साहेब की डायरी से

{मैं फेसबुक पर #साहेबकीडायरीसे शृंखला के अंतर्गत जो व्यंग्य लिख रहा हूँ उसे यहाँ संकलित किया है|  यह पृष्ठ डायरी के नए पन्नों के साथ अपडेट होता रहेगा}

१८नवम्बर २०१७

“बत्रा सर कहते हैं कि हम राम की भक्ति अवश्य करें किन्तु राजनीति कृष्ण नीति से करें। महाभारत युद्ध में कृष्ण जी ने अर्जुन को जयद्रथ का वध करने में सहायता देने के लिए सूर्यास्त का समय बदल दिया था। यह उनकी माया थी। अब मैंने भी इसी नीति का अनुसरण करते हुए संसद के शीतकालीन सत्र का समय बदल दिया है। इससे अमित और विजय को गुजरात चुनाव में अधिक समय दे पाऊंगा। मुझमें और श्रीकृष्ण में कितनी समानताएं हैं!

कृष्ण जी को रणछोड़ कहा जाता है। एक बार युद्ध में अत्यधिक रक्तपात होता देखकर भगवान युद्धभूमि से पलायन कर गए थे। इसीलिए उन्हें रणछोड़ नाम दिया गया। यह भी उनकी माया ही है। हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश ने गुजरात में जो कुप्रचार किया है और राहुल जी जो सफ़लता मिल रही है, सोच रहा हूँ क्यों न कृष्ण नीति का पालन करते हुए मैं भी रणछोड़ बन जाऊं? चुनाव जीते तो श्रेय मेरा, नहीं जीते तो दोष विजय और अमित का।

जो भी हो 2002 के बाद से चुनावों में इतना कठिन समय नहीं देखा। पर यह भी एक दैवीय योग है। ईश्वर परीक्षा ले रहा है। मैं भी परीक्षा के लिए तैयार हूँ। चुनाव आयोग, ईवीएम, अमित की तिकड़में, सीडी आदि की मदद से इस परीक्षा में भी सफ़लता मिलेगी यही आशा है।

हे माखनचोर, हे रणछोड़, बचा लो इस बार!”

#साहेब_की_डायरी_से

 

१५ मार्च २०१७

“सब ओर मैं ही मैं हूँ,
मैं ही लखनऊ, मैं ही इम्फाल
मैं ही पंजिम, मैं ही देहरादून
मैं बनारस, मैं अयोध्या
यह मेरी ही लीला है
मैं सर्वत्र व्याप्त परम तत्व हूँ
यह विश्व एक मिथ्या है
इस मिथ्या विश्व की माया
का सर्जक भी मैं हूँ।
मेरा सब होना ही एकात्म मानववाद है।
-ग्यारह मार्च 2017
– #साहेब_की_डायरी_से

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१४ जनवरी २९१७

“दौड़ने में मेरा कोई मुकाबला नहीं। अब उर्जित ने भी दौड़ लगा दी। सुना कि पत्रकारों से बचने के लिए वह महात्मा मंदिर की दो-दो सीढियां लांघकर भाग गया। यह जानकर अच्छा लगा कि उर्जित शारीरिक रूप से स्वस्थ है। वरना यहाँ गडकरी जी को मैं बोल-बोलकर थक गया हूँ कि आप प्रतिदिन थोड़ा टहला कीजिए। मैं तो रोज़ योग करता हूँ। हालांकि उस दिन मुझे योग का त्याग करना पड़ा क्योंकि बा से मिलना था। बा का आशीर्वाद मिला, भले ही एक दिन योग न हुआ। लेकिन अब न जाने राहुल गांधी को कहाँ से मालूम हो गया कि मैं ठीक से पद्मासन नहीं कर पाता। अरे भाई! क्या पद्मासन ही योग है? मैं कम से कम इतना योग तो कर ही लेता हूँ कि भविष्य में यदि मुझे पत्रकारों से भागना पड़ा तो मैं उर्जित की अपेक्षा कहीं तीव्र गति से दौड़ लगा दूंगा।

वैसे ये समझ नहीं आया कि राहुल जी इतना अच्छा भाषण कैसे देने लगे। लगता है बत्रा सर आजकल उन्हें एक्स्ट्रा ट्यूशन दे रहे हैं।”

#साहेब_की_डायरी_से

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३ जनवरी २०१७

“कभी-कभी लगता है कि मैं समय से आगे चल रहा हूँ. आने वाले समय में जो होगा उसका भान हो जाता है मुझे पहले से. यह हमेशा सही नहीं होता पर प्रायः सही ही होता है. अब जैसे कि बिहार के समय मैंने अमित से कह दिया था कि हम नहीं जीतेंगे, तब अमित उत्साह में था और नहीं माना, लेकिन वही हुआ जो मैंने सोचा था. अब उत्तर प्रदेश में मुझे ऐसा लग रहा है कि हम पूर्ण बहुमत प्राप्त करेंगे.

लेकिन इस पूर्वाभास हो जाने के कारण समस्या यह है कि मुझे फिर प्रयास करने में थोड़ा आलस आने लगता है. अब जब परिणाम मालूम ही हैं तो मैं आवश्यकता से अधिक कार्य क्यों करूँ?

नोटबंदी का जो मेरा मास्टरस्ट्रोक रहा, उसका निर्णय लेते समय भी मुझे ऐसा अहसास हुआ था कि यह सफ़ल होगा ही. जो हुआ सो हुआ, और जो न हुआ सो जुआ! आज जनता खुश है, भ्रष्टाचारी डरे हुए हैं. क्रियान्वयन भले ही अच्छा न हुआ हो, मेरा सन्देश जनता तक पहुँच गया है.

मुझे मालूम है कि राष्ट्रनिर्माण का यह पथ एकांगी है. इस पथ पर अंत तक मुझे ही चलना है. अमित, अरुण, स्मृति जी इत्यादि सभी यात्रा के साथी मात्र हैं, अटल-अकेला यात्री तो मैं ही हूँ. यश लूटने के लिए सभी साथ होते हैं, जब विष पीना हो तो महादेव अकेले ही हुए हैं. खैर, स्मृति जी पूछ रही थीं कि मेरा नए वर्ष का संकल्प क्या है, उन्हें तो नहीं लेकिन डायरी, तुम्हें जरुर बाताउंगा कि मेरा संकल्प है कि कर्तव्य पथ पर आगे से अपनी चुनी हुई दिशा पर ही चलूँगा और सलाहकारों के सुझाए विचलनों पर ध्यान नहीं दूंगा. भविष्य मेरी राह देख रहा है. भारत की नयी सुबह आने को है.”

#साहेब_की_डायरी_से

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25दिसंबर 2016

“कैसे एक वर्ष बीत गया और पता भी नहीं चला। पिछले साल इसी दिन मैं लाहौर की अपनी ऐतिहासिक यात्रा पर गया था। उस दिन नवाज़ भाई का भी बर्थडे था और अटल जी का भी। नवाज़ भाई ने क्या बढ़िया केक खिलाया था! अब लोग कहते हैं मैं बिन बुलाए चला गया! कैसे लोग हैं ये? अरे भाई अपनों के यहां भी कोई बुलव्वे से जाता है भला? नवाज़ भाई अपने हैं, लाहौर अपना है और पूरा अखंड भारत अपना है! मैं लाहौर गया था काबुल से। यानी अखंड भारत के कांधार प्रदेश से। आगे चलकर जब मैं पूरे अखंड भारत का प्रधानमंत्री बनूंगा तो नवाज़ भाई को पश्चिम पंजाब का मुख्यमंत्री बनवा दूंगा।

ख़ैर, एक साल बाद हालात उतने अच्छे नहीं। आज सुबह स्मृति जी क्रिसमस का केक लेकर आयी थीं। लेकिन खाने का जी नहीं हुआ। अरुण और उर्जित ने जो नोटबंदी के मेरे मास्टरस्ट्रोक की मिट्टी पलीद की है, उसके बाद मुझे ही सब संभालना पड़ रहा है। कल मुम्बई में उद्धव भाई मुझे आँखे दिखा रहे थे। वहीं पूना में शरद पवार जी ऐसे मुस्कुरा रहे थे मानो चिढ़ा रहे हों। गलती करें अरुण और उर्जित, भुगतना पड़े मुझको! लगता है बड़ा फैसला लेते हुए सुब्रह्मण्यम स्वामी जी को वित्त मंत्रालय दे दूं तो हालात शायद संभलें। लेकिन फ़िर अरुण का और मेरा संघर्षों का साथ है, वह नाराज़ हो जाएगा। क्या करूँ? किससे सलाह लूँ? इस मामले पर तो बत्रा सर भी कुछ नहीं बता सकते। बड़ी मुश्किल है जी।”

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23-December-2016

***साहेब की डायरी रिटर्न्स***
” बचपन में बा कहती थी, नरु, आदमी सफ़लता से अधिक असफ़लता से सीखता है। बत्रा सर कहते हैं कि इतिहास शासकों की महानता का पूर्ण आकलन करता है, एक या दो फ़ैसलों से उनकी महानता पर फ़र्क नहीं पड़ता। दोनों कितनी अच्छी बातें हैं! अब नोटबंदी का क्रांतिकारी फ़ैसला लिया मैंने, आइडिया था मेरा, लेकिन अरुण और उर्जित उसे ठीक से क्रियान्वित नहीं कर पाए, तो शिवजी की तरह इस मंथन का विष मुझे पीना भी पड़ा तो शिव तो मैं ही हुआ ना! इस असफ़ल किन्तु महान प्रयास से भी मैंने कुछ सीख लिया। मैंने मंच पर नृत्य की शैली में हाव-भाव बनाना सीखा, मैंने राहुल जी की नकल भी उतार ली, कितना हँस रहे थे बनारस के लोग उस पर! इन नयी सीखों से मेरी भाषण कला में जो नया निखार आया है, उसे मैं अगले विदेश दौरे में किसी विशाल एनआरआई सभा में ज़रूर आजमाउंगा। मैंने अब फ़ैसला कर लिया है कि मैं हास्य पर ही क़ायम रहूँगा। बड़ा नेता होने के नाते मेरा उग्र भाषण देना अब शोभा नहीं देता। महान शासक वही है जो बड़ी से बड़ी घटना को हंसकर भूल जाए और जनता को भी हंसा दे। हंसी सारी तकलीफें भुला देती है। जनता की ख़ातिर मुझे अगले कुछ दिन तो ज़रूर हंसना चाहिए।”
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23-January-2016

“आखिर मुझे ही सब संभालना पड़ता है। अरे भाई, काम मेरा कम नहीं कर सकते तो कम से कम बढ़ाओ मत! पठानकोट मैं देखूँ, इस्लामाबाद मैं देखूँ, सारा बाहर का मैं ही देखूँ, तुम लोग कम से कम हैदराबाद तो संभाल लेते!

आखिरकार मुझे ही लखनऊ से हैदराबाद संभालना पड़ा। ये लोग समझते नहीं कि इमोशनल ऐक्ट में कितना रिस्क है! फेल हो गए तो पूरी स्टोरी आपकी गयी हाथ से। अभी कुछ दिन पहले बराक के साथ भी यही हुआ, हालांकि ऐक्ट उसका ठीक ही था। रोहित वाली स्टोरी तो खैर मैंने सेव कर ली, लेकिन पीआर वालों का कहना है कि इमोशनल ऐक्ट का अति उपयोग किया तो इनइफ़ेक्टिव हो जाएगा।

ये लोग स्मृति जी को बहुत परेशान कर रहे हैं, खासकर कम्युनिस्ट लोग, पर स्मृति जी इन समस्याओं से निपटने में सक्षम हैं ऐसा मेरा विश्वास है। पुणे और मद्रास उन्होंने अच्छी तरह हैंडल किया है, हैदराबाद भी संभल जाएगा। हालांकि नुकसान जो हो गया सो तो हो ही गया।

ऐसे क्षणों में में मुझे गुजरात के दिन याद आते हैं, क्या समय था जी! केस की बात अगर छोड़ दें तो कोई आवाज़ भी नहीं उठा सकता था। आडवाणी जी सही कहते थे, दिल्ली में जीवन आसान नहीं है।”
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22-November-2105

“अब मलेशिया वालों ने इतने प्रेम से अनुरोध किया कि टालता भी तो कैसे? पहन ली हरी कमीज़। आजकल दिन ऐसे चल रहे हैं कि मन कहीँ लगता नहीं। यहां मलेशिया में लोग मेरे साथ सेल्फ़ी खिंचवाने के लिए बेताब हैं वहां बिहार में न जाने क्यों धोखा हो गया? खैर, मुझे स्मृति जी का व्हॉट्स एप आया कि इस हरी कमीज़ वाली तस्वीर को ही प्रोफाइल पिक बना लूँ। उन्हें यह तस्वीर अच्छी लगी। मुझे भी कभी याद नहीं कि हरा रंग मेरे इतने क़रीब कभी आया हो। जब से लंदन से लौटा हूँ सोच रहा हूँ रानी साहिबा को भी अपने व्हॉट्स एप ग्रुप में शामिल कर लूँ। वो भी मेरी प्रोफाइल पिक देखेंगी तो कितना खुश होंगी। यह बिहार मेरे दिमाग से निकल जाए तो काम पर ध्यान लगाऊं। लंदन हो या क्वालालंपुर दिमाग से पटना निकल नहीं रहा। स्मृति जी किसी फ़िल्म का वो गीत सुना रही थीं चुनाव परिणाम के दिन। मुझे और अमित को अब वह गीत अच्छा लगने लगा है। अमित तो कह रहा था अगले साल गरबे में यही गाना बजवाएगा।

फ्रस्टियाओ नहीं मूरा,नर्भासाओ नहीं मूरा,
एनीटाइम मूडवा को अप्सेटाओ नहीं मूरा,
जो भी रोंग्वा है उसको सेट राईटवा करो जी,
नहीं लूजिये जी होप, थोडा फाईटवा करो जी।

इतने सारे पद्मश्री जो लौट आए हैं। उनमें से एक इस गीत के लेखक को देना चाहिए।”
#साहेब_की_डायरी_से

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11 October 2015

“सब अच्छा चल रहा था। स्क्रिप्ट पर काम ठीक से हो रहा था। एक दो लोगों ने पुरस्कार भी लौटा दिए थे। लोग मुझे मौनी बाबा बोलने लगे थे। पीआर वालों ने कहा था आप कुछ मत बोलिएगा, उससे कोर कॉन्स्टीट्वेंसी खुश रहेगा। लेकिन ये प्रणव बाबू ने सब खेल बिगाड़ दिया। अब राष्ट्रपति ने बोल दिया तो मुझे बोलना ही पड़ता। वह तो भला हो बत्रा सर का। उन्होंने कहा कि जैसे पूजा में पंडित अपनी तरफ़ से संकल्प बोल देता है, वैसे ही आप समझ लो प्रणव बाबू ने बोल दिया। तो मैंने भी फिर कह दिया कि भाई जो प्रणव बाबू नेकहा है उसे सुन लो। मतलब जैसे कि अश्वत्थामा मर गया ये बोल भी दिया नहीं भी बोला। सूर्यग्रहण करवा दिया लेकिन सूर्यास्त भी नहीं हुआ। बालीवध भी हो गया, मर्यादा भी बच गयी। भई वाह! हमारी संस्कृति में ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जो ऐसी कठिन परिस्थितियों में काम आते हैं। महान है हमारी संस्कृति! न बोलना हो या झूठ बोलना हो तो उसका भी उपाय कर गए हैं हमारे ऋषि।

खैर अब तो बात जम्मू-कश्मीर तक चली गयी है। स्क्रिप्ट पर काम ठीक से चल रहा है। मैं बहुत खुश हूँ।” ‪#‎साहेब_की_डायरी_से‬

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24 September 2015

“पहले सिर्फ़ लड़ना होता था तो हिंदी बोलता था। जब से दिल्ली आया हूँ, हिंदी में ही सोचना बोलना पड़ता है। उलटे जब ग़ुस्सा आता है तब गुजराती में बोलने का मन करता है। पर बराक तो गुजराती समझता नहीं! समझता तो उसे सुनाता कि मुझे कितना बुरा लगा। न तो वह मुझे लेने विमानतल आया, न ही शी भाई की तरह 21 तोपों की सलामी दी और न ही पोप की तरह गर्मजोशी से स्वागत किया। भई यह भी कोई दोस्ती हुई? न आते विमानतल, कम से कम व्हाइट हाउस पर चाय के लिए तो बुलाते! ऊपर से बड़ी मुश्किल से पटेलों को मनाया कि वह काले झंडे मुझे न दिखाएँ। फिर भी बिना स्वागत किरकिरी तो होनी ही थी। उस पर दुर्दैव यह कि मेरे ही होटल में नवाज भी रुके हैं! यानी इतना सस्ता होटल किया है कि जहां पाकिस्तानी रुकते हैं वहां मैं रुकूं? इसके बारे में वापस जाकर देखना होगा।
वह तो भला हो पीआर वालों का जिन्होंने फेसबुक और गूगल के दफ्तरों में कार्यक्रम रखवा दिया। कम से सोशल मीडिया पर एक्टिविटी तो बनी रहेगी। इन विदेश मंत्रालय वालों से तो मेरे पीआर वाले ही अच्छे। आने वाले इतिहास में बत्रा सर जरूर इन विदेश मंत्रालय वालों की करतूतें लिखें, ऐसा मैं उनसे अनुरोध करूँगा।” ‪#‎साहेब_की_डायरी_से‬

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9th July 2015

“घुमक्कड़ी की भी श्रेणियाँ होती हैं। सबसे निम्न श्रेणी की घुमक्कड़ी जाति आधारित होती है जो मेरा नोमेड ट्रायबल किया करता है। उसके बाद ये साधू और फ़क़ीरों भिखमंगों की घुमक्कड़ी होती है। उसके ऊपर वह घुमक्कड़ी होती है जो मेरा स्वयंसेवक करता है। लेकिन स्वयंसेवक अपनी इच्छा से नहीं घूमता, वह संघ के आदेश पर काम करता है। उससे भी उच्च स्तर की घुमक्कड़ी वह होती है जो हिप्पी लोग किया करते थे। वो किसी से अनुमति नहीं लिया करते। उससे भी उच्च स्तर होता है जो मेरे गुजराती भाई घुमक्कड़ी करते हैं। सारी दुनिया का पॅकेज टूर खरीदकर थेपला पोटली में बांधकर घूमते हैं। लेकिन मैं इसे भी इतना उच्च नहीं मानता क्योंकि यह खुद के पैसों से की जाती है।

तृतीय श्रेणी के घुमक्कड़ होते हैं सरकारी अधिकारी, राज्य सरकारों के मंत्री व निगम-मंडलों के अध्यक्ष इत्यादि। ये जनता के पैसों पर घूमते हैं। लेकिन इन्हें अपनी यात्रा के लिए वित्त विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है। ये लोग बाहर जाएं तो वहां की सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लौट के आएं तो क्या किया कोई नहीं पूछता।

द्वितीय श्रेणी के घुमक्कड़ होते हैं केंद्र में कैबिनेट के मंत्री व राज्यों के मुख्यमंत्री, साथ ही देश के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति। इन सबकी यात्राएं भी जनता के पैसे पर तो होती ही हैं साथ ही इनकी यात्राओं को ठीकठाक कवरेज मिल जाता है। लेकिन ये भी फिर चाहे विदेश मंत्री क्यों न हों, यात्रा पर तभी जाते हैं जब मेरी, अर्थात, प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति या इच्छा होती है। इस श्रेणी में सबसे महत्वपूर्ण हैं राज्यों के मुख्यमंत्री। यदि किसी देश ने किसी मुख्यमंत्री का वीजा रोक दिया तो यह मुख्यमंत्री के आक्रोश का कारण बन सकता है। ऐसे में वह मुख्यमंत्री बिना वीजा के ससम्मान उस देश में यात्रा को कृतसंकल्प हो उठता है। ऐसे मुख्यमंत्री फिर अपने संकल्प से देश के सर्वोच्च सिंहासन को हिला देते हैं। इतिहास गवाह है अब तक देश में ऐसा केवल और केवल एक ही प्रकरण हुआ है। खैर।

प्रथम श्रेणी की घुमक्कड़ी वह है जो मैं करता हूं। यानी जो प्रधानमंत्री करता है। जैसी मर्जी हो वैसा कार्यक्रम बनाओ। जाने के तीन महीने पहले से पीआर चलाओ। जिस देश में जाओ वहां के गुजराती भाइयों को पहले से मोटिवेट करो ताकि वहां जाओ तो मोदी-मोदी के नारे लगाएं। वहां के राष्ट्रप्रमुख के साथ सेल्फ़ी खिंचवाओ। उसे बराक जैसे प्रथम नाम से संबोधित करो। वहां के दर्शनीय स्थलों पर घूमो और उसका लाइव टेलीकास्ट करो। सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाओ। भारतीय प्रवासियों को भाषण दो। उस देश के साथ अपना गहरा और पुराना नाता साबित करो। गौतम या मोटा भाई की डील करवा दो। साथ ही वहां गांधी जी की प्रतिमा पर फूल चढ़ा दो। लौटो तो सात दिन तक अखबारों में कॉलम और चैनलों पे चर्चा। और आते ही अगली यात्रा का ऐलान। यह होती है प्रथम श्रेणी की घुमक्कड़ी। इतिहास गवाह है कि यह घुमक्कड़ी सिर्फ एक साल पुरानी है। बत्रा सर को कहना होगा कि इसे इतिहास की किताब में लिख लें। कहीं छूट न जाए।”

‪#‎साहेब_की_डायरी_से‬

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३ अप्रैल २०१५
“विवाद किसके यहां नहीं होते जी? फर्क तो संस्कारों में होता है कि कौन विवाद को कैसे संभालता है। अब ये जो आम आदमी पार्टी वाले हैं ये सब नक्सली, कम्यूनिस्टों का जमावड़ा हैं। इनकी पार्टी भी टूट ही गयी। बत्रा सर बता रहे थे कि इन लोगों में रूस के समय में भी लड़ाइयां थी, कोई स्टालिन है उसकी किसी ट्रॉटस्की से लड़ाई हो गयी थी। फिर बोरिस येल्तसिन साहब की गोर्बाच्योव से नहीं बनी वह तो मुझे भी याद है। समाजवादियों के भी झगड़े हैं। भारत के कम्यूनिस्ट भी कई टुकड़े हो चुके हैं। इनके संस्कार ही ऐसे हैं कि विवाद हुआ नहीं कि रास्ते अलग, रिश्ते ख़त्म।

एक हमारी हिन्दू संस्कृति है। कुछ भी विवाद हो जाए परिवार एक रहना चाहिए। अब हमारे यहां तो ये है कि जो बुजुर्ग हो जाए और ज्यादा हस्तक्षेप करे तो उसको प्यार से दुकान से हटाओ और घर के आँगन में एक खटिया दे दो हुक्के के साथ। फिर जो है हुक्का पियो, आराम से रोटी खाओ, बच्चों-औरतों पे चिढ़ो और रात को खांसो भी, ताकि चौकीदारी भी हो जाए घर की। इधर नयी पीढ़ी आराम से गल्ले पे बैठे और दुकान चलाए। भाजपा भी तो हिन्दू संस्कृति का आईना है। इसलिए मैंने आडवाणी जी के लिए मार्गदर्शक मंडल बनवा दिया। अब मंडल हो गया खटिया और उनका वो ब्लॉग हो गया हुक्का। करो आराम। पार्टी भी नहीं टूटी और देश को मेरे जैसा युवा नेतृत्व भी मिल गया।

और उधर ये कम्यूनिस्ट। सब संस्कारों का फ़र्क है जी।”
– #साहेबकीडायरीसे

२७ मार्च २०१५
“आज जनता बहुत निराश है। भारतीय क्रिकेट टीम सेमीफाइनल मैच में हर गयी। मैं भी निराश हूँ। चाहता हूँ जनता के इस दुःख को दूर करूं। लेकिन क्या करूं? मैं अच्छी गेंदबाज़ी कर सकता हूँ। लोग कहते हैं मैं फेंकने की कला में दक्ष हूँ। अगले विश्वकप में अगर मेरे नेतृत्व में गेंदबाजी की जाए तो अच्छे परिणाम आ सकते हैं। अमित बल्लेबाज़ी कर लेगा, और साथ ही कुछ टीमों को मैनेज कर लेगा। बाबा रामदेव को फिटनेस कोच बना दिया जाय। नवजोत भी नाराज चल रहा है, उसे मुख्य प्रशिक्षक बना देते हैं। मैनेज करने में अगर आस्ट्रेलिया की टीम न माने तो मैं टोनी से बात कर लूंगा। नवाज तो खैर अपना ही भाई है। बाकी जो बचे वह पवार साहब संभाल ही लेंगे।

आज ही आईटी सेल को कहता हूँ कि वे मिशन 2019 के नाम से वेबसाइट, ट्विटर हैंडल, हैशटैग आदि शुरू कर दें।” #साहेबकीडायरीसे

२३ मार्च २०१५

“पिछले कुछ महीनों में मैने बहुत से नए दोस्त बनाए हैं। बराक, टोनी, शी, नवाज आदि। इनमें बराक मुझे सबसे अधिक प्रिय है। जब बराक भारत आया तो हमने ढेर सारी बातें की। एक समस्या जो हम दोनों को सामान रूप से परेशान किए है उस पर तो काफ़ी लंबी चर्चा हुई। वह समस्या है हमारे आधिकारिक निवासों में खानपान की। हालांकि मैं अपनी समस्या बराक को ठीक से समझा नहीं पाया, क्योंकि मुझे तो पश्चिमी खानपान की जानकारी है, लेकिन बराक को गुजराती भोजन के बारे में नहीं मालूम। फिर भी बराक इतना समझ गया कि मेरी समस्या क्या है।

ये सात रेसकोर्स के कर्मचारी भी अजीब हैं। खांडवी और पास्ता में फर्क क्या है इनको नहीं पता। फर्क तो खम्मण और ढोकले में भी होता है पर चलो वह तो अधिकाँश अगुजरातियों को नहीं पता। लेकिन थेपले की जगह परांठा बना देना? यह तो ज्यादती है भाई! थेपला, थेपला होता है परांठा, परांठा होता है। नमकीन मंगाता हूँ गुजराती ये हल्दीराम का ला देते हैं। अरे कितने ही विमान अमदावाद से आते हैं दिल्ली, क्या जाता है मंगवा लेने में? चाहें तो जसुबेन का पिज़्ज़ा भी मंगवा लें! मैं नहीं खाता लेकिन अमित और नितिन को तो खिला सकते हैं!

खैर बराक कह रहा था कि उसकी समस्या फिर भी नियंत्रण में है क्योंकि मिशेलबेन बहुत कुछ संभाल लेती हैं।”
‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

२० मार्च २०१५
“मुझे अकेले में किस तरह समय व्यतीत करना अच्छा लगता है? यह वह प्रश्न है जो हर एक पत्रकार और पुस्तक लेखक मुझसे पूछता है| स्कूल-कॉलेज के बच्चे भी यही पूछा करते हैं| मुझे इस प्रश्न के उत्तर को यहाँ डायरी में लिख लेना चाहिए| ताकि जब भी आवश्यकता पड़े एक जैसा उत्तर दिया जा सके|

तो मुझे अकेले में सबसे अधिक प्रिय कार्य लगता है आईने के सामने बैठना| चाहूं तो मैं घंटों बिना थके आईने के सामने बैठ सकता हूँ| ऐसा करना मुझे ऊर्जा देता है| आईने के सामने बैठने से मुझे मानसिक शान्ति का भी अनुभव मिलता है और बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाने के लिए प्रेरणा भी मिलती है| एक और कार्य जो मुझे अकेले में अच्छा लगता है वह है गीत गुनगुनाना| एक हिन्दी गीत जो मैं प्रायः गुनगुनाया करता हूँ वह है ‘मेरे अपने’ फिल्म का किशोर कुमार जी का गाया हुआ “कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों”| यह मुझे इसलिए भी प्रिय है कि इस फिल्म के दोनों प्रमुख अभिनेता विनोद जी व शत्रुघ्न जी मेरी भाजपा से सांसद हैं| दुसरा गीत जो मैं आईने के सामने बैठकर अक्सर मन ही मन गाया करता हूँ वह है “आईने के सौ टुकड़े कर के हमने देखे हैं| एक में भी तन्हा थे, सौ में भी अकेले हैं”| इस गीत की यह पंक्तियाँ भी अच्छी हैं – “जिन्दगी की राहों में, लोग हमसे खेले हैं…एक में भी तन्हा थे…सौ में भी अकेले हैं”|

अब लिखना बंद करना होगा| वह गीत फिर मेरे अंतर्मन में गूँज रहा है, जाकर आईने के सामने बैठकर गाने का मन कर रहा है….”खोयी-खोयी आँखों में आंसुओं के मेले हैं…एक में भी तन्हा थे, सौ में भी अकेले हैं, सौ में भी अकेले हैं” लगता है जैसे मेरे लिए ही बना है यह गीत! कुमार सानू जी को भी कोई पद्म पुरस्कार देना ही चाहिए|” – #साहेबकीडायरीसे

१७ मार्च २०१५
“ना, ना, ना| ये गलत बात है और मुझे बिलकुल पसंद नहीं आयी| आईटी सेल वाले बता रहे थे कि सोशल मीडिया पर उत्साही जनता ने १ अप्रैल को मोदी दिवस मनाने का निर्णय लिया है| अरे भई, एक अप्रैल पूज्य हेडगेवार जी का जन्मदिवस है और हेडगेवार दिवस के रूप में ही मनाया जाना चाहिए| मोदी आज जो भी है पूज्य हेडगेवार जी के कारण है| इसलिए मनाना है तो हेडगेवार दिवस मनाओ, मैं भी ट्वीट करूंगा आपके हैशटैग पर| इतना ट्रेंड किया जाय कि कम्यूनिस्टों का मूर्ख दिवस लोग भूल जाएं और केवल हमारा हेडगेवार दिवस याद रहे|

वैसे मैंने एक अप्रैल को मोदी दिवस मनाने का कारण पूछा तो आईटी सेल वाले कह रहे थे कि उस दिन से नया वित्तीय वर्ष शुरू होता है और मैंने जो अर्थव्यवस्था में क्रान्ति लाई है उससे भाव-विभोर होकर जनता ऐसा करना चाहती है| देश की जनता भी ना, मुझे कितना प्रेम करती है|” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬


१६ मार्च २०१५

“अखण्ड भारत, अखण्ड भारत, जब देखो तब पूछने चले आते हैं कि अखण्ड भारत कब बनाओगे? अरे अखण्ड भारत कोई थेपला है जो मैं गांधीनगर से पोटली में बाँध लाया हूँ और इन्हें झण्डेवालां में जाकर दे दूंगा कि लो भाऊ, खा लो अपना अखण्ड भारत?

अरे भाई बैद्धिक में बोलना आसान है, सरकार में आकर देखो तो मालूम होता है व्यावहारिक दिक्कतें क्या हैं। पूरे पच्चीस वर्ष लगेंगे अखण्ड भारत बनाने में ऐसा मेरा हिसाब है। उसके पहले विकास लाना है, फिर लुक ईस्ट पॉलिसी है, फिर हिन्द महासागर के देशों को सेट करना है। उसके बाद ईरान को पटाना पड़ेगा तब जाकर अमेरिका और चीन राजी होंगे, और तब ना मैं पाकिस्तान पर चढ़ाई करूँगा? आपकी शाखा की लाठी तो नहीं चलाती है सेना, तो मनोहर को भी समय देना होगा कि वह हथियार, जहाज, टैंक खरीदे।

तो मेरा काम है इतना सब अगले पच्चीस साल में करूँ। इनका काम है ये देखना कि उसके लिए मैं दिल्ली में निर्बाध पच्चीस वर्ष बना रहूँ। इनको उसी पे ध्यान देना चाहिए। फिर एक दिन बन जाए अखण्ड भारत तो लगाओ लाहौर में शाखा, करो कांधार में घर वापसी, बुलाओ पेशावर में प्रतिनिधि सभा।” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

१५ मार्च २०१५
“युवाओं को चाहिए कि जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करें और फिर उसे प्राप्त करने के लिए उस लक्ष्य का पीछा करें। जब तक लक्ष्य पूरी तरह आपका न हो जाए उसे आँखों से ओझल न होने दें बस पीछा करें और पीछा करते रहें। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मैं लक्ष्यों का पीछा करने के लिए पूरी ताकत झोंक दिया करता था। जरूरत पड़े तो अपने गृहमंत्री सहित पूरी की पूरी एटीएस उस लक्ष्य के पीछे लगा दिया करता था।

टीप: यह सुविचार मैंने स्मृति जी के अनुरोध पर लिखा है। वो चाहती हैं कि मेरे प्रेरक विचारों का एक संकलन पुस्तक के रूप में युवाओं में निःशुल्क वितरित किया जाय। पुस्तक का नाम ज्ञान के मोती होगा। पर मोती क्यों! ज्ञान के मोदी क्यों नहीं?” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

१४ मार्च २०१५ 
“एक अप्रैल को संघ के संस्थापक पूज्य हेडगेवार जी का जन्मदिन है| उनके जन्मदिन को कम्यूनिस्टों के द्वारा साजिश के तहत मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है| पूज्य डॉक्टर साहेब तो बुद्धिमता और विद्वत्त्ता की प्रतिमूर्ति थे| इस दिन कार्यक्रम तो दिल्ली में भी होंगे और इस बार तो धूमधाम से ही होंगे| लेकिन मुझे इस दिन नागपुर में होना चाहिए| नागपुर ही मेरे लिए काशी-बनारस है, पूज्य हेडगेवार जी बाबा विश्वनाथ समान हैं|

लोकसभा चुनाव के समय मुझे नागपुर से प्रतिनिधित्व लेने का मन था| इससे संघ के स्वयंसेवकों में बड़ा अच्छा संदेश जाता| लेकिन नितिन को भी आना था सो वह हो न सका| स्मृति जी से बात करता हूँ| एक अप्रैल को नागपुर के सारे स्कूली बच्चों को रेशिमबाग में बुलाया जाय| वहां मेरा एक प्रेरक भाषण हो जाए| बाद में स्वल्पाहार का कार्यक्रम रख लेंगे| नितिन कहता है कि तेलंगखेड़ी की समोसे बड़े प्रसिद्ध होते हैं| वह बता रहा था कि बर्डी इलाके में कोई खम्मण वाला भी है| उसके खम्मण भी मंगा लेंगे|” ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

१३ मार्च २०१५
“ग्रैजुएशन तो मैंने जैसे-तैसे आर्ट्स में कर लिया, लेकिन मेरी रूचि विज्ञान और तकनीकी में ही रहती है। हिन्द महासागर के देशों की यात्रा के बाद एक आइडिया आया है। क्यों न एक ऐसी तकनीक विकसित की जाए जिससे हिन्द महासागर का पानी कुछ जगहों से सुखाकर वहां बड़े-बड़े हाइवे बना दिए जाएं? फिर भारत से श्रीलंका सीधे सड़क मार्ग द्वारा जाना सम्भव हो जाएग। आह! प्रभु श्रीराम के बाद यह कार्यभार मुझ पर ही आना था। ढूंढूंगा तो क्या आज के भारत में मुझे नल-नील जैसे इंजीनियर नहीं मिलेंगे? और समुद्र सुखाने का क्या है? प्राचीन काल में ऋषि अगत्स्य एक बार ऐसा कर ही चुके हैं। हाइवे का नामकरण श्रीराम सेतु महामार्ग जैसा कुछ रख देंगे।” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

१२ मार्च २०१५ 
“एक बार बत्रा सर रात्रि भोजन पर आए तो बता रहे थे कि इतिहास में कुछ दोस्तों की जोड़ियां प्रसिद्ध हैं। राम और सुग्रीव, कृष्ण और सुदामा, अकबर और बीरबल। किसी मार्क्स और एंगेल्स का नाम भी लिया उन्होंने। बत्रा सर भी ना, कैसे-कैसे नाम लेते हैं जो हमने कभी सुने ही नहीं। हम तो अटल-आडवाणी की मित्रता को सजीव देखते आए हैं। एक फ़िल्म है जिसमें सुनील दत्त जी के पुत्र और किसी नए कलाकार की दोस्ती भी आजकल प्रसिद्ध है। अब बत्रा सर का कहना है कि आने वाले इतिहास में मेरी और अमित की दोस्ती के अध्याय लिखे जाएंगे। पता नहीं वो समय कब आएगा? लेकिन बत्रा सर कह रहे हैं तो सही ही होगा। कितने प्रतिभाशाली हैं बत्रा सर! जी तो करता है उन्हें भारत रत्न दे दूँ। लेकिन शुरुआत पद्मश्री से करेंगे।” ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

११ मार्च २०१५ 
“परम्परा का पालन होना चाहिए। प्रभु श्रीराम जब लंका आए थे तो निशानी के तौर पर पुष्पक विमान लेते आए। मैं क्या ले जाऊं?” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

१० मार्च २०१५

“एक लाइन मैंने फिल्मों में बहुत सुनी है। आज यही लाइन मेरे मन को ठीक-ठीक व्यक्त कर पा रही है – जी करता है ये सब छोड़-छाड़ कर कहीं दूर निकल जाऊं, इस शोर-शराबे से दूर कहीं एकांत में चला जाऊं। लेकिन आजकल जब भी यह विचार आता है तभी यह भी याद आता है कि मैंने जो वादे किए हैं उनका क्या होगा? क्या होगा उन लाखों वादों का? आखिर प्राण जाइ पर वचन न जाइ!

मैंने मोटा भाई से और गौतम से जो वादे किए हैं उनकी तो खैर गिनती ही नहीं। ठीक है कोयले वाला काम हो गया है लेकिन ये तो केवल शुरुआत है। अभी लैंड का काम बाकी है। लेबर का काम बाकी है। बराक से भी वादे किए हैं, उसमें अभी तो बस न्यूक्लियर लाइबिलिटी का काम हुआ है। क्या सोचेगा बराक अगर सारे वादे पूरे न किए? इस देश के असंख्य लोगों ने मुझ पर प्रेम बरसाते हुए चन्दा दिया चुनाव के वक्त। उन सबके वादे भी तो हैं, उनके भी तो काम करने हैं। नहीं, मैं कहीं नहीं जाऊँगा, न दैन्यं म पलायनम्। वादे पूरे कीन्हे बिना मोहि कहाँ विश्राम।”‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

१० मार्च २०१५
“विमान से कितना शांत दिखाई देता है कोलम्बो शहर! उधर दिल्ली वाले। क्या लोग हैं जी! अरे प्रधानमंत्री की कोई इज्जत होती है। मेरे गुजरात के लोगों को देखो। बारह साल चूं तक नहीं किया। ये लोग क्या बारह महीने मौन नहीं रह सकते?

कोलम्बो वाले मेरी कितनी इज्जत करते हैं! क्यों न राजधानी दिल्ली से हटाकर कोलम्बो कर दूं! ये बड़ा ऐतिहासिक फैसला हो जाएगा। इसके लिए इतिहास वाले बत्रा सर से कल ही बात कर लेता हूँ।”

‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

९ मार्च २०१५ 
“आज डायरी लिखने का मन नहीं है। देश में ‪#‎आक्रोश‬ है, हम में भी आक्रोश है।” –‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

९ मार्च २०१५
“कल सोमवार है। संसद जाना होगा। मुझे संसद जाना अच्छा नहीं लगता, वो लोग हर बात पर जवाब मांगते हैं। लेकिन मुझे वहां की कैंटीन अच्छी लगने लगी है।” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

८ मार्च २०१५
“आज शाम अमित तरबूज़ ले आया। मार्च के महीने में ऐसे ही फ़ल खाने चाहिए। कल मार्च की आठ तारीख़ है, कुछ महिला दिवस इवस है। खैर वो सब तो डीएवीपी वाले देख लेंगे। मुझे इन गैरजरूरी कामों में न घसीटा जाए तो मैं विकास पर ध्यान दे सकता हूँ। कल मोटा भाई अणे नीता बेन को लंच पर बुला लेता हूँ। अकेला मैं इतना बड़ा तरबूज़ कैसे खाऊंगा? घर में कोई हो तो बात और है!” –‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

७ मार्च २०१५
“आज अखबारों की छुट्टी थी। सुबह-सुबह अखबारों में अपनी तस्वीर न देख लूँ तो चाय पीना भी नहीं सुहाता।” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

६ मार्च २०१५
“होली तो वडनगर की होती थी। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, मैं तो तालाब के मगरमच्छों को भी रंग लगा दिया करता था। दिल्ली की होली में वो बात कहाँ है जी! कल अमित ने बताया कि कुर्ते के बाद अब मेरे नाम से मोदी रंग भी बाजारों में बिकने लगा है। अमित बता रहा था कि ये रंग थोड़ी-थोड़ी देर बाद नए रंगों में बदल जाता है। याने मेरे नियो मिडिल क्लास को बहुत सारे रंग खरीदने नहीं पड़ेंगे। पता नहीं उस रंग को बीपीएल ख़रीद पाएगा या नहीं? पहले पता होता तो मैं अरुण से सब्सिडी का बोल देता।

विज्ञान ने सचमुच बहुत प्रगति कर ली है। विज्ञान और होली के इस संगम पर एक अच्छा भाषण बन सकता है। अब सोना चाहिए, सुबह होते ही अमित तिलक लगाने दरवाजे पर आ जाएगा। उसे एक एसएमएस कर देता हूँ कि तिलक के लिए वो मोदी रंग ही लेता आए। वही रंग आडवाणी जी और जोशी जी को लगा दूंगा।” ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

४ मार्च २०१५
“एक मैं हूँ जो इनका मान बढ़ाने के लिए इनके साथ कैण्टीन में पूरे 29 रूपये देकर खाना खाता हूँ, और ये लोग हैं जिन्होंने राज्यसभा में मेरी मिट्टी पलीद कर दी! येचुरी भाइ, आपने ये ठीक नहीं किया।” – ‪#‎साहेबकीडायरीसे‬

२ मार्च २०१५
“आज मैंने उनतीस रुपए में खाना खाया। पता नहीं ये लोग क्यों गरीबी-गरीबी करते रहते हैं। क्या जरूरत है इन्हें ‪#‎मनरेगा‬ वगैरह की?” ‪#‎साहेब‬कीडायरीसे

– हितेन्द्र अनंत

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