फ़िल्म समीक्षा – डिटेक्टिव ब्योमकेश बख़्शी

डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी अच्छी है शानदार नहीं। खुल के कहूँ तो ठीकठाक है। इसमें जो सबसे अच्छा है वह है कला निर्देशन। यानी जो 1942 का सेट वगैरह है वह उम्दा है। लेकिन निर्देशन में वो बात नहीं है। फ़िल्म आवश्यकता से अधिक “लाउड” है। एक सुपरिचित जासूस कथा को हिंदी में प्रस्तुत करने से पहले उस पुराने धारावाहिक पर विचार कर लेना चाहिए था जिसकी एक ख़ास छवि हिंदी जनमानस में घर कर चुकी है।

जासूस यूं भी “लाउड” नहीं होते, सुशांत के चरित्र में आवश्यकता से अधिक भावुकता और मासूमियत दिखाई है जो एक महान जासूस के चरित्र से मेल नहीं खाती। कुछ समय के लिए पुराने व्योमकेश बख्शी को भूल भी जाएं तो एक महान जासूसी चरित्र इतना नादान नहीं हो सकता जितना इस फ़िल्म में दिखाया है। एक दो सुपरिचित जासूसी युक्तियाँ छोड़ दें तो यह पात्र शातिर दिमागवाला है ऐसा इस फ़िल्म में कहीं नजर नहीं आया। इसके बाद यदि फ़िल्म निर्देशक दर्शक से यह उम्मीद करे कि वह इस चरित्र के शातिर जासूसी दिमाग का क़ायल हो जाए तो वह मुश्किल है।

बंगाली में सुना है एकाधिक ब्योमकेश बनी हैं। उनको देखा नहीं है इसलिए उनकी कथा के बारे में नहीं जानता। लेकिन जो कहानी इस फ़िल्म के लिए चुनी गयी है वह जासूसी से शुरू तो होती है लेकिन उसका अंत किसी दुनिया को बचाने वाले अमरीकी सुपर हीरो की कहानी की तरह होता है। “ब्योमकेश तुमने कलकत्ता बचा लिया” यह संवाद अखर जाता है। जासूसों से गुत्थियां सुलझाने की उम्मीद की जाती है, शहर या देश बचाने का काम महानायक का होता है। दोनों एक नहीं होते। फ़िल्म सोच-समझकर इस तरह बनायी गयी है कि इसका अगला संस्करण आए। लगता है संस्करणों (सीक्वल्स) की ख्वाहिश में दिबाकर बैनर्जी ने ब्योमकेश को सुपर हीरो बनाने की ठान ली। यही फ़िल्म की विफलता है।

byomkesh

रजित कपूर छोड़िये, मुझे सुशांत के निभाए जासूसी पात्र का आभामण्डल पंकज कपूर (करमचन्द) वाले पात्र से भी कम लगा। कोई कह सकता है कि इस कहानी में उसके जासूस बनने की शुरुआत है, लेकिन तीन घंटे की फ़िल्म में जासूसी की कला प्रभावित न कर पाए तो यह दर्शकों के साथ नाइंसाफ़ी ही है। फ़िल्म के मुख्य खलनायक का पात्र भी अंतराल के बाद गंभीरता छोड़ सलमान खान की किसी फ़िल्म के खलानायकों जैसा हो जाता है, अंतिम दृश्य में उसकी हरकत देखकर हंसी आती है, एक सीक्वल का इशारा देने के लिए कहानी से छेड़छाड़ की है।

कला निर्देशन का उच्च स्तर था। शायद थोड़ी मेहनत सुशांत सिंह के हिंदी उच्चारण पर जाती तो और भी अच्छा लगता। मैं समझ सकता हूँ कि झूठा बंगाली एक्सेंट उन पर नहीं जंचता, लेकिन सुशांत जिस तरह से हिंदी बोलते हैं वह आजकल की दिल्ली वाली हिंदी है। 1940 के दशक में ऐसी हिंदी नहीं थी। सुशांत ने अभिनय अच्छा किया है। वे अच्छे अभिनेता हैं। वे इस फ़िल्म में भी वैसे ही संयमित दिखे जैसे काई पो… या शुद्ध देसी… में थे। उन्हें और भी अलग क़िस्म की भूमिकाएं मिलनी चाहिए।

सभी सहायक पात्र बेहद उम्दा कलाकार हैं। उर्मि जिवेकर व नीरज कवि प्रभावित करते हैं। दिव्या मेनन भी अच्छी लगीं।

फ़िल्म एक बार अवश्य देखी जानी चाहिए।

अंक 2.5 / 5

निर्देशक – दिबाकर बैनर्जी
कलाकार – सुशांत सिंह राजपूत, आनंद तिवारी, नीरज कवि, स्वास्तिका मुखर्जी, दिव्या मेनन, मियांग चांग
कथा – सरदिंदु बंदोपाध्याय की कहानियों पर आधारित पात्र, फ़िल्म की कहानी – उर्मि जिवेकर, दिबाकर बैनर्जी

-हितेन्द्र अनंत

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