1.क्या भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आपसी समझ को “विशुद्ध” (absolute) राजनीतिक अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जाना चाहिए? 2. सच तो यह है कि सदियों से यह आपसी समझ मोटे तौर पर बनी हुई थी। 3. इसे ग्रहण प्रतिस्पर्धी चुनावी राजनीति के कारण लगा है। 4. उदहारण के लिए, जितने भी “प्रमुख” रेस्त्रां या […]

*भक्त सुबह: “पुरानी बातें छोड़ो, हजारों साल पहले जो हमारे पूर्वजों ने किया उसकी सजा हम क्यों भुगतें? दलित-वलित सब बेकार की बातें हैं।” *भक्त दोपहर: “हजारों साल पहले मुसलामानों ने बाहर से आकर हमला करके इस देश को गुलाम बना दिया। हमें इस देश को फ़िर से हिन्दू राष्ट्र बनाना है।” *भक्त शाम: ” […]

१. ऐसा कहा जाता है कि भारत में परिवारों का एकजुट रहना, भारत की संस्कृति के कारण है। २. यह केवल आंशिक रूप से सत्य है। आंशिक रूप से सत्य इसलिए क्योंकि भारत सहित अधिकांश एशियाई समाजों में व्यक्ति से बढ़कर परिवार व समाज शक्तिशाली रहे हैं एवं मनुष्य की दैनिक गतिविधियों के केंद्र में […]

सभी लिबरल सेक्युलर नहीं होते, सभी सेक्युलर वामपंथी नहीं। सभी वामपंथी कम्युनिस्ट नहीं होते, सभी कम्युनिस्ट माओवादी नहीं। सभी मूर्ख “भक्त” नहीं होते, सभी भक्त भाजपाई नहीं। सभी भाजपाई संघी नहीं होते, सभी संघी दंगाई नहीं।। हितेन्द्र

1. मैं कश्मीर में कथित आजादी का या उसके नाम पर एक इस्लामी राज्य स्थापित करने या उसे पाकिस्तान में शामिल करने का विरोधी हूँ। 2. दक्षिण पूर्व एशिया में भारत गणराज्य धर्मनिरपेक्षता की एकमात्र मिसाल है। इसलिए हमें अपने आजू-बाजू एक और पाकिस्तान बनने से रोकना चाहिए। 3. लेकिन हमें अपने भीतर भी एक […]

संघ और भाजपा जिस तरह का हिन्दू धर्म भारत में थोपना चाहते हैं उसके कुछ ख़ास लक्षण इस प्रकार हैं: १. इसमें वैष्णव धारा से केवल शाकाहारी मूल्यों को लिया गया है। उसमें जो सात्विकता, सत्यवादिता, परहित एवं अहिंसा जैसे मूल्य हैं, उन्हें छोड़ दिया। २. शैव-शाक्त धाराओं से केवल हिंसक भाव लिए हैं। उनमें […]

आपको फिर से राममंदिर का झुनझुना पकड़ाया गया है. फैसला आपका है, या तो इसे बजाते रहें, ताकि #साहेब कॉर्पोरेट की ड्यूटी आराम से बजाएं, या फिर आप चाहें तो इस झुनझुने को फेंक दें और सवाल पूछते रहें कि: 1. मंदिर छोड़ो और ये बताओ कि स्मार्ट सिटी का क्या हुआ? 2. पेट्रोल के […]

प्यार क्या होता है? थोड़ा बहुत जो जैविक कारणों से होता है, उसे छोड़ दें, तो प्यार दरअसल सभ्यता की पैदाइश है। अपवादों को छोड़ दें तो जानवर प्यार नहीं करते। आदिमानव भी नहीं करता था। प्यार सभ्यता के साथ विकसित हुआ है। वफ़ादारी, साथ जीने और ख़्याल रखने जैसी बातें उसके घटक हैं। ये […]

पहले गन्ना होता था। फिर ये कोई भारत में ही था जिसने उसे चूसकर थूक नहीं दिया, सदियों पहले उसका रस इकट्ठा किया, ये बात आगे बढ़ी तो गुड़ बना, शक्कर बनी। कोई था जिसने सोचने की जुर्रत की। उस समय लोग उसे कहते कि नहीं परंपरा है, गन्ना चूस के फेंक दो, उसका रस […]

“नोट बने अंगारे” महाकवि, जनक्रांतिदूत, रूस के निवासी, कॉमरेड निरालाई गुप्तेस्तोव नोटबंदी के कारण बदहाल हुए भारत के सर्वहारा वर्ग की पीड़ा से इतना चिंतित हैं कि उन्होंने एक नए काव्य संग्रह की घोषणा की है। संग्रह का नाम होगा “नोट बने अंगारे”। यह रूस के अगति प्रकाशन से प्रकाशित किया जाएगा। मूल्य होगा – […]