ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम ख़ूब लगा लो नारा

बहुत डर लग रहा है. सुना है १२५ करोड़ के इस देश को पूरे ५ लड़कों के नारों से ख़तरा पैदा हो गया है. जब से पाकिस्तान और चीन को इस बात का पता चला है दोनों मिलकर सर कूट रहे हैं…जिस देश से मुकाबले के लिए उन्होंने अरबों डॉलर नाभिकीय अस्त्र बनाने में लगा दिये उसे फ़कत कुछ नारों से हिलाया जा सकता है. तैयार हो जाइये…अब सीमा पार से गोलीबारी नहीं नारेबाजी होगी. सैनिकों को बारूद नहीं नमक के पानी के गरारों की जरूरत है…अपने नारे भी उतने ही बुलंद होने चाहिए. हो सकता है वे अमेरिका से नारे ख़रीद लें, हमें भी रूस से बात कर लेनी चाहिए. उनका नारे लगाने का इतिहास पुराना है. नारों का इतिहास हमारा भी है…१९४७ के पहले हमने खूब नारे लगाए. लेकिन तब के नारे लगाने वालों को शायद यह नहीं मालूम था कि १९४७ के बाद एक ऐसा दिन भी आएगा जब इस देश में नारे लगाने की आज़ादी ख़त्म हो जाएगी. वैसे इस आज़ादी को ख़त्म करने वाले वही लोग हैं जो १९४७ के पहले नारे नहीं लगाते थे. लगाते तो उनमें से कोई तो जेल जाता…वो तो सरकारी गवाह बनकर नारे लगाने वालों को जेल भिजवाया करते थे. १९४८ के आते ही उन लोगों ने उस बूढ़े की हत्या कर दी थी जिसने हमें सबसे अधिक और मजबूत नारे दिए थे. अब ये लोग सत्ता में हैं तो नारों से उनका डर अस्वाभाविक नहीं है. सोच रहा हूँ उस गाने का क्या नया संस्करण होना चाहिए जो लता जी ने १९६२ की लड़ाई के बाद गाया था…”ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम ख़ूब लगा लो नारा”.
– हितेन्द्र अनंत

One comment

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