ज्ञानार्जन – स्वामी विवेकानंद

ज्ञानार्जन

-स्वामी विवेकानंद

ज्ञान के आदि स्रोत के संबंध में विविध सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं। उपनिषदों में हम पढ़ते हैं कि देवताओं के संबंध में प्रथम और प्रधान ब्रह्मा जी ने शिष्यों में उस ज्ञान का प्रचार किया, जो शिष्य परंपरा द्वारा अभी तक चला आ रहा है। जैनों के अनुसार उत्सर्पिणि एवं अवसर्पिणि कालचक्र के बीच कतिपय अलौकिक सिद्ध पुरुषों – जिनों का प्रादुर्भाव होता है और उनके सद्वारा मानव समाज में ज्ञान का पुनः पुनः विकास होता है। इसी प्रकार बौद्धों का भी विश्वास है कि बुद्ध नाम से अभिहित किये जानेवाले सर्वज्ञ महापुरूषों का बारंबार आविर्भाव होता रहता है। पुराणों में वर्णित अवतारों के अवतीर्ण होने के अनेकानेक प्रयोजनों में से आध्यात्मिक प्रयोजन ही मुख्य है। भारत के बाहर, हम देखते हैं कि महामना स्पितामा जरथुष्ट्र मर्त्यलोक में ज्ञान को लाये। इसी प्रकार हजरत मूसा, ईसा तथा मुहम्मद ने भी अलुकिक शक्तिसंपन्न होकर मानव समाज के बीच अलुकिक रीतियों से अलौकिक ज्ञान का प्रचार किया।

केवल कुछ व्यक्ति ही ‘जिन’ हो सकते हैं, उनके अतिरिक्त और कोइ भी ‘जिन’ नहीं हो सकता, बहुत से लोग केवल मुक्ति तक ही पहुँच सकते हैं। बुद्ध नामक अवस्था की प्राप्ति सभी को हो सकती है। ब्रह्मादि केवल पदवी विशेष हैं, प्रत्येक जीव पदों को प्राप्त कर सकता है। जरथुष्ट्र, मूसा, ईसा, मुहम्मद ये सभी महापुरूष थे। किसी विशेष कार्य के लिये ही इनका आविर्भाव हुआ था। पौराणिक अवतारों का भी आविर्भाव इसी प्रकार हुआ था। उस आसन की ओर जनसाधारण का लालसापूर्ण द्रुष्टिपात करना अनधिकार चेष्टा है।

आदम ने फल खाकर ज्ञान प्राप्त किया। ‘नूह’ (Noah) ने जिहोवा देव की कृपा से सामाजिक शिल्प सीखा। भारत में देवगण या सिद्ध पुरूष ही समस्त शिल्पों के अधिष्ठाता माने गये हैं; जूता सीने से लेकर चण्डी-पाठ तक प्रत्येक कार्य अलौकिक पुरूषों के कृपा से ही संपन्न होता है। ‘गुरू बिन ज्ञान नहीं’, श्री गुरूमुख से निःसृत हुए बिना, श्री गुरू की कृपा हुए बिना शिष्य परंपरा में इस ज्ञान-बल के संचार का और कोइ उपाय नहीं है।

फिर दार्शनिक – वैदान्तिक कहते हैं, ज्ञान मनुष्य की स्वभावसिद्ध सम्पत्ति है – आत्मा की प्रकृति है; यह मानवात्मा ही अनंत ज्ञान का आधार है, उसे कौन सिखला सकता है? इस ज्ञान के ऊपर जो एक आवरण पड़ा हुआ है, वह सुकर्म के द्वारा केवल हट जाता है; अथवा यह ‘स्वतःसिद्ध ज्ञान’ अनाचार से संकुचित हो जाता है तथा ईश्वर की कृपा एवं सदाचार से द्वारा पुनः प्रसारित होता है; और यह भी लिखा है कि अष्टांग-योगादि के द्वारा, ईश्वर की भक्ति के द्वारा, निष्काम कर्म के द्वारा अथवा ज्ञान-चर्चा के द्वारा अंतर्निहित अनंत शक्ति एवं ज्ञान का विकास होता है।

दूसरी ओर आधुनिक लोग अनंत स्फूर्ति के आधारस्वरूप मानव-मन को देख रहे हैं। सबकी यह धारणा है कि उपयुक्त देश-काल-पात्र के अनुसार ज्ञान की स्फूर्ति होगी। फिर पात्र की शक्ति से देश-काल की विडम्बना का अतिक्रमण किया जा सकता है। कुदेश या कुसमय में पड़ जाने पर भी योग्य व्यक्ति बाधाओं को दूर कर अपनी शक्ति का विकास कर सकता है। अब तो, पात्र के ऊपर, अधिकारी के ऊपर जो सब उत्तरदायित्व लद दिया गया था, वह भी कम होता जा रहा है। कल की बर्बर जातियाँ भी आज अपने प्रभाव से सभ्य एवं ज्ञानवान होती जा रही हैं – निम्न श्रेणी के लोग भी अप्रतिहत शक्ति से उच्चतम पदों पर प्रतिष्ठित हो रहे हैं। नरमांस का आहार करने वाले माता-पिता की संतान भी विनयशील एवं विद्वान सिद्ध हुई है। संथालों के वंशज भी अंग्रेजों की कृपा से अन्य भारतीय विद्यार्थियों के साथ होड़ ले रहे हैं। वंशानुगत गुणों पर प्रतिष्ठित अधिकार भी दिनोंदिन आधारहीन प्रमाणित होता जा रहा है।

एक संप्रदाय के लोग ऐसे हैं, जिनका विश्वास है कि प्राचीन महापुरूषों का उद्देश्य वंश-परंपरा से केवल उन्हींको प्राप्त हुआ है, एवं सब विषयों के ज्ञान का एक निर्दिष्ट भांडार अनंत काल से विद्यमान है और वह भांडार उनके पूर्वजों के ही अधिकार में था। अतः वे ही उसके उत्तराधिकारी हैं, जगत के पूज्य हैं। यदि इन लोगों से पूछा जाय कि जिनके पूर्वज ऐसे नहीं हैं, उनके लिये क्या उपाय है – तो उत्तर मिलता है ‘कुछ भी नहीं’। पर इनमें से जो अपेक्षाकृत दयालु हैं, वे उत्तर देते हैं – “हमारी चरण सेवा करो, उस सुकृत के फलस्वरूप अगले जन्म में हमारे वंश में जन्म ग्रहण करोगे।” और इन लोगों से यदि कहा जाय, ‘आधुनिक काल में अनेक अविष्कार हो रहे हैं, उन्हें तो तुम लोग नहीं जानते हो और न कोइ ऐसा प्रमाण मिलता है कि तुम्हारे पूर्वजों को ये सब ज्ञात थे’ तो वे कह उठते हैं, “हमारे पूर्वजों को ये सब ज्ञात थे, पर अब इनका लोप हो गया है। यदि इसका प्रमाण चाहिये, तो अमुक अमुक श्लोक देखो।”

यह कहने की जरूरत नहीं कि प्रत्यक्षवादी आधुनिक लोग इन सब बातों पर विश्वास नहीं करते।

अपरा एवं परा विद्या में विभेद अवश्य है, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान में विभिन्नता अवश्य है; यह हो सकता है कि एक का पथ दूसरे का न हो सके, एक उपाय के अवलम्बन से सब प्रकार के द्वार न खुल सकें, किंतु वह अंतर केवल उच्च्ता के तारत्म्य में है, केवल अवस्थाओं के भेद में है। उपायों के अनुसार ही लक्ष्य प्राप्ति होती है। वास्तव में वही एक अखण्ड ज्ञान समस्त ब्रह्माण्ड में परिव्याप्त है।

इस प्रकार स्थिर सिद्धांत हो जाने पर कि ‘ज्ञान मात्र पर केवल कुछ विशेष पुरूषों का ही अधिकार है तथा ये सब विशेष पुरूष ईश्वर या प्रकृति कर्म से निर्दिष्ट होकर यथासमय जन्म ग्रहण करते हैं, और इसके अतिरिक्त किसी भी विषय में ज्ञान-लाभ करने का कोइ और उपाय नहीं है’, समाज से उद्योग तथा उत्साह आदि का लोप हो जाता है, आलोचना के कारण उद्भावना शक्ति का क्रमशः नाश हो जाता है तथा नूतन वस्तु की जानकारी में फिर किसीको उत्सुकता नहीं रह जाती, और यदि होने का उपाय भी हो तो समाज उसे रोककर धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। यदि यही सिद्धांत स्थिर हुआ कि सर्वज्ञ व्यक्ति विशेष के द्वारा ही अनंत काल के लिए मानव के कल्याण का पथ निर्दिष्ट हुआ है, तो ऐसा होने से समाज, उन सब निर्देशों में तिल मात्र भी व्यतिक्रम होने पर सर्वनाश की आशंका से, कठोर शासन के द्वारा मनुष्यों को उस नियत मार्ग पर ले जाने की चेष्टा करता है। यदि समाज इसमें सफल हुआ तो परिणाम स्वरूप मनुष्य यंत्रवत बन जाता है। जीवन का प्रत्येक कार्य यदि पहले से निर्दिष्ट हुआ हो, तो फिर विचार-शक्ति को विशद आलोचना का प्रयोजन ही क्या? उद्भावना-शक्ति का प्रयोग न होने पर धीरे-धीरे उसका लोप हो जाता है एवं तमोगुणपूर्ण जड़ता समाज को आ घेरती है, और वह समाज धीरे-धीरे अवनत होने लगता है।

दूसरी ओर, सर्वप्रकार से  निर्देशविहीन होने पर यदि कल्याण होना संभव होता, तो फिर सभ्यता एवं संस्कृति चीन, हिन्दू, मिस्त्र, बेबिलोन, ईरान, ग्रीस, रोम एवं अन्य महान देशों के निवासियों को त्यागकर जुलू, हब्शी, हटेंटॉट, संथाल, अंदमान तथा आस्ट्रेलियानिवासी जातियों का ही आश्रय ग्रहण करतीं।

अतएव महापुरूषों द्वारा निर्दिष्ट पथ का भी गौरव है, गुरू-परंपरागत ज्ञान का भी एक विशेष प्रयोजन है, और यह भी चिरंतन सत्य है कि ज्ञान में सर्व-अंतर्यामित्व है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेम के उच्छवास में अपने को भूलकर भक्तगण उन महापुरूषों के उद्देश्य को न अपनाकर उनकी उपासना को एक मात्र ध्येय समझने लगते हैं; तथा स्वयं हतश्री हो जाने पर मनुष्य स्वाभाविकतया पूर्वजों के ऐश्वर्य स्मरण में ही समय बिताता है – यह भी एक प्रत्यक्ष प्रमाणित बात है। भक्तिपूर्ण हृदय संपूर्णतया पूर्वपुरूषों के चरणों पर आत्मसमर्पण कर स्वय़ं दुर्बल बन जाता है, और यही दुर्बलता फिर आगे चलकर शक्तिहीन गर्वित हृदय को पूर्वजों की गौरव-गाथा को ही जीवन का आधार बना लेने की शिक्षा देती है।

पूर्ववर्ती महापुरूषों को सभी विषयों का ज्ञान था, और समय के फेर से उस ज्ञान का अधिकांश अब लुप्त हो गया है – यह बात सत्य होने पर भी, यही सिद्धांत निकलेगा कि उसके लोप होने के फलस्वरूप आज के तुम लोगों के पास उस विलुप्त ज्ञान का होना य न होना एक सी ही बात है; और यदि तुम उसे पुनः सीखना चाहते हो, तो तुम्हें फिर से नया प्रयत्न करना होगा, फिर से परिश्रम करना होगा।

आध्यात्मिक ज्ञान, जो विशुद्ध ह्रुदय में अपने आप ही स्फुरित होता है, वह भी चित्तशुद्धि-रूप बहु प्रयास एवं परिश्रमसाध्य है।  आधिभौतिक ज्ञान के क्षेत्र में भी जो सब सत्य मानव-ह्रुदय में स्फुरित हुए हैं, अनुसंधान करने पर पता चलता है कि वे सब सहसा उद्भूत दीप्ति की भांति मनीषियों के मन में उदित हुए हैं, जंगली असभ्य मनुष्यों के मन में नहीं। इसीसे यह सिद्ध हो जाता है कि आलोचना, विद्या-चर्चा, मनन-रूप कठोर तपस्या ही उसका कारण है।

अलौकिकत्व-रूप जो सब अद्भुत विकास है, चिरोपार्जित लौकिक चेष्टा ही उसका कारण है; लौकिक और अलौकिक में भेद केवल प्रकाश के तारतम्य में है।

महापुरूषत्व, ऋषित्व, अवतारत्व या लौकिक विद्या में शूरत्व सभी जीवों में विद्यमान है। उपयुक्त गवेषणा एवं समयानुकूल परिस्थिति के प्रभाव से यह पूर्णता प्रकट हो जाती है। जिस समाज में इस प्रकार के पुरूषसिंहों का एक बार आविर्भाव हो गया है, वहाँ पुनः मनीषियों का अभ्युत्थान अधिक संभव है। जो समाज गुरू द्वारा प्रेरित है, वह अधिक वेग से उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है, इसमें कोइ संदेह नहीं; किंतु जो समाज गुरूविहीन है, उसमें भी समय की गति के साथ गुरू का उदय तथा ज्ञान का विकास होना उतना ही निश्चित है।

-विवेकानंद साहित्य, सजिल्द, दशम खंड, पृष्ठ 157 से लिया गया।

-हितेन्द्र अनंत

2 टिप्पणिया

  1. सुबह चार बजे ये पोस्ट पढ़ कर काफी कुछ जानने को मिला। सोचने के लिए काफी कुछ है इस उद्धरण में। मैं स्वामी विवेकानन्द की सभी बातों से सहमत नहीं हूँ पर यहाँ जो भी कहा है वह ग्राह्य है और उसमें भारतीय दर्शन को ले कर फैली कई सारी भ्रांतियों का उत्तर है। जो बात मुझे सबसे विशेष लगी वो ये है की इस लेख में ज्ञान के विषय को ले कर समाज में हो रहे हर स्तर पर हर प्रकार के परिवर्तन- उच्च निम्न, अगड़े पिछड़े, जाति जनजाति – सबकी चर्चा है। उनको स्वामी सच ही कहा गया है।

    1. अमित भाई धन्यवाद। मैं इस पर अपनी टिप्पणियाँ भी जोड़ना चाहता था। फिर सोचा, कि रहने दो, पढ़ने वाले स्वयं ग्रहण करें जो उन्हें ग्राह्य है। ब्राहमण वर्चस्व सहित जाति विभेद के अतिरिक्त इसमें भक्तिवादी आंदोलनों के आडंबरपूर्ण संप्रदायों और एकेश्वरवादी पैगंबरों के उपासक समाजों पर भी टिप्पणी है। साथ ही इसमें केवल भौतिक विज्ञान को ही सर्वस्व मानने वालों के लिये भी संदेश है।

      कोइ किसी से पूरी तरह सहमत हो जाए तो स्वयं का रास्ता कैसे बनाएगा? संयोग से इस लेख में भी पूरी तरह सहमत होकर फिर धीरे-धीरे व्यक्ति पूजा में बदल जाने वाले संप्रदायों की भी चर्चा है। स्वामीजी स्वयं अपने गुरू से पूरी तरह सहमत नहीं थे, यह सर्वविदित है।

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