अन्य पुरूष, मध्यम पुरूष

“अगर मैंने तुम्हें ज़रा सा तीखा बोल भी दिया तो क्या नाराज़ हुआ जाता है इतनी सी बात पर? बोला भी तो अपना समझ के बोल दिया, क्या मैं तुम्हारा कोइ नहीं?”

वह बहुत देर से फोन पर अपनी पत्नी या प्रेमिका से लड़ रहा था। पत्नी या प्रेमिका होने का अनुमान मैंने इसलिये लगाया क्योंकि वह बहुत देर से फोन पर था। मैंने उसकी बातें सुन लीं। बस में वह मेरे बगल की सीट पर बैठा था। दो लोगों की सीट में बगलवाले की बात सुन लेना कोइ असभ्यता नहीं मजबूरी है। मैं सोचने लगा कि उसकी पत्नी या प्रेमिका क्या जवाब दे रही होगी इस पर। शायद कह रही हो “देखो तुम मुझे चाहे जो कह लो, लेकिन किसी तीसरे के सामने नहीं। जो मेरे-तुम्हारे बीच है वह किसी थर्ड पर्सन के सामने कहोगे तो सोचो मेरा अपमान नहीं होगा?” हाँ, यही कह रही होगी।

बस की यात्रा लंबी थी। मेरी सोच “थर्ड पर्सन” पर अटक गयी। थर्ड पर्सन, यानी अन्य पुरूष यानी ही, शी, इट, मोहन, संस्कृत में सः, तौ, ते, रामः। व्याकरण के पाठ याद कर ही रहा था कि लगा कोइ मुझसे कुछ कह रहा है। यह बगल वाला ही था। कुछ कहा उसने जो मैंने नहीं सुना। इसका मतलब यह कि उसकी फोन पर बात खत्म हो चुकी थी। इसका मतलब यह कि उस फोन वाले झगड़े का पटाक्षेप कैसे हुआ, हुआ भी या नहीं, यह मैं आपको नहीं बता पाउंगा। ना ही यह कि वह वह पत्नी थी या प्रेमिका?

“जी!” मैंने उससे कहा। इसका मतलब वह फिर से कहे उसने मुझसे क्या कहा था।

“पानी नहीं गिरा रहा है। सूखा पड़ेगा इस बार।”

कौन नहीं गिरा रहा है पानी? यह सोचने का काम मेरा। वाक्य कहा गया किसी अन्य पुरूष यानी थर्ड पर्सन को संबोधित करके। अब यदि वह आस्तिक हो, तो उसका आशय अवश्य ही ईश्वर से होगा।

“हाँ! कुछ खास बारिश नहीं है इस बार।” जवाब देकर मैं अन्य पुरूष पर वापस आया। हिन्दी में अन्य पुरूष का अनोखा महत्व है। देश की हर छोटी-बड़ी समस्या के पीछे यही अन्य पुरूष होता है।

“अरे साहब! पहले ही इतना दाम बढ़ा दिया है। अब सूखा पड़ेगा तो और महँगाई बढ़ेगी।” उसने फिर कहा तो मैं समझ गया कि यह मुझसे गप लड़ाने का इच्छुक है। वैसे भी इन समस्याओं पर गप ही लड़ाई जा सकती है।

पर यह दाम बढ़ाने वाला कौन? किसने दाम बढ़ा दिया है? कौन है यह अन्य पुरूष?

“भ्रष्टाचार भी तो बढ़ गया है भाईसाहब!” मैंने रटा सा जवाब दिया। यह भी ठीक लगा कि वह मुझे साहब कह रहा है तो मैं उसे भाईसाहब कह लूँ।

“अरे सब चोर हैं साहब! इसीलिये तो लोकपाल नहीं ला रहा है। लाएगा तो सबको जेल जाना होगा ना!”

फिर अन्य पुरूष। इस बार मतलब किससे था? प्रधानमंत्री से या संसद से? कौन नहीं ला रहा लोकपाल? बचा हुआ सफर पैंतालीस मिनट का था। जब पता चला कि उसे भी मेरे ही स्टॉप पर उतरना है तो मेरे मन में एक विचार आया। पैंतालीस मिनट में न जाने कितनी बार “भाईसाहब” बोलना पड़े! अकेला ‘भ’ ही इस शब्द को भारी बना देता है। तो मैंने आखिरी बार उसे भाईसाहब कहा।

“शुभनाम क्या लिखते हैं आप भाईसाहब, मैं हितेन्द्र, हितेन्द्र अनंत”।

“राम, राम कृष्ण सावंत”।

बचे सफर में न जाने कितनी बार “अन्य पुरूष” का आगमन हुआ। मैं बस कुछ उदाहरण आपके सामने रख देता हूँ।

“संचेती चौक पे बिना मतलब ग्रेड सेपरेटर बना दिया है। करोड़ों रूपया खाया है”।

“मुंबई तो अब मैं ट्रेन से ही जाता हूँ। शिवनेरी (सरकारी बस) का किराया साढ़े तीन सौ कर दिया है।”

“नई बसें खरीद नहीं रहा है। भीड़ नहीं होगी तो और क्या होगा!”

“मीडिया को तो अब मनोरंजन बना दिया है।”

“अरे! नागपुर को तो चमका दिया है। पुणे-मुंबई कुछ नहीं नागपुर के सामने!”

“मेट्रो (ट्रेन) का प्रपोजल पास कर दिया है। अंडरग्राउंड (भूमिगत) नहीं बनाएगा। अंडरग्राउंड बनाता तो मजा आता। लेकिन ठीक है, कितना तोड़-फोड़ करेगा अंडरग्राउंड के लिये।”

“इतना सारा आई.टी. और बी.पी.ओ. जो खोला है न, उसी से रेट इतना बढ़ गया है पुणे में। पहले हिल स्टेशन होता था पुणे! वाट लगा दिया है यहाँ के एनवायरनमेंट (पर्यावरण) की।”

“कल टीवी पे “रंग दे बसंती” दे रहा था। वैसाइच्च करना माँगता है।”

मेरे लिये यह अन्य पुरूष एक अबूझ पहेली था। कौन है वह जो इतना सब करता है। फिल्मे दिखाने से लेकर मेट्रो ट्रेन चलाने तक हर काम करने वाला वह दिव्य पुरूष जिसे व्याकरण में सावंत अन्य पुरूष के रूप में संबोधित करता है, वह आखिर है कौन?

उससे रोज़ का मिलना हो गया। एक ही बस में आना-जाना, एक ही मोहल्ले में रहना। उसने मेरा बोझ थोड़ा और हल्का किया, अब “राम जी”, “सावंत जी” या “सावंत साहब” नहीं कहना पड़ता था। वह मेरे लिये “रैक्स” हो चुका था। हल्का और आसान!

उसका सिर्फ नाम नहीं बदला मेरे लिये। एक और परिवर्तन हुआ।

“इस बार किसको बनवा रहे हो राष्ट्रपति?”

“क्या यार बारिश करवा दी कल तुमने! छूट गयी सात वाली बस!”

“डीजल का रेट बढ़वा दिये हो सर, अब बस का किराया भी बढ़वा ही दोगे!”

समझ गये आप! यह परिवर्तन बड़ा था। रैक्स के लिये जो अन्य पुरूष था अब वह मध्यम पुरूष बन चुका था। मध्यम पुरूष यानी सेकंड पर्सन यानी यू, यू, यू, संस्कृत में त्वं, युवाम्, यूयं।

“रैक्स तुमने जन्मदिन की पार्टी अब तक नहीं दी। इस बार संडे को कहाँ ले चल रहे हो?”

“जहाँ बोलोगे ले जाउंगा हितेन्द्र सर! बस आप मेरी सैलरी बढ़वा दो।”

“जितवा दो यार संगमा को, प्रणव अपने को जमता नहीं।”

“सर एक बार मोदी को बनवा दो पी.एम. फिर देखो इनकी कैसे वाट लगाएगा।”

कस्तूरी कुंडली बसे, मृग ढूंढे बन माँही! इस दिव्य ज्ञान ने मुझे हिला दिया! तो क्या अब तक जिस दिव्य, अन्य पुरूष की खोज में मैं व्याकुल था वह मैं ही हूँ? क्या मैं ही हूँ रैक्स की हर समस्या का कारण और निदान? क्या खूब ज्ञानी थे हमारे ऋषि मुनि जिन्होंने कहा था कि ब्रह्म तुम्हारे भीतर ही है। कहाँ लोग जंगल जाया करते हैं “स्वयं की खोज” में! मैंने तो कांक्रीट के जंगलों के बीच घूमती बस में ही अपने असली स्वरूप को पहचान लिया था! मैं ही हूँ सारी समस्याओं का कारण और समाधान! सही लिखा है उपनिषदों में, उसे जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता!

पर आपके लिये यह जानना शेष है कि वह जिससे रैक्स फोन पर झगड़ रहा था उसकी पत्नी ही थी, प्रेमिका नहीं। यह जानने के बाद अब आप स्वतः जान गये होंगे कि उनके झगड़े हमेशा होते थे, और हमेशा सुलझ भी जाते थे। यह भी कि अधिकांश अवसरों पर रैक्स ही क्षमा माँगा करता था!

-हितेन्द्र अनंत

टीप: बस यात्रा पर एक रोचक कवितामय प्रसंग पढ़िये यहाँ

6 टिप्पणिया

  1. bahut hi realistic observation ke sath ye vyang ya drishtant likha hai appne. shubhkamnayen.

  2. Drashta(Observer) ki nazar se, ek sadharan si ghatana ko, bahoot hi rochak dhang se present kiya gaya hai. Aur baton-baton main bahoot gahari daarshnik seekh bhi deta hai. Hitendra ‘Bhaisahab’🙂 ko dher sari subhkamanayen.

  3. चकाचक। मोदी जी वाली बात अब शुरु हुई है शायद!

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