शनि शिंगणापुर प्रकरण के बहाने

१. हिन्दू धर्म में जो सुधार हुए हैं प्रायः बाहर से आए हैं. हालिया बदलाव न्यायालय के फैसले से संभव हुआ, किसी हिन्दू नेता या संत-मठाधीश को इतने सालों से एक घटिया परम्परा को सुधारने की कोई जरूरत महसूस नहीं हुई थी. बाके स्वरूपानंद का बयान सबके सामने है. (“महिलाओं को प्रवेश से बलात्कार बढ़ेंगे”)
२. सती, बालविवाह, स्त्रियों के विवाह व संपत्ति संबंधी अधिकार, ये सभी अंग्रेजों के क़ानून या डॉ. आम्बेडकर द्वारा बनाए गए हिन्दू कोड बिल की देन हैं. हिन्दू मठाधीशों ने इन कानूनों का घोर विरोध किया था जो कि इतिहास में दर्ज है.
३. अच्छी बात यह है कि (केवल धार्मिक कुरीतियों के संबंध में) बाहर से जब कभी ऐसे बदलाव आते हैं, इनका विरोध प्रायः कमजोर होता है या नहीं होता. हिंसक विरोध प्रायः नहीं देखा गया है. लेकिन जब कभी ऐसे बदलाव जाति व्यवस्था के संबंध में आते हैं तब हिंसक विरोध होता है.
४. यह पुनः इस बात को साबित करता है कि एक हिन्दू के लिए उसका विश्व उसकी जाति-बिरादरी तक सीमित है. उसे धर्म से अधिक अपनी जाति से लेना देना है. वह एक जाति के अंतर्गत संगठित है, न कि एक धर्म केअंतर्गत.
५. मंडल आयोग के तहत लागू किए गए आरक्षण का घोर हिंसक विरोध हुआ था. विभिन्न अगड़े जाति समूह आरक्षण मांगने के लिए हिंसक आन्दोलन करते रहते हैं.
६. यूपीए शासन में जब उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े तबकों को आरक्षण दिया गया तब उसका भी ज़ोरदार विरोध हुआ था.
६. अस्पृश्यता उन्मूलन का विरोध आज भी जारी है. मानसिक अस्पृश्यता ख़त्म नहीं हुई है. दलितों के खिलाफ हिंसक अत्याचार बदस्तूर जारी हैं. यानी हिन्दू सवर्ण समाज ने उन बदलावों को न तो स्वीकार किया है न ही आत्मसात.
७. यहाँ यह भी कहना आवश्यक है कि भारत के मुसलामानों ने बाहर या भीतर से आने वाले ऐसे बदलावों को कभी स्वीकार नहीं किया है. हिन्दू समाज के मुकाबले उनके बदलाव स्वीकारने की क्षमता कमजोर है. इसलिए वहां बदलाव कम हुए हैं. ऐसे बदलाव जो विशुद्ध मुस्लिम मुल्कों में हुए हैं, वे यहाँ भारत में लाना कठिन हो गया है. तीन तलाक, तलाक के बाद गुजारा भत्ता, शाहबानो, आदि का उदाहरण लीजिए.
८. बदलावों के प्रति बंददिमागी रवैया भारतीय मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन का एक कारण है – अनेक अन्य कारणों में से.
९. हिन्दू अतिवादी यह कभी न कहें कि हिन्दू धर्म ने समय के साथ खुद को बदला है. सत्य यह है कि जहां तक कुरीतियों के बदलने का प्रश्न है, ये बदलाव बाहर से आए हैं भीतर से नहीं.
१०. अब दोनों खेमों के संघी व मुसंघी पत्थर फेंकना शुरू कर सकते हैं.

– हितेन्द्र अनंत

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