श्रेणी समाज

भारतीय परिवारों की एकजुटता बनाम बिखराव

१. ऐसा कहा जाता है कि भारत में परिवारों का एकजुट रहना, भारत की संस्कृति के कारण है। २. यह केवल आंशिक रूप से सत्य है। आंशिक रूप से सत्य इसलिए क्योंकि भारत सहित अधिकांश एशियाई समाजों में व्यक्ति से बढ़कर परिवार व समाज शक्तिशाली रहे हैं एवं मनुष्य की दैनिक गतिविधियों के केंद्र में […]

शनि शिंगणापुर प्रकरण के बहाने

१. हिन्दू धर्म में जो सुधार हुए हैं प्रायः बाहर से आए हैं. हालिया बदलाव न्यायालय के फैसले से संभव हुआ, किसी हिन्दू नेता या संत-मठाधीश को इतने सालों से एक घटिया परम्परा को सुधारने की कोई जरूरत महसूस नहीं हुई थी. बाके स्वरूपानंद का बयान सबके सामने है. (“महिलाओं को प्रवेश से बलात्कार बढ़ेंगे”) […]

किस्सा ऊँच नीच का

महाराष्ट्र में तीन पीढ़ियों से रह रहे राजस्थान के गौड़ ब्राह्मण परिवार के एक बुजुर्ग दम्पति घर आए थे। ये दो सालों से अपने पुत्र के विवाह के लिए रिश्ता ढूंढ रहे हैं। मौसम और फ़िल्मी दुनिया के बाद बात जब राजनीति पर पहुँची तो मुझे “पूरा भारत एक है, हम सब भारतीय हैं, हिंदुओं […]

विविधता मर रही है, विविधता अमर रहे!

यदि किसी उद्यान के सभी फूल एक ही रंग के हों तो भला उस उद्यान की शोभा ही क्या रह जाएगी? एकरूपता में सौंदर्य कैसा? सौंदर्य तो विविधता में ही होता है। भारतीय होने के नाते विविधता को जितना निकट से हम देखते-समझते हैं, उतना अवसर अन्य किसी देश के लोगों को शायद ही मिलता […]