नीले आसमान के तले काली धरती की कहानी है काला !

फ़िल्म “काला” देखी। हिंदी में डबिंग थी सो मूल फ़िल्म जैसा अनुभव नहीं हो सकता। लेकिन फ़िल्म कैसी लगी यह बताने से ज्यादा महत्वपूर्ण है यह बताना कि ऐसी फिल्मों का इस स्तर पर बनना और सफ़ल होना कितना अधिक महत्वपूर्ण है।

तमिल फिल्म निर्देशक पा रंजीत (काला के भी निर्देशक) दलित हैं, वैसे ही जैसे मराठी के नागराज मंजुळे (सैराट, फैंड्री) या हिंदी के नीरज घायवान (मसान)। एक दलित निर्देशक का भारत के सबसे बड़े सुपरस्टार को लेकर फ़िल्म बनाना, तमिल फ़िल्म की कहानी के लिए मुम्बई को चुनना और धारावी के भीतर भी गतिविधियों के केंद्र में भीमवाड़ा और एक बौद्ध विहार का आना प्रचलित भारतीय सिनेमा के लिए अद्भुत घटना है।

देखा जाए तो कथानक सामान्य है, बल्कि एक किस्म का दोहराव लिए है। गरीबों की बस्ती को “विकास” के नाम पर उजाड़ने वाले नेता और बिल्डर का विरोध करने वाला बस्ती का एक नेता या कि लोकप्रिय गुंडा। कहानी अन्य तमिल फिल्मों की तरह अतिरंजित है। नायक रजनीकांत है तो मारपीट के दृश्य भी वैसे ही हैं। लेकिन यह फ़िल्म तकनीकी या कलापक्ष को लेकर याद नहीं रखी जाएगी। यह फ़िल्म इसलिए याद नहीं रखी जाएगी कि यह “कैसी है’, बल्कि इसलिए कि यह “क्या है”।

इस फ़िल्म में प्रतीकों का बेहद मज़बूती से इस्तेमाल हुआ है। फ़िल्म का नायक (रजनीकांत) काला है। हमेशा काले कपड़े पहनता है। मुम्बई में आज भी बाहरी माना जाने वाला तमिल है। दलित है। डॉक्टर आम्बेडकर की तस्वीरें पृष्ठभूमि में अनेक बार आती हैं। एक बौद्ध विहार है। नीला झंडा है। नायक के बेटे का नाम “लेनिन” है, तमिलनाडु के लिए यह अचरज की बात नहीं लेकिन फिल्मों के नायक के लिए फिर भी है। नायक एक दलित है जिसकी मुसलमान प्रेमिका है जिनकी शादी के लिए दोनों परिवार सहर्ष राजी हो गए थे, हालांकि शादी हो न सकी। काला की शादी की सालगिरह में गायन का काम मुसलमान कव्वालों के जिम्मे है। उसके बेटे की प्रेमिका एक मराठी मुलगी है। उसकी बस्ती में हिन्दू-मुसलमान का भेद नहीं।

फ़िल्म का खलनायक (नाना पाटेकर) ब्राह्मण है। उसे काला रंग चुभता है। वह दलितों के घर का पानी नहीं पीता। उनकी जगह अपने पैरों में समझता है। वह इस देश को “स्वच्छ” और “पवित्र” बनाना चाहता है। वह “डिजिटल धारावी” का सपना दिखाता है। उसके लिए नायक काला का मतलब “रावण” है। नाना पाटेकर के पोस्टर-बैनर सब कुछ केसरिया हैं।

फ़िल्म के अंतिम दृश्य में रंगों का स्क्रीन पर छा जाना अद्भुत है। केसरिया रंगों और झंडों से सजी धारावी का परिदृश्य और नाना पाटेकर के सफ़ेद कपड़े, सबकुछ यकायक काले रंग से पुत जाते हैं। चारों तरफ़ काला रंग छा जाता है, और फिर थोड़ी देर बाद अचानक सब कुछ नीला हो जाता है। नीला गुलाल सारी दुनिया को जैसे नीला कर देता है। पूरी तरह काले होकर नाच रहे लोग अब नीले रंग से सराबोर हैं। जिधर देखो उधर नीला है।

पा रंजीत की फ़िल्म काला, नागराज मंजुळे की फिल्मों से अलग है। वह कला प्रधान नहीं है। वह संकेतों में बात नहीं करती। वह सीधे-सीधे दलित दुनिया को ही मुख्यधारा बना देती है। कोई लागलपेट नहीं। नागराज की फिल्में गहरा असर छोड़ती हैं। पा रंजीत की फ़िल्म ललकार कर अपनी बात कहती है। सैराट की तरह काला एक मनोरंजक फ़िल्म है। सैराट हालांकि कलात्मकता के पैमाने पर कहीं ऊपर है। नीरज की बेहद मज़बूत और प्रभावी फ़िल्म “मसान” को पूरी तरह प्रचलित सिनेमा की फ़िल्म नहीं कहा जा सकता। काला प्रत्येक फ्रेम में लोकप्रिय-प्रचलित सिनेमा की तरह बनाई गई है। यही सबसे ख़ास बात है।

अभिनय सभी का अच्छा है। रजनीकांत तो रजनीकांत हैं ही, उनके अलावा, नाना भी हमेशा की तरह सहज हैं। “न्यूटन” के बाद रजनी पाटिल का अभिनय इस फ़िल्म में भी ज़ोरदार है। लेनिन की भूमिका में मणिकन्दन अच्छे लगे। पंकज त्रिपाठी को लेकर अब एक ऐसी फिल्म बननी चाहिए जिसमें वो मुख्य भूमिका में हों। यह आदमी क़िरदार में इस तरह डूब जाता है कि लगता ही नहीं कि इससे पहले इसने कोई और भूमिका की है। हुमा कुरैशी ने कुछ खास प्रभावित नहीं किया। रजनीकांत की पत्नी की भूमिका में ईश्वरी राव खूब जंचीं।

हितेन्द्र अनंत

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