फिल्म समीक्षा: आंखों देखी

मुख्य भूमिका:  संजय मिश्रा,  रजत कपूर, सीमा पाहवा, माया सराओ, तरनजीत, मनु ऋषि चड्ढा, बृजेंद्र काला, योगेन्द्र टिक्कू
कथा एवँ निर्देशन: रजत कपूर
गीत: वरूण ग्रोवर
संगीत: सागर देसाई

संजय मिश्रा (बाऊजी) पुरानी दिल्ली के फतेहपुरी इलाके में अपने भाई रजत कपूर के साथ रहने वाला एक नितांत मध्यवर्गीय चरित्र है। संयुक्त परिवार की रोज की चहल-पहल, शोर और खींचतान के बीच दोनों भाइयों का परिवार जी रहा है। इस बीच एक दिन बाऊजी यह निर्णय ले डालते हैं कि वे किसी भी चीज को तब तक सत्य नहीं मानेंगे जब तक कि उसे स्वयं देख ना लें  या स्वयं के अनुभव से जान न लें। इस फैसले पर अ‍डिग होते ही बाऊजी  का जीवन आस-पास के लोगों के लिए एक मजाक बन जाता है और उनके परिवार के लिए एक समस्या। उनके मोहल्ले के अनेक दोस्त पहले तो उनका मजाक उड़ाते हैं लेकिन सत्य की खोज की उनकी इस यात्रा में धीरे-धीरे उनके शिष्य भी बन जाते हैं।  चाय की टपरियों या नाई की दुकान पर चलने वाली मोहल्ले की अंतहीन चिर-परिचित गपशप अब बाऊजी के सत्य के साथ उनके प्रयोगों के आसपास घूमने लगती है। उदाहरण के लिए शेर दहाड़ता ही है यह सच है या झूठ इस पर भी यह मंडली तभी विश्वास करती है जब दिल्ली के चिड़ियाघर का दौरा कर स्वयं दहाड़ का साक्षात्कार नहीं कर लेती। बाऊजी की यह सत्य की खोज कभी उनसे मूर्खतापूर्ण काम करवाती है जिन पर खूब हंसी आती है तो कभी आपको एक आध्यात्मिक अंतः यात्रा की ओर उन्मुख भी कर सकती है। इस यात्रा के दौरान होने वाले अनुभव आपको  साद्योपांत पर्दे से चिपकाए रखते हैं। हंसाते भी खूब हैं।

संजय मिश्रा ने पात्र में जान फूंक दी है। उनके अभिनय कौशल का पहली बार इतना अच्छा उपयोग किया गया है। उनकी पत्नी के रूप में सीमा पाहवा खूब जंचती हैं। रजत कपूर प्रायः अमीर पात्रों को निभाते आए हैं, लेकिन इस फिल्म में उनकी मध्यवर्गीय पात्र की भूमिका सधी हुई है। परिवार के अधिक पढ़े-लिखे सदस्य होने के कारण उनकी भाषा का अन्य पात्रों  की अपेक्षा अधिक शहरी होना खलता नहीं है। सीमा पाहवा ने संजय की पत्नी की भूमिका भली प्रकार निभायी है। मनु ऋषि चड्ढा, बृजेंद्र काला सहित अन्य सभी पात्रों का चयन और उनका अभिनय सधा हुआ है। रजत-कपूर मंडली से विनय पाठक का नदारद होना दुःखी करता है लेकि सौरभ शुक्ला और रणवीर शौरी की एक दृश्य की भूमिका भी उन्हें पसंद आएगी जो “भेजा फ्राय” या “फंस गए रे ओबामा” आदि फिल्मों को पसंद करते आए हैं।
Ankhondekhi
रजत कपूर काफ़ी समय से निर्देशक रहे हैं लेकिन यह फिल्म उनकी अब तक की सबसे सफल फिल्म कही जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। कथा भी उन्होंने ही लिखी है। पात्रों और दृश्यों से बनावटीपन कोसों दूर है। संवाद लिखे गए नहीं लगते हैं। दृश्यों का संपादन भी बेहद बारीकी लिए हुए है। रजत कपूर की इस फिल्म में दिल्ली के पात्र ऐसे दिखते हैं मानों उनके दैनिक जीवन से कुछ दृश्य खुफिया कैमरे में कैद कर लिए गये हों। पुरानी दिल्ली का फिल्मांकन बहुत ही यथार्थपरक है।

इस फिल्म की भाषा सोने पर सुहागा है। दिल्ली शहर की भाषा केवल पंजाबी प्रभावित हिंदी नहीं होती। वहाँ राजस्थान, ब्रज जैसे इलाको के लोग भी रहते हैं जिनकी खड़ी बोली ही इस फिल्म की भाषा है। पंजाबी अतिरेक से मुक्त।

इस फिल्म के  संगीत पर चर्चा किये बिना समीक्षा अधूरी ही रहेगी। वरूण ग्रोवर ने सूंदर गीत लिखे हैं।  सागर देसाई का संगीत अच्छा है। कैलाश खेर और शान सहित अन्य गायकों ने गीत गाए हैं। गीत आध्यात्मिक प्रेरणा लिए हुए हैं। “आज लागी लागी नयी धूप”  और  “आई बहार” विशेष रूप से प्रशंसनीय हैं। पुनः कहना चाहूंगा कि पंजाबी तड़का या जबरदस्ती घुसाए गए “मौला हू”  किस्म के गानों से मुक्त यह संगीत अच्छा लगा। विवाह के एक दृश्य में महिलाओं का लोकगीत भी अच्छा है। (मुझे पंजाबी और सूफी दोनों संगीत पसंद हैं पर आजकल की हरेक फिल्म में इनका पाया जाना उबाऊ तो होता ही है!)

संसार के विभिन्न पहलुओं को लेकर हमारे मन में अनेक प्रश्न हमेशा उठते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने से  हम अक्सर बचा करते हैं और जो कहा जाए उसी को सच मान लेते हैं। लेकिन हममें से कुछ लोग होते हैं जो अपना सच खुद ढूंढने निकल पड़ते हैं। ऐसे लोगों को पागल, सनकी, मूर्ख आदि बहुत कुछ कहा जाता है। लेकिन अपने सच को ढूंढने की यह यात्रा कितनी रोमांचक, सुखद और मनोरंजक हो सकती है यह जानने के लिए आपको यह फिल्म स्वयं देखनी होगी! आखिर मेरा सत्य और आपका सत्य एक कैसे हो सकता है!

– हितेन्द्र  अनंत

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