फिल्म समीक्षा: हंसी तो फंसी

फिल्म समीक्षा: हंसी तो फंसी
मुख्य भूमिका: परिणिति चोपड़ा, सिद्धार्थ मल्होत्रा, शरत सक्सेना, मनोज जोशी, अदा शर्मा, नीना कुलकर्णी।
निर्देशन: विनी मैथ्यू
कथा: हर्षवर्धन कुलकर्णी
यह उन फिल्मों में से एक है जो अपने ट्रेलर से कहीं ज्यादा अच्छी निकल आती हैं। कथानक साधारण है। नायक या नायिका को किसी से प्रेम होता है और वे विवाह करने वाले होते हैं कि उन्हें पता चलता है कि उन्हें दरअसल कोइ और पसंद है। मीता (परिणिति) एक व्यवसायी गुजराती परिवार में पली एक इंजीनियर है जिसे तकनीकी और विज्ञान में गहरी दिलचस्पी है। निखिल (सिद्धार्थ) एक उत्तर भारतीय अफसरों के परिवार का युवा है जिसे ठीक-ठीक नहीं मालूम कि उसे जीवन मे क्या करना है। निखिल को मीता की बहन करिश्मा (अदा) से प्रेम हो जाता है। आगे प्रेम संबंधों की जटिलता है।

परिणिति के चरित्र को वैसा ही बनाने का प्रयास किया गया है जैसी भूमिकाएँ अब वे सहज रूप से करने लगी हैं – एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर, आधुनिक युवती। “शुद्ध देसी रोमांस” की तरह इस फिल्म की धुरी भी परिणिति ही हैं। उनकी भूमिका को थोड़ा और बड़ा किया जा सकता था। सिद्धार्थ की यह दूसरी फिल्म है। उनका अभिनय अच्छा है। मोहन जोशी, नीना कुलकर्णी और शरत सक्सेना हमेशा की तरह मंजा हुआ अभिनय करते नजर आते हैं। अदा के हिस्से अदाएँ ही आई हैं। उनका रूप उनके अभिनय पर हावी है।

माधुरी दीक्षित के सौंदर्य के बारे में कहा जाता था कि वे कुदरत का सारा नमक ले उड़ी हैं। लगता है उसमें से थोड़ा नमक परिणिति ने चुरा लिया है। नमकीन होने के अतिरिक उनके सौंदर्य की एक और विशेषता यह है कि वे फिल्म उद्योग में अपेक्षाकृत नयी होने के बाद भी रोमांटिक सौंदर्य प्रधान फिल्मों पर निर्भर नहीं हैं। आजकल के युवा अभिनेतओं के विपरीत हिंदी उच्चारण पर उनकी अच्छी पकड़ है। नारी प्रधान भूमिकाओं में वे विद्या-बालन की टक्कर की मानी जाएंगी, अपनी बहन प्रियंका या करीना से आगे।
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इस फिल्म की कहानी लिखी है हर्षवर्धन कुलकर्णी ने। कथानक ठीक-ठाक होने के बावजूद पटकथा कमजोर है। कहानी में आने वाले मोड़ अनेक बार अनावश्यक लगते हैं। पात्रों में परिणिति के अतिरिक्त अन्यों के चरित्र पर अधिक गहरायी से ध्यान देने की आवश्यकता थी। शायद सभी पात्रों के साथ यथोचित न्याय करने के प्रयास में पटकथा कमजोर हो गयी है।

कहानी की कमजोरी को संवाद लेखन, पात्र चयन और निर्देशन ने पूरा कर दिया है। विनी मैथ्यू अंत तक दर्शकों को बांधे रखने में सफल हुए हैं। गुजराती परिवार के पात्रों के उचित चयन एवं उनकी व्यापारिक मानसिकता के उचित चित्रण के बाद भी फिल्म आमतौर पर स्टीरियोटाइप्ड छवि बनाने की गलती नहीं करती है। गुजरती पात्रों का हिंदी उच्चारण बनावटी नहीं है। वहीं उत्तर भारतीय पात्र भी मुंबई में आकर मसखरी करने लगें ऐसा नहीं है। हिंदी व्यावसायिक सिनेमा के लिये यह भी कम उपलब्धि नहीं है।

संगीत औसत है। याद नहीं रखा जाएग। प्रत्येक फिल्म संगीत पर पूरा ध्यान दे यह आवश्यक भी नहीं है।

कुलमिलाकर वही जो आप जानते थे कि अंत में लिखा जाएग। एक बार अवश्य देखिये।

-हितेन्द्र अनंत

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