अभाविप को डर लगता है

पहले गन्ना होता था। फिर ये कोई भारत में ही था जिसने उसे चूसकर थूक नहीं दिया, सदियों पहले उसका रस इकट्ठा किया, ये बात आगे बढ़ी तो गुड़ बना, शक्कर बनी। कोई था जिसने सोचने की जुर्रत की। उस समय लोग उसे कहते कि नहीं परंपरा है, गन्ना चूस के फेंक दो, उसका रस इकट्ठा मत करो, तो शक्कर नहीं बनती।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नहीं चाहती कि शक्कर बने। वो गन्ना चूस के फेंक देंते हैं। जो रस इकट्ठा करेगा वो उसका ख़ून चूस के फेंक देने के ख़्वाब पालते हैं, हालांकि करते उतना नहीं, खाली मारपीट से काम चला लेते हैं। उनका साथ अनेक पुलिसवाले और कुछ बूढ़े प्रोफ़ेसर दे रहे हैं। ये वो प्रोफ़ेसर हैं जो शक्कर कभी नहीं बना पाएंगे, लेकिन दूसरे ने बनाई तो उनसे देखा नहीं जाएगा।

सोचता हूँ आज कोई तेरह साल का बालक केरल के कलाडी गांव से निकले और ओंकारेश्वर जाकर कहे कि जगत मिथ्या है, तो उसे सबसे पहले जूता अभाविप और विहिप वाले ही मारेंगे। आज से कुछ सदियों पहले एक बालक ने ऐसा किया था, उसका नाम शंकर था। फिर वो शंकराचार्य बना। शंकर आज होता तो अभाविप का सदस्य कभी नहीं बनता।

ज़्यादा पुरानी बात क्यों, 150 साल पहले कलकत्ते में नरेन्द्र नाम का बालक था। वह अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से कहता था कि तुम यह सब जो कहते हो वह बकवास है, उसमें कोई तर्क नहीं है। तब परमहंस के अन्य शिष्य यदि अभाविप के सदस्य होते तो नरेन्द्र की ठुकाई कर देते और वह विवेकानंद नहीं बन पाता। परमहंस भी नरेन्द्र की बात सुनकर चिढ़ते नहीं थे। हँसते थे। आज के कुछ बूढ़े प्रोफेसर सवाल सुनकर चिढ़ जाते हैं।

अच्छा हुआ अभाविप तब नहीं थी। अब है भी तो उससे डरने की कोई बात नहीं। दरअसल डर अभाविप को लगता है। मार्क्स या आम्बेडकर दूर की कौड़ी हैं, पढ़ते नहीं वो अन्यथा उन्हें शंकराचार्य और विवेकानंद से भी डर लगने लगेगा।
-हितेन्द्र अनंत

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