प्यार क्या होता है? थोड़ा बहुत जो जैविक कारणों से होता है, उसे छोड़ दें, तो प्यार दरअसल सभ्यता की पैदाइश है। अपवादों को छोड़ दें तो जानवर प्यार नहीं करते। आदिमानव भी नहीं करता था। प्यार सभ्यता के साथ विकसित हुआ है। वफ़ादारी, साथ जीने और ख़्याल रखने जैसी बातें उसके घटक हैं। ये […]

पहले गन्ना होता था। फिर ये कोई भारत में ही था जिसने उसे चूसकर थूक नहीं दिया, सदियों पहले उसका रस इकट्ठा किया, ये बात आगे बढ़ी तो गुड़ बना, शक्कर बनी। कोई था जिसने सोचने की जुर्रत की। उस समय लोग उसे कहते कि नहीं परंपरा है, गन्ना चूस के फेंक दो, उसका रस […]

“नोट बने अंगारे” महाकवि, जनक्रांतिदूत, रूस के निवासी, कॉमरेड निरालाई गुप्तेस्तोव नोटबंदी के कारण बदहाल हुए भारत के सर्वहारा वर्ग की पीड़ा से इतना चिंतित हैं कि उन्होंने एक नए काव्य संग्रह की घोषणा की है। संग्रह का नाम होगा “नोट बने अंगारे”। यह रूस के अगति प्रकाशन से प्रकाशित किया जाएगा। मूल्य होगा – […]

भारत जैसे देशों की उम्र आंकना समझदारी नहीं है. यदि यह सही है कि भारत एक देश है और आने वाली सदियों तक ऐसा ही बना रहेगा, तो फिर ऐसा कोई समय बिंदु नहीं हो सकता जहां आकर सब ठीक हो जाए. क्या आज से सात सौ साल बाद भारत में कोई समस्या नहीं रहेगी? […]

फिल्म समीक्षा : डिअर ज़िन्दगी   हिन्दी सिनेमा के लिए यह एक नया विषय और नए किस्म की कहानी है. पहली बार यह भी हुआ कि शाहरुख और आलिया भट्ट साथ अभिनय कर रहे हैं. उस पर निर्देशिका हैं गौरी शिंदे जिनकी पहली फ़िल्म इंग्लिश-विन्ग्लिश काफी प्रभावी थी. कहानी यूं है कि काइरा (भट्ट) एक […]

१. हिन्दू धर्म में जो सुधार हुए हैं प्रायः बाहर से आए हैं. हालिया बदलाव न्यायालय के फैसले से संभव हुआ, किसी हिन्दू नेता या संत-मठाधीश को इतने सालों से एक घटिया परम्परा को सुधारने की कोई जरूरत महसूस नहीं हुई थी. बाके स्वरूपानंद का बयान सबके सामने है. (“महिलाओं को प्रवेश से बलात्कार बढ़ेंगे”) […]

बहुत डर लग रहा है. सुना है १२५ करोड़ के इस देश को पूरे ५ लड़कों के नारों से ख़तरा पैदा हो गया है. जब से पाकिस्तान और चीन को इस बात का पता चला है दोनों मिलकर सर कूट रहे हैं..

१. मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चार डिब्बे पहला रोटी दूजा दवाई तीजा किताबें चौथा थोड़ा अमन चैन चला सकोगे? २. कर्ज़ा जापान का पुर्ज़ा जापान का ट्रेन सेठ की सफ़र सेठ का तमाशा साहेब का तारीफ़ साहेब की आँखें ग़रीब की तालियाँ ग़रीब की – हितेन्द्र अनंत

भाषा हमारे अंदर का झूठ पकड़ ही लेती है.
बीते कुछ दशकों या एकाध सदी में हम इतने झूठे हो गए हैं कि हमारा अपने ही वचन पर विश्वास नहीं रह गया है. हम यह भी जानते हैं कि दूसरों को भी हमारे कहने पर विश्वास नहीं ही होना है. इसलिए हमने “रिअली”, “वाकई”, “सचमुच”, “वास्तव में” “कसम से” जैसे शब्द गढ़ लिए हैं.

आजकल हम प्रत्येक घटना के “स्थानीय” पहलू पर ही ध्यान देते हैं। जैसे कि एक दलित ने कुछ दिन पहले मंदिर प्रवेश किया तो उसे ज़िंदा जला दिया गया। हमारी और सरकार की प्रतिक्रिया यहीं तक सीमित रहती है कि घटना की जांच हो और दोषियों को सजा मिले। वह भी तब जब हमारे समय […]