सेठजी के प्रति भक्तिपूर्ण पत्र

परमपूज्य सेठजी!

मुझे आपमें ईश्वर के दर्शन होते हैं

इसीलिये परमपूज्य लिख रहा हूँ

पर पता नहीं क्यों मैं आपको सेठजी ही कह रहा हूँ

मुझे मालूम है आपको तो सेठजी भी कहलाना पसंद नहीं

आपको तो सर, मालिक, या बॉस भी पसंद नहीं,

आप चाहते हैं कि हम बुलाएँ आपको “पहले नाम” से

सिर्फ रखें फिर मतलब अपने काम से

कोइ न कहे किसी को भी सर

किसी को भी न हो किसी का भी डर

 

मैं तो सोचा करता हूँ,

किस काम का, जो कर्मचारी नहीं डरा अपने सेठ से

पर आप हैं कि डराना ही नहीं चाहते

आपकी तो बात ही निराली है सेठजी!

ये आदत आपने कैसे डाली है सेठजी!

जहाँ लिखना होता है

कि साले क्यों नहीं हुआ काम अब तक!

भाड़ झोंक रहा था, या झक मार रहा था!!

आप लिखते हैं

“प्लीज़ बी ऑन टॉप ऑफ इट!”

या अधिक से अधिक

“दिज़ इज़ नॉट एक्सेप्टेबल!!”

सेठजी! क्या खूब हैं आपके ये मंत्र

हिला डालते हैं पूरा का पूरा तंत्र

बस इतना सा लिखा और मच जाता है कोहराम!

आपका डाइरेक्टर लिखता है वी.पी. को

वी.पी. लिखता है जी.एम. को

जी.एम. लिखता है डी.जी.एम. को

और भी लोग लिखते हैं

नीचे तक एक ही बात

“दिज़ इज़ नॉट एक्सेप्टेबल!!”

और झट हो जाता है काम!

नीचे से कोइ लिखता है

“दिज़ इज़ डन!”

फिर गंगा बहती है उल्टी

नीचे से ऊपर

डी.जी.एम. से जी.एम. से

वी.पी. से डाइरेक्टर से होती हुई आप तक

“दिज़ इज़ डन!”

“दिज़ इज़ डन!”

मानो सब कहना चाह रहे हों.

“तेरा तुझको अर्पण”

 

क्या खूब मंत्रों की रचना की है आपने सेठजी!

आप तो नाट्यशास्त्र के भी महान शिक्षक हैं सेठजी!

हाँ देव हाँ!

आप डर को हटाने के लिये

कितने कोमल शब्दों में लिखते हैं ई-मेल

पर लोग आपसे मिलकर

या आपको लिखकर

प्रदर्शित करते हैं अपना “डर”।

तब भी, जब वे अंदर से डरे नहीं होते

क्योंकि वे जानते हैं कि

बची रहेगी उनकी नौकरी यदि

आप उन्हें डरा हुआ देख पाएँगे!

बची रहेगी उनकी नौकरी भले ही वे ना सुधरें

बस यदि आप उन्हें डरा हुआ मान जाएँगे!

यह कुछ वैसा ही है जैसा,

लोग गुरूवार को नहीं खाते माँसाहार

यह दिखाने के लिये कि वे ईश्वर से डरते हैं

 

पर आप तो डर मिटाना चाहते हैं सेठजी!

बराबरी लाना चाहते हैं सेठजी!

आपको तो चाहिये ऐसे लोग जिनके हो स्वतंत्र विचार

जो खुद करें पहल, देखें सपने, करें साकार

बशर्ते वो सभी सपने “संस्था” के हित में हों

है ना सेठजी!

“इन द बेस्ट इंटरेस्ट ऑफ़ द ऑर्गनाईजेशन”

है ना सेठजी!

 

क्या विराट रूप धरते हैं आप सेठजी

एक ही क्षण में “आप” से

“ऑर्गनाईजेशन” बन जाते हैं आप सेठजी

इसलिये जब कोई देख ही लेता है सपने

और आपको लिख भेजता है सुझाव अपने

इससे पहले कि बहा दें बनाकर उन कागज़ों की नाव

आप धन्यवाद देना नहीं भूलते उसे जो भेजे सुझाव

“थैंक्स फ़ॉर योर सजेशंस, आई विल डेफिनेटली टेक इट टू द बोर्ड”

यह बोर्ड आप श्री त्रिदेव का तीसरा रूप है सेठजी!

आपका “पहला नाम” एक देव

“ऑर्गनाईजेशन” एक देव

और “बोर्ड” एक देव

आज भी धार्मिक संस्कारों से कितना जुड़े हैं आप

है ना सेठजी!

“बिज़नेस इंस्पायर्ड बाय स्पिरिच्युएल वैल्यूज़”

है ना सेठजी!

सुझावों की नाव बनाकर बहा देना!

वह तो आपके शिक्षा देने का एक तरीका है सेठजी!

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन!

 

ऐसे धर्मात्मा सेठ को

जो देवतुल्य न जानूँ सेठजी!

कैसे इस संसार रूपी भवसागर से

खुद को पार मानूँ सेठजी!

 

-हितेन्द्र अनंत

7 टिप्पणिया

  1. अद्भुत समर्पण मेल,🙂 हुण्डी याद दिला दी!!

  2. हा हा !!

    क्या खूब लिखा है आप ने. हिंदी अंग्रेजी का इतना अच्छा सम्मिश्रण किसी हिंदी कविता में पहली बार देखा. शायद ऐसे ही हिंदी अंग्रेजी की हेजेमनी से अडजस्ट कर पाएगी. बधाई हो !

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