जिस शहर में मेरी ससुराल है, वहाँ एक दुकान है – “फलाने फोटो फ्रेम एण्ड जलेबी भण्डार”। पहली बार देखा तो बहुत हँसी आई थी। अब सोचता हूँ, क्या हुआ होगा? एक फोटो फ्रेम बनाने वाले ने सोचा, चलो इसी दुकान में जलेबी बनाकर क्यों न बेच लें? सीमेन्ट की फैक्ट्री वाले सेठ सीमेन्ट की […]

नेटफ्लिक्स पर सर(2018) देखिए। विवेक गोम्बर और तिलोत्तमा शोमे की अतुलनीय अदाकारी है। रोहिना गेरा का बेजोड़ लेखन और क़ाबिले तारीफ निर्देशन है। सिनेमेटोग्राफी उत्तम है। एक-एक फ्रेम शानदार है। संवाद बहुत सोच-समझकर लिखे गए हैं। प्रेम के पनपने और उसके बिखरने को फ़िल्मी नाटकीयता से बचाकर वास्तविकता के क़रीब लाया गया है। इसके पहले […]

“मैं कौन हूँ?”, “जीवन का उद्देश्य क्या है?” आदि ऐसे प्रश्न हैं जिन पर न जाने कितना कहा और लिखा गया है।  अनेक फ़िल्में भी बनी होंगी, लेकिन ऐसी फ़िल्म, वह भी एक एनिमेशन फ़िल्म शायद पहली बार बनी है।  पिक्सार स्टूडियो की एनिमेशन फ़िल्म “सोल” (=आत्मा), एक बेहद अलग प्रयोग है। पिक्सार स्टूडियो अपनी […]

*** “कमल की वखत तो केवल कमल जानता है। सागौन जो यहाँ लगे हैं, इनको क्या मालूम कमल की वखत?” *** “आप गाते हैं कि माला, मुद्रा, छाप, तिलक, व्रत आदि सब छोड़ने की बात #कबीर साहब करते हैं। लेकिन महंत बनकर जब आप खुद चौका-आरती करते हैं तो यह क्या है?”स्टैंफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर […]

अमेज़न प्राइम पर आई “अनपॉज़्ड” निहायत ही घटिया दर्जे की फ़िल्म है। इसकी पहली कहानी जो निखिल आडवाणी की है वही झेली नहीं गई। अव्वल तो यह समझना चाहिए कि करेंट अफेयर्स पर फ़िल्म बनाना बेवकूफ़ी है। जो इतना सामयिक विषय है, उस पर जनता आपसे अधिक जानती है। बनाना है तो बीस साल बाद […]

“गाते-गाते लोग चिल्लाने लगें” तो कान बन्द करना एक उपाय है। दूसरा उपाय है गाना। जब पड़ोस, मित्रता और रिश्ते खत्म होने लगें तो खुद को बंद कर लेना एक उपाय है। दूसरा है फिर से पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदारों को ढूंढना। जब लोग हाल-चाल पूछने की बजाय दिखाने लगें, और व्हाट्सएप स्टेटस लोगों की […]

मरुस्थल की रेत के पास होती हैंबहती नदियों की कहानियाँ जंगलों की कहानियाँधरती में दबा कोयला सुनाता है मूर्तियाँ सुना सकती हैछैनियों और पत्थरों की कहानियाँ मेरे पास तुम्हारीऔर तुम्हारे पास मेरी कहानियाँ हैं एक दिन उन नदियों और जंगलों की तरहहम दोनों न होंगे इसलिए चलो अपनी सारी कहानियाँ सुना दें हमबहुत सारे बच्चों […]

लोकतंत्र में चुनावों के सम्बन्ध में यह मानकर चला जाता है कि मतदाता ईमानदार होते हैं और वे जो चुनेंगे वो सही ही होगा। भारत सहित अन्य देशों का हमारा अनुभव बताता है कि मतदाता ईमानदार नहीं होते। न ही वे युक्तिसंगत निर्णय लेते हैं। भारत में जो संविधान उन्हें मतदान का अधिकार देता है, […]

मनु जोसेफ़ के उपन्यास “सीरियस मेन” पर इसी नाम से बनी फ़िल्म आई है जिसे सुधीर मिश्रा ने बनाया है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी मुख्य भूमिका में हैं। जितना अच्छा उपन्यास है, फ़िल्म उतनी अच्छी नहीं बन पाई है। बल्कि कहना होगा कि ख़राब फ़िल्म बनी है। सुधीर मिश्रा मुझे ओवररेटेड निर्देशक लगते थे पहले भी। अब […]

समझिए क्यों कृषि को कॉरपोरेट के हाथों में देना ख़तरनाक होगा मैं लाइसेंस-परमिट राज का समर्थक नहीं हूँ। लेकिन बात जब विश्व की चन्द बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की हो तो मुक्त बाज़ार या मुक्त व्यापार सिर्फ़ छलावा साबित हुए हैं। अमेज़न और फ्लिपकार्ट का असर अपने पड़ोस की मोबाइल बेचने वाली दुकान के मालिक से […]