महामहिम पर महानाटक: देस मेरा रंगरेज ऐ बाबू

कहते हैं कि भारत एक उत्सव प्रिय देश है। उत्सव मनाने के अनेक तरीके हो सकते हैं। नाटक खेलना भी उत्सव मनाने का एक अच्छा तरीका है। लेकिन पिछले कुछ सालों से ऐसा लगता है कि हम उत्सव प्रिय देश से नाटक प्रिय देश में बदल गये हैं। नाटक यूँ तो मंच पर खेले जाते हैं पर भारत में मंच पर खेले जाने वाले नाटकों की दशा दयनीय है। मंच पर दयनीय इसलिये क्योंकि नाटक अब असल ज़िदगी में खेला जाता है, सड़क से संसद तक। अतिशयोक्ति नहीं होगी यदि कहा जाय कि भारत में सारा जनजीवन ही अब एक नाटक हो चुका है।

भारत के फिल्म कलाकार फिल्मों से अधिक सार्वजनिक जीवन में नाटक करते हैं। एक दूसरे को पार्टियों में थप्पड़ मारते हैं। जब उनका मन हो हिरण जैसे संरक्षित जानवरों का शिकार करते हैं, जब मन करे फुटपाथ पर सोये हुए लोगों को कुचल देते हैं। एक गायक एक अभिनेत्री को खुलेआम चुंबन देता है और देश में हंगामा खड़ा हो जाता है। किसी फिल्म का लेखक इस बात पर निर्माता से खफा हो जाता है कि उसका नाम फिल्म के आरंभ में अधिक महत्ता के साथ क्यों नहीं आया? एक फिल्मी सितारा क्रिकेट के मैदान में एक बेचारे सुरक्षाकर्मी से लड़ बैठता है। देश के उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायधीश हमारी मनोरंजन की इस लत से परेशान होकर कहता है कि नब्बे प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं। हम इसे भी अपने मनोरंजन का विषय बना लेते हैं। इन सब बातों पर देश के टी.वी. चैनल दिन रात बहस करते हैं। यह बहस भी हमारे मनोरंजन ग्रहण करने की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग बन चुकी है।

एक मंत्री 140 अक्षर के ट्विटर में कुछ लिख देता है तो सारे देश को दो दिन नींद नहीं आती, वह किसी 20-20 क्रिकेट क्लब की टीम को खरीदना चाहता है तो उसे पद से हाथ धोना होता है। एक के बाद एक नेताओं की अश्लील सीडियाँ बाज़ार में आती हैं। इन्हें बाजार में लाने का आरोप नेता अपने ड्रायवर पर लगाते हैं। लेकिन मजे की बात है वे अपने ड्रायवर को इस कुकृत्य की सजा नहीं देना चाहते, वे उससे समझौता कर लेते हैं। अश्लील सी.डी. के निर्माताओं में से एक राज्य का तत्कालीन राज्यपाल भी शामिल है। महोदय को जब लगा कि सी.डी. से जनता ऊब चुकी है, तो एक नया मामला आया, एक युवक दावा करता है कि वे उनके पिता हैं और इसकी डी.एन.ए. जाँच हो। वे खून देने से इंकार करते हैं। देश का सुप्रीम कोर्ट लाखों लंबित मामलों को छोड़कर इस मामले में हस्तक्षेप करता है। एक संतनुमा बाबा की भी सेक्स सी.डी. आती है। एक अन्य बाबा कहते हैं समोसे खाने से जीवन सुधर जाएगा, कृपा हो जाएगी। वे कहते हैं कि इतना भी नहीं कर सकते तो मुझे सिर्फ टी.वी. पर देख लो कृपा हो जाएगी। एक बाबा सूर्यनमस्कार सिखाते समय सूर्य देव की स्तुति में मंत्र पढ़ने के स्थान पर “काला-धन” का काला जादू वाला मंत्र पढ़ते हैं। बाबा की सी आयु के एक और सफेदपोश बड़े भैया (अर्थात “अण्णा”) कहते हैं भारत माता की जयकार करो और मुझे टी.वी. पर देखो भ्रष्टाचार खत्म।

ऐसा नहीं है कि चर्चित व्यक्ति ही मनोरंजन उद्योग के नायक हैं। एक बालक बोरवेल में गिर जाता है, सारा देश मंदिरों में देवों के सामने गिर जाता है। इसके बाद और भी कुछ बालक गिरते हैं, पर वे उतने ही लोगों को मंदिर नहीं भेज पाते। शादियों के मौसम में एक के बाद एक दुल्हनें बैरंग बारातें लौटाती हैं, हम इसका जीवंत प्रसारण (लाईव टेलीकास्ट) देखते हैं। एक प्रोफेसर अपनी छात्रा से प्रेम करते हैं, तब पत्नी द्वारा उनकी पिटायी लाईव आती है। कुछ वर्ष बाद यही प्रोफेसर अपनी प्रेयसी के साथ वेलेंटाईन डे पर चैनलों में प्रेम कविताओं का पाठ करते हैं। क्या कुछ लिखूँ? यदि यहाँ सब लिखने लगा तो आप को इसी ब्लॉग से मनोरंजन की लत लग जाएगी।

विचित्र देश है। यहाँ मनोरंजन के लिये अब सभागारों और सिनेमाहालों में जाने की अवश्यकता नहीं रही। यदि मनोरंजन ही चाहते हैं तो आप बस सुबह का अखबार पढ़ लीजिये। तीसरे पन्ने की बातें पुरानी हुईं, पहले पन्ने से ही विशुद्ध मनोरंजन आपके लिये प्रतिदिन प्रस्तुत है। इतने पर भी आपका मन नहीं भरा तो 24 घंटे आने वाले खबरिया चैनल देखिये। इतना मनोरंजन मिलेगा कि आपको अपच भी हो सकता है।

हुआ यह है कि नाटक देखने का और नाटक दिखाने का रोग अब इस स्तर पर जा पहुँचा है कि राष्ट्रपति का चुनाव भी इससे अछूता नहीं रह गया।

यदि आप राष्टृपति के चुनावों में नाटक नहीं करेंगे तो आपके देश की जनता आपसे नाराज़ हो जाएगी। आज 15 जून 2012 के घटनाक्रमों के बाद लगता तो यही है कि जो कुछ हुआ वह नाटकों की हमारी उच्च परंपरा को बनाये रखने के लिये ही है। आखिर नाट्यशास्त्र का लेखन भरत मुनि ने भारत में ही तो किया!

पहले से तय था कि काँग्रेस और संप्रग (यू.पी.ए.) श्री ए.पी.जी. अब्दुल कलाम को नहीं बनाना चाहते दुबारा राष्ट्रपति। सबको मालूम था कि जितनी संख्या संप्रग के पास है उतनी किसी के पास नहीं। मुलायम के पास काँग्रेस के समर्थन के सिवा कोइ और चारा नहीं था क्योंकि परोक्ष और अपरोक्ष रूप से उनके द्वारा रा.ज.ग (एन.डी.ए.) को लाभ मिलने का अर्थ होता उनके प्रतिबद्ध मुस्लिम मतदाताओं की नाराज़गी। इतना ही नहीं, मुलायम के खिलाफ सी.बी.आई. के मामले चल रहे हैं, उन्हें इन मामलों को नियंत्रित स्थिति में रखने के लिये संप्रग की आवश्यकता होगी। ममता बंदोपाध्याय के खिलाफ ऐसा कोइ मामला नहीं। उनके राज्य में भाजपा का कोइ अस्तित्व नहीं, फिर उन्हें काँग्रेस और संप्रग से कैसा डर?

यह सब क्या मुलायम तब नहीं समझते थे जब वे ममता के साथ बैठ तीन नामों की घोषणा कर रहे थे? अवश्य समझते थे। लेकिन मुलायम ने अपना हित साधा। ममता के बहाने उन्होंने काँग्रेस के खेमें में असुरक्षा की भावना बढ़ाई। ऐसे में लेन-देन में उनका पलड़ा भारी हुआ। करना तो उनको वही था जो उन्होंने किया। लेकिन असमंजस की स्थिति बनाकर अपने लाभ को अधिकतम करने का प्रयत्न उनका रहा।

तो क्या ममता मूर्ख थीं जो मुलायम पर विश्वास किया? जी नहीं। जब से वे मुख्यमंत्री बनी हैं, ममता की पटरी काँग्रेस के साथ कभी नहीं बैठी। सब जानते हैं कि यदि तत्काल चुनाव हुए तो लाभ ममता का है, उनके सांसदों की संख्या बढ़ेगी; और तब वे किसी भी केन्द्र सरकार से अधिक मजबूती से सौदेबाजी कर पायेंगी। पर इसके लिये चाहिये कि सरकार गिरे। इस घटनाक्रम से उन्हें बहाना मिलेगा संप्रग को अपना शत्रु बनाने का। फिर वे शत्रु की सरकार को गिराने का भरपूर प्रयास करेंगी। जितनी जल्दी सरकार गिरेगी उतना ममता को चुनाव में लाभ होगा। किंतु संप्रग की सरकार तो वर्तमान में ऐसा एक भी कठोर कदम उठाने से डरेगी जिसका बहाना बनाकर ममता सरकार से समर्थन वापस लें। ममता संप्रग की घटक रहकर बिना ठोस वजह के सरकार गिरायें यह जनता को अनुचित जान पड़ेगा। अतः ममता ने प्रयास किया कि वे काँग्रेस को अधिकतम हानि पहुँचाएँ बजरिये उसे अपमानित कर और उससे शत्रुता की शुरूआत कर।

प्रधानमंत्री का नाम राष्ट्रपति पद हेतु क्यों सुझाया गया? दिग्भ्रमित करने लिये और साथ ही वर्तमान सरकार को अपमानित करने के लिये। इस सरकार के अपमानित होकर गिरने पर ही मुलायम और ममता को अगले लोकसभा चुनाव में लाभ है। इस निकम्मी और अपने ही कर्मों से बदनाम हो चुकी सरकार के कामों का डंका बजाकर वे चुनाव लड़ेंगे नहीं। अतः एक तरफ तो यह संकेत कि प्रधानमंत्री हमें पसंद नहीं। दूसरी तरफ काँग्रेस के उस वर्ग को दिग्भ्रमित करना अथवा सक्रिय करना जो मनमोहन के जाने की मन्नत माने बैठा है। मुलायम और ममता को मालूम था कि काँग्रेस इतनी मूर्ख भी नहीं कि अपने ही प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बनाकर यह स्वीकार करे कि प्रधानमंत्री अब शासन संचालन के योग्य नहीं रहे।

ममता और मुलायम ने कलाम को प्रत्याशी (कैंडिडेट, उम्मीदवार) क्यों घोषित किया? क्योंकि वे जानते थे कि वर्तमान परिस्थितियों में कलाम प्रत्याशी बनेंगी ही नहीं। यदि बन जाते, यदि हाँ कह देते तो मजबूरन मुलायम को उनका समर्थन करना होता। ऐसा उन्हें करना था नहीं, उन्होंने बस कलाम के नाम का हौवा काँग्रेस के सामने खड़ा किया। हौवा इसलिये कि यही एक नाम है जो लोकप्रिय तो है ही, काँग्रेस के मन में यह डर भी पैदा कर सकता है कि कहीं मुलायम और ममता राजग से न जा मिलें।

नाटक की परतें और भी हो सकती हैं, विश्लेषण और भी प्रकारों से किया जा सकता है। किंतु यह तय है कि जो हुआ वह राजनैतिक सौदेबाजी का खुल्ला खेल था। इस खेल में अवश्य किसी की जीत हुई होगी और किसी की हार, पर था यह खेल ही।

आप शायद कहेंगे कि इस नाटक का नुकसान यह हुआ कि राष्ट्रपति पद की गरिमा का ह्रास हुआ। मैं पूछता हूँ कि गरिमा थी ही कब? उस गरिमा का क्या लाभ कि विदर्भ की ही एक महिला राष्ट्रपति है और विदर्भ के लाखों किसानों की आत्महत्याएँ अब समाचार तक नहीं बन पातीं। क्या देश के दुश्मन आतंकवादी की क्षमायाचना पर पूरे पाँच वर्ष निर्णय न लेना गरिमा का प्रदर्शन है? पुणे में सेना की एक ज़मीन के लिये सारा ज़ोर लगाना यह क्या राष्टृपति पद की गरिमा के अनुकूल है?

और सिर्फ प्रतिभा पाटिल ही नहीं, इंदिरा गाँधी के ज़माने से ही राष्ट्रपति सिवाय रबर के ठप्पे के कुछ और रहे नहीं हैं। और इसमें श्रीमान कलाम का नाम भी कोइ अपवाद नहीं। किसानों की आत्महत्याएँ उनके कार्यकाल में भी हुईं। हम जानते हैं कि वे शासन के दैनिक कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकते, पर जिस गणतंत्र के आप गणनायक हैं, वहाँ का नागरिक भूख से कर्ज से त्रस्त होकर मर रहा है, क्या एक बार भी उन्होंने इसका संज्ञान लिया? कलाम ने सिर्फ भाषण दिये। स्कूलों में बच्चों के साथ तस्वीरें खिंचवायीं, हमें सपना दिखाया कि भारत 2020 में महाशक्ति बनेगा। इसके लिये पाँच साल में उन्होंने किया क्या? वही किया जो हर मंदिर के दरवाजे पर लटका रहता है। आपातकाल के दौरान के राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद कितने असहाय थे इस चर्चित कार्टून में आप देख ही सकते हैं।

 

आप कहेंगे कि भाई राष्टृपति का काम यह सब करना नहीं, वह तो केवल संवैधानिक पद है। मैं भी यही कहूँगा। जिस पद के पदासीन व्यक्ति के होने न होने से कोइ फर्क ही ना पड़े उस पद की आवश्यकता ही क्या है? जब आवश्यकता नहीं तो गरिमा का प्रश्न तो फिर बेमानी ही है। ऐसी झूठी गरिमा पर हमें आँसूं नहीं बहाने।

और गरिमा नहीं है, इसलिये जब चाहे तब 1969 ई. से लेकर आज तक राजनेता राष्ट्रपति चुनावों को नाटक बनाते आये हैं और बनाते रहेंगे। हम और आप तमाशा देखते रहेंगे और हमेशा कहेंगे “कोऊ नृप होय हमें का हानि”।

अंत में इस गीत को अवश्य देखिये, इसे पहले ही आप को सुना देता तो यह सब जो लिखा है आप पढ़ते ही नही!!

– हितेन्द्र अनंत

4 टिप्पणिया

  1. thought provoking post….

    विचारो द्वेलक लेख …किन्तु हर नाटक में पात्र की भूमिका कमोबेश निर्देशक तय करता है ..और इस नाटक का निर्देशक आम आदमी ही तो है …और फिर “जब सैयां भये कोतवाल तो फिर डर काहे का ” वाली कहावत चरितार्थ होती है तो हमको अपच होने लगती है |

    कुल मिला कर सार यही है की जैसी पटकथा लिखी जाएगी …नाटक भी वैसा ही होगा …और शायद आज समाज यही चाहता है ..इसीलिए उसे वही मिल रहा है ..
    परन्तु दोगलेपन की हद तो तब हो जाती है जब आम आदमी रोने का नाटककरने लगता है… की ये बुरा हो रहा है ..वो बुरा हो रहा है ..ये चोर है वो चोर है और वो भी जानता है कि बात वही “ढाक के तीन पात ” वाली ही रहेगी ..५ साल बाद फिर वही लोग बुलाये जायेंगे ..रोना गाना फिर मचेगा …खबरिया चैनल पर कुछ दिन चट्कारियां भी वही आम आदमी लेगा ..और यही क्रम अनवरत चलता रहेगा …

    अंततोगत्वा “बोया पेड़ बाबुल का ..तो आम कहाँ से होए “

  2. amazing – Hitendra bhai aap full form mein hain aaj kal. gazab ka lekh hai. ise kahin chapwaiye. jyada se jyada logon ko saubhagya prapt ho manoranjan ka.

  3. मोहित श्रीवास्तव · · प्रतिक्रिया

    हितेंद्र भाई,
    बहुत ही उम्दा लेख है और आपका विश्लेषण बिलकुल सही है| देश की राजनीति में हो रही इस बेमतलब की उठापटक से आम आदमी त्रस्त हो चुका है|
    और मीडिया (पत्रकारिता) जो कि लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक है आज स्वयं लोकतंत्र की बखिया उधेड़ने में लगा है|

  4. bhai lekh to vakai bahut achcha hai, par sawal ye hai ki isako dur karene ke liye hum kya kar rahe hai, jaha tak mera prashna hai mai to kuch nahi kar raha hoo, kyoki noon tel aur lakadi ke hi sawal nahi sulajhate baki kya soche.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: