यह सचमुच सच है!

भाषा हमारे अंदर का झूठ पकड़ ही लेती है.
बीते कुछ दशकों या एकाध सदी में हम इतने झूठे हो गए हैं कि हमारा अपने ही वचन पर विश्वास नहीं रह गया है. हम यह भी जानते हैं कि दूसरों को भी हमारे कहने पर विश्वास नहीं ही होना है. इसलिए हमने “रिअली”, “वाकई”, “सचमुच”, “वास्तव में” “कसम से” जैसे शब्द गढ़ लिए हैं. इनका प्रयोग हम कुछ इस तरह से करते हैं कि हमारे अंदर के उस आत्मविश्वास की कमी (सत्य वचन पर) सामने आ ही जाती है. कुछ उदहारण देखिए:

१. हम वाकई आपके आभारी हैं.
२. आप यहाँ आए हमें सचमुच बहुत खुशी हुई.
३. कसम से आज खाना बहुत बढ़िया बना था.
४. मैं वाकई बहुत शर्मिन्दा हूँ
५. वास्तव में आपका धन्यवाद करना चाहता हूँ.
६. I am really thankful to you.
७.I Really appreciate your help.
८. I am really sorry.
९. I really liked your speech
१०. I really mean it
और यह भयंकर है
११. I REALLY love you
और यह उससे भी बड़ा:
१२. Darling, you REALLY miss me na?
१३. Yes darling, I REALLY miss you!

ये सभी वाक्य “रिअली”, “वाकई”, “सचमुच”, “वास्तव में” “कसम से” आदि शब्दों के बगैर भी कहे जा सकते थे. लेकिन कहने वाले और सुनने वाले दोनों को कही जाने वाली बात पर थोड़ा कम विश्वास है. यह अविश्वास जैसे-जैसे बढ़ता गया हमने स्वतः वाक्यों में इन वजन बढ़ाने वाले शब्दों को शामिल कर लिया. एक समय था जब सभी सभ्यताओं इन्सान का वचन बेहद कीमती होता था और वचन पर लोग जान दे दिया करते थे. सभ्यता के “विकास” ने हमें भरोसे के लायक नहीं रख छोड़ा है.
– हितेन्द्र अनंत

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