ओह! यस, अभी! – (व्यंग्य)

गर्मियों के दिन हैं, कभी ये छुट्टी के दिन हुआ करते थे। श्रीमतीजी चूँकि कॉलेज में पढ़ाती हैं अतः उन्हें गर्मियों में छुट्टियाँ मिल जाती हैं। पिछले सप्ताह वे मायके चली गयीं। उन्हें ट्रेन में बिठा कर घर लौटा और टीवी चलाया। एक शीतल पेय का विज्ञापन आ रहा था – “पेप्सी! ओह! यस, अभी”! अर्थात् जो करना है कर डालो, यही समय है।

मैंने भी सोचा इस एक-दो सप्ताह की स्वतंत्रता को यूँ ही नहीं खोने दूँगा। जी लिया जाय अपने पुराने कुँवारेपन के दिनों को! यही समय है, जो करना है कर डालो! मैंने झट रैक्स को फोन लगाया। मेरा मित्र रैक्स अब तक अविवाहित है। पुणे में ही एक सॉफ़्टवेयर कंपनी में काम करता है और अकेला रहता है। सोचा इसके साथ उसके ही फ्लैट में कुछ दिन रहा जाय और अपनी “खोयी हुई जवानी” के दिनों को फिर से जी लिया जाय! ओह! यस, अभी!

फोन लगाया, तो रैस्क ने कहा, “अभी के अभी आ जाओ। जो करना है कर डालो, यही समय है!” मैंने पूछा रैक्स, क्या तुम भी शीतल पेय के उसी क्रांतिकारी विज्ञापन से प्रेरित हो जिसके विप्लवकारी वचनों को सुनकर मैंने तुम्हें फोन लगाया है? रैक्स ने कहा, “नहीं यार, वो तो कारण है ही, लेकिन यह भी कि मैं अब एक महीने बाद शहर छोड़कर दिल्ली जा रहा हूँ। लेकिन तुम पूरी कहानी आकर सुनना अभी फोन पर शुरू न हो जाना।”

समाचार तो चौंकाने वाला था ही , सवाल भी अनेक आये मन में, किंतु मैंने किसी प्रकार स्वयं को संयत किया और सोचा कि इन सवालों को रैक्स के घर जाकर ही पूछना चाहिये। सात दिन उसके साथ पुराने दिनों की तरह जीने का जो उत्साह था, वह उसके जाने की खबर सुनकर थोड़ा फीका पड़ गया।

रैक्स के घर पहुँचने पर दरवाजे की घंटी बजायी। मुझे देखते ही रैक्स हँस पड़ा, “अबे तुम फिर से धोती में! आये हो कुँवारेपन के दिन जीने और फिर से यह धोती!” मैंने कहा “पुरानी बहस फिर से न शुरू करो, धोती का उम्र से क्या लेना-देना?”

“अरे छोड़ो धोती को, अंदर आओ, पहले कुछ खाते हैं।” रैक्स ने मुझे अंदर कुछ इस जल्दी में खींचा मानों वह डरा हो कि उसकी बिल्डिंग के लोग मुझे धोती में न देख लें!

खाना मेज पर तैयार था। मेज के बींचो-बीच एक बड़ा पिज़्ज़ा, और शीतल पेय की वह बोतल जिस पर पीली रंग की तिरछी एक पट्टी पर अंग्रेजी में लाल रंग में लिखा था “ओह यस! अभी!!”।

पिज़्ज़ा के अपने एक हिस्से पर मैंने टमाटर की चटनी का लेप लगाया और लाल मिर्च के कुछ टुकड़े बिखराये। फिर रैक्स से पूछा “इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर दिल्ली क्यों जाना चाहते हो? कुछ बड़े वेतन का मामला है, या वह कंपनी तुम्हें विदेश भेज रही है?”

“भाई साहब! दिल्ली जा रहा हूँ मुखर्जी नगर में रहने, और बैनर्जी सर की आईएएअस कोचिंग क्लास में पढ़ने के लिये! अब हम आईएएस की तैयारी करेंगे!”

“हैं! आईएएस? सॉफ़्टवेयर की नौकरी है इतनी बढ़िया, इतना वेतन जो तुम्हें आज मिला रहा है, सरकारी नौकरी में संभवतः कभी न मिले! हाँ, अगर तुम्हारी ऊपर की कमाई वाला इरादा है, तो बात अलग है!” मैंने कहा?”

“तुम क्या हर काम पैसे के लिये करते हो बे! मैं देश की सेवा करना चाहता हूँ। देश की व्यवस्था सड़ चुकी है। देख रहे हो क्या हो रहा है? मंत्री पर मंत्री त्यागपत्र दे रहे हैं। उच्चतम न्यायालय से झूठ बोला जा रहा है, न्यायालय सीबीआई को पिंजरे में कैद तोता कह रहा है। घोटालों पर घोटाले हो रहे हैं। पूरा का पूरा सिस्टम ही खराब है। मैं तो बचपन से ही देश की सेवा करना चाहता था। अब आईएएस बनूँ तो बात आगे बढ़े।” रैक्स ने उत्तर दिया।

“मेरे भाई रैक्स उर्फ राम कृष्ण सावंत जी! देश की सेवा का तुम्हारा सपना अच्छा है। लेकिन क्या तुम आज भी देश की सेवा नहीं कर रहे हो? तुम पूरी निष्ठा से आयकर देते हो, सॉफ़्टवेयर में तुम्हारी कंपनी करोड़ों डॉलरों का निर्यात करती है, यह सब भी तो देश की सेवा ही है मित्र!”

“तुम नहीं समझोगे, विवाह के बाद से तुम ज़रा संभलकर चलने लगे हो! अरे, कर देने मात्र से सेवा नहीं हो जाती देश की! पूरी व्यवस्था बदलनी होगी!  फिर मैं तो व्यवस्था का अंग बनकर भीतर से उसे बदलना चाहता हूँ, माओवादियों की तरह व्यवस्था को उखाड़ने की बात तो नहीं कर रहा ना! फिर तुम्हें क्या आपत्ति है?”

“अच्छा यह बताओ, तुम कहते हो कि बचपन से ही यह देश-सेवा का तुम्हारा सपना था। फिर इतने दिन तुम क्या कर रहे थे बंधु? यह सॉफ़्टवेयर की नौकरी की ही क्यों तुमने? सीधे आईएएस ही कर लेते?”

“चाहता तो मैं यही था कि बारहवीं के बाद ही आईएएस की तैयारी करूँ, लेकिन मैं एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से हूँ। आईएएस की तैयारी में कभी-कभी अनेक वर्ष लग जाते हैं। मेरे पिता इतने लंबे समय तक मेरी तैयारी का खर्च नहीं उठा सकते थे। तो मैंने सोचा कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई करूँ। इंजीनियरिंग करने पर आम डिग्रियों की अपेक्षा नौकरी की संभावना बढ़ जाती है। एक सरकारी इंजीनियरिंग महाविद्यालय में मुझे प्रवेश मिल गया। छात्रवृत्ति तो थी ही, मैं शुरू से ही अच्छे नंबर लाया करता था। लेकिन इंजीनियरिंग के दौरान मैंने देखा कि सभी इंजीनियरिंग पढ़ने वालों को नौकरी मिले यह आवश्यक नहीं। तो मैंने सोचा कि क्यों न इंजीनियरिंग के बाद किसी आईआईटी से एम.टेक. कर लिया जाय। कम से कम एम.टेक. के बाद तो नौकरी तय ही होगी”। रैक्स उत्तर देते हुए कहीं खो गया। उसके हाथ में रखा पिज़्ज़े का टुक़ड़ा वैसे ही लटका हुआ था जैसे नो पार्किंग हटाने वाली पुलिस की क्रेन में दोपहिया गाड़ियाँ लटकी रहती हैं। दूसरे हाथ में शीतल पेय से भरा काँच का गिलास था।

“अरे भाई! खाते-खाते बात करो!” मैंने उसे टोका। “अच्छा यह बताओ कि तुम जब आईएएस ही करना चाहते थे, तो यह एम.टेक. क्यों? इंजीनियरिंग के बाद ही कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लेते, और साथ ही आईएएस की तैयारी! जो करना है उसी समय कर लेना था, ओह! यस, अभी! है ना?”

“आईएएस की तैयारी दिल्ली में होती है हितेन्द्र भाई! वहाँ जैसी तैयारी होती है वैसी कहीं और संभव नहीं। तगड़ी प्रतियोगिता है। सफल होने वाले दिन रात पढ़ते हैं, तब जाकर होती है तैयारी। तुम तो जानते होगे, आईएएस की चयन परीक्षा के लिये खूब रटना और खूब पढ़ना पड़ता है। यह सब तभी हो सकता है जब आपके पास अच्छी कोचिंग की फीस भरने के लिये और दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में रहने के लिये पैसे हों, जहाँ इसी तरह के लोग रहते हैं। कितने ही लोग सालों तैयारी करते हैं और फिर हारकर लौट आते हैं। तो, इन सब बातों के लिये पैसा चाहिये था, जो मेरे पास नहीं था। सो मैंने यह सोचा कि दो-तीन साल कोई बड़ी नौकरी करूँ और खूब पैसे बचाऊँ। फिर आराम से दो-तीन साल तैयारी के लिये दूँ। यदि असफल भी हो गया, तो मेरे पास होगी एम.टेक. की डिग्री और तीन साल का सॉफ़्टवेयर में काम करने का अनुभव। कम से कम वापस आने पर कहीं “सेटल” तो हो जाउंगा!” रैक्स ने उत्तर देकर शीतल पेय को गले का रास्ता दिखाया।

“चार साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई, दो साल एम.टेक. और तीन साल की नौकरी। यानी कुल नौ साल”। मैंने कहा।

“हाँ यार, नौ साल! नौ साल से इस सपने को दिल में दबाये रखा है। अब समय आ गया है। अब तुम संभालो पुणे, हम तो चले दिल्ली!” रैक्स ने काव्यात्मक अंदाज़ में कहा।

“अच्छा एक बात बताओ रैक्स, तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा सपना क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है?”

“बताया ना भाई! देश की सेवा करना, इस सड़ी-गली व्यवस्था को बदलना, देश के गरीबों की आँखों में जो आँसूँ हैं, उन्हें पोंछना। मैंने यह सपना नहीं देखा कभी, कि विवाह करूँ, बच्चे पैदा करूँ, बंगला-गाड़ी खरीदूँ।”

“तुम्हारे लिये देश की सेवा कितनी महत्वपूर्ण है?” मैंने पूछा।

“अपने प्राणों से भी ज़्यादा, समझे! मैं देश के लिये प्राण भी दे सकता हूँ। मैं अपने देश से उतना ही प्यार करता हूँ जितना गांधी, सुभाष, खुदीराम बोस और भगत सिंह करते थे। इसीलिये मैंने अबतक विवाह भी नहीं किया, और न करूंगा। मेरा पूरा जीवन देश को समर्पित है।” रैक्स ने भावुकता में उत्तर दिया।

“अच्छा, जब बारहवीं पास की तुमने, तब क्या आयु रही होगी तुम्हारी?”

“यही कोई सोलह वर्ष, क्यों?” रैक्स ने पूछा।

“यानी बचपन से जो तुम्हारा स्वप्न था, उसे नौ वर्षों के लिये तुमने स्थगित किया। अब तुम्हारी आयु पच्चीस वर्ष है। आईएएस बन जाने में और कितने वर्ष लगेंगे तुम्हें?”

रैक्स ने कोई उत्तर न दिया, वह टीवी देख रहा था, टीवी पर वही विज्ञापन आ रहा था, रणवीर कपूर के हाथ में शीतल पेय की बोतल, और अंत में रणवीर ने कहा, “पेप्सी! ओह! यस, अभी!” विज्ञापन खत्म हुआ, आईपीएल का मैच शुरू हुआ।

मैंने दुबारा प्रश्न किया। “रैक्स, बचपन से जो तुम्हारा स्वप्न था, उसे नौ वर्षों के लिये तुमने स्थगित किया। अब तुम्हारी आयु पच्चीस वर्ष है। आईएएस बन जाने में और कितने वर्ष लगेंगे तुम्हें?”

“भाई, प्रथम प्रयास में भी चयन हो गया तब भी दो वर्ष न्यूनतम, फिर चयन के पश्चात दो वर्ष का मसूरी में प्रशिक्षण। फिर असली काम शुरू होगा।”

“अच्छा यह बताओ, देश की सेवा के लिये आईएएस ही एक रास्ता क्यों है?”

“रास्ता नहीं, वह तो सीढ़ी है हितेन्द्र! इतनी मजबूत शक्तियाँ जो देश को लूट रही हैं, उनसे हम और तुम लड़ नहीं सकते। उनसे लड़ने के लिये हमें शक्ति चाहिये, सत्ता की शक्ति, आवश्यक हुआ तो पैसे की भी शक्ति। तो आईएएस वह सीढ़ी है जिससे हमें यह सब हासिल होगा।”

मैं हैरान था! आखिर रैक्स चाहता क्या है? आईएएस भी मात्र एक सीढ़ी है? तो फिर रैक्स की मंज़िल आखिर है क्या? “भाई रैक्स, आईएएस अगर सीढ़ी है, तो तुम आखिर चाहते क्या हो भाई?”

“अरे हितेन्द्र! सभी आईएएस अधिकारी आखिर हैं क्या? राजनेताओं के इशारे पर नाचने वाले नौकर ही ना! मेरी योजना है कि मैं एक लोकप्रिय आईएएस आधिकारी बनूँ, फिर अपनी लोकप्रियता के बलबूते एक दिन चुनावी राजनीति में उतरकर वास्तविक सत्ता पर अधिकार जमाऊँ। असली देश सेवा तो तब शुरू होगी यार!”

थोड़ी देर के लिये हम शांत हो गये। इधर टीवी पर क्रिकेट खिलाड़ी क्रिस गेल छक्के पर छक्के लगा रहा था। रैक्स के उत्साह की सीमा न थी। सैंतीस गेंदों में शतक! कोई मामूली बात नहीं।

“कुछ भी कहो भाई, ट्वंटी-ट्वंटी ही असली क्रिकेट है। क्या गति है, क्या तेज़ी है, क्या जोश है! और फिर समय भी कम लगता है। तीन घंटे में मैच खत्म!” रैक्स ने कहा।

“गति ही जीवन है, क्यों रैक्स?”

“बिलकुल, गति ही जीवन है।”

“हमारे देश की वर्तमान व्यवस्था कितनी सुस्त है! कोई गति नहीं! है ना रैक्स?”

“और क्या, सुस्त, पस्त व्यवस्था है यार। इसी व्यवस्था को तो बदलना है।” रैक्स ने कहा।

“यही तुम्हारा सपना है?”

“सपना नहीं हितेन्द्र, यही मेरी योजना है।”

“तेरह साल बर्बाद करने की योजना बनाकर तुम अब भी इस सुस्त व्यवस्था को बदलने की योजना बना रहे हो?”

“मतलब!”

“मतलब, जो बचपन से देश सेवा का तुम्हारा सपना है., उसकी केवल तैयारी के लिये जवानी के नौ साल तो तुम लगा ही चुके हो, अभी तीन-चार साल और बाकी हैं तुम्हारी, उसके बाद भी तुम कहते हो कि आईएएस केवल सीढ़ी है, व्यवस्था परिवर्तन तो तब होगा जब तुम्हारे हाथ में सत्ता आयेगी! याने तब, जब तुम कम से कम चालीस वर्ष के हो चुके होगे”।

“तुम्हारा आशय क्या है भाई?” रैक्स ने पूछा।

“तुम कहते हो कि तुम देश के लिये उसी तरह प्राण दे सकते हो जैसे खुदीराम बोस ने दिये थे। जब वे शहीद हुए, उनकी आयु सत्रह वर्ष थी! गांधी, सुभाष, भगत सिंह ने कितनी डिग्रियों और कितनी नौकरियों के लिये प्रतीक्षा की थी देश-सेवा के लिये?”

रैक्स कुछ कहना चाहता था, पर मैंने उसे बीच में ही रोक दिया।

“रैक्स मेरे भाई, जिस देश के लिये तुम प्राण तक दे देना चाहते हो, उसके लिये यह चिंता कैसी कि डिग्रियाँ हों, अनुभव हो, ताकि एक अदद नौकरी मिल सके! अरे भाई. जिन्हें प्राणों की भी चिंता नहीं वे भला कभी नौकरी की चिंता किया करते हैं? और फिर यह देखो कि तुम अपने जीवन के कितने वर्ष देश्-सेवा की तैयारी मात्र में लगा रहे हो, न जाने कब वह समय आयेगा, जब तुम देश की सेवा आरंभ भी करोगे! तब तक तुम अपने जीवन के सबसे ऊर्जावान दिनों को खो न चुके होगे? देश को ईश्वर से कम तो न मानते होगे? ईश्वर को भी ताज़े पुष्प चढ़ाये जाते हैं भाई, बासी और मुरझाये हुए नही!”

रैक्स इन बातों को सुनकर चुप हो गया। उसने कोई उत्तर न दिया। टीवी बंद कर दिया। कुछ देर के लिये वह विचारमग्न हो गया। इस सन्नाटे को देखकर मैंने अपने हिस्से के बचे हुए पिज़्ज़े को खत्म किया। थोड़ा शीतल पेय पिया, और बची हुई बोतल रैक्स की ओर बढ़ाई।

रैक्स ने मुझसे बोतल ली। और बोतल के रैपर को ध्यान से देखा। पीले रंग की तिरछी पट्टी में लाल रंग से अंग्रेजी में लिखा था – “ओह! यस, अभी!”।

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अचानक रैक्स के चेहरे पर चमक आई। पूरी बोतल गिलास में खाली करने की बजाय सीधे गटक कर रैक्स ने कहा – “हितेन्द्र भाई! तुम्हारी बात में दम है यार! जो करना है कर डालो, यही समय है! तुम्हारी बात पर सोचना पड़ेगा मुझे। लगता है मेरे सपने क्या हैं और उनको पूरा करने की मैंने क्या योजना बना रखी है, इन सब बातों पर फिर से सोचना होगा!”

“मैं तुम्हें हतोत्साहित नहीं करना चाहता रैक्स!” मैंने कहा।

“अरे छोड़े इन बातों को भाई, चलो, रेल्वे स्टेशन चलते हैं!”

“है! रेल्वे स्टेशन? अब वहाँ क्यों?” मैंने पूछा।

“अरे मेरे धोती वाले विवाहित काकाजी! भूल गये पुराने दिन! जब आधी रात को स्टेशन जाया करते थे चाय और बन-मस्का का मज़ा लेने? अरे तुम यहाँ अपने पुराने दिन जीने आये हो ना! तो चलो भाई, जी लो उन दिनों को फिर से मेरे साथ। मेरा तो जो देश सेवा का फैसला है वह कर ही लेंगे, पर भाभीजी के आने से पहले, तुम्हारी सेवा तो हो ही जाय! अब धोती संभालो और चलो!” तेज़ी से उठकर रैक्स ने दरवाजे का रूख किया।

मैंने एक बार फिर शीतल पेय की बोतल को ध्यान से देखा। पीले रंग की तिरछी पट्टी में लाल रंग से अंग्रेजी में लिखा था – “ओह! यस, अभी!”।

-हितेन्द्र अनंत

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मेरे अन्य व्यंग्य पढ़ने के लिये इस लिंक पर जायें:

https://hsonline.wordpress.com/category/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF-satire/

-हितेन्द्र अनंत

2 टिप्पणिया

    1. धन्यवाद!
      -हितेन्द्र अनंत

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