नोट कोइ नहीं जला सकता!

नोट कोइ नहीं जला सकता!

 

रैक्स नोटबुक पर कोइ सूची बना रहा था।

अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे जब मैं थक जाता हूँ, तब कार्यालय में थोड़ा टहल लेता हूँ। इस बहाने लोगों से राम-राम भी हो जाती है। मानव संसाधन प्रबंधन विभाग (एच.आर.) में होने के नाते यह मेरा काम है कि लोगों से उनका हाल-चाल पूछता रहूँ। अपनी नौकरी की इस कमज़ोरी का मैं पूरा फायदा उठाता हूँ। गप्पबाज़ी (आप “बकर” कह लें) की लत तो बचपन से ही है। अच्छा है अब इस गप्पबाज़ी के पैसे भी मिलने लगे हैं।

मुझे आता देख रैक्स के चेहरे पर चमक आ गई। काम में मेरी तरह उसका भी मन नहीं लगता। एक गपोड़ी का दूसरे गपोड़ी से क्या संबंध हो सकता है, इसे या तो हम गपोड़ी समझ सकते हैं या दिल्ली उच्च न्यायालय। समाज इस संबंध को आज तक समझ नहीं पाया। दिल्ली उच्च न्यायालय इसलिये कि एक और संबंध है जिसे समाज नहीं समझ पाया पर न्यायालय समझ गया। मैं तो स्वामी रामदेव को भी अपने इस गपोड़ी समुदाय का प्रतिष्ठित सदस्य मानता हूँ। और हम गपोड़ियों की भलमनसाहत देखिये, हम कोइ “गपोड़ी परेड” भी नहीं करते हैं।

तो मैं रैक्स के पास गया और उससे पूछा।

“क्या बाज़ार जा रहे हो रामकिसनवा? बड़ी लंबी सूची बन रही है”!

“नहीं यार बात कुछ और ही है। दरअसल मैं देश के महापुरूषों की सूची बना रहा हूँ”। रैक्स उर्फ रामकिसनवा उर्फ राम कृष्ण सावंत ने उत्तर दिया।

“देश के महापुरूषों की सूची! वह भी भारत देश के?”

“हाँ भाई, नहीं तो क्या पाकिस्तान के”?

“और मुझे बताओगे यह सूची तुम क्यों बना रहे हो?”

“अरे तुमने सुना नहीं! सरकार अब भारतीय मुद्रा के नोटों में गांधीजी के अतिरिक्त देश के अन्य महान व्यक्तियों के चित्र भी छापने वाली है। तो मैंने सोचा कि एक सूची क्यों न मैं भी सरकार को भेज दूँ? हो सकता है उनके कुछ काम आ जाए”।

“रैक्स भाई, फिर तो बनने से रही तुम्हारी सूची। और बन भी गयी तो उसके नामों का छपना तो असंभव ही है”।

“ऐसा क्यों?” रैक्स ने कुछ क्रोधित सी मुद्रा में पूछा।

“ऐसा इसलिये कि तुम्हें हर जाति, वर्ग, धर्म को इसमें जोड़ना होगा। तैंतीस करोड़ तो हिन्दुओं के देवी-देवता, फिर पिछले कुछ सौ सालों के उनके साधु बाबा, इसमें जोड़ लो जैनियों के चौबीस तीर्थंकर, सिखों के दस गुरू, एक महात्मा बुद्ध, एक ईसा मसीह और एक डॉक्टर अंबेडकर। इन सबके चित्र नोटों पर छपने चाहिये”।

“मुसलमानों से क्या शत्रुता है तुम्हारी? पैगंबर साहब को भी जोड़ लेते”! रैक्स ने सूची को संतुलित करने का प्रयत्न किया।

“तुम नोट में उनका चित्र छापकर तो देखो, भारत ही नहीं सारी दुनिया की टकसालों में आग लगा दी जाएगी। मौसिकी (संगीत) की तरह चित्रकारी हराम है भाई!”

“हूँ। लेकिन नहीं छापेंगे उनके किसी महापुरूष का चित्र तो ये नाइंसाफी होगी”।

“क्यों? मौलना अबुल कलाम आज़ाद हैं ना। उन्हीं का चित्र छाप लिया जाए”। मैंने समस्या को हल करने का प्रयास किया।

“इन सवालों से तो निपट लेंगे यार। हर जाति-धर्म में कितने ही महापुरूष हैं जिन्होंने इस देश के लिये अपना योगदान दिया। पर अगर हिन्दुओं के तैंतीस करोड़ देवी देवताओं को इसमें जोड़ लिया जाय तो इतने तो नोट ही कहाँ छपने हैं? हिन्दुओं को यहाँ त्याग करना होगा। उन्होंने वैसे भी देवताऑ की जनसंख्या बहुत बढ़ा दी है। हम हिन्दुओं के देवता कुछ कम कर देंगे।”

“फिर किस हिन्दू देवता का चित्र तुम छापोगे नोटों पर और किसका नहीं?” मैं अब असमंजस की स्थिति में था।

“यार, एक उपाय है मेरे पास। आखिर महात्मा गांधी हिन्दू ही हैं ना। तो हम अब और हिन्दुओं के चित्र नहीं छापेंगे नोटों पर। बाकी हर धर्म से एक-एक चित्र ले लिया जाएगा।” रैक्स ने निर्णय लिया।

“रैक्स भाई, तुम सरकार को फँसाने वाली सलाह दे रहे हो। हिंदुओं का तो निपटारा तुमने कर दिया। अब ये बताओ कि जैनियों के चौबीस तीर्थंकरों में से किसे लोगे? और सिखों के दस गुरूओं में से किसे?”

“ओ हो! यार ये तो मामला ही गड़बड़ लगता है। ऐसे तो बड़ी लड़ाई होगी। तरह-तरह के प्रदर्शन होंगे”।

“पर एक प्रदर्शन नहीं होगा”। मैंने बीच में टोका।

“कौन सा प्रदर्शन?”

“भारत में लोग जिस तरह असहमत होने पर पुस्तकें, कार्टून, और फिल्मों के पोस्टर जलाया करते हैं, उस तरह नोट जलाने की हिम्मत अभी भारत की गरीब जनता में नहीं है”।

“यानी कोइ नोट नहीं जलाएगा?”

“नहीं। छापो जिसका छापना है चित्र। अधिक से अधिक, लोग वित्त मंत्री का पुतला जलाएँगे या उनसे त्यागपत्र माँगेंगे या दोनों”।

मैं और रैक्स अपनी ही चर्चा की इस उपलब्धि पर बड़े प्रसन्न थे। अब हम अपनी इच्छित सूची सरकार को सौंप सकते थे। हमें विश्वास हो गया कि सरकार हमारे सुझाए महापुरूषों के चित्र नोटों में अवश्य छापेगी। क्योंकि सरकार को यह डर नहीं कि लोग नोट जलाएँगे।

रैक्स ने फिर प्रश्न किया।

“यार सुना है कि वित्त मंत्री के राष्ट्रपति बनने के बाद प्रधानमंत्री ही वित्त मंत्री बनने वाले हैं। यदि नोटों में नये चित्र छपे, और विवाद हुआ, और विवाद होने पर लोगों ने वित्त मंत्री अर्थात प्रधानमंत्री का ही त्यागपत्र माँग लिया तो?”

“मेरे मित्र रैक्स, जिस प्रकार लोगों में यह साहस नहीं कि नोट जलाएँ, ऐसे ही काम के दौरान और गप लड़ाने का अब मुझमें साहस नही रह गया है! वित्तमंत्री का काम प्रधानमंत्री ही करेंगे या कोइ और इस पर फिर कभी बात करेंगे। अब चलो काम पर वापस”।

रैक्स मुस्काराया और उसने कॉफी मशीन की दिशा पकड़ी। मैं भी उसके साथ हो लिया। कार्यालय में कॉफी मशीन ठीक से काम कर रही है या नहीं, इस पर मुझे रैक्स से फीडबैक जो लेना था!

-हितेन्द्र अनंत

6 टिप्पणिया

  1. wah!!!!..badhiya ja rahe ho guru…keep it up. waise ye racks jo aapka sah nayak hai aajkal dimag ki upaj hai ya vastav me ek charitra hai ????

    khair jo bhi ho badi achhi bhumika me ek ati sundar sandeshatmak vyangya srinkhala ka safal patra sabit ho raha hai ..aur nischay hi badhai ka patra hai….

    Keep it up..great going!!!!

    1. उपेंद्र मेरे,

      रैक्स के बारे में और लिखा जाएगा। आगे आने वाले लेखों में। पूछकर तुम रोमांच खत्म न करो!

      1. badhiya hai guru nahin poochhate …par ye racks tumhara reall harry potter banane ja raha hai…aur tum parde ke peechhe ke J.K.ROWLIING hi rah jaoge…:)..any way ..badhiya ja rahe ho

        1. अपनी ही रचना जब भस्मासुर बन जाय तो उसका क्या भवितव्य होता है तुमको जानकारी है ही।

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