पानी के किस्से

इन दिनों हवा में गर्मी है, और प्यास भी ज़्यादा लगा करती है। ऐसे में पानी ज़्यादा पीना पड़ता है। पर गर्मियों में पानी की कमी होती है। इसीलिए पानी के मूल्य का बोध मनुष्य को गर्मियों में ही होता है, तब वह साल भर पानी बचाने का संकल्प लेता है और हर साल वर्षा के मौसम में भूल भी जाता है कि कोइ संकल्प लिया था। ठीक वैसे ही जैसे हर परीक्षा परिणाम के बाद एक औसत दर्जे का विद्यार्थी साल भर पढ़ने का संकल्प लेता है किंतु जुलाई का महीना आते ही भूल जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऊपर जिन दो संकल्पों का उल्लेख हुआ है, दोनों ही संकल्प गर्मी के मौसम में लिये जाते हैं और बारिश के मौसम में भुला दिये जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि पढ़ाई वाला संकल्प जो भूल जाते हैं वे विद्यार्थी औसत दर्जे के होते हैं, औसत से निचले दर्जे के विद्यार्थियों को संकल्प की चिंता नहीं होती और औसत दर्जे से ऊपर के विद्यार्थियों को संकल्प की आवश्यकता नहीं होती। तो क्या पानी बचाने के मामले में भी यही बात सत्य है? क्या हम कह सकते हैं कि दुनिया में ज़्यादातर आबादी ऐसे लोगों की है जो औसत दर्जे के हैं इसीलिये संकल्प लेकर भूल जाते हैं । यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि संकल्प लेकर भूल जाना एक बात है और संकल्प तोड़ देना दूसरी बात। लेकिन इससे पहले कि मनुष्यों में दर्जे की चर्चा करते हुए हम किसी गंभीर समाजशास्त्रीय बहस में पड़ें, मैं आपको बता दूँ कि इस चिट्ठे का उद्देश्य जल संकट पर या संकल्पों के टूटने पर चर्चा करना नहीं है। मुझे तो बस याद आ रहा है कि कैसे पानी पीने के तरीके बदल चले हैं मेरे आसपास के संसार में। 

      हम रायपुर जिले की गरियाबंद तहसील के ग्राम छुरा के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे। हम यानी ग्राम छुरा की सिंचाई विभाग की कॉलोनी में रहने वाले हम-उम्र बच्चे। हमारे माता-पिता शहरी थे जिन्हें नौकरी के चलते गाँव में रहना पड़ रहा था। हम घर के अंदर शहरी और घर से बाहर देहाती थे। हमारी स्कूल सन् 1907 में बनी थी जिसमें मैंने सन् 1987 से 1991 तक पढाई की । हमारे स्कूल में पीने के पानी की कोइ व्यवस्था नहीं थी। स्कूल में पढ़ाई के बीच तीन छुट्टियाँ दी जाती थी। इनमें से एक खाने की छुट्टी थोड़ी लंबी होती थी जिसमें हम सब घर जाकर खाना खाकर वापस आते थे। वहाँ टिफ़िन लेकर जाने का कोइ रिवाज़ नहीं था। तो जब ये छुट्टियाँ होती थीं, तो हम आसपास के घरों में जाकर पानी माँगकर पीते थे। इन घरों की गृहणियाँ बड़े प्रेम से हमें पानी पिलाया करतीं। स्कूल में कोइ दो सौ से तीन सौ लड़के पढ़ते थे। सभी एक ही घर से पाने नहीं पी सकते थे, इसलिये सब अलग अलग घरों में पानी पीते, इनमें वे घर भी शामिल थे जिनके बच्चे हमारे ही स्कूल में पढ़ते थे। हम घरों के आँगन में सीधे घुस जाते और वहाँ काम कर रही महिलाओं से कहते, दाई-ओ पानी दे तो। इस पीने के पानी में और भी किस्से शामिल थे। जैसे मेरे एक दोस्त ने मुझसे एक बार कहा ओ नेहरू घर के पानी झन पिये कर, ओकर डौकी टोनही हे, तोला पानी पिया के टोनहा दिहीयानी तुम नेहरू के घर से पाने मत पिया करो, क्योंकि उसकी पत्नी टोनही है और तुमपर जादू टोना कर सकती है। लेकिन मैं नेहरू के घर से ही पानी पीना चाहता था क्योंकि उसके घर के कुँए का पानी मीठा होता था। इस समस्या का समाधान बताते हुए एक मित्र ने कहा कि जब भी उसके यहाँ पानी पियो, तो पहले थोड़ा सा पानी ज़मीन पर गिरा दो, ऐसा करने से उसका जादू टोना काम नहीं करेगा। बाद में मैंने ध्यान दिया कि अनेक बड़े बुजुर्ग लोग जहाँ भी जाते हैं, पीने से पहले थोड़ा सा पानी गिरा देते हैं।  

पानी पीना तो प्याऊ का  भी बड़ा मज़ेदार होता है। हमें गर्मियों में अक्सर बाज़ार भेजा जाता था। अब चूँकि बाज़ार एक गाँव का था, अतः छोटा था, अतः हम पैदल ही जाते। जाने से पहले ही हम यह फ़ैसला कर लेते थे कि आज कौन से प्याऊ का पानी पीना है। गर्मी के शुरूआती कुछ दिनों तक अलग अलग प्याऊ में भटकने के बाद हम उस एक प्याऊ की पहचान कर लेते जहाँ पानी अच्छा होता था। अच्छा पानी यानी ठंडा- मीठा पानी और प्याऊ में साफ़ सफ़ाई। प्याऊ में प्लास्टिक के अलग अलग रंगों के गिलास होते थे। अपने मनपसंद रंग के गिलास में पाने पीने के लिये हम दूर से ही दौड़ लगा देते। ज़्यादातर प्याऊ ऐसे थे जहाँ पानी पीने के पहले और बाद पीने वाले को ही गिलास पानी से साफ़ करना होता था। कुछ प्याऊ ऐसे भी थे जहाँ पानी पिलाने वाली महिला गिलास साफ़ कर देती और पाने पीने के बाद जूठा गिलास भी स्वयं साफ करती। ऐसे प्याऊ की इस अतिरिक्त सेवा से हम खासे खुश हो जाते थे।  

अब पुनः स्कूल का रूख़ करते हैं। प्राथमिक शाला के बाद हमने माध्यमिक शाला यानी मिडिल स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ पीने के पानी का एक ड्रम था जिसे स्कूल खुलने के वक्त एक दाई पास के हाई स्कूल के हैंडपंप से भरकर रख जाती थी। दाई स्कूल की साफ़सफ़ाई भी करती थी। प्राथमिक शाला में झाड़ू लगाने का काम विद्यार्थी अपनी अपनी कक्षा में बारी बारी से करते थे। मिडिल स्कूल में हमने गुरूजी को सर कहना सीखा। यहीं हमने पहली बार देखा कि हर विषय को अलग अलग सर पढ़ाते हैं, तो हमारा पहली बार पीरियड और डेली टाईम टेबल जैसे शब्दों से परिचय हुआ। वर्ना टाईम टेबल तो सिर्फ परीक्षा के लिये हुआ करता था। मिडिल स्कूल में एक और सुविधा थी जो प्राथमिक स्कूल से बढ़कर थी। यहाँ प्रधानपाठकजी की कुर्सी से लगा एक बटन था जिसे दबाने पर एक विद्युत घंटी बजती थी। यूँ पीरियड बदलने या छुट्टी की सूचना देने के लिये एक घंटा अलग से था। जब कभी पीरियड बदलता तो प्रधानपाठक या उनकी गैरमौजूदगी में कोइ अन्य शिक्षक बटन दबाते और पास ही जो कक्षा छठवीं(अ) का कमरा था वहाँ के विद्यार्थी दौड़ लगाते कि सर क्या काम है? कभी कभी सरजी घंटा इसलिये बजाते कि उन्हें पानी पीना होता था। ऐसे में जो बच्चा कार्यालय तक पहले पहुँचता, उसे सभी शिक्षकों को पानी पिलाने का गौरव प्राप्त होता था। इस काम में सभी को अतीव आनंद प्राप्त होता था। मिडिल स्कूल के पास स्वयं का कोइ हैडपंप नहीं था। आगे चलकर हमारे गाँव के सरपंच जो हमारे ही स्कूल से पढ़े थे, जब विधायक बन गये तो हमारे प्रधानपाठक के अनुरोध पर उन्होंने एक हैंडपंप हमारे स्कूल के पास ही लगवा दिया था। कुछ साल बाद मुझे पता चला कि प्राथमिक शाला के सामने भी एक हैंडपंप लग चुका था। 

मिडिल स्कूल की पढाई के बाद हमारा परिवार शहर आ गया। यहाँ के स्कूल में मैंने देखा कि पीने के पानी का एक अलग ही कमरा था जिसमें अनेक नल एक कतार में लगे हुए थे। ये नल एक बड़े से वाटर फ़िल्टर से जुड़े थे। पानी के कमरे की दीवार पर किसी ने कोयले से लिख रखा था यहाँ ज़ीरो-बी का पानी मुफ़्त मिलता है 

पानी तो मिनरल वाटर की बोतल से भी पिया जाता है। मैंने पहली बार मिनरल वाटर का पानी तब पिया जब हमारे मिडिल स्कूल की स्काउट टीम के साथ मैं कलकत्ता गया था। तब मैंने और मेरे मित्र ने कौतुहलवश एक बोतल खरीदी थी। हमारे साथ गये प्रधानपाठक ने हमें हिदायत दी थी कि हम इसे किसी और को न दें, और रोज़ इसे थोड़ा-थोड़ा पियें क्योंकि इसमें सेहत के लिये लाभकारी खनिज-लवण (मिनरल्स) होते हैं। और हमने उनकी बात मानी। अब तो लोग सफ़र में वज़नी थर्मस नहीं ले जाते और मिनरल वाटर की बोतल पर ही भरोसा करते हैं। मिनरल वाटर अब बोतल के अलावा पाऊच में भी मिला करता है। पानी-पाऊच का विशेष इस्तेमाल मैंने राजनेताओं की रैलियों और संतों के प्रवचनों में देखा जहाँ आई या लायी गयी भीड़ में इसे निःशुल्क वितरित किया जाता है। 

तो ये वो अनेक बाते हैं जो पानी पीने से जुड़ी हैं। पानी पीने का तरीका चाहे जो हो, जो प्यासा है उसके लिये तो पानी अमृत है। तो जो प्यासा है और जिसके लिये पानी अमृत है, उससे यह अपेक्षा अवश्य की जानी चाहिये कि वह पानी बचाने का संकल्प ले। किंतु जो प्यासा है और पानी बचाने का संकल्प लेता है वह इस संकल्प को भूल न जाए इस बात की कितनी संभावनाएँ हैं? खैर यह इस पर भी निर्भर करता है कि संकल्प लेने वाला औसत दर्जे का मनुष्य है या किसी और दर्जे का। तो आपका दर्जा क्या है? और आपका संकल्प क्या है?

3 टिप्पणिया

  1. Gr8…to read this article… बहुत ही विश्लेषित रुप में आपने अपनी बात रखी है जो सत्य ही है…लेकिन इस सोंच के कारण यह अलग भी है…बधाई!!!

  2. पानी का विषय चुन कर एक अच्छा लेख लिखा है।बधाई।

  3. जल ही जीवन का आधार है
    आपका लेख अच्छा है अगर समय आपके के पास हो तो कुछ लेख हमारे लिए भी लिख देना हम उसे प्रकाशित करेंगे मैं भास्कर में डिजाइनर हूं हमारे यहां परिषिश्ट निकलते है हम उसे प्रकाशित कर सकते है सहयोग की अपेक्षा के साथ आरिफ खान 98264 89906

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