मेरा गाँव, मेरे लोग

बहुत सोचता हूँ इस महानगर को छोड़ दूं, कहीं गाँव चला जाऊं। फिर देखता हूँ मेरे आस-पास एक गाँव बसता जा रहा है। मेरे अपने बनते जा रहे लोगों का गाँव। छोटी-छोटी बातें हैं। लेकिन बड़ी महत्वपूर्ण हैं।

हमें इस मोहल्ले में आये चार महीने हुए। घर पर अखबार की बंदी नहीं लगाई है। रोज पास के चौराहे से अखबार लेने जाता हूँ। अखबार के ठेले पर एक ही परिवार के चार अलग-अलग लोग रोज बारी-बारी से बैठते हैं। चाहे कोई बैठा हो, मुझे देखते ही “इन्डियन एक्सप्रेस” थमा देता है।

अखबार बगल में दबाए दूध की दूकान पर जाता हूँ। मुझे देखते ही वह एक लीटर “चितळे” के दूध की थैली दे देता है। दोनों जगह पैसों का आदान-प्रदान होता है, शब्दों का न के बराबर।

कार्यालय से वापस लौटूं और हेलमेट अपने कक्ष में भूल आऊं तो सिक्योरिटी गार्ड टोक देता है। साल भर पहले तक वह उलाहना देता था कि अब तो कार ले लो! कब तक हेलमेट भूलते रहोगे? लेकिन एक साल हुआ उसने बोलना छोड़ दिया कार के लिए! शायद समझ गया कि मैं कार चला सकूं ऐसी हैसियत अब तक हुई नहीं मेरी!

लिफ्ट चालक भी है। वह मुझे रोज गुडमार्निंग कहता था मैं उसे नमस्कार। अब वह भी नमस्कार करता है – सिर्फ मुझसे, बाकी सबसे अब भी गुडमार्निंग!

जिस भवन में मैं रहता हूँ वहां का चौकीदार थोड़ी बहुत बात कर लेता है। वह मध्यप्रदेश से है। मैंने उसे बताया कि मैं रायपुर से हूँ। कहने लगा कि “हाँ तो पैले तो हमाए “मध्यई प्रदेश” में तो था रायपुर!”

सामने मुस्लिम परिवार रहता है। महिलाओं में पर्देदारी है। पुरूष दिखाई नहीं देते। लेकिन बच्चे और उनकी दादी पर्दा नहीं करते। सुबह अखबार लेने जाता हूँ तो दादी देखकर मुस्कुरा देती हैं। बातचीत कम ही होती है। उनके साथ खड़े स्कूल बस का इन्तजार कर रहे बच्चे अभी शर्माते हैं। नाम उन्होंने बताया है पर तुतली जबान में। कभी उनकी दादी से पूछ लूंगा।

हम इसी मोहल्ले में डेढ़-साल पहले तक रहते थे। फिर चले गए तो अभी चार महीने पहले वापिस आए। यहाँ एक “अन्ना” की चाय-नाश्ते की दूकान है। लौटने के बाद पहली बार जब चाय पीने गए तो पूछ बैठा “क्या मेन? कभी आया इदर?”

मैं उसे क्या जवाब दूं? किराये के मकानों में रहता हूँ। घर और मोहल्ले बदलता रहता हूँ। हर मोहल्ले में ऐसे बहुत से अन्ना हैं। पिछले मोहल्ले में एक “काकू” (काकी) थीं। कभी उनकी दुकान जाउंगा तो वह भी पूछेंगी। “कस काय? कधी आले?”

अपने गाँव के लोग ऐसे ही तो होते हैं ना? जरूरतें पहचानते हैं। और आपको काफी दिनों बाद देखें तो पूछते हैं – “कब आए?”

और लंबा नहीं लिखूंगा। मेरी छोटी सी दुनिया के हिसाब से कुछ ज्यादा ही लिख दिया।

-हितेन्द्र अनंत

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