पिता और मैं [कविता]

पिता और मैं 

१.

पिता जब सो रहे होते

पेट के बल

मैं उनके कंधे पर बैठ

उनके घुँघराले बालों को

सीधा करने का प्रयास करता

२. 

मैं पिता को ध्यान से देखता

जब पिता दाढ़ी बनाते

फिर छूकर उनके चिकने गालों को

मैं उनके काम की सफलता की पुष्टि करता

३.

ये वे दिन थे जब

पिता मुझे कंधे पर बिठाते

और मैं रोता था

जब पिता मुझे स्कूल छोडकर लौट जाते

ये वे दिन थे जब

मैं पिता से डरता नहीं था

४.

पिता ने मुझे सिखाया

तकिये पर मुक्के मारना

ताकि मैं

मुहल्ले के शरारती बच्चों से लड़ सकूँ

५.

फिर वे दिन आए जब आईने के सामने खड़े होकर

अपने चेहरे में

मैं पिता का चेहरा ढूँढता था

आज भी ढूँढता हूँ

यदि आप मुझसे कहें

कि मैं अपने पिता पर गया हूँ

मेरे लिए इसका अर्थ होगा

कि यह मेरे जीवन के सबसे बड़ी उपलब्धि है

६.

बाद के कुछ वर्षों में

पिता ने बदली कई बार

अपनी मोटरसाईकिल

हरेक मोटरसाईकिल की आवाज

मुझे आज भी याद है

पिता की हर मोटरसाईकिल की आवाज

मैं दूर से ही पहचान लेता था

७.

ये वे दिन थे जब

पिता की मोटरसाईकिल की आवाज

आती दूर से

और मैं बंद कर देता टी.वी.

और खोल लेता किताब

८.

इन्हीं दिनों कभी

काली मिट्टी की बहुत सी गोलियां बनाकर

उन्हें माचिस की तीलियों से जोड़कर

पिता ने मुझे समझायी थी

ग्रेफ़ाईट की अणु संरचना

९.

ये वे दिन थे जब

न जाने कैसे पिता को पता चल जाता

जब मैं पुस्तक के पीछे के उत्तर पहले देखकर

फिर हल करता था गणित के प्रश्न

१०.

ये वे दिन थे जब

मैंने सबसे अधिक अभ्यास

पिता के हस्ताक्षर की

नकल का किया

११.

घर के कपड़ों को इस्तरी करते हुए

मैंने सबसे ज्यादा मेहनत

पिता के कपड़ों पर की

१२.

पिता के कपड़ों को इस्तरी करते हुए

मैंने छिपा दी थी वो कमीज़

जो जल गयी थी मुझसे

मेरी आशा के विपरीत

पिता को पता चल गया

मेरी आशंका के विपरीत

पिता ने मुझे मारा नहीं

१३.

कमीज़ ही क्या कुछ वर्षों तक

मैंने छिपायीं पिता से

कितनी ही परिक्षाओं की तिथियाँ

कितनी ही अंक सूचियाँ

और कितनी ही वे बातें

जो मैंने सीखीं मित्रों से

१४.

ये वे वर्ष थे जब पिता ने

मुझे तभी स्पर्श किया

जब मैंने मार खायी हो

पर ये वही वर्ष थे जब पिता ने

मुझे लेकर देखे कितने ही सपने

और मेरी निरंतर विफलताओं के बाद भी

रखा मुझपर निरंतर विश्वास

१५.

ये वही वर्ष थे जब पिता ने

अपनी आय का सबसे बड़ा हिस्सा

मेरी पढ़ाई पर खर्च किया

ये वही वर्ष थे जब मैंने

सोचा कि पिता भी गलत हो सकते हैं

इन वर्षों में मैंने

पिता से झूठ बोला

लड़ाईयाँ की

और सोचा कि पिता मुझे कभी नहीं समझ सकते

इन वर्षों में मैं

यह नहीं देख पाया कि

पिता के स्पर्श के

और भी तरीके हो सकते हैं

१६.

मैं इन वर्षों को मिटा देना चाहता हूँ

अपनी स्मृति से

मिट ही जाना चाहिये इन वर्षों को

और आप देखिये कि

ऐसा लगता है कि मिट ही जायेंगे

ऐसे ही जैसे

इस कागज़ से मिट गये हैं ये वर्ष

क्योंकि जिस कागज़ पर मैं यह सब लिख रहा हूँ

वह भीग गया है मेरे आंसूओं से

१७.

और अब एक नये कागज़ पर

मैं यह कविता नहीं लिख रहा हूँ

मैं तो वर्णमाला लिखने का अभ्यास कर रहा हूँ

मेरे हाथ पकड़े हैं पिता ने

और वे सुधारना चाहते हैं

मेरा हस्तलेखन

आप उनसे कह दीजिये

कि मुझे अपने पिता का

बस यही स्पर्श याद है।

-हितेन्द्र अनंत

10 टिप्पणिया

  1. Bahot achhi kavita hai
    Dil ko chhune wali yaadein likh di hein
    Saari baatein ek si jo mere bhi bachpan se judi hein

  2. सोच के लिखूंगा यहाँ जो भी लिखूंगा…..अभी तो कुछ बढ़िया सा सूझ नहीं रहा!

    छू गयी ये कविता…इतना कहना काफी नहीं होगा शायद….विल बी बैक!!
    🙂

  3. एक पुत्र के ह्रदय से निकलते पितृ प्रेम की कोई भी व्याख्या अधूरी है…शब्दों का यह जोड़तोड़ आपके उसी प्रेम चित्रण की अनुपम कोशिश है जिसे केवल महसूस ही किया जा सकता है….
    सादर,
    उपेन्द्र दुबे

    1. धन्यवाद उपेन्द्र जी!

  4. खूबसूरत है कविता का पैरहन और अंदुरनी सामग्री

  5. Manviya samvedanaon ko bahoot hi simple words main rakha gaya hai….Rochak aur Marmik kavita ke liye Hitendra bhai ko dhanyawad…Har aadmi is kavita se jud jayega…ye sabhi muddon se upar hai….Manushya ke jeevan ko dekhne ka nazariya bahoot hi vishaal hai Hiten bhai ka…Wah Wah…..

  6. भावनाओ से भरी है | दिल को छू लिया|

  7. Mata-pita ke sath payh sabhi ka jurav rahata hai parantu edhar teji se algaw barhati ja rahi hai pita-putra aapas me lar rahe hai mataye apani hi santano se nirwasit ya dutkari ja rahi hai desh me teji se old hause bante ja rahe hai govt.ese apni uplabdhi bata rahe hai ese tapis me tandi jhoke ki tarah apki kavita laga likhate rahiye

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