नजर मिला सवाल कर, जो हो सके बवाल कर

पाई-पाई का हिसाब ले

नजर मिला सवाल कर

जब राजा ही डकैत हो

जो हो सके बवाल कर॥

 

रत्नगर्भा धरती यह जननी तेरी

धरती के सारे रत्नों को चोर लिया

सुजलाम-सुफलाम धरती यह जननी तेरी

जल-जंगल को और फसल को चोर लिया

चोर लिया फिर भी जब पेट न भरा इनका

तुझसे तेरी धरती को भी चोर लिया॥

 

चोर कर जमीन, जंगल और जल

खड़े कर लिये इन चोरों ने विशाल महल

माल भरा है जो महलों में

माल वो सारा तेरा है

पंचायत से संसद तक

अब चोरों का ही डेरा है॥

 

तो आग लगा दे महलों में

और दंड दे चोरों को कुछ इस प्रकार

कि महलों का धरती पर ना अवशेष रहे

और दुबारा चोरी करने को

चोर न कोई धरती पर ही शेष रहे॥

 

पर इससे पहले कि चोरों को

चोरी का मिल जाये दंड

इससे पहले कि महलों को

जला दे अग्नि प्रचंड

कितना तुझको लूटा है

इसका भी ख़याल कर

पाई-पाई का हिसाब ले

नजर मिला सवाल कर

जब राजा ही डकैत हो

जो हो सके बवाल कर॥

 

-हितेन्द्र अनंत

14 टिप्पणिया

  1. मालूम नहीं कितना सहमत हूँ इस कविता के सन्देश से. चोर कौन है कौन नहीं ये मैं नहीं कह सकता. क्यूंकि चोरी का अर्थ हर ज़माने में भिन्न रहा है. “ये पाप है क्या और पुण्य है क्या…रीतों पर धर्म की मोहरें हैं. हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे” – हाँ आप के शब्दों में जो एनर्जी और उनमें जो बात है उसका जवाब नहीं!

    1. धन्यवाद अमित भाई!
      आधात्मिक संदर्भ में देखें तो फिर पाप-पुण्य सब मिथ्या है। किन्तु यहां नितांत भौतिक प्रश्न है। भौतिक जगत में कम से कम सफेदपोश चोरों को जो सफ़ेद वाहनों में ही अक्सर घूमा करते हैं, आप पहचान न सकें यह आश्चर्य का विषय है। चोर और भी होंगे उनके अलावा इससे सहमत हूं।

      1. सच है. पर क्या ‘वो सफेदपोश चोर’ हममें से ही एक नहीं ?? मेरे हिसाब से ये ‘उन’ बनाम ‘हम’ वाला चक्कर थोडा भावनात्मक ज्यादा हो जाता है.

        1. हां। वे बनाम हम नहीं होना चाहिए। यह मानता हूं। भावनात्मक नहीं होना चाहिए, पर कमजोर जो वैसे लड़ नहीं सकता वो भावना में बहकर गुस्से में आकर ही कुछ कर सकता है।

          खुद को नहीं गिनता चोरों में🙂 सफ़ेद गाडियाँ नहीं दौड़ाईं अब तक🙂

          1. 🙂🙂🙂🙂

            मुझे नहीं लड़ना आप से !! बहुत प्रिय हैं आप मुझे!

            1. 🙂🙂 सौभाग्यशाली हूँ कि आपके स्नेह का पात्र हूँ🙂

  2. Behtareen Sir Behtareen. Teerchi nnazariya ka vaar khali nahin jaana chahiye.

  3. True reflection of emotions of any Indian citizen these days. After recent attempts from various sections of social leadership to curb & challenge corruption, our nation still awaits a purification process. Thanks Hitendra for giving words to a common man’s feelings. Well said !!!

  4. खट खट !!

    कोई है???

    बहुत दिन हो गए नया कुछ नहीं मिला पढ़ने को !
    😦

    1. आपने ध्यान रखा सो गदगद हूं। जल्द आता हूं वापस। कुछ तो नौकरी और कुछ ये त्यौहारी मौसम😦

  5. bahut hi anmol aapki kathan hai
    kya jawab du aapke sandesh ka chor to sara watan hai

  6. जबरदस्त तेवरी कविता , तीखा और सच्चा व्यंग्य

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