फिल्म समीक्षा: क्या दिल्ली क्या लाहौर

मुख्य भूमिका: विजय राज, मनु ऋषि, राज जुत्शी, विश्वजीत प्रधान
निर्देशन: विजय राज, करन अरोड़ा
कथा: संदीप सिन्हा

अंक:  2.5 / 5

सन 1948, भारत-पाक सीमा पर एक सैन्य संघर्ष के बाद दो सिपाही बचते हैं। एक भारतीय दूसरा पाकिस्तानी। भारतीय सैनिक (मनु ऋषि) बंटवारे के बाद लाहौर से दिल्ली आ गया और पाकिस्तानी सैनिक (विजय राज) दिल्ली से लाहौर चला गया। एक भारतीय चौकी पर इनकी मुलाकात की कहानी है यह फिल्म। फिल्म की कहानी पूरी तरह बोस्नियन फिल्म “नो मैन्स लैंड” से प्रभावित है। कहानी का भारतीयकरण किया गया है। किंतु इस चक्कर में एक अच्छी कहानी की गंभीरता कम हो चली है। यदि आपने “नो मैन्स लैंड” देख रखी है तो यह फिल्म आपको उतनी पसंद नहीं आएगी। यदि नहीं देखी है तो पहले “नो मैन्स लैंड” ही देखिये। कहानी का संदेश युद्ध की निरर्थकता और बंटवारे के दर्द को दर्शाना है। वह काम यह फिल्म फिर भी अच्छी तरह करती है। इसलिये भी कि भारत-पाक संबंधों पर इस तरह की यह पहली हिंदी फिल्म है। इस फिल्म में कोइ दुश्मन देश नहीं है।

यह उन फिल्मों में से एक है जो अच्छी हैं लेकिन और भी अधिक अच्छी बन सकती थीं। संवादों में हास्य का पुट अच्छा है लेकिन अनेक बार बोझिल और हल्का हो जाता है। विजय राज अति-अभिनय के लिये जाने जाते हैं। स्वनिर्देशित इस फिल्म में कभी वे संयत हैं कभी झेले नहीं जाते। उन्हें समझना होगा कि एक चरित्र अभिनेता के लिये अति-अभिनय जरा भी अच्छी चीज नहीं है। वे न तो नाना पाटेकर हैं न संजय मिश्रा कि लोग केवल उन्हें देखने के लिये थियेटर आएँ। मनु ऋषि हर फिल्म में प्रभावित करते हैं। “फंस गये रे ओबामा” के बाद उन्हें शायद पहली बार विस्तार से प्रतिभा प्रदर्शन का मौका मिला है। डर है कि इस प्रतिभाशाली कलाकार का वही हश्र न हो जो अक्सर उनके जैसों का होता आया है। लेकिन “आँखों देखी” और “क्या दिल्ली…” जैसी फिल्में आशा जगाती हैं। राज जुत्शी और विश्वजीत प्रधान की भूमिकाएँ सीमित हैं।

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फिल्म के कथाक्रम के बीच-बीच में गुलजार के लिखे काव्यत्मक संवाद फिल्म का सुखद हिस्सा हैं। ऐसा लगता है जैसे संवाद नहीं गुलजार की कविता पढ़ी जा रही है। सैनिकों को हिंसा से डर लगता होगा, लेकिन इस फिल्म में सैनिकों को जिस तरह से डरपोक बताया गया है वह पचता नहीं। फिल्म में लंबे समय के लिये मनु और विजय काफी दूर से बात करते है। इनमें मनु तो जोर से पुकारते हुए बात करते हैं लेकिन विजय न जाने क्यों इतना धीमे बोलते हैं मानो मनु उनके बगल में बैठे हों। ऐसा क्यों किया गया समझ नहींं आया। भाषा अच्छी है और पात्रों पर जंचती है। विजय राज के अभिनय से बेहतर उनका निर्देशन है। राज चक्रवर्ती का छायांकन उम्दा है। फिल्म की शूटिंग फिजी में हुई है। क्यों हुई है यह भी समझ नहीं आया। ऐसा दृश्य भारत में आसानी से मिल सकता था।

भारत और पाकिस्तान के बीच जिस तरह क्रिकेट मैचों में तनाव घटा है वैसा ही कुछ फिल्मों में होना तय ही था। कुछ समय पहले आई फिल्में “वार छोड़ ना यार”, “टोटल सियापा” भी सरहद के तनाव पर हंसने का साहस रखती हैं। यह अच्छा है। जब हम अपनी शत्रुता पर हंसने लगेंगे और उसकी विद्रूपता पर व्यंग्य कर सकेंगे तब शायद तनाव कम होगा। “क्या दिल्ली क्या लाहौर” इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। यह फिल्म एक बार प्रत्येक भारतीय और पाकिस्तानी को अवश्य देखनी चाहिये। फिर भले

– हितेन्द्र अनंत

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