पुस्तक समीक्षा – दीवार में एक खिड़की रहती थी (विनोद कुमार शुक्ल)

संपन्नता और विपन्नता के समाज में कुछ सर्वमान्य पैमाने होते हैं। संपन्न्ता या विपन्नता के अपने-अपने स्तरों पर हम किसी की अपेक्षा संपन्न और किसी की अपेक्षा विपन्न होते हैं। यह तुलना हर स्तर पर होती है कि कौन संपन्न है और कौन विपन्न। साहित्य और समाज में प्रायः संपन्न्ता की अपेक्षा विपन्न्ता केंद्र में होती है। साहित्य में विपन्नता के कारणों की विवेचना से अधिक विपन्न्ता की शिकायत पायी जाती है। जीवन में भी ऐसा ही होता है। हम शिकायत करते हैं कि विपन्न हैं। यह शिकायत हम तब करते हैं जब हम स्वयं को अपनी ही विपन्न्ता से पृथक कर यह चिंतन करते हैं। किंतु जब हमारा जीवन केवल जीवन होता है, जब हमारा जीवन समाज के पैमानों के आधार पर किसी तुलनात्मक अध्ययन का विषय नहीं होता, तब केवल जीवन ही सत्य होता है। तब जीवन जिया जाता है। हो सकता है कि बाहर से ऐसा जीवन बड़ा ही नीरस हो, पर उस जीवन की सरलता और जीने वालों के सपने उसमें रंग भर देते हैं, उसे सरस बना देते हैं।

ऐसे नीरस किंतु सरस जीवन की कहानी कैसी होगी? कैसी होगी वह कहानी जिसके पात्र शिकायत करना नहीं जानते, हाँ! जीवन जीना अवश्य जानते हैं, प्रेम करना अवश्य जानते हैं, और जानते हैं सपने देखना। सपने शिकायतों का अच्छा विकल्प हैं। यह भी हो सकता है कि सपने देखने वालों के पास और कोई विकल्प ही न हो। यह भी हो सकता है कि शिकायत करने वाले यह जानते ही ना हों कि उन्हें शिकायत कैसे करनी चाहिये। या तो यह भी हो सकता है कि शिकायत करने वाले यह मानते ही न हों कि उनके जीवन में शिकायत करने जैसा कुछ है भी!

ऐसे ही सपने देखने वाले किंतु जीवन को बिना किसी तुलना और बिना किसी शिकायत के जीने वाले, और हाँ, प्रेम करने वाले पात्रों की कथा है विनोदकुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी”। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित यह उपन्यास शुक्ल जी की कालजयी कृति “नौकर की कमीज” की अपेक्षा एक अलग ही कहानी कहता है। दोनों उपन्यास एक निम्न-मध्यमवर्गीय (विपन्नता का यह पैमाना हमारे द्वारा तय किया गया है, उस वर्ग में जीने वालों के द्वारा नहीं) परिवार की कहानी कहते हैं। पर “नौकर की कमीज” के विपरीत “दीवार में एक खिड़की रहती थी” किसी भी प्रकार की पीड़ा को व्यक्त करने वाला उपन्यास नहीं है। यह उस वर्ग के पात्रों के दैनंदिन जीवन के यथार्थ में निहित सौंदर्य को एक कवितामयी भाषा में व्यक्त करने वाला उपन्यास है।

उपन्यास के नायक हैं एक छोटे शहर के महाविद्यालय के युवा और नवविवाहित व्याख्याता रघुवर प्रसाद। नायिका है रघुवर की पत्नी सोनसी। रघुवर प्रसाद शहर की एक पुरानी बस्ती में एक कमरे के घर में किराये पर रहते हैं। यह कमरा दो अन्य कमरों के बीच में है जहाँ एक ही कमरे में अन्य परिवार रहते हैं। यही कमरा रघुवर और सोनसी की दुनिया है। इसी कमरे में उनकी बैठक, रसोई और शयनकक्ष हैं। कमरे में एक ही दरवाजा और एक ही खिड़की है। कमरे के बाहर एक बरामदा है जिसके आगे वही सामान्य निम्न-मध्यम वर्गीय पुरानी बस्ती है।

कमरे की खिड़की इस उपन्यास के केंद्र में है। यह वह खिड़की है जिसके पार कूदकर सोनसी और रघुवर प्रसाद एक जादुई दुनिया में पहुँच जाते हैं। शहर के इस हिस्से में नदी है, तालाब हैं, पशु हैं, पक्षी हैं, और जंगल भी। इन  सबके साथ मानव रूप में एकमात्र उपस्थिति है एक बूढ़ी अम्मा की जो चाय की एक टपरी चलाती हैं। बूढ़ी अम्मा इतनी बूढ़ी हो चुकी हैं कि उनकी आयु में नाम का होना मायने नहीं रखता, उनका बूढ़ी अम्मा कहलाना पर्याप्त है।

खिड़की के इस पार की दुनिया हर किसी को दिखायी नहीं देती। बाहर की दुनिया से इस दुनिया में जाने का रास्ता रघुवर प्रसाद के घर के अंदर जाकर खिड़की से कूदकर ही मिल सकता है। यह दुनिया अपने साथ सुहावना मौसम, हवा में सुगंध, ठंडक और एक मोहक वातावरण लिये हुए है जहाँ रघुवर प्रसाद और सोनसी एकांत के क्षण बिताते हैं, आकाश के नीचे बेखटके प्रेम करते हैं, नदी या तालाब में नहाते हैं, और बूढ़ी अम्मा की चाय पीते हैं। इस दुनिया में वे सारे सुख हैं जो संपन्न्ता या विपन्न्ता के किसी  भी स्तर पर जीने वाले किसी भी शहरवासी को न मिलें। रघुवर और सोनसी की इस दुनिया में कभी-कभी गाँव से आकर उनके माता-पिता और छोटा भाई भी शामिल हो जाते हैं।

अब बाहर की द्निया में लौटते हैं। रघुवर प्रसाद का महाविद्यालय शहर से दूर है। वहाँ तक जाने के लिये मुख्य सड़क से टेम्पो पर जाना होता है। रघुवर प्रसाद टेम्पो से ही आना-जाना करते हैं। यह टेम्पो से आना-जाना जितना सरल और साधारण है, शुक्ल जी अपनी विशिष्ट शैली से उसे उतना ही विशिष्ट बना देते हैं। एक उदाहरण देखिये:

“टैम्पो में हमेशा की तरह गाँव की औरतों और बूढ़ों की भीड़ थी। एक बूढ़ा डंडा लिये हुए बैठा था। विद्यार्थी नहीं थे इसलिये रघुवर प्रसाद ने अंदर घुसने की कोशिश की। टैम्पो वाले ने जगह बनाने के लिये कहा। टेम्पो में जगह होती तो मिलती। ऐसा नहीं था कि बाहर मैदान से थोड़ी जगह ले लेते और टैम्पो में रख देते तो जगह बन जाती। बिना जगह के वे टैम्पो में घुस गये। जब टैम्पो चली तब उनको लगा कि दम नहीं घुटेगा। लड़्कियों-औरतों के बीच बैठे हुए आगे जब उनको कोई विद्यार्थी देखेगा तो अटपटा नहीं लगेगा, क्योंकि विद्यार्थी सोचेगा कि रघुवर प्रसाद के बैठने के बाद औरतें बैठी होंगी। औरतों के बाद रघुवर प्रसाद बैठे होंगे ऐसा विद्यार्थी क्यों सोचेगा।…

…डंडे वाले बूढ़े के कंधे पर कंबल रखा था जो रघुवर प्रसाद को गड़ रहा था। ठंड को गए कुछ दिन बीत गए थे पर बीते दिनों की आदत की तरह कंबल कंधे पर रखा हुआ था।”

टेम्पो से आना-जाना स्थायी नहीं होता। रघुवर प्रसाद के जीवन में तब नया मोड़ आता है जब प्रतिदिन उसी  रास्ते से हाथी पर सवार एक साधू रोज रघुवर प्रसाद को अपने हाथी पर महाविद्यालय लाने-ले जाने लगता है। रघुवर प्रसाद हाथी की सवारी पर महाविद्यालय जाते हैं। लौटते में हाथी उन्हें घर तक छोड़ देता है। यह हाथी रघुवर प्रसाद और सोनसी के बाद उपन्यास का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण पात्र है। रघुवर प्रसाद, साधू, हाथी और सोनसी मिलकर मानवीय संबंधों और मानव के पशु से संबंधों का एक पूरा संसार गढ़ते हैं। हाथी रघुवर प्रसाद के मोहल्ले, महाविद्यालय के विभागाध्यक्ष, सोनसी और रघुवर के छोटे भाई, सभी के जीवन में कौतुहल और आकर्षण का विषय बन जाता है। शहर से रोज एक व्याख्याता का हाथी पर सवार हो महविद्यालय आना-जाना सामान्य घटना नहीं। एक विपन्न निम्न मध्यमवर्गीय शिक्षक की सवारी का हाथी होना भी सामान्य घटना नहीं, किंतु उपन्यास में हाथी का अस्तित्व जीवन के एक अभिन्न अंग की तरह है। वह साईकिल, टैम्पो और स्कूटर जैसे विकल्पों के बाद भी अपनी महत्ता नहीं खोता।

“हाथी के जाने से एक बड़ी जगह निकल आयी थी। यह तो था कि हाथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी।”

उपन्यास की भाषा संवादों की अनेक परतों को एक साथ दिखाती चलती है। पात्र जब दैनंदिन जीवन के सामान्य कार्य निपटा रहे होते हैं, तभी वे सपने भी देख रहे होते हैं और तभी वे प्रेम भी कर रहे होते हैं। कुछ उदाहरण देखिये:

“रघुवर प्रसाद कल की तैयारी में किताब खोलकर बैठ गये। पत्नी खाना बनाते-बनाते पति को देख लेती थी। हर बार देखने में उसे छूटा हुआ नया दिखता था। क्या देख लिया है यह पता नहीं चलता था। क्या देखना है यह भी नहीं मालूम था। देखने में इतना ही मालूम था कि इतना ही देखा था।”

यह भी:

“…इसके बाद पत्नी ने पूछा बस स्टैण्ड से रिक्शे में आए थे?”

“नहीं पैदल आया था” पत्नी ने  सुना कि रघुवर प्रसाद घोड़े पर आए थे।
“हाथी नहीं मिला” पत्नी ने पूछा। रघुवर प्रसाद ने सुना कि पत्नी पूछ रही है – रिक्शा नहीं मिला था?
“मिला था पर पैदल आया। पैदल आने से पैसे बच गए थे। पास ही बस स्टैण्ड है।”
पत्नी ने सुना – घोड़े के पैसे नहीं देने पड़े थे। बस स्टैण्ड पास है।

“घोड़े से आने पर कितना समय लगा?” पत्नी ने पूछा।

“जल्दी आ जाता पर रास्ते में एक दोस्त मिल गया।” रघुवर प्रसाद ने कहा।

पत्नी ने सुना – रास्ते में एक घुड़सवार और मिल गया था।

“फिर इधर-उधर घूमते रहे।”

इधर-उधर घोड़ा दौड़ाते घूमते रहे – पत्नी ने सुना।

“थक गए तो एक टिपरिया चाय की दुकान में चाय पी।”

थक गए तो एक खण्डहर जैसी पुरानी सराय में केसरिया दूध पिया – पत्नी ने सुना।

“अच्छी गरम चाय थी।”

गाढ़ा गरम दूध था-पत्नी ने सुना।

“मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी” पत्नी ने कहा।

मैं भी तुम्हारे साथ घुड़सवारी करूंगी – अबकी बार रघुवर प्रसाद ने सुना। “

संवादों की परतों में इच्छाएँ छुपी हैं, भावनाएँ छुपी हैं और छुपा है प्रेम। इसे समझने के लिये आगे का उद्धरण पढ़िये:

“…”घुड़सवारी क्यों खटिया में लेटे-लेटे उड़ जाएँगे।”  रघुवर प्रसाद ने कहा।

पक्षी बनकर उड़ जाएँगे – पत्नी ने सुना।

“हाँ” पत्नी ने कहा।

“उड़कर सबसे पहले कहाँ जाएँगे?”

“जहाँ छः महीने की रात होती हो।” रघुवर प्रसाद ने कहा। पत्नी ने भी यही सुना।

“छः महीने की रात में इस खटिया पर लेटे रहेंगे” पत्नी ने कहा। रघुवर प्रसाद ने भी यही सुना।”

“दीवार में  एक खिड़की रहती थी” उपन्यास के अंदर एक कविता है। या कि कविता की शक्ल में एक उपन्यास है। किसी भी प्रकार की जाँच-पड़ताल या शिकायत से मुक्त यह एक चित्र है। क्या चित्र वैसा ही होता है जैसा यथार्थ है? नहीं। चित्रकार अपने चित्र में यथार्थ के दृष्यों के रंगों को अपनी अलग ही दृष्टि से चित्रित करता है। यदि हमारे जीवन का चित्र हमें ही बनाने को कह दिया जाय तो संभवतः हम एक रंगहीन बेजान चित्र बनायें। रघुवर और सोनसी भी शायद अपनी ही कहानी स्वयं कहते तो एक बेजान, रंगहीन कहानी कहते। विनोद कुमार शुक्ल ने उनकी कहानी में रंग भरे हैं, बाहर से लाकर नहीं, उन्होंने रंग थोपे नहीं हैं, बल्कि जीवन में पहले से मौजूद रंगों को अपनी तूलिका से जीवंत और दृष्यमान कर दिया है। रघुवर और सोनसी की कहानी रंगों से भरी हुई एक जीवंत कहानी है। यह बात भले ही घिसी-पिटी लगे, पर यही सत्य है कि यह हमारी और आपकी कहानी है। हमारी कहानी बहुरंगी और जीवंत है!

-हितेन्द्र अनंत

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पुस्तक – दीवार में एक खिड़की रहती थी। (उपन्यास)

लेखक – विनोद कुमार शुक्ल

पृष्ठ संख्या – 168 (पेपरबैक संस्करण)
प्रकाशक  –  वाणी प्रकाशन

मूल्य – 100 रूपये

4 टिप्पणिया

  1. बहुत अच्छी लगी समीक्षा। यह किताब बहुत दिन से पढ़ने को मेरे एकदम बगल में धरी है। अब लगता है पढ़ ही जाना चाहिये।🙂

  2. bahut achhi sameeksha hai ye Hitendra Bhai! Pehle do paragraphs mein kya mast baatein likhi hain aap ne. Padh ke maza aaya. Ye upanyaas mujhe padhna hai asap. padh ke aapko apne vichaar preshit karunga! Accha laga padh ke ki aap zindagi ko zindagi samajhne waali soch ke kaayal hain!

  3. बहुत बढ़िया लिखा है आपने। वास्तव में यह उपन्यास पूरी मुकम्मल कविता है।

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