Tag Archives: कविता

सागर हो जाओ – कविता

तुमने चाहा थाऐसा हो एक घर जिसकी खिड़की सेदिखता हो सागरतुमने सागर में डूब जाना नहीं चाहा कभी डूबकर सागर ही हो जाना नहीं चाहा कभी डूब जाओसागर हो जाओ खिड़की से जो दिखेगा आखिर कब तक टिकेगा – हितेन्द्र अनंत

माणसाने (नामदेव ढसाळ की मराठी कविता का हिंदी अनुवाद)

मराठी के प्रख्यात कवि, दलित चेतना के प्रमुख स्वर श्री नामदेव ढसाळ का आज सुबह निधन हो गया। उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी एक महान रचना “माणसाने” के अनुवाद का प्रयास ज़ारा अकरम खान, Krantikumar Arade और Dinesh Kapse के सहयोग से किया है। आप भी पढ़िये। (अनुवाद की सारी त्रुटियाँ केवल और केवल मेरी)। माणसाने – नामदेव ढसाळ ‌‌‌————– मनुष्य पहले तो […]

प्रतिमाखंडन – कविता

तुम पूजते आये थे अब तक जिन्हें   भांति-भांति के देवता सभी ऊंची थी उनकी प्रतिमाएँ मूक-हृदयहीन पत्थर की वह देखो  लड़ रहे हैं आपस में पत्थर के देवता सभी जैसे चूर कर देंगे एक दूसरे को अभी के अभी पर तुम ठहरो बस देखो तमाशा दूर से चूर हो जायें इनमें से बहुत से […]

भैंस के आगे बीन [कविता]

भैंस के आगे बीन: प्रधानमंत्री हे! हे भारत की सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन रीढ़ विहीन! छोड़ दो! पद त्याग दो! तुम्हारे नहीं! हम हैं अपने देश के सर्वोच्च आसन के सम्मान की चिंता में लीन! वो जिसे अंग्रेजी में कहते हैं कीन! मानव ही हो या यंत्र हो या हो तुम कोइ भैंस? […]

आरंभ और अंत [कविता]

ऊंचे पर्वतों पर किसी गंगोत्री से जो निकले उस जलधारा का गंगा हो जाना और मिल जाना समुद्र से अंततः क्या है? नियति है? या सचेत एक निर्णय है उस जलधारा का? या यह कि पर्याय नहीं कोई गंगा हो जाने के अतिरिक्त!   वनों के एकांत में जो मिलते हैं उन असंख्य झरनों का […]

पिता और मैं [कविता]

पिता और मैं  १. पिता जब सो रहे होते पेट के बल मैं उनके कंधे पर बैठ उनके घुँघराले बालों को सीधा करने का प्रयास करता २.  मैं पिता को ध्यान से देखता जब पिता दाढ़ी बनाते फिर छूकर उनके चिकने गालों को मैं उनके काम की सफलता की पुष्टि करता ३. ये वे दिन […]

सौ रूपये की कॉफ़ी पीने वाले [कविता]

सौ रूपये की कॉफ़ी पीने वालों को देखकर मेरे मन में अनेक प्रश्न उठते हैं।   बाज़ार में सौ रूपये की कॉफी मिलती है यदि यह मैं मम्मी से कह दूँ तो मम्मी हँसेगी कहेगी ये भी कैसे हो सकता है भला? हिसाब लगा लेगी मम्मी तुरंत इतने का दूध, इतने की कॉफ़ी और इतने […]

नजर मिला सवाल कर, जो हो सके बवाल कर

पाई-पाई का हिसाब ले नजर मिला सवाल कर जब राजा ही डकैत हो जो हो सके बवाल कर॥   रत्नगर्भा धरती यह जननी तेरी धरती के सारे रत्नों को चोर लिया सुजलाम-सुफलाम धरती यह जननी तेरी जल-जंगल को और फसल को चोर लिया चोर लिया फिर भी जब पेट न भरा इनका तुझसे तेरी धरती […]

एक हिंसा और हो, एक हत्या और हो

ज्योति जो है सूर्य में, दीप में भी है वही। सूर्य हो या दीप हो, परिचय ज्योति एक है॥ एक ग्रंथ था लिखा, ज्योति का भेद मिटाने को। एक ग्रंथ था लिखा, परिचय को मिथ्या बताने को॥ एक ‘नाम’ था दिया, कि नाम, नाम में हो विलय। एक नाम था दिया, कि नाम, नाम से […]

स्मृति क्या है

स्मृति क्या है?   स्कूल की टाटपट्टी है जिसे बिछाने, झटकने और लपेटने की पारियाँ बंधी होती थीं।   पापा की बुलेट की टंकी है जिस पर बैठकर मैं एक्सीलरेटर घुमाता और सोचता कि गाड़ी चल रही है।   स्कूल के पास का कुँआ है जिसका पानी मीठा था और जिसमें मेरी चाक-कलम गिर गयी […]