फिल्म समीक्षा: फैंड्री (फँड्री – मराठी)

मुख्य भूमिका: सोमनाथ अवघडे, राजेश्वरी खरात, सूरज पवार, किशोर कदम, छाया कदम, नागराज मंजुळे
कथा एवँ निर्देशन: नागरज मंजुळे

आपने फैंड्री का प्रतिनिधि गीत और उसके पोस्टर देखे हैं। नायक और नायिका की तस्वीर देखकर आपने अनुमान लगा लिया है कि यह किशोरवय के प्रेम पर आधारित फिल्म है। फिल्म की चर्चाएँ पढ़-सुनकर आप यह भी जानते हैं कि नायक दलित और नायिका उच्च जाति की है, यानी जातिभेद का भी एक पक्ष है।  आप मोटे तौर पर फिल्म के बारे में एक धारणा बना चुके हैं। लेकिन थियेटर में जाते ही आपकी धारणाएँ बदलती जाती हैं। फिल्म पूरी होने के बाद आप पार्किंग से अपनी गाड़ी निकालते हैं और रास्ते भर सोचते हैं कि इस फिल्म के भीतर कितनी कहानियाँ हैं? हर वह प्रश्न जो यह फिल्म उठाती है आपके जेहन में बार-बार उभरता है। आप इन प्रश्नों से उद्विग्न या उत्तेजित नहीं होते, लेकिन इन प्रश्नों पर सोचने के लिये मजबूर हो जाते हैं।

इस फिल्म के बारे में कोइ एक वाक्य लिखना आसान नहीं है। लिखना तो यह चाहता था कि यह फिल्म जातिवादी दंभी हिंदू समाज के मुँह पर मारा गया एक पत्थर है। लेकिन इतना कहना पर्याप्त न होगा। कथाकार-निर्देशक नागराज मंजुळे ने कहानी के प्रवाह को मजबूती से नियंत्रित किया है। पूरी फिल्म में कहीं भी जातिवाद पर कोइ भाषण नहीं है। गरीबी का रोना रोते पात्र नहीं हैं। नायक के भोले प्रेमपत्र को छोड़ दिया जाए तो प्रेम से संबंधित घिसे-पिटे संवाद भी नहीं है। नागराज ने सभी पात्रों के अभिनय पर भरपूर नियंत्रण रखा है। कलाकार पात्रों का सामान्य जीवन जीते हैं। वे ऐसी मराठी भाषा बोलते हैं जो अखबारों में नहीं छपती या आम मराठी फिल्मों में बोली नहीं जाती। संवाद बेहद बारीकी से इस तरह लिखे गये हैं कि लगता ही नहीं कि पात्रों को संवाद लिखकर दिये गये थे। लगता है कि किसी गाँव में आपस में बातें करते लोगों को बस कैमरे में शूट कर लिया गया है।

कहानी कुछ इस प्रकार है: महाराष्ट्र के एक गाँव में जब्या (सोमनाथ अवघडे) सुअर पकड़ने वाली दलित जाति का किशोर है जो गाँव की ही पाठशाला में सातवीं का छात्र है। जब्या का पिता कचरू (किशोर कदम) और उसका परिवार घोर निर्धनता में किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालता है। दलित होने के कारण इस परिवार को दिन-प्रतिदिन गाँववालों के द्वरा घोर अपमान सहना पड़ता है। जब्या को उसी की कक्षा की उच्च जाति की लड़की शालू से प्रेम हो जाता है। गाँव का ही एक युवक जो तंत्र-मंत्र में विश्वास रखता है, वह जब्या को काली गौरैया मारकर उसे जलाकर, उसके राख शालू के सिरपर छिड़कने की वशीकरण की युक्ति बताता है। वहीं गाँव के लोग जो सुअर से छुआछूत मानते हैं गाँव के एक सुअर से परेशान हैं और जब्या के पिता कचरू को स्वाभाविक रूप से जाति व्यवस्था  के तहत यह काम दिया जता है कि वह इस सुअर को पकड़कर मार दे। पूरी फिल्म जब्या के किशोरवय के प्रेम, काली गौरैया की तलाश और सुअर पकड़ने की कवायद के इर्द-गिर्द घूमती है।
Fandry-Full-Marathi-Movie-Online
नागराज ने जानबूझकर फिल्म की शूटिंग गर्मी के मौसम में की ताकि बारिश के बाद आने वाली हरियाली गाँव की असल तस्वीर को छिपा न ले। हिंदी सिनेमा में शायद ही ऐसी कोइ फिल्म आई है जिसमें गाँव के दृश्यों को यथार्थ के निकट रखा गया हो। गाँव के पात्रों को घिसी-पिटी छवि से मुक्त रखा गया है। वे भोले-भाले नाचते-गाते ग्रामीण नहीं हैं। बस इंसान हैं जो शहरों की बजाय गाँवों में रहते हैं। प्रेम कहानी किशोरवय के आकर्षण पर है। इस वय के अनुकूल ही यह प्रेम भारी-भरकम संवादों से मुक्त है। इस प्रेम में बस प्रियतम को देखलेने की तमन्ना है। दलितों के प्रश्न पर यह फिल्म सर्वाधिक ध्यान देती दिखाती देती है। लेकिन यह-सब अलग से नहीं किया गया है। गाँवों के जीवन में जिसप्रकार जातिभेद दैनंदिन जीवन में समाहित है और जिस प्रकार गाँवों के स्कूलों में (जहाँ दीवारों पर आंबेडकर और सावित्रिबाई फुले के चित्र लगे हैं) पढ़ाये जाने वाले सामाजिक समरसता के पाठ कक्षा से बाहर निकलते ही भुला दिए जाते हैं, इन सबका चित्रण ठीक उसी प्रकार किया गया है, न कम, न ज्यादा। एक प्रश्न भाषा का भी है। जब्या का पिता कचरू अपनी पत्नी से जनजातीय भाषा में बात करता है। उसकी ही जाति के संबंधी भी जब उसे यह भाषा बोलते पाते हैं तो उसे मराठी बोलने के लिये कहते हैं।

इस फिल्म का अंतिम दृश्य बहुत ही सशक्त और प्रभावी है। और नहीं तो केवल अंतिम दृश्य के लिये ही यह फिल्म देखी जानी चाहिये।

सोमनाथ सहित सभी बाल कलाकारों ने सहज अभिनय किया है। किशोर कदम को इससे पहले मैंने जोगवा और नटरंग में देखा है। हमेशा की तरह उनका अभिनय छाप छोड़ने वाला है। छोटी से भूमिका में स्वयं नागराज भी प्रभावित करते हैं।

छायांकन और पार्श्व संगीत भी प्रशंसनीय है।

फैंड्री (फँड्री) एक और फिल्म है जो साबित करती है कि गुणवत्ता और विषय-विविधता के परिप्रेक्ष्य में हिंदी सिनेमा को मराठी सहित क्षेत्रीय सिनेमा की बराबरी करने में अभी बहुत समय लगेगा।

फिल्म सबटाइटल्स के साथ है। अवश्य देखिये।

-हितेन्द्र अनंत

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