लोहा, लोहे को नहीं काटता!

मेरे एक मित्र हैं जिन्हें ठंड के दिनों में आईसक्रीम खाना पसंद है। वे गर्मी के दिनों में आईसक्रीम खाने से ज़्यादा चाय पीना पसंद करते हैं। उनसे इस उल्टी आदत का कारण पूछने पर कहते हैं – “लोहा ही लोहे को काटता है”।

पर मैं सोचता हूँ कि क्या यह हमेशा ही सही है?

एक

कुछ दिनों पूर्व फेसबुक पर एक चर्चा हो गयी। प्रसंग था हरियाणा एवँ उत्तर प्रदेश के जाट बहुल क्षेत्रों में जातिविशेष की पंचायतों  अर्थात खाप के द्वारा लिये गये कुछ प्रतिगामी निर्णय एवँ उनके अटपटे बयान। खाप ने देश में बढ़ती हुई बलात्कार की घटनाओं के पीछे पश्चिमी “फास्ट फूड” और चाइनीज़ व्यंजन “चाउमिन” को कारण बताया। बलात्कार रोकने के लिये इन खापों की माँग है कि लड़कियों का विवाह 15 वर्ष की आयु तक ही कर दिया जाय। ऐसी जाति पंचायतों के निर्णय हास्यास्पद ही नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज के लिये खतरनाक हैं।

तो चर्चा प्रारंभ करने वाले सज्जन का कहना कुछ इस प्रकार था: माना कि खाप पंचायतों के कुछ फैसले बेतुके हैं। पर मीडिया मुस्लिमों में फैले अंधविश्वासों और उनके मुल्लाओं द्वारा दिये जाने वाले ऊल-जलूल फ़तवों को क्यों नहीं प्रचारित करता?

मैंने इस पर आपत्ति की। संक्षेप में मेरा कहना था कि जिस समय आप की त्रुटियाँ सामने आयें, उस समय समझदारी इसी में है कि उन्हें सुधारने करने के प्रयास किये जायें ना कि स्वयं पर लगे आरोप के बदले हम दूसरों पर आरोप लगायें। कम से कम उस समूह में यह बात किसी को नहीं माननी थी सो नहीं मानी।

मेरा मानना है कि एक प्रकार की कट्टरता का उत्तर दूसरे प्रकार की कट्टरता नहीं हो सकती। यदि आप किसी समाजविशेष की कट्टरता से पीड़ित हैं तो स्वयं को कट्टर बनाकर आप उसका सामना नहीं कर सकते। इससे बेहतर होगा कि अपनी उदार जीवन शैली एवँ उदार धार्मिकता को पूरी प्रतिबद्धता से बल दें। कट्टरता का जवाब कट्टरता से देने पर आप कट्टरता की होड़ ही खड़ी कर डालते हैं, समस्या का समाधान नहीं करते।

जिस अतिवादी एवँ हिंसक इस्लामी विचारधारा से इस समय पूरे विश्व को खतरा है, उसके मानने वाले यही सिद्ध करना चाहते हैं कि इस दुनिया में भिन्न-भिन्न धार्मिक-विचारों के लोग एक साथ नहीं रह सकते। इसलिये उन्हें यह अधिकार है कि वे अपने से भिन्न मत के लोगों को या तो मतांतरित कर दें या उनकी हत्या ही कर दें! हम उन्हें हरा सकते हैं यदि अपने प्रयासों से हम यह सिद्ध कर सकें कि मतभिन्नताओं के बाद भी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व संभव है।

इसके विपरीत यदि भारत के संदर्भ में हम यह कहना प्रारंभ करें कि केवल और केवल हिन्दुत्व ही एक मात्र सत्य है (यद्यपि ऐसा कहना ही आपके हिन्दू न होने का प्रमाण होगा!), और हिन्दू जीवन शैली ही सर्वश्रेष्ठ है, तब हम न केवल “सभ्यताओं के संघर्ष” की विचारधारा को बल देते हैं, बल्कि हिन्दुत्व का भी अनुचित प्रतिरूपण विश्व के सामने करते हैं।

“एकं सद् , विप्राः बहुधा वदन्ति”।

लोहा, लोहे को नहीं काटता!

दो

कुछ दिन पहले मित्रों के एक समूह में गंभीर चर्चा चल रही थी। यह मेरे उन मित्रों का समूह है जो कुछेक विषयों पर एकमत है। कार्पोरेट जगत एक छलावा है, पैसों के पीछे भागने से कुछ हासिल नहीं होता, भौतिक विषयों की प्राप्ति के लिये भागदौड़ से अच्छा है कि जीवन में अपने सपनों को पूरा किया जाय और शांति से जिया जाए! यह कुछ ऐसी बाते हैं जिन पर हम सभी मित्र एकमत हैं। मित्रों के मेरे इस समूह में कोइ बहुत बड़ा चित्रकार बनना चाहता है, तो कोइ शतरंज का खिलाड़ी, किसी को संगीत में नाम करना है तो किसी को गाँवों में बसकर आध्यात्मिक शांति का जीवन बिताना है। चर्चा चली कि नौकरी करना व्यर्थ है! अतः स्वयं का व्यापार ही क्यों न कर लिया जाय! और फिर जैसा कि इस तरह की बैठकों में कहीं भी होता है, सुझाव पर सुझाव आने लगे कि कौन सा व्यापार शुरू किया जाय?

मैंने ध्यान दिया कि आधिकांश सुझाव एक ऐसे व्यापार के थे जो प्रारंभ तो छोटे ही स्तर पर होगा, पर आगे चलकर बहुत बड़ा आकार ले लेगा। इन सुझावों या प्रस्तावों के अंत में यह सपने भी कि हम एक दिन अमुक-अमुक साधनों के स्वामी हो जायेंगे, एक दिन इतने हज़ार कर्मचारियों को हम नौकरी देंगे, दुनिया भर में फैले हुए इतने कार्यालय होंगे और उस दिन हम अपने बॉस को दिखा देंगे कि व्यापार करते कैसे है!

अब यदि इतना बड़ा कारोबार होगा तो भला कोइ कैसे चित्रकारी करेगा! शतरंज का खिलाड़ी कैसे घंटों बोर्डरूम में मीटिंगें करेगा? स्पष्ट है कि मेरे मित्र किसी और की बनायी हुई व्यवस्था की गुलामी से बचने के लिये स्वयं की ही एक व्यवस्था बनाना चाह रहे थे! अब भला व्यवस्था होगी तो गुलामी क्योंकर न होगी!

कल्पना कीजिये कि कोइ जेल के कठोर नियमों एवँ जेलर की प्रताड़नाओं से त्रस्त एक बंदी कहे कि इस जुल्मी जेलर को एक दिन मैं अच्छा सबक सिखाउंगा। खुद की एक जेल बनाउंगा और फिर इसे दिखाउंगा कि जेल चलाते कैसे है!

तो लोहा, लोहे को नहीं काटता!

तीन

इन दिनों देश में राजनीतिक माहौल गर्म है। विकल्प की चर्चाएँ हो रही हैं। नया विकल्प लाने वाले सोत्साह नित्य दिवस स्थापित समूहों पर आरोप लगा रहे है। वे कहते हैं हम व्यवस्था बदल देंगे। उनसे पूछिये कि आप यह काम कैसे करेंगे, वह काम कैसे करेंगे, इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, उस विषय पर आपके क्या विचार हैं? वे कहते हैं कि जी विचार-इचार कुछ नहीं, ये तो पूरी व्यवस्था ही खराब है। हमें तो व्यवस्था ही बदलनी है। इसके लिये हमने नयी पार्टी बना ली है। अब जब हमें सत्ता मिलेगी, हम व्यवस्था को बदल देंगे!

और नये विकल्प को सत्ता कैसे मिलेगी? पुराने विकल्प पर आरोप लगाने से! पर क्या यही आरोप-प्रत्यारोप का खेल नहीं खेलते आ रहे? वे कहते हैं, इसीलिये तो हम एक साथ उन सब पर आरोप लगा रहे हैं। उनके पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं कि आरोप तो उन पर लगे हैं और लगते रहेंगे!

मेरी समझ में आधुनिक भारत में सबसे आधिक सफल राजनैतिक आंदोलन वह था जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था। क्या महात्मा गांधी यह कहते कि भारत के हालात तो तब सुधरेंगे जब हमें सत्ता मिलेगी! जब तक अंग्रेज इस देश से बाहर नहीं चले जाते, हम  उन पर आरोप लगाते रहेंगे और आराम करेंगे। उनके जाने से व्यवस्था बदल जायेगी और सब कुछ ठीक हो जायेगा! क्या महात्मा गांधी अंग्रेजों के विरूद्ध ऐसी भाषा का प्रयोग करते जैसी भाषा नये विकल्प ले लोग करते हैं?

याद कीजिये कि महात्मा गांधी ने क्या किया? अछूतों के उद्धार के लिये उनकी बस्तियों में जाकर सेवा कार्य, उनके लिये शिक्षा का प्रबंध, उन्हें सफाई की शिक्षा देना, तथाकथित उच्च जातियों को लताड़ना और साथ ही साथ उन्हें “हरिजनों” की सेवा के द्वारा प्रयश्चित के लिये तत्पर करना। गरीबों को स्वदेशी व स्वावलंबन की शिक्षा और इन सभी शिक्षाओं को स्वयं की दिनचर्या में पहले उतारना। समाज के उत्थान के न जाने और भी कितने ही कार्य!

यहाँ प्रश्न गांधीजी के तरीकों से सहमति अथवा असहमति का नहीं बल्कि उनके आंदोलन की दिशा एवँ व्यापकता का है। देश की स्वतंत्रता उनका लक्ष्य अवश्य था, किंतु देश की दशा सुधारने के लिये उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन की प्रतीक्षा नहीं की।

सत्ता परिवर्तन से आप व्यवस्था परिवर्तन की अपेक्षा नहीं कर सकते। इससे पहले भी अनेक दलों ने ऐसा सोचा किन्तु देखा यह गया कि वे स्वयं इसी व्यवस्था का ही एक भाग बनकर रह गये। ऐसा नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में रहकर ही अच्छे काम नहीं किये जा सकते, अवश्य किये जा सकते हैं। किन्तु जब आपका घोषित लक्ष्य ही व्यवस्था परिवर्तन है, तब आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप इस परिवर्तन का मार्ग बतायें एवँ यह भी बतायें कि वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी। मात्र यह कहकर कि शासक बदल कर हमें शासक बना लो, व्यवस्था बदल जायेगी, आप जनता का विश्वास नहीं जीत सकते।

यूं भारत की जनता ने तवे पर रोटियाँ पलटने की तरह पार्टियाँ बहुत बदली है, किंतु वह भी अब तक साँपनाथ एवँ नागनाथ के बीच का अंतर नहीं समझ पायी है।

जनता को और सभी नये विकल्पों को यह समझना होगा, कि लोहा, लोहे को नहीं काटता!

यद्यपि यहाँ कहना आवश्यक है कि इतनी जल्दी हमें भी निराश नहीं होना चाहिये, श्रीमान केजरिवाल की पार्टी अभी बस बनी ही है, नामकरण भी नहीं हुआ है अब तक उसका, अतः उन्हें हमें समय देना चाहिये।

महात्मा गांधी जानते थे कि आमूल परिवर्तनों में समय लगता है। इसीलिये उनकी इच्छा थी कि वे 125 वर्ष जियें, ताकि भारत में वे राम-राज्य को कार्यान्वित होते देख सकें।

शेष-विशेष

बीते एक महीने में दो महत्वपूर्ण पुस्तकें पढ़ीं। एक है श्री अरूण शौरी की “वरशिपिंग़ फाल्स गॉड  – अंबेडकर एंड द फैक्ट्स दैट हैव बीन इरेज़्ड।” दूसरी है श्री एम. जे. अकबर की “टिंडरबॉक्स: द पास्ट एंड फ्यूचर ऑफ़ पाकिस्तान।” दोनों ही पुस्तकें पठनीय हैं, संभव हो तो अवश्य पढ़िये। पुस्तकों के विषय में फिर कभी।

-हितेन्द्र अनंत

2 टिप्पणिया

  1. अच्छा लगा आपकी पोस्ट पढ़कर। सही है लोहा हमेशा लोहे को नहीं काटता।

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