श्रेणी दर्शन (Philosophy)

नफ़रत का मोहब्बत में बदल जाना

एक रोचक क़िस्सा सुनाता हूँ। संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन जी की मृत्यु के करीब एक महीने पहले ईद के दिन उन्होंने भोपाल के कोह-ए-फ़िज़ा इलाके में मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की इच्छा व्यक्त्त की। मप्र के तब के गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने इसकी मालूमात होते ही तुरन्त वहाँ जाकर उन्हें मस्जिद जाने से […]

हिन्दू धर्म में बहुत कुछ है जो संघ-भाजपा छोड़ चुके

संघ और भाजपा जिस तरह का हिन्दू धर्म भारत में थोपना चाहते हैं उसके कुछ ख़ास लक्षण इस प्रकार हैं: १. इसमें वैष्णव धारा से केवल शाकाहारी मूल्यों को लिया गया है। उसमें जो सात्विकता, सत्यवादिता, परहित एवं अहिंसा जैसे मूल्य हैं, उन्हें छोड़ दिया। २. शैव-शाक्त धाराओं से केवल हिंसक भाव लिए हैं। उनमें […]

प्यार और सभ्यता

प्यार क्या होता है? थोड़ा बहुत जो जैविक कारणों से होता है, उसे छोड़ दें, तो प्यार दरअसल सभ्यता की पैदाइश है। अपवादों को छोड़ दें तो जानवर प्यार नहीं करते। आदिमानव भी नहीं करता था। प्यार सभ्यता के साथ विकसित हुआ है। वफ़ादारी, साथ जीने और ख़्याल रखने जैसी बातें उसके घटक हैं। ये […]

क्या हिन्दू सहिष्णु होते हैं? क्या सेकुलरिज़्म हमारे डीएनए में है?‏

क्या हिन्दू सहिष्णु होते हैं? क्या सेकुलरिज़्म हमारे डीएनए में है? (संदर्भ – प्रधानमंत्री का हालिया भाषण) यह कहना कि सेकुलरिज़्म हमारे डीएनए में है, यह पहले अधिक चर्चित तरीके से यों कहा जाता था कि हिंदू सहिष्णु होते हैं। यह हिंदुओं की प्रकृति मानी जाती है। मेरा मत है कि यह एक प्रकार का […]

नास्तिकता पर स्फुट विचार

(मैंने फेसबुक पर नास्तिकता के संबंध समय-समय पर जो लिखा है उसे यहाँ संग्रहित किया जा रहा है – हितेन्द्र अनंत) 1‌‌‌‌… नास्तिकता पर कुछ निजी विचार: 1. नास्तिक होने का अर्थ तर्कशील, स्वतन्त्र-चिंतक एवं विज्ञानवादी होना है। इसके तहत ईश्वर को नकारना स्वाभाविक रूप से आता है। 2. नास्तिक होने का नैतिकता एवं मूल्यों […]

संभवामि युगे युगे?

भारत का जनजीवन हजारों वर्षों से अवतारों की कहानियों के साथ विकसित होता आया है। अलग-अलग युगों में बहुत से अवतारों ने “तारणहार” की भूमिका निभायी है। एक ऐसे समाज में जहाँ बच्चा पैदा होते ही अवतारों की कहानियाँ सुनता है, उनकी पूजा करता है और उन्हीं को आदर्श मान अपने जीवन मूल्यों को गढ़ता […]

ज्ञानार्जन – स्वामी विवेकानंद

ज्ञानार्जन -स्वामी विवेकानंद ज्ञान के आदि स्रोत के संबंध में विविध सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं। उपनिषदों में हम पढ़ते हैं कि देवताओं के संबंध में प्रथम और प्रधान ब्रह्मा जी ने शिष्यों में उस ज्ञान का प्रचार किया, जो शिष्य परंपरा द्वारा अभी तक चला आ रहा है। जैनों के अनुसार उत्सर्पिणि एवं अवसर्पिणि […]

लोहा, लोहे को नहीं काटता!

मेरे एक मित्र हैं जिन्हें ठंड के दिनों में आईसक्रीम खाना पसंद है। वे गर्मी के दिनों में आईसक्रीम खाने से ज़्यादा चाय पीना पसंद करते हैं। उनसे इस उल्टी आदत का कारण पूछने पर कहते हैं – “लोहा ही लोहे को काटता है”। पर मैं सोचता हूँ कि क्या यह हमेशा ही सही है? […]

एक हिंसा और हो, एक हत्या और हो

ज्योति जो है सूर्य में, दीप में भी है वही। सूर्य हो या दीप हो, परिचय ज्योति एक है॥ एक ग्रंथ था लिखा, ज्योति का भेद मिटाने को। एक ग्रंथ था लिखा, परिचय को मिथ्या बताने को॥ एक ‘नाम’ था दिया, कि नाम, नाम में हो विलय। एक नाम था दिया, कि नाम, नाम से […]

हिन्दी की ‘शुद्धता’ पर फेसबुक में चर्चा

हिन्दी भाषा की क्लिष्टता अथवा शुद्धता के विषय पर फेसबुक पर एक मित्र का आलेख पढ़ा। पहले भी उनके आलेख पढ़ता आया हूँ और निःसंदेह वे अत्यंत ज्ञानी, राष्ट्रवादी और हिन्दी भाषा के बहुत ही अच्छे जानकार हैं। उनके प्रति पूर्ण आदर है। नाम आदि का उल्लेख न करते हुए यह बता दूँ कि उनका […]