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मेरा गाँव, मेरे लोग

बहुत सोचता हूँ इस महानगर को छोड़ दूं, कहीं गाँव चला जाऊं। फिर देखता हूँ मेरे आस-पास एक गाँव बसता जा रहा है। मेरे अपने बनते जा रहे लोगों का गाँव। छोटी-छोटी बातें हैं। लेकिन बड़ी महत्वपूर्ण हैं। हमें इस मोहल्ले में आये चार महीने हुए। घर पर अखबार की बंदी नहीं लगाई है। रोज […]

पिता और मैं [कविता]

पिता और मैं  १. पिता जब सो रहे होते पेट के बल मैं उनके कंधे पर बैठ उनके घुँघराले बालों को सीधा करने का प्रयास करता २.  मैं पिता को ध्यान से देखता जब पिता दाढ़ी बनाते फिर छूकर उनके चिकने गालों को मैं उनके काम की सफलता की पुष्टि करता ३. ये वे दिन […]