हिन्दी की ‘शुद्धता’ पर फेसबुक में चर्चा

हिन्दी भाषा की क्लिष्टता अथवा शुद्धता के विषय पर फेसबुक पर एक मित्र का आलेख पढ़ा। पहले भी उनके आलेख पढ़ता आया हूँ और निःसंदेह वे अत्यंत ज्ञानी, राष्ट्रवादी और हिन्दी भाषा के बहुत ही अच्छे जानकार हैं। उनके प्रति पूर्ण आदर है। नाम आदि का उल्लेख न करते हुए यह बता दूँ कि उनका कहना था कि हिन्दी जितनी अधिक संस्क़्रुतनिष्ठ होगी उतना ही अच्छा।

फेसबुक पर आप इस चर्चा को यहाँ से पढ़ सकते हैं: (कृपया लिंक कॉपी कर ब्राउज़र में पेस्ट करें)

http://www.facebook.com/notes/anand-g-sharma/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%81-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81-/10150648443925603?notif_t=note_reply

एक खास तरह की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के प्रयोग के पक्ष में मित्र का कथन है:

“हिन्दी मेरी मातृभाषा है – मैं माता को सुन्दर – शालीन एवं मूल्यवान वस्त्राभूषणों से अलंकृत करने का यथाशक्ति प्रयास कर रहा हूँ – और इसमें निहित स्वार्थ यह है कि इस से मेरी भी लेखनी का परिमार्जन हो रहा है l

 मेरा विचार है कि निरंतर शुद्ध – उच्च – शालीन – सुसंस्कृत भाषा के संपर्क में रहने से – शनैः शनैः – जड़मति भी सु-जान हो जाता है – इस प्रयास करने में मष्तिष्क को किंचित कष्ट भी हो तो सहन कर लेना अपेक्षित हैl

 साधारण में रूचि रखने से उत्कर्ष का मार्ग स्वतः अथवा अनायास ही अवरुद्ध हो जाता है – यह चिंतन का विषय है l

 अब आप समस्त हिन्दी भाषियों एवं हिन्दी प्रेमियों को चयन करना है कि मातृभाषा हिन्दी को सुशोभित करना है अथवा परित्यक्ता की तरह दीन हीन अवस्था में रखना है l” 

आप श्री का यह भी कहना था:

“मेरा मानना है कि हिन्दी भाषा समुचित रूप से समृद्ध भाषा है |

 अब जो समृद्ध है – जिसके पास वस्त्राभूषणों का बाहुल्य है – वह सादगी दिखने के लिए सप्ताह में एक दो दिन सादे वस्त्र धारण करे तो उसे स्वयं को एवं दूसरों को भी अच्छा लगता है – परन्तु वस्त्राभूषणों की प्रचुरता होने के उपरांत यदि वह व्यक्ति सदैव नितांत सादे वस्त्रों में विचरण करे तो वह अपनी संपदा का दुरूपयोग कर रहा है |

 इसी प्रकार यदि हिन्दी भाषा में भी शालीन सुसंकृत अलंकारिक शब्दों का प्रयोग नहीं होगा तो शनैः शनैः लोग हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा को सड़कछाप भिन्डीबजारी बोली में रूपांतरित कर देंगे – और हिन्दी सिनेमा यह नीचकर्म बहुत पहले से आरंभ कर चुका है |”

अनेक लोगों ने चर्चा में हिस्सा लिया और अपने-अपने मत रखे। इस विषय पर मैंने जो विचार रखे उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

“[…], हिन्दी शुद्ध रूप से लिखी जाए यहाँ तक ठीक है। किंतु आप एक विशेष प्रकार की हिन्दी को ‘उच्च’ क्यों कह रहे हैं। क्या अन्य प्रकार ‘नीच’ हैं? आप और हम जिस हिन्दी में बात करते हैं वह कितनी पुरानी है? आज से 200-300 वर्ष पहले क्या यह भाषा इसी स्वरूप में थी? हिन्दी की माताएँ वे भाषाएँ हैं जिन्हें ‘बोली’ कहकर ‘नीच’ करार दिया गया है। ये लोकभाषाएँ जिनकी मातृभाषाएँ हैं क्या वे निम्न स्तरीय भाषा का उपयोग करते हैं? महाशय, डायनासोर की भाँति यदि भाषाओं को विलुप्ति से बचाना है तो उन्हें बहती नदी के समान स्वच्छ जल बनाईये ना कि तालाब का सड़ा हुआ पानी। भाषाएँ देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलती हैं। इनमें राजनैतिक और ऐतिहासिक कारणों से भी परिवर्तन आते हैं। भारतेन्दु हरिशचंद्र जी जिस हिन्दी में लिखा करते थे उसमें आप नहीं लिखते हैं। तो किसकी हिन्दी ‘उच्च स्तरीय’ एवँ महँगे ‘वस्त्र आभूषणों से सुसज्जित” मानी जाए? हिन्दी की माता संस्कृत नहीं है। संस्कृत उसकी परनानी हो सकती है। प्राचीन भारत के विभिन्न जनपदों में बोली जाने वाली भाषाएँ ही उसकी माताएँ हैं। प्रभो, धनवान भाषा वह नहीं जो अधिक ‘शास्त्रीय’ है, अपितु वह है जो अनेक क्षेत्रों-संस्कृतियों की भाषाओं से आने वाले शब्दों को स्वयं में समाहित करने की क्षमता रखती है। हिन्दी में एक से अधिक भाषाओं के शब्दों का प्रयोग कर पाना भाषायी अशुद्धता नहीं अपितु एकाधिक भाषाओं का मेल कर पाने की कला है। उदाहरण के लिये मुंबईया भाषा ‘निम्न स्तरीय’ या ‘दरिद्र’ भाषा नहीं है। वह मराठी, हिन्दी, और कुछ हद तक अन्य भाषाओं का सम्मिलन है। मुंबईया भाषा ने मुंबई के विभिन्न भाषा-भाषियों को निकट लाने का पुनीत कार्य किया है। हिन्दी को ‘शास्त्रीय’ बनाए रखने के आपके प्रयास प्रशंसनीय हैं। लेकिन यही हिन्दी मानक, उच्च, आदि है ऐसा मानना कठिन है।

यदि प्रश्न शुद्धता का ही है, तो विवाद को हजारों वर्षों पूर्व ले जाइये। और हजारों वर्ष पूर्व बोली जाने वाली संस्कृत में बातें कीजिये। 100-200 साल पुरानी हिन्दी में नहीं। आज घर-घर में तुलसी ज्ञानेश्वर और तिरूवल्लूर पढ़े जाते हैं ना कि वाल्मीकि और वेद-व्यास। भाषा माध्यम है, धर्म नहीं। वर्ग विशेष ने जिस भाषा की पढ़ायी से अन्यों को वंचित रखा आज वह भाषा विलुप्तप्राय है। जिन भाषाओं के कभी स्कूल नहीं खुले वे आज भी बोली जाती हैं।

आप मुझे किसी भी वेद, षड-दर्शनों के ग्रंथों,एवँ सभी भाष्यॉ, और स्मृतियों में से कहीं भी ‘हिन्दी’ अथवा ‘हिन्दू’ शब्द का उल्लेख हो तो कृपया बताइये। जिस भाषा के लिये हम इतनी बहस कर रहे हैं उसका यह नाम भी बाहरी भाषाओं के प्रभाव से ही पड़ा है। तो शुद्धता की शुरूआत क्यों ना नाम बदलकर की जाए?”

मेरा मानना यही है कि भाषा के प्रति हमें उदारवादी होना चाहिये, भाषा के प्रति पेम सर्वथा उचित है किंतु एक सीमित शब्दावली (भले ही वह कितनी ही समृद्ध हो) के ही प्रयोग का हठ उचित नहीं है।

-हितेन्द्र

3 टिप्पणिया

  1. आपने ठीक लिखा कोई भी भाषा हमेशा एक जैसी नहीं रहती है. उसमे समय के साथ परिवर्तन होना अनिवार्य है.
    हिंदी भाषा को ले लीजिए गोस्वामी तुलसीदास के समय से लेकर तक़रीबन आज से 100 साल पहले हिंदी के साहित्य खड़ी-बोली में नहीं लिखे जाते थे बल्कि ब्रज भाषा में लिखे जाते थे.
    किसी भी भाषा का बदलना बहुत अनिवार्य है. अगर वह भाषा समय के अनुसार नहीं ढल पाती है तो उसका दुनिया से विलुप्त होना तय है.

  2. आप के स्पष्ट ज़ोरदार और प्रभावशाली शब्दों से पूर्णतया सहमत हूँ! इस विषय पर इतनी सुन्दर टिपण्णी मैंने नहीं पढ़ी है अभी तक!

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