दोपहर के नाम दो कविताएँ

1. दोपहर का अंतर

छोटे शहरों की
सुबह जल्दी होती है
लेकिन देर से शुरू होता है दिन
यह दिन
मौसम के हिसाब से बड़ा या छोटा हो सकता है
लेकिन इन शहरों की दोपहर हमेशा लंबी होती है
छोटे शहरों की शामें हसीन
और रातें रंगीन
हो भी सकती हैं और नहीं भी
लेकिन सबसे खूबसूरत होती है
तो दोपहर, छोटे शहरों की दोपहर

बड़े शहरों में
देर से होती है सुबह
बहुत ही जल्द शुरू होता है दिन
यहाँ की शामें हसीन
और रातें रंगीन
हो भी सकती हैं और नहीं भी
लेकिन बड़े शहरों की
दोपहर नहीं होती
कम से कम दिखायी नहीं देती कभी
शायद दिन की लंबी चादर से ढंक जाती है
शायद शाम के गहरे सागर में डूब जाती है
शायद रात के अंधेरे में खो जाती है

एक बड़े शहर और एक छोटे शहर में
दोपहर का अंतर होता है

2. जब दोपहर होती है

दुनिया के सभी बड़े कवि और चित्रकार
शायद दोपहर को सुस्ताते थे,  ऊंघते थे
इसीलिये उनकी अधिकांश कविताओं और चित्रों में
दिखायी देती हैं केवल शामें, रातें या सुबहें ही
दोपहरें गायब हैं

चित्रकारों को दोपहर दिखायी नहीं दी कभी
जैसे कि उन्होंने पनघट पर पानी भरती
पनिहारिनों के खूब बनाये चित्र
पर नहीं दिखायी दीं उन्हें वे महिलाएँ
जो छत पर या बाहर आंट पर बैठी
एक दूसरे के सिरों में तेल लगा रही होती हैं
या फुरसत से जुएं तलाश रही होती हैं

हर शाम
अपने-अपने प्रिय के लौटने की राह देखती
सज-संवर कर तैयार स्त्रियों पर
जिन्होंने लिखी होंगी कविताएँ
कुछ नहीं लिखा उन्होंने
उन पर जो दोपहर को आंगनों और छतों पर
मसाले और अचार सुखा रहीं हों
स्वेटर बुन रही हों
मेथी की भाजी चुन रही हों
या कोइ गीत गुनगुना रही हों
या यूं ही बस धूप सेंक रही हों

रात के सन्नाटे में विरह के गीत सुनायी देते होंगे
पर दोपहर के सन्नाटे में भी तो
आंगन में लड़कियों की चहक सुनायी देती है
बिल्लस खेलती
बेख़ौफ़ हंसती लड़कियों की चहक
या फिर सुनायी देता है संगीत
जो अनाज पछोरते सूप से निकलता है
या सुनायी देती है आवाज
फेरीवालो की

फेरीवालों की जब सुनायी देती है आवाज
तब सारी औरतें जुट जाती हैं साथ
उनमें से किसी एक के घर
जहाँ रोक लिए जाते हैं वे फेरीवाले
वे बेच सकते हैं ऊन, साड़ियाँ, चूड़ी, बिंदी, कुछ भी
वे चमका सकते हैं पीतल के बर्तन
धार कर सकते हैं चाकुओं में
या बेच सकते हैं बर्तन, पुराने कपड़ों के बदले

दोपहर शांत और खूबसूरत होती है
दोपहर घर पर नहीं होते पुरूष
दोपहर पर अधिकार होता है
स्त्रियों का
दिन के इस अंतराल में
बहुत सारी जिम्मेदारियों से मुक्त
पुरूषों की निगरानी से मुक्त
अपनी मर्जी से समय काटती स्त्रियों का

स्त्रियों के चित्र ऐसे समय के भी बनाए जाएं
स्त्रियों के ऐसे समय पर भी कविताएँ लिखी जाएँ
जब स्त्रियाँ मुक्त होती हैं
जब दोपहर होती है

-हितेन्द्र अनंत

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