शार्ली हेब्दो हत्याकांड पर

(पेरिस की कार्टून पत्रिका शार्ली हेब्दो के परिसर पर हुए आतंकवादी हमलों पर जो कुछ फेसबुक पर लिखा उसे यहाँ संग्रहित किया है –  हितेन्द्र अनंत)

बधाई हो हत्यारों, कुछ निर्दोषों को मारकर तुमने अपने मजहब को ख़तरे से बचा लिया।‪#‎Charli‬ Hebdo ‪#‎Paris‬

पेशावर से पैरिस तक सिर्फ इंसान दोषी नहीं थे, मजहब भी सवालों के घेरे में है।

आप चाहे अगर-मगर करो, चाहे भीतर झाँको, फैसला आपका है। लेकिन एक कार्टून से आहत हो जाने वाले आपके दीन से दीन और दुनिया दोनों खतरे में हैं। आप निबटें न निबटें, दुनिया को इस खतरे से निबटने उपाय तो ढूंढना ही होगा ना? हो सकता है दुनिया का तरीका गलत हो, लेकिन आपने क्या तरीका अपनाया है, यह अब तलक दिखाई नहीं दिया। आपको और आपके दीन दोनों को सुधार की जरूरत है।

कार्टून का बदला कार्टून
किताब का बदला किताब
फ़िल्म का बदला फ़िल्म
बदले की भावना फिर भी मुर्दाबाद! ‪#‎CharlieHebdo‬ ‪#‎Paris‬

“कार्टून बनाने वाले को मारना गलत है पर कार्टून बनाने की जरूरत ही क्या थी?”
समस्या की जड़ यही सोच है। बाकी समझदार को इशारा काफ़ी है।

अमा मियाँ, सारी दुनिया अपने तरीके से मजहबों और विचारधाराओं पर टिप्पणियाँ करती रहेगी। आप विचार छेड़ेंगे तो उसकी प्रतिक्रिया तो होगी ही। सचमुच सफाई या सुधार चाहते हैं तो दिमाग से “जरूरत ही क्या थी” वाले हिस्से को निकाल दीजिए। उससे कम में आपका कुछ नहीं हो सकता। ‪#‎CharlieHebdo‬ ‪#‎Paris‬

कार्टून बनाने पर सवाल उठाने वाले (वो जो हिंसा के विरोधी हैं), जब चित्र बनाने पर पाबंदी पर ही सवाल उठाने लगेंगे तब मानूँगा कि वे मजहब में सुधारों को लेकर ईमानदार हैं।‪#‎CharlieHebdo‬ ‪#‎Paris‬

असम में हुई हिंसा हिंदू बनाम गैर नहीं है भाई। वहां का मसला जटिल है जिनमें आसिवासी, ईसाई, हिन्दू मुस्लिम, बांगलादेशी और अन्य भी शामिल हैं। असम की हिंसा की मजम्मत कीजिए लेकिन उसे पैरिस या पेशावर की आड़ न बनाइये, तुलना सम्भव नहीं है।

कुछ रटे-रटाए वाक्यों को नए सिरे से लिखे जाने की जरूरत है:
1.”आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता”
(आतंकवाद मजहब से प्रेरित भी होता है। मजहब से प्रेरित होकर और उसके कहे अनुसार हिंसा हुई है और हो रही है)
2. “मजहब बुरा नहीं होता, इंसान बुरे होते हैं”
(कुछ इंसान मजहबों की वजह से बुरे बन जाते हैं। मजहब इंसानों को बुरा बन जाने से रोकने में असफल रहा है। मजहब का कड़ाई से पालन करने वाले इंसान के कट्टर और हिंसक बन जाने की संभावना अधिक है।)
3. “धर्म का अनादर नहीं किया जाना चाहिए”
(धर्म को विधर्मी के अनादर से बचना चाहिए, हिंसा तो खैर दूर की बात है।)
4. “सभी धर्मों का सम्मान हो”
(सभी धर्मों की खुली आलोचना हो – ससम्मान)
5. “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना”
(मजहब और मजहबी दोनों आपस में बैर रखना सिखाते हैं)

उस पत्रिका ने बार-बार कार्टून छापकर उकसाया नहीं। हिंसा तो पहली बार जब कार्टून छपे तब भी जबरदस्त हुई थी। बार-बार कार्टून छापने से कल की घटना सही साबित नहीं हो जाती।

भारत साधकों का देश है। भारत के वामपंथी भी सदा ही एक साधना में लीन रहते हैं – संतुलन साधना। जैसे – “मारना गलत है लेकिन कार्टून बनाना…” यह जानकर भी कि शार्ली हेब्दो एक कट्टर कम्यूनिस्ट पत्रिका है।

यदि दुनिया की सबसे क्रूर शोषण व्यवस्था यानी जाति-वर्ण व्यवस्था की आलोचना करनी है तो क्या यह कह कर संतुलन साधें कि “यह हिन्दू धर्म का असली चेहरा नहीं है…”?

 कल रात एक सपना देखा:पुणे में नाई की दुकान पर कुछ हथियारधारियों ने हमला कर दिया। वहां बाल कटवा रहे कुछ ग्राहक नाई समेत मारे गए। हमलावरों का कहना था कि हमारे धर्म में केश कटवाने की मनाही है फिर भी ये लोग बार-बार बाल कटवाकर हमें उकसा रहे हैं। सपने में मैंने आगे देखा कि फेसबुक पर इस घटना की तीव्र निंदा हुई। एक बड़ा वर्ग ऐसे निंदकों का था जिन्होंने लिखा – “हत्या की निंदा करते हैं लेकिन बाल नहीं कटवाने चाहिए थे…”। यह मैंने सपने में ही देखा कि मेरे मित्र Haider Rizvi की वाल पर लिखा था “आप सांड को लाल कपड़ा दिखाते ही क्यों हैं?”

सपने में मैंने भी इस घटना की तीव्र निंदा की और देखा कि कुछ लोग यह हिसाब लगा रहे थे कि मैंने कुल जमा कितनी पोस्ट इस घटना पर लिखी और कितनी अन्य घटनाओं पर। जो लोग अगर-मगर न करते हुए सीधे हत्याओं की निंदा कर रहे थे उनके सेकुलर होने पर प्रश्न चिह्न लग गया। जो लोग इससे पहले हुई बहुत सी मार-काटों को अपनी वीरता का नमूना मानकर शौर्य दिवस आदि मनाया करते थे, वे भी बाल कटवाने के निजी और मौलिक अधिकार पर भाषण देते नजर आए। कुल मिलाकर नजारा हैरान कर देने वाला था। सपना बहुत बुरा था इसलिए किसी तरह जागकर मैंने इस सपने को तोड़ देना बेहतर समझा।

-हितेन्द्र अनंत

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