आरंभ और अंत [कविता]

ऊंचे पर्वतों पर

किसी गंगोत्री से जो निकले

उस जलधारा का

गंगा हो जाना

और मिल जाना समुद्र से अंततः

क्या है?

नियति है?

या सचेत एक निर्णय है

उस जलधारा का?

या यह

कि पर्याय नहीं कोई

गंगा हो जाने के अतिरिक्त!

 

वनों के एकांत में जो मिलते हैं

उन असंख्य झरनों का क्या?

मस्तमौला चाल से जो

बहा करते हैं इधर-उधर

और अंत में वन में ही कहीं

भटक कर खो जाते हैं?

क्या गंगा बन जाना

उनकी नियति नहीं होती?

या सचेत एक निर्णय है उनका

गंगा न बन जाने का?

या कि पर्याय नहीं कोई उनके भी पास

भटक कर खो जाने के अतिरिक्त!

 

गुलाब के पौधों से काटकर

क्यारियों में रोपी गयी हर कलम से

बनते हैं जो पौधे

उनमें से जिनमें नहीं फूल पाते कभी गुलाब

उन पौधों को है क्या अधिकार

केवल पौधा ही बने रहने का?

या नियति है उनकी कि

उखाड फेंक दिये जायें

या कि सचेत कोई निर्णय है उनका

कि वे ऐसे गुलाब जन्मना ही नहीं चाहते

जिन्हें छीन ले उनसे कोई!

उद्यानों के मालियों से पूछिये

है कोई विकल्प?

ऐसे पौधों के लिये उनके पास?

 

वह सब जिसका आरंभ है

उसके अंत की इतनी चिंता क्यों है हमें?

इससे पहले यह प्रश्न

कि हमें कौन बताता है

आरंभ की परिभाषा ही क्या है?

 हम यदि आरंभ ही नहीं जानते

अंत को कैसे परिभाषित कर लेते हैं?

आरंभ के अस्तित्व पर और

अंत की सत्यता पर हमारा यह विश्वास

और प्रत्येक अंत को इस प्रकार परिभाषित करना

क्या हमारी नियति है?

हमारा एक सचेत निर्णय है?

या कि कोई विकल्प नहीं हमारे पास

आरंभ से अंत तक सीमित हो जाने के अतिरिक्त!

और विस्मृत कर देने के अतिरिक्त

उसे जो “अनंत” है!

 

-हितेन्द्र अनंत 

6 टिप्पणिया

  1. bahut hi khoobsurat rachna! soch ki gehraayi ko dekhkar waah kiye bina nahi reh paya! padhkar anand aaya. dhanyavaad iske liye!

  2. कोमल, गंभीर और उदास से विचारों का ऐसा व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण !!!! बहुत अच्छा लगा पढ़ कर!

    दोबारा पढने को विवश,

    अमित।

    1. धन्यवाद! धन्यवाद!!

      कहाँ थे आप? आशा है अब इन्टरनेट की दुनिया में पुनः सक्रिय हो गए होंगे।

      1. kya khoob likha hai aap ne ye post….kya maza aaya padh ke!!

        ghazal jaisi bhaavnaayein hain kuch yahan!

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