विविधता मर रही है, विविधता अमर रहे!

यदि किसी उद्यान के सभी फूल एक ही रंग के हों तो भला उस उद्यान की शोभा ही क्या रह जाएगी? एकरूपता में सौंदर्य कैसा? सौंदर्य तो विविधता में ही होता है। भारतीय होने के नाते विविधता को जितना निकट से हम देखते-समझते हैं, उतना अवसर अन्य किसी देश के लोगों को शायद ही मिलता होगा।

भारत के सौंदर्य की सबसे बड़ी विशेषता ही यहाँ के जन-जीवन और संस्कृति में विद्यमान विराट विविधता है। भारत पर हुए ऐतिहासिक आक्रमणों के आर्थिक-राजनैतिक परिणाम चाहे जो रहें हों, पर इन आक्रमणों ने भी हमारी सांस्कृतिक विविधता को ही पोषित किया है। हमारे देश की आध्यात्मिक और धार्मिक चेतना कुछ इस प्रकार की रही है कि अपनी पहचान को मिटाये बिना ही हमने आक्रमणकारियों को भी अपनी संस्कृति में आत्मसात कर लिया।

पर पिछले दो दशकों से लग रहा है कि आत्मसात कर लेने की और अपनी पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने की हमारी क्षमता अब धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। इतना ही नहीं, इस बार आक्रमण कुछ भीतर से और कुछ बाहर से ऐसा है कि हमारी सांस्कृतिक विविधता पर संकट के काले बादल मंडरा रहे हैं। आइये कुछ उदाहरणों के माध्यम से इन परिवर्तनों की चर्चा करते हैं।

विवाह:

भारतीय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है विवाह। इतना महत्वपूर्ण कि यह प्रत्येक व्यकित के जीवन का सबसे बड़ा उत्सव होता है। विवाहों में जहाँ एक ओर दहेज और जातिप्रथा जैसी कुप्रथाएँ तो लगभग वैसी की वैसी ही हैं, किंतु इनका जो उत्सवरूप है वह उत्तर से लेकर दक्षिण तक अब एक जैसा होता जा रहा है। कुछ हिन्दी फिल्म उद्योगों और कुछ पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से, विवाहों की प्रादेशिक विविधताएँ अब समाप्त होती जा रही हैं। हर विवाह में अब वर शेरवानी और पश्चिमी कोट पहनते हैं। वधुएँ राजस्थानी शैली का फिल्म प्रभावित घाघरा।

रिसेप्शन अर्थात स्वागत समारोह अब प्रत्येक विवाह का प्रमुख अंग है। इस दौरान जो भोजन परोसा जाता है उसमें भी अब स्थानीय रूचि के पकवान गायब होते जा रहे हैं। महाराष्ट्र में अनेक विवाह समारोहों में सम्मिलित होता आया हूँ, लगभग सभी जगहों पर आशीर्वाद समारोहों में परोसा जाने वाला भोजन उत्तर भारतीय, पंजाबी शैली का होता है। “चायनीज़”  एवँ बर्फ के गोले के बगैर ऐसे किसी उत्सव की कल्पना ही व्यर्थ है। यहाँ मैं एक बड़ी गलती कर रहा हूँ, विवाहों में अब भोजन अब परोसा ही नहीं जाता, वह तो केवल मेजों पर रख दिया जाता है!

फिल्मों का प्रभाव देखिये कि वर के जूते अब हर जगह चुराए जाते हैं। “लेडीज़-संगीत” और “डी. जे.” ने अब पारंपरिक वाद्यों से सजी बारात की जगह ले ली है। विवाहों में गाये जाने वाले लोकगीत भुला दिये गये हैं। गिने-चुने रटे-रटाए हिन्दी फिल्मी गानों पर ही नाचकर अब सारा भारत (पाकिस्तान भी!) विवाह के आनंद को व्यक्त करता है। सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह कि जिन प्रदेशों-समाजों में खर्चीले विवाहों का प्रचलन नहीं था वहाँ भी यह वीमारी अब घर चुकी है। मेरे गृहप्रदेश छत्त्तीसगढ़ में मेरे देखे लंवे समय तक विवाह बहुत ही सादगी से संपन्न कराये जाते थे, लेकिन आज आप किसी छतीसगढ़ी विवाह और किसी पंजाबी विवाह में कुछ रीति-रिवाजों को छोड़कर एक भी अंतर नहीं बता सकते।

यदि आप फेसबुक पर हैं, तो पाएँगे कि आपके फेसबुक मित्रों में से जिन्होंने भी अपने विवाह के चित्र लगाएँ हैं, लगभग सभी में आपको एक जैसा परिदृश्य दिखायी देगा। भले ही आपके मित्र भारत के अलग-अलग प्रेदेशों से हों।

पोशाकें:

इस विषय में अधिक क्या लिखें? अपने चारों ओर दृष्टि घुमाइये, पुरूषों के कपड़े पूरी तरह पश्चिमी हो चुके हैं। गाँवों में भी बड़े-बूढ़ों को छोड दें तो भारतीय परिधान शायद ही कोइ पहने दिखायी देता है। महिलाओं के वस्त्रों से भी विविधता गायब है, उनका सर्वप्रमुख वस्त्र अब सलवार-कुर्ती है। यहाँ नारीवादी कृपया ध्यान दें कि आशय वस्त्रों की सांस्कृतिक विविधता से है, महिलाओं की परिधान चुनने की स्वतंत्रता का मैं समर्थन करता हूँ। किंतु इतनी समृद्ध वस्त्र परंपरा वाले देश में यह देखकर रोना ही आता है कि सारे देश का परिधान अब ठीक एक जैसा हो चुका है।

नगर रचना और वास्तु शैली:

भारत के किसी भी नगर में चले जाइये, दुकानों और घर बनाने की शैली एक सी है। दुःखद तथ्य यह है कि पश्चिमी वास्तु शैली की नकल करते वक्त भी हमारे वास्तुविदों नें उनके सौंदर्यबोध की नकल नहीं की है। काँच की एक जैसी दीवारों के एक जैसे व्यावसायिक केंद्र और मॉल। लगभग एकरूप बँगले और घर। दुकानों और घरों का दम घोटने वाली एक जैसी आंतरिक सज्जा। विश्व की सबसे महान वास्तुशिल्प परंपरा के स्वामी देश के बाज़ारों और गलियों में अब सौंदर्य का कोइ चिह्न नहीं रहा। बाज़ारों का स्वरूप भी एकरंग है, वही फास्ट-फ़ूड श्रुंखलाएँ, वही मोबाईल सुधारने की दुकानें, ब्रांडेड कपड़ों के वही शो-रूम जो हर जगह एक जैसे हैं।

आजकल नगरों में जो बहुमंजिला रिहायशी इमारतें बन रहीं हैं, उनके वास्तुशिल्पियों के सौंदर्यबोध पर तो थूकने को जी चाहता है। इन्हें देखकर माचिस के डिब्बों के अतिरिक्त आप किसी और चीज़ की कल्पना कर सकते हों तो कहिये! कहना चाहता हूँ कि उन बिल्डिंगों को बनाने वाले वास्तुविद और निर्माता मूर्ख नहीं तो और क्या हैं जो हमारी नहीं तो किसी और देश की ही संस्कृति से ही प्रेरणा लेकर कम से कम इन इमारतों को सुंदर तो बना दें! पश्चिम की गुलामी की हमारी मानसिकता यहाँ पूरे ज़ोर से दिखायी देती है। “ऑक्स्फोर्ड कंट्री”, “ब्रुकलिन स्ट्रीट” जैसे पश्चिमी नाम शायद इसलिये रखे जाते हैं कि जो अभागे भारत को छोड़कर विदेशों में नहीं बस पाये, वे कम से कम भारत में ही अपना पता तो विदेशी कर ले! लानत है!

उद्योग-धंधे-आमोद-प्रमोद:

एक समय था जब पूरा का पूरा नगर कपड़ों का एक ब्रांड होता था। संबलपुरी साड़ी, बनारसी साड़ी, कांचीवरम् का रेशम और भी न जाने क्या-क्या! कोल्हापुर की चप्पलें, अलीगढ़ के ताले, भोपाल के बटुए! सब कुछ अब लेबल और आधुनिक ब्रांड की दुनिया में गायव होता जा रहा है।

किसी भी शहर की यात्रा पर जाइये, खानपान में जो थोड़ी-बहुत विविधता होती है वह भी वहाँ की होटलों की व्यंजन-सूची में दिखायी नहीं देती। वही पनीर कढ़ाई, वही बटर चिकन!

वन में जाकर आखेट खेलना, संध्या को समूह में बैठकर गप्पें लड़ाना या संगीत का आनंद लेना, कबड्डी खेलना, मुर्गों की लड़ाई का मज़ा लेना, मेलों में जाना। यह सब कल की बात है। आज के भारत में मनोरंजन के दो ही अर्थ हैं, एक, टी.वी. पर क्रिकेट देखना और दूसरा, टी.वी. पर ही जो कुछ कूड़ा-करकट दिखाया जाए, वह सब देखना! फिल्मों के अतिरिक्त संगीत अब होता नहीं, होता है तो लोकप्रिय नहीं हो पाता। क्रिकेट के अतिरिक्त सारे खेल अब हमारे ही द्वारा की जाने वाली अस्पृश्यता का शिकार हैं। लोकगीतों का अर्थ है फिल्मों में आने वाले फूहड़ आईटम गीत।

उदाहरण अनेक हो सकते हैं। विविधताओं के अंत की यह समस्या जीवन के हर क्षेत्र में है। यह भी मानता हूँ कि जिन उदाहरणों का ऊपर उल्लेख किया गया है उनके अपवाद भी मौजूद हैं। किंतु एक तरफ़ परिवर्तनों की आंधी और दूसरी तरफ़ गिने-चुने अपवाद। जब अपने ही देश में अपनी ही संस्कृति का पालन अपवाद स्वरूप दर्शाया जाय, तो संकट की गंभीरता को समझना सरल है।

कारण क्या हैं?

अनेक कारण हैं, पर सबसे बड़ा कारण है भूमंडलीकरण अर्थात ग्लोबलाइजेशन। केवल भारत ही नहीं विश्व के अनेक देश भूमंडलीकरण के इस सांस्कृतिक हमले का शिकार हैं। विश्व व्यापार संगठन (वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन), विश्व मुद्राकोष तथा विश्व बैंक जैसी जिन संस्थाओं के दम पर उदारीकरण और भूमंडलीकरण सारी दुनिया पर थोपा गया है, उसका एक प्रमुख उद्देश्य पश्चिम के विकसित देशों उत्पादों के लिये पूरे विश्व में एक खुला बाज़ार खड़ा करना है। उनके सभी उत्पाद हमारे देशों में बिक सकें इसके लिये आवश्यक है हमारे यहाँ की संस्कृति भी उनके उत्पादों के अनुकूल हो। इसलिये सांस्कृतिक हमले। इन बातों पर पहले भी कई जगह लिखा जा चुका है। अतः उल्लेख ही पर्याप्त है।

दूसरा प्रमुख कारण है शहरीकरण और औद्योगिकरण। शहरी समाज जो दफतरों और कारखानों में कार्य करता है, उसकी दिनचर्या लगभग पश्चिमी विकसित देशों के कामगारों की दिनचर्या के जैसी ही हो जाती है। इस प्रकार की दिनचर्या अपने कार्य के अनुकूल सांस्कृतिक आचार करती है। भारतीय संस्कृति, पर्व-त्यौहार आदि कृषि पर आधारित समाज के अनुकूल हैं। ऐसे समाज के वेश-भूषा, खान-पान, त्यौहार आदि भी ऋतुओं के परिवर्तन पर आधारित होते हैं। पश्चिमी जीवनशैली में ऋतुओं का दैनिक जीवन पर प्रभाव नगण्य है। यही कारण है कि भारत में कभी धूम-धाम से मनाए जाने वाले त्यौहार अब लगभग भुला दिये गये हैं।

हम पर सीधा-सीधा पश्चिमी सांस्क़्रुतिक आक्रमण हुआ है। यह आक्रमण इतना शक्तिशाली है कि इससे बचना या इसका सामना करना तो दूर इसके प्रभाव का आकलन कर पाना भी टेढ़ी खीर है।

क्या परिवर्तन बुरा है? क्या आधुनिकता का विरोध उचित है?

कदापि नहीं। परिवर्तन अवश्यंभावी है, आधुनिकता का स्वागत भी अनिवार्य है। किंतु आधुनिक और पश्चिमी परस्पर पर्यायवाची नहीं हैं। केवल आधुनिकता के नाम पर अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता और वैविध्य को त्याग देना कहाँ की बुद्धिमानी है? एक जैसी दिखायी देने वाली दुनिया भला कैसे सुंदर होगी? उसमें भी केवल मुट्ठीभर लोगों की संस्कृति की नकल करते बाकी दुनिया के लोग सम्मान के साथ किस प्रकार इस दुनिया में जी पाएँगे? जब हमारे आने वाली पीढ़ियाँ देखेंगी कि जो कुछ भाषा-कला-संस्कृति इस दुनिया में है वह सब इन्हीं पश्चिमी सभ्यताओं के देन है, तब वे अपने अतीत पर किसे प्रकार अभिमान कर पायेंगी?

सारी दुनिया को एक गाँव बनाने के नाम पर हम देखते हैं कि एक गाँव विशेष ही सारी दुनिया की मानक पहचान हो चला है। दूरियाँ खत्म करने के नाम पर पहचानें खत्म की जा रही हैं। सारी दुनिया तो एक खुला बाजार अवश्य बन चुकी है, लेकिन दुकानदार केवल एक ही है।

लड़ें कैसे:

जीवन सेविविधता के अदृश्य होना एक त्रासदी है। विविधता का मिटना केवल इसलिये दुःख़दायी नहीं कि इससे सौंदर्य नष्ट हो रहा है, बल्कि यह भी कि यह सब प्राकृतिक न होकर कृत्रिम है। एक संस्कृति विशेष के लिये रास्ता बनाते हुए संसार की बाकी सारी संस्कृतियों को खत्म किया जा रहा है। विडंबना यह कि जो इस आक्रमण का शिकार हैं वे स्वयं नहीं जानते कि उन पर आक्रमण हुआ है। ऐसे आक्रमण से अवश्य लड़ना होगा।

मैंने यहाँ विविधता की चर्चा की है किंतु लड़ाई का विषय पश्चिमी संस्कृति के आक्रमण एवँ भूमंडलीकरण को बनाया  है। ऐसा इसलिये क्योंकि इस समस्य के मूल में यही पश्चिमीकरण है। कभी आर्थिक उन्नति के नाम पर, कभी वैज्ञानिक श्रेष्ठता के नाम पर और कभी हमारा जो कुछ है उसके हीन होने के नाम पर हम इस आक्रांता संस्क़्रुति के क्रीत दास बनते जा रहे हैं।

 जो लड़ते हैं, जो विरोध की बाते करते हैं, उन्हें प्रतिगामी करार दिया जाता है। उन्हें पुरातनपंथी, दकियानूसी, विकासविरोधी आदि कहा जाता है। फिर भी लड़ाई तो जारी रखनी ही होगी। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक उपाय तो अपनई जगह हैं ही। व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ उपाय किये जाने चाहिये।

यह जो भूमंडलीकरण के कंधे पर सवार पश्चिमी बाज़ार है, उसकी सफलता का मूलमंत्र है भोगवाद। हम जितना अधिक भोगवादी, भौतिकवादी होंगे उतना ही पश्चिम के उत्पादों के खरीदार होंगे। जिस दिन हम इस भोगवाद को हरा देंगे उस दिन पश्चिमी बाज़ार तंत्र के लिये साँस लेना कठिन होग। आवश्यकता है कि हम प्रकृति के निकट जाएँ, अपरिग्रह और संयम से जीवन जीने की भारतीय पद्धति अपनायें। हम आधुनिक तरीके अवश्य अपनाएँ किंतु प्रकृति के विनाश की कीमत पर नहीं। प्रकृति के विनाश करने वाले उपभोग के अधिकांश साधनों का अविष्क़ार भी पश्चिम में हुआ है, और इनका व्यापार भी पश्चिम ही किया करता है।

हमें अपनी भाषा, बोलियों, कलाओं, पर्वों, देशज विज्ञान और दर्शन आदि सभी के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना होगा। किंतु सम्मान ही पर्याप्त नहीं, जितना भी युगानुकूल है, उतना हमें अपनी संस्कृति को आचरण में भी लाना होगा। जब तक हम स्वयं अपनी संस्कृति को आचरण में नहीं लाएँगे, दूसरों से यह अपेक्षा करना व्यर्थ है। हमसे जितना हो सके, अपने व्यवहार में अपनी संस्कृति को प्रतिध्वनित करें।

व्यक्तिगत परिवर्तन ही सामाजिक स्तर पर किये जाने वाले बड़े परिवर्तनों की शुरूआत होता है। अंत में, हम नीरक्षीरविवेक का पालन करें। जो अच्छा है, ग्रहण करें, जो अवांछनीय है, त्याग दें। फिर चाहे वह पश्चिम का हो या हमारा अपना।

-हितेन्द्र अनंत

6 टिप्पणिया

  1. आपकी बातों से बहुत हद तक सहमत।

    एक बात जोड़ना चाहूंगा कि सुविधावादी और उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति के बढ़ावे ने लोगों को न्‍यूनतम लागत और न्‍यूनतम श्रम एवं अधिकतम उपलब्‍ध संसाधनों के उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ाई। यह समस्‍या उससे पैदा हुई लगती है। जो सर्वाधिक सुविधाजनक होगा, वही सर्वाधिक स्‍वीकार्य होगा।

    वैसे छोटे छोटे पॉकेट्स में अब भी विविधता पूरी खूबसूरती के साथ नजर आती है…

    1. जी हाँ, कुछ कोने हैं जो अब भी अछूते हैं, लेकिन आक्रमण इतना प्रचंड है कि वे कब तक बच पाएँगे कह पाना मुश्किल है।

  2. कमाल का लेख है. हितेंद्र जी आप को बहुत बधाई. पूर्णतया सहमत!

    वैश्वीकरण का ऐसा असर हमें कब कहाँ और कैसे ले जाएगा इसका उत्तर समय ही दे पायेगा. इन परिवर्तनों के साथ साथ कुछ अति सुन्दर अवसर भी हमारे समक्ष आये हैं. जैसे की इन्टरनेट पर आप जैसे लेखकों की बातें पढ़ना. यू ट्यूब पर न जाने कितना कुछ स्थानीय और देसी हमारे लिए उपलब्ध हुआ है. आप यकीन नहीं करेंगे की उत्तर प्रदेश (मेरा गृह राज्य) की असंख्य लोक कलाओं, तमिल सिनेमा और तमाम विदेशी फिल्मों से मेरे परिचय का एक मात्र साधन अभी तक यू ट्यूब ही रहा है. देवरिया में रह कर मैंने कभी कोई लोकगीत शायद ही सुना हो. पर इन्टरनेट का धन्यवाद की ऐसे गीत भी सुनने को मिले!

    वो कहते हैं न “Every Dark Cloud has a Silver Lining”.

    1. अमित भाई, आपसे सहमत हूं। लेख से स्पष्ट है कि पीड़ा कुछ और ही है तकनीकी नहीं। तकनीकी यदि हमारी विरसात के संरक्षण और पल्लवन का माध्यम बनती है तो उसका स्वागत ही किया जाएगा। इसका संतोष अवश्य है कि तकनीकी हमारे काम आ रही है। लेकिन यह क्या दुःख का विषय नहीं कि जो संगीत गली-मोहल्ले-चौराहे पर सहज-सरस सुनने को मिलता था उसे पाने के लिए अब यूट्यूब का सहारा लेना पड़ रहा है। कहने का मतलब यह कि नुकसान तो स्पष्ट ही है!

      और हां, इस सुंदर गीत के लिए धन्यवाद!

      1. हाँ सही कह रहे हैं ! सहमत हूँ !

  3. बढ़िया आलेख प्रस्तुति …आभार

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