I don’t want to spoil the day for you. But, please stop stereotyping mothers and women. Not all children are lucky to have loving, compassionate mothers. Many have their childhood destroyed because they had, let me write it with all the courage, a bad mother. Yes, that thing exists. Stereotyping mothers is also unfair to […]

उन्हें जीते हुए राज्य गिनने दीजिएआपको लाशें गिनने का काम दिया गया हैआपसे उम्मीद है कि आप इंजेक्शन ढूंढते रहेंआपको चाहिए कि आप एम्बुलेंस में लेटे हुएहर अस्पताल के बाहर चक्कर लगाएँऔर पलंग न होने पर ठुकराए जाते रहेंआपको यह करना है कि अपनी दुकानें बंद रखेंनौकरियाँ ढूंढिए, न मिलें तो सब्ज़ी बेचिएऔर फिर भी […]

“कांग्रेस कल्चर” वो सच्चाई है जिसे भाजपा ने तहे दिल से अपना लिया है। पुलिस का बेज़ा इस्तेमाल किसने शुरू किया, होने दिया और उसे इंतेहा तक ले गए? इसलिए इन मामलों पर कम से कम वो दल आँसू न बहाए जो इन सबका जिम्मेदार है। पुलिस सुधार किसने वर्षों लागू नहीं किए? किसने औपनिवेशिक […]

यूनाइटेड किंगडम के उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में टैक्सी एग्रीगेटर एप उबर के ख़िलाफ़ फैसला दिया है कि उसकी टैक्सी चलाने वाले सभी चालक अब उसके कर्मचारी माने जाएंगे और वे सभी सेवानिवृत्ति और सामाजिक सुरक्षा के लाभों के हक़दार होंगे। इस फैसले के भारत सहित पूरे विश्व में दूरगामी परिणाम होंगे। बाकी देशों […]

उदारवादी मध्यवर्ग के पास नायकों का अकाल है।इसलिए ज़रा सी अच्छी बात दिखते ही यह वर्ग किसी को भी नायक बना देने पर उतारू है। और जैसे ही कोई ज़रा सी खोट मिले, उसका नव-नायक तत्काल खलनायक में बदल जाता है।एक भाषण और मोहुआ मोइत्रा नायक। एक रोना और राकेश टिकैत नायक। कभी अन्ना हज़ारे […]

जिस शहर में मेरी ससुराल है, वहाँ एक दुकान है – “फलाने फोटो फ्रेम एण्ड जलेबी भण्डार”। पहली बार देखा तो बहुत हँसी आई थी। अब सोचता हूँ, क्या हुआ होगा? एक फोटो फ्रेम बनाने वाले ने सोचा, चलो इसी दुकान में जलेबी बनाकर क्यों न बेच लें? सीमेन्ट की फैक्ट्री वाले सेठ सीमेन्ट की […]

नेटफ्लिक्स पर सर(2018) देखिए। विवेक गोम्बर और तिलोत्तमा शोमे की अतुलनीय अदाकारी है। रोहिना गेरा का बेजोड़ लेखन और क़ाबिले तारीफ निर्देशन है। सिनेमेटोग्राफी उत्तम है। एक-एक फ्रेम शानदार है। संवाद बहुत सोच-समझकर लिखे गए हैं। प्रेम के पनपने और उसके बिखरने को फ़िल्मी नाटकीयता से बचाकर वास्तविकता के क़रीब लाया गया है। इसके पहले […]

“मैं कौन हूँ?”, “जीवन का उद्देश्य क्या है?” आदि ऐसे प्रश्न हैं जिन पर न जाने कितना कहा और लिखा गया है।  अनेक फ़िल्में भी बनी होंगी, लेकिन ऐसी फ़िल्म, वह भी एक एनिमेशन फ़िल्म शायद पहली बार बनी है।  पिक्सार स्टूडियो की एनिमेशन फ़िल्म “सोल” (=आत्मा), एक बेहद अलग प्रयोग है। पिक्सार स्टूडियो अपनी […]

*** “कमल की वखत तो केवल कमल जानता है। सागौन जो यहाँ लगे हैं, इनको क्या मालूम कमल की वखत?” *** “आप गाते हैं कि माला, मुद्रा, छाप, तिलक, व्रत आदि सब छोड़ने की बात #कबीर साहब करते हैं। लेकिन महंत बनकर जब आप खुद चौका-आरती करते हैं तो यह क्या है?”स्टैंफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर […]

अमेज़न प्राइम पर आई “अनपॉज़्ड” निहायत ही घटिया दर्जे की फ़िल्म है। इसकी पहली कहानी जो निखिल आडवाणी की है वही झेली नहीं गई। अव्वल तो यह समझना चाहिए कि करेंट अफेयर्स पर फ़िल्म बनाना बेवकूफ़ी है। जो इतना सामयिक विषय है, उस पर जनता आपसे अधिक जानती है। बनाना है तो बीस साल बाद […]