भारतीय परिवारों की एकजुटता बनाम बिखराव

१. ऐसा कहा जाता है कि भारत में परिवारों का एकजुट रहना, भारत की संस्कृति के कारण है।
२. यह केवल आंशिक रूप से सत्य है। आंशिक रूप से सत्य इसलिए क्योंकि भारत सहित अधिकांश एशियाई समाजों में व्यक्ति से बढ़कर परिवार व समाज शक्तिशाली रहे हैं एवं मनुष्य की दैनिक गतिविधियों के केंद्र में रहे हैं।
३. भारतीय परिवार लंबे समय तक एकजुट रहे हैं। लेकिन उसके पीछे के कारण सांस्कृतिक कम और आर्थिक अधिक हैं।
४. एक लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान रही। आजादी के पहले तक भारतीय परिवारों में बंटवारे के स्पष्ट नियम भी नहीं थे। इसलिए खेती से जुड़े परिवारों के सदस्य मजबूरन साथ रहते थे।
५. भारतीय समाज में व्यापार व रोज़गार के अनेक ऐसे साधन थे जो जातिगत थे। अर्थात एक ही जाति के लोग उस काम को करते थे। ऐसे कामों को सीखने और फ़िर उससे जुड़े बाज़ार में बने रहने के लिए परिवारों की एकजुटता आवश्यक थी।
६. जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था का औद्योगीकरण होता गया, आय के साधनों के लिए व्यक्ति की परिवार पर निर्भरता ख़त्म होती गई। आधुनिक अर्थव्यवस्था में कमाने वाला अकेला व्यक्ति होता है। उसे अपनी आय के लिए जाति या परिवार पर अपेक्षाकृत कम निर्भर रहना होता है।
७. नयी अर्थव्यवस्था ने हालांकि एकल परिवारों को जन्म दिया, फ़िर भी पुराने संस्कारों के बने रहने के कारण आज भी संयुक्त परिवारों को नैतिक रूप से ऊँचा दर्जा हासिल है।
८. एकल परिवारों के लोगों का आदर्श आज भी संयुक्त परिवार है। “सब कुछ अच्छा रहे” तो एकल परिवार, संयुक्त बन जाना चाहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा। जो परिवार दिखने के संयुक्त हैं भी, उनमें भी अंदर भयानक बिखराव, मनमुटाव आम है।
९. ऐसा नहीं है कि संयुक्त परिवार अच्छे नहीं होते, या एकल परिवार अधिक अच्छे होते हैं। यदि लोग साथ मिलजुलकर रह सकें तो इससे अच्छा भला क्या होगा? लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।
१०. ऐसा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि भारतीय परिवार इस बात को भूल जाते हैं कि व्यक्ति परिवार की इकाई है। व्यक्तियों के जुड़ने से परिवार बनता है। परिवारों के गठन का उद्देश्य ही व्यक्ति की भलाई है।
११. परिवारों का जीने का एक सामूहिक तरीका होता है, व्यक्तियों के जीने का तरीका व्यक्तिगत होता है।
१२. प्रायः परिवारों में, परिवारों के भीतर, व्यक्ति की स्वतंत्रता, उसकी पसंद-नापसंद और उसकी निजता के दायरे की उपेक्षा की जाती है। व्यक्ति पर परिवार हावी हो जाता है। परिवार की इच्छा व्यक्ति की इच्छा का दमन करती है।
१३. यह परिवार की कथित इच्छा दरअसल परिवार के मुखिया या परिवार के सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्ति/व्यक्तियों की इच्छा होती है।
१४. निजी तौर-तरीकों का दमन ही परिवारों में मनमुटाव और अंततः बिखराव का कारण बनता है।
१५. यदि परिवारों को एकजुट रहना है तो उन्हें निजी और सामूहिक के बीच संतुलन बनाना सीखना होगा।
१६.यदि परिवारों के भीतर रहकर भी निजी आज़ादी क़ायम रहे तो व्यक्ति परिवार से अलग नहीं होगा।
१७. व्यक्तियों को भी चाहिए वे तय करें कि उनकी निजी आज़ादी की सीमाएं क्या हैं? उसके बाहर वे परिवार की जरूरतों से सहकार करें और समझौतों के लिए भी तैयार रहें।
१८. परिवार हमेशा व्यक्ति से अधिक शक्तिशाली होता है, इसलिए परिवार की एकजुटता का पहला जिम्मा उसका है न कि व्यक्ति का।
१९. परिवारों की एकजुटता का दूसरा उपाय है सभी सदस्यों का समान रूप से सम्मान व बड़े-छोटे या पुरुष-स्त्री के नाम पर भेदभाव का ख़त्म होना।
२०. यदि परिवार के भीतर व्यक्ति की निजी भावनाओं, आकांक्षाओं और जीने के तरीकों को सम्मान मिलेगा तब ही परिवार खुशहाल और एकजुट रह पाएंगे।
२१. जिन परिवारों में ऐसा नहीं हो सकता, टूट जाना ही उनकी नियति है।
-हितेन्द्र अनंत

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