लियू शियाओबो (Liu Xiaobo)

“वह मर गया, लेकिन उसके नाम पर फ़िल्मी रोना-धोना शुरू हो गया है। हम बैठकर इसका मज़ा लेंगे।” – चीनी अख़बार ग्लोबल टाइम्स, एक ट्वीट में जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया।
“The person’s gone but a blockbuster tear-jerker is just on — we’ll sit back and enjoy the show.” – Global Times

लियू उन नौजवानों में शामिल थे जिन्होंने तिएनआमेन चौक पर लोकतंत्र की माँग करते हुए चीनी टैंकरों का सामना किया था। लियू चार्टर-8 के सहलेखक थे जिसमें चीनी नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की माँग की गयी थी।

चीन की सरकार ने लियू को जेल भेज दिया। उन्हें नोबल शांति पुरस्कार दिया गया। चीन की सरकार ने तब उनकी पत्नी को भी नजरबंद कर लिया ताकि वे जाकर अपने पति की ओर से पुरस्कार हासिल न कर लें।

पिछले कुछ हफ़्तों में जब वे कैंसर से लड़ाई के अंतिम क्षणों में थे, तब चीनी डॉक्टरों ने सलाह दी कि उन्हें विदेश में (अमेरिका या जर्मनी) भेजा जाए ताकि उनकी हालत सुधारने के प्रयास हो सकें। चीन की सरकार ने यह माँग ठुकरा दी और उन्हें मर जाने दिया।

अब जब पूरी दुनिया में चीन की सरकार की भर्त्सना हो रही है। तब चीन का तानाशाही निज़ाम इंटरनेट के हर कोने से उनका नाम मिटाने में जुटा हुआ है। सर्च इंजिन से संदर्भ मिटाए जा रहे हैं। चीन के नागरिकों द्वारा सोशल मीडिया पर दिए गए श्रद्धांजलि संदेश भी मिटाए जा रहे हैं।

चीन एक बेहद शक्तिशाली लेकिन बेहद डरा हुआ तानाशाही मुल्क़ है। वहाँ के नागरिकों के मानवाधिकारों का कोई अस्तित्व नहीं है। केवल एक पार्टी का राज है। मज़दूरों के अधिकारों का भयंकर हनन होता है। मजदूरों को हड़ताल वगैरह करने की भी आज़ादी नहीं है। इन सभी बातों पर लियू लिखते थे, इसलिए चीन की आँखों में खटकते थे।

भारत में कम्युनिस्टों का एक वर्ग चीन में जन्नत के दर्शन करता है। प्रायः सभी कम्युनिस्ट, फ़िलस्तीन से लेकर क्यूबा तक के सरोकार रखने वाले, चीनी तानाशाही पर चुप रहते हैं। आप पूछेंगे तो वे खानापूर्ति के लिए कुछ कह देंगे। लेकिन सारी दुनिया के मसलों पर रैली, हड़ताल, पोस्टर, पैम्फ्लेट, कैंडिल मार्च वाले ये क्रांतिदूत लियू पर चुप रहेंगे।
– हितेन्द्र अनंत।

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