निर्धनता को शापित एक समाज की समृद्धि का अभिलेख – बूढ़ी डायरी

भारत क्या है? इस प्रश्न पर विवादों का कोई अंत नहीं है। एक वर्ग है जो भारत को यूरोप की तरह अनेक संस्कृतियों का एक बेमेल समुच्च्य मानता है। उनके मत से यदि अंग्रेजों ने इस देश पर राज न किया होता तो यह देश, एक राष्ट्र न होकर पाँच-छः सौ  बिखरी हुई रियासतें होता। वहीं दूसरा वर्ग है जो भारत को एक भू-सांस्कृतिक इकाई मानता है। हो सकता है कि इतिहास के एक बड़े कालखंड में भारत एक राजनैतिक इकाई न रहा हो (एकाधिक बार वह ऐसा रहा भी है), पर आसमुद्र-हिमालय, एक प्रवाहमान विराट सांस्कृतिक अस्तित्व को नकारना भी असंभव है। जिस प्रकार गंगा का जल हिम-प्रदेशों में किसी रंग का और बंगाल की खाड़ी में किसी और रंग का हो, पर होता वह गंगा का जल ही है। उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक भारत का जनजीवन और दर्शन इसी प्रवाहमान संस्कृति का दर्शन कराता है।

इस संस्कृति रूपी प्रवाहमान नदी का जल अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न रंगों का हो सकता है, उसके प्रवाह की गति भिन्न हो सकती है, पर उस जल का स्रोत एक ही है, गंगोत्री एक ही है। यह भी सत्य है कि संस्कृति रूपी इस गंगा को एक विशाल नदी बनाने में इसमें मिलने वाली अन्य नदियों का भी योगदान है, किंतु इन नदियों ने भी एक प्रकार से अपने को गंगा में इस तरह से मिला दिया है कि उनकी पृथक पहचान कर पाना असंभव है। जी हाँ, मैं भारत की संस्कृति में पास-पड़ोस की अन्य संस्कृतियों के मिलन की ही चर्चा कर रहा हूँ।

ऐसी प्रवाहमान संस्कृति हजारों वर्षों से अपने में बहुत कुछ समेटे हुए है, सांस्कृतिक प्रतीक हैं, धर्म हैं, आस्थाएँ हैं, कला की समृद्ध परंपराएँ हैं, और इन सबसे बढ़कर जीवन मूल्य हैं। वे जीवन मूल्य जो हजारों सालों के अनुभवों को संचित करते हुए पिछ्ली असंख्य पीढ़ियों से कभी वाचिक परंपरा, कभी नसीहत, कभी धार्मिक रिवाजों तो कभी कला के अनेक आयामों के जरिये हमारी पीढ़ी तक पहुँचे हैं। पर बीते कुछ सौ वर्षों में परंपरा  और संस्कृति के इस प्रवाह में बाधाएँ आयी हैं। जिस प्रकार आज गंगा की दुर्दशा है, आधुनिकता और अबूझ विकास के नाम पर यह संस्कृति भी उसी प्रकार अस्तित्व के भीषण संकट का सामना कर रही है। पूरी की  पूरी संस्कृति पर एक आक्रमण है, एक नहीं अनेक दिशाओं से।

ऐसे समय में किसी भी समाज के लिये दो बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं- एक, वह आने वाले आक्रमण को रेखांकित करे, दो, जिस संस्कृति को अस्तित्व का खतरा है उसे साहित्य सहित विभिन्न माध्यमों में आलेखित कर संजोने का प्रयास करे। ताकि आगे आने वाली पीढ़ियाँ यदि उस संस्कृति का प्रत्यक्ष दर्शन न भी कर पाये, तो कम से कम संस्कृति की कहानी कहते इन अभिलेखों की सहायता से उसे पुनर्जीवित कर पाने की संभावना उस नयी पीढ़ी के साथ बनी रहे।

“बूढ़ी डायरी” सहित चार  अन्य उपन्यासों के लेखक अशोक जमनानी यही दोनों कार्य कर रहे हैं। उनका पहला उपन्यास “बूढ़ी डायरी”  वह अभिलेख है जो न केवल अपनी ही समृद्ध विरासत को आँखों के सामने लुटता देख रहे समाज को न केवल इस आत्मघाती  उपेक्षा के लिये चेताने का काम करता है, बल्कि उसे उसकी ही पैतृक संपत्ति के महान वैभव से भी परिचित कराता है।  कहने के लिये इस उपन्यास में एक नायक है(जिसका नाम “सत्य” है), कहने के लिये अवश्य ही एक बहुत सुंदर कहानी है, पर सत्य तो यह है कि यह हजारों सालों की विरासत को उपेक्षित भाव से लुटाने को तैयार बैठे आपकी और मेरी कहानी है।

budhi diary

अब कहानी पर आते हैं। अनेक परते हैं, अनेक आवरण हैं। सबसे ऊपरी सतह पर एक भौतिकवादी जमींदार का पौत्र है जिसके पिता एक विरक्त, आदर्शवादी व्यक्ति हैं जिनका जीवन गांधीवादी मूल्यों  से जीने में बीता है। यह गांधीवादी पिता अपनी आँखों के सामने विवश हो देखता है कि किस प्रकार उसका पुत्र उसके रास्तों को न चुनकर  अपने दादा की तरह जमींदारी ठाठ-बाट और भौतिकवादी मूल्यों पर आधारित जीवन जीता है। पिता पुत्र को रोकने का प्रयास नहीं करता, केवल गांधीवादी  उपायों से प्रायश्चित करता है। पूरे उपन्यास में पिता की उपस्थिति एक साये की तरह है। वह अनीति देख तो सकता है, पर अनीति को होने से रोक नहीं सकता। यहाँ हम किसे याद करें? भीष्म को? या धृतराष्ट्र को?

किंतु नायक सत्य का जीवन विवाह के बाद धीरे-धीरे नया मोड़ लेता है। नायिका “धारा” सत्य के जीवन में संस्कृति और का कला का प्रवेश है। धारा के आने के बाद नायक और पिता के संबंध रोचक परिवर्तनों से गुजरते हैं, पर एक औसत राजपूत परिवार की तरह, पिता-पुत्र  के बीच न्यूनतम दूरी मिटती नहीं।

कहानी की दूसरी परत है भारत की समृद्ध पौराणिक परंपरा पर बनी हुई पाषण प्रतिमाएँ। इसके केंद्र में है मध्यप्रदेश का एक छोटा सा गाँव तेवर जो कभी कल्चुरी काल में कल्चुरी वंश की राजधानी “त्रिपुरी” हुआ करता था। तेवर  में उस काल में बनी लाखों पाषाण प्रतिमाएँ और मंदिरों के भग्नावेश आज भी हैं। बिखरे हुए, उपेक्षित और अनजान गाँववासियों के अज्ञान के चलते गायब हो जाने का खतरा लिये। नायिका अपने पिता से विरासत के रूप में इन प्रतिमाओं को पाती है। नायिका के माध्यम से अशोक जी ने अनेक प्रतिमाओं की कहानी कही है। इन प्रतिमाओं की कहानी के माध्यम से पुराणों और लोकोक्तियों में वर्णित समृद्ध कथाएँ उपन्यास का सबसे सुंदर पक्ष हैं।

कहानी आगे बढ़ती है। सत्य का पुत्र क्षितिज पश्चिम में शिक्षित युवक है, जो अपने माता-पिता के द्वारा संगृहित इन प्रतिमाओं के सच्चे मोल को नहीं पहचानता। इतना ही नहीं, पश्चिम की उसकी शिक्षा ने उसे अपने पिता के प्रति स्वाभाविक प्रेम और सम्मान से भी दूर कर दिया है। यहाँ क्षितिज का चरित्र कुछ अर्थों में हमारी-आपकी याद दिलाता है। अपनी ही विरासत के मूल्य से अनभिज्ञ और नये मूल्यों को ग्रहण करने के अति उत्साह में नैतिक अधोपतन की ओर अग्रसर्। जी नहीं, यहाँ पूर्व-बनाम पश्चिम का रटा-रटाया रोना नहीं है। उपन्यास अनेक स्थानों पर पश्चिम से आये प्रगतिशील मूल्यों का समर्थन करता दिखायी देता है।

इसके आगे कहानी में एकाधिक पीढ़ियों का संघर्ष है। यह संघर्ष केवल पाषाण-प्रतिमाओं को बचाने का ही संघर्ष नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों, मानवीय संबंधों की नैसर्गिक ऊष्मा और पवित्रता को बनाये रखने का भी संघर्ष है। क्या क्षितिज की घोर उपेक्षा के कारणअसंख्य मूल्यवान और पुरातात्विक दृष्टि से अति-महत्वपूर्ण प्रतिमाओं को खतरा बना रहता है? क्या अपने ही पिता के साथ जटिल संबंधों को जीने वाला नायक सत्य अपने पुत्र क्षितिज के साथ सामान्य संबंधों और प्रेम को बनाये रखने में  सफ़ल हो पाता है? उपन्यास पढ़कर इन प्रश्नों का जो उत्तर मिलता है वह पाठक के हृदय में भावनाओं के अनेक  तूफ़ान पैदा कर सकता है।

दूसरा संघर्ष जिससे कहानी दो-चार होती है वह है, प्राचीन विरूद्ध नवीन का संघर्ष। क्या एक बूढ़े आदमी की, जिसने अपनी सारी संपत्ति खो दी है, और जो अब अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिये दूसरों पर निर्भर है, समाज में कोई उपयोगिता हो सकती है? ठीक वैसे ही क्या एक हजारों साल पुरानी संस्कृति से मिले नैतिक- मूल्यों और परंपराओं की  भी इस आधुनिक भौतिकवादी समाज में कोई उपयोगिता है?

“बूढ़ी डायरी” के लेखक इन प्रश्नों का उत्तर देने का सशक्त प्रयास करते हैं। पर उत्तर देने से अधिक यह उपन्यास प्रश्न पूछने का काम करता है। डायरी की शक्ल में लिखे गये इस उपन्यास के प्रत्येक अध्याय के अंत में कुछ प्रश्न हैं जो पाठक को उसके अपने उत्तर ढूंढने हेतु प्रेरित करते हैं। वैसे तो एक सच्चे लेखक का भी यही कार्य होता है, प्रश्न पूछना, न कि उत्तर देना। लेखन जितना उत्कृष्ठ होगा, प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की पाठक की आतुरता उतनी ही अधिक होगी। “बूढ़ी डायरी” ऐसे अनेक प्रश्न आपके सामने रखती है। एक बानगी देखिये:

“रंगों से दूर इस बुढ़ापे में अतीत की विविधता ही शायद कुछ रंग भर सके। धारा! बुढ़ापा इतना श्वेत क्यों है?”

“धारा! पुत्र की गलतियों के लिये पिता का प्रायश्चित किसे मुक्त करता है?”

“धारा! क्या रावण मरकर भी हम सब में जीवित है?”

“धारा! आवाजें ही नहीं डराती, मन में डर हो तो मौन भी बहुत डराता है।”

“धारा! कभी-कभी पत्थर भी अपने सगे-संबंधी लगते हैं। और कभी-कभी सगे-संबंधी भी पत्थर लगते हैं।”

बूढ़ी डायरी एक शापित समाज की कहानी कहती है। वह शापित समाज जिसे कभी समृद्धि और वैभव के असीमित भोग का वरदान प्राप्त था। वह समाज जिसे शाप मिला है कि वह न केवल अपने वैभव को विवश अपने समक्ष लुटता देखे बल्कि स्वयं उस लूट में लुटेरों का बढ़-चढ़कर साथ भी दे। यदि यह सत्य है कि हमारे समाज पर ऐसा कोइ शाप है, तो विश्वास कीजिये “बूढ़ी डायरी” जैसे प्रयास एक दिन इसी समाज के लिये वरदान सिद्ध होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।

पुस्तक – बूढ़ी डायरी

लेखक – अशोक जमनानी

पृष्ठ संख्या – 160

लगभग सभी ऑनलाइन पुस्तक विक्रय की वेबसाईटों पर उपलब्ध।

-हितेन्द्र अनंत

2 टिप्पणिया

  1. बहुत सुन्दर समीक्षा की है। बधाई!

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: