अपने-अपने जीवन में हम सभी कुछ ना कुछ प्राप्त करना चाहते हैं। हम सफल होना चाहते हैं, सुखी होना चाहते हैं, प्रसिद्ध होना चाहते हैं, आदि इत्यादि। इन सबके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि हममें से कुछ लोग ‘संतोष” पर विश्वास करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो कि अब तक यह फैसला नहीं कर पाये हैं कि वे क्या चाहते हैं। कुछ भी नहीं चाहने वाले वैरागी जीवों की तो यहाँ चर्चा भी नहीं की जा रही।
हम चाहे केवल संतोष के साथ जीना चाहें या जीवन में बहुत ही “आगे बढ़ना” चाहें, हमारे सपने चाहे छोटे हों या बड़े, प्रायः यह देखने में आता है कि हम सभी को जीवन में एक अंतहीन दौड़ का घोड़ा बनना पड़ता है। और यह दौड़ चाहे-अनचाहे हममें तनाव, अवसाद, अस्वस्थता, और भौतिक तथा वैयक्तिक विकृतियों को जन्म देती है। सीधे शब्दों में कहें तो हमारे भीतर की मनुष्यता को समाप्तप्राय ही कर देती है।
इन अवसाद (डिप्रेशन) और तनाव (स्ट्रेस) के क्षणों से प्रभावित होकर कभी-कभी हमारा ‘स्व” अर्थात हमारा मूल स्वरूप हमसे ही विद्रोह कर बैठता है। इस द्वन्द्व के प्रभाव में आकर हम अन्धी भौतिक दौड़ से बचने के उपाय सोचने लगते हैं। हम इन सम्स्याओं से दूर भागना चाहते हैं, जिसे अंग्रेजी में “एस्केप” करना कहा जाता है। यदि आप किसी नगर या महानगर में निवास करते हों तो आपने अनेक बार सुना होगा अथवा स्वयं कहा होगा कि “जी तो करता है इस शहर को छोड़कर आराम से किसी गाँव में जाकर रहूं। वहाँ कोइ छोटा-मोटा काम ही कर लूंगा, कम से कम इस तनाव से मुक्ति तो मिलेगी!” यदि आप नौकरी करते हैं या ऐसे लोगों से मिलते जुलते हैं तो आपने अवश्य सुना-कहा होगा कि “यार, चलो कोइ स्वयं का बिज़नेस (व्यापार) शुरू करते हैं, इस रोज़-रोज़ की झंझट से छुटकारा तो मिलेगा! और अच्छे-खासे पैसे भी कमा लेंगे। इस नौकरी में रखा ही क्या है?” इसका ठीक उल्टा भी सत्य है। छोटे शहरों के लोग महानगरों के सपने देखते हैं और गाँवों के लोग शहरों के। महानगरों के कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विदेशों मे बस जाने को भी सुखी जीवन का एक उपाय समझते हैं। मैंने अनेक व्यापारियों को भी यह कहते सुना है कि “भाई हमारे व्यापार से तो तुम्हारी नौकरी ही भली, कम से कम तुम्हें मालूम तो है कि अगले महीने न्यूनतम इतने पैसे तो तुम कमा ही लोगे।”
ये और बात है कि ऐसा कहने वाले अधिकांश लोग न तो शहर छोड़कर गाँव में जाते हैं, और ना अपनी नौकरी छोड़कर कोइ व्यापार ही प्रारंभ करते हैं। पर यहाँ मैं उनके संकल्प की दृढ़ता पर विचार नहीं कर रहा। साथ ही स्पष्ट कर दूँ कि आपके शुभचिंतक ने स्वयं भी ऐसे अनेक संकल्पों को धारण किया है और कभी पूरा नहीं किया।
तो फिर मैं इस लेख में कहना क्या चाहता हूँ?
मेरा मानना है कि न तो कभी यह संभव है कि पूरा संसार गाँवों में जाकर रहे और ना ही यह संभव है कि सभी नौकरीपेशा अपनी नौकरियाँ छोड़कर स्वयं का व्यसाय करने लगें। हमें यही सुनिश्चित करना होगा कि जो जहाँ भी रहता है, और इच्छापूर्वक जिस व्यवसाय को भी करता है वह वहीं सुख या संतोष या सफलता या यह सब प्राप्त कर सके।
समस्या यह है कि हम अपनी वर्तमान स्थिति से अप्रसन्न हैं और इससे भागना चाहते हैं, “एस्केप” करना चाह्ते हैं। इस भाग जाने की भावना के पीछे कुछ तात्कालिक एवँ भावावेशजनित कारण दिखायी देते हैं जैसे नौकरी में मालिक या उच्चाधिकारी (बॉस) की घुड़कियाँ। पराये शहर का अकेलापन और सामाजिकता का अभाव। छोटी-मोटी असफलताएँ। कुछ कारण वस्तुतः गंभीर एवँ दुःसाध्य हैं। समस्या के मूल में जाने के लिये इन कारणों और उनके प्रभावों पर विचार करते हैं। इनमें भी हम पहले नौकरीपेशा और शहरी लोगों से जुड़ी समस्याओं पर विचार करेंगे। यहाँ सरकारी नौकरियों से जुड़ी परिस्थितियों पर विचार नहीं किया गया है।
- नौकरी देने वाले छोटे-बड़े सभी संस्थान अपने कर्मचारियों का शोषण करते हैं। ये संस्थान प्रायः “अधिकतम लाभ कमाने की भावना” से संचालित होते हैं। यहाँ अधिकतम शब्द पर जोर दिया जाय।
- किसी भी मनुष्य की सुचारू रूप से कार्य कर सकने की शारीरिक एवँ मानसिक क्षमताओं या सीमाओं को ये संस्थान जाने-अनजाने अनदेखा करते हैं।
- कर्मचारियों को उनके कार्य में हर अगली तिमाही या अगले वित्तीय वर्ष में पिछले हर वर्ष से अधिक लक्ष्य दिया जाता है। ज़ोर “अधिक से अधिक” पर होता है। यह लक्ष्य सीधे बिक्री अर्थात सेल्स से ना भी जुड़ा हो पर अंततः संस्थानों की अधिक कमाई की लालसा से ही संचालित होता है।
- कर्मचारियों की वार्षिक वेतन वृद्धि अधिकांशत: गिने-चुने हाथों में और आमतौर पर एक अपारदर्शी एवँ अस्पष्ट प्रक्रिया के तहत होती है। यद्यपि संस्थान अपनी ऐसी प्रक्रियाओं को पारदर्शी और वैज्ञानिक बताने का खूब पाखंड करते हैं।
- चूँकि नौकरी का मूल प्राप्य वेतन है, कर्मचारियों में स्वतः ही एक तरह का “दबाव” कार्य करने लगता है। यह स्वतः सक्रिय दबाव सुनिश्चित करता है कि येन-केन-प्रकारेण कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को प्रसन्न करें और अगले वर्ष “अधिक से अधिक” वेतनवृद्धि प्राप्त करें।
- इस दबाव के चलते आने वाली समस्याओं के कुछ लक्षण होते हैं। कार्यालयीन समय के समाप्त हो जाने पर भी देर रात तक लोगों का अपने दफ्तरों में टिके रहना। या तो वाकई काम का बोझ अधिक होता है अथवा यह दिखाने की प्रतिस्पर्धा कि हम कितनी मेहनत करते हैं। दूसरा लक्षण है चाटुकारिता। अपने वरिष्ठ की हाँ में हाँ मिलाना, अपने समकक्ष की बुराई, स्वयं के छोटे-से-छोटे कार्य के लिये श्रेय की याचना इत्यादि। ऐसे चाटुकारों से उनमें भी असंतोष एवँ तनाव व्याप्त हो जाता है जो या तो किसी प्रकार चाटुकारिता में बाज़ी नहीं मार पाते या केवल अपने काम की ईमानदारी पर ही भरोसा करते हैं। दबाव का तीसरा लक्षण है संस्थान के द्वारा दिये गये लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये कर्मचारियों द्वारा अनुचित, अनैतिक एवँ संभवतः अवैधानिक साधनों का उपयोग। इन सब अनैतिक कार्यों को करने या न करने वाले जब निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाते तो यह भी एक नये दबाव को जन्म देता है कि वे अब अपनी नौकरियाँ कैसे बचाएँ? इतना सब कर लेने पर भी और निर्धारित लक्ष्य पूरा कर लेने पर भी यदि ऐच्छिक वेतनवृद्धि एवँ प्रशंसा आदि न मिले तब?
- स्वाभाविक है कि कार्य में अनुचित दबाव, नैतिक पतन और कार्य की अधिकता से मानसिक एवँ शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी सम्स्याएँ जन्म लेती हैं। इनमें सर्वप्रमुख हैं तनाव और जीवनशैली से जुड़े अन्य रोग जैसे कि मधुमेह, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, मोटापा, अपच, अम्लरोग इत्यादि। जो अधिक देर तक खड़े रहकर या घंटों एक ही जगह बैठकर काम करते हैं, उन्हें हड्डी से संबंधित रोग जैसे कि मेरूदंड(स्पाईनल कॉर्ड) से संबंधित बीमारियाँ, कमर और कंधों में दर्द की शिकायत होने लगती है।
- शारीरिक नुकसानों के अतिरिक्त सामाजिक समस्याएँ भी आ घेरती हैं। अपने प्रियजनों, परिवार, मित्रों एवँ पड़ोसी तथा रिश्तेदारों को समय न दे पाना। सामाजिक आयोजनों में न जा पाना। परिवार के प्रति आवश्यक दायित्वों को भी समयाभाव के कारण पूरा न कर पाना। पति-पत्नी एवँ पालकों तथा संतानों के रिश्तों में खटास। खटास को प्रेम के स्थान पर पैसों से दूर करने का प्रयास। इससे भी अधिक भयावह स्थिति है काम के दबाव, और कॅरियर (आजीविका?) के लिये विवाह में देर और फिर संतान्नोत्पत्ति जैसी नितांत प्राक्रुतिक घटना को भी या तो टालना या इससे बचने का प्रयास।
- व्यक्ति तो व्यक्ति, पूरे समाज ने भी इस आधुनिक जीवन की अनिवार्य व्यस्तता की भारी कीमत चुकाई है। चूँकि समय की कमी है, इसीलिये, पाँच-दस दिनों विवाह-उत्सव केवल एक-दो दिनों में सिमट गये हैं। अनेक उत्सवों जैसे कि वसंतोत्सव को तो मनाना ही बंद कर दिया गया। दीपावली जैसे अति महत्वपूर्ण त्यौहारों पर भी सजावट से लेकर मिठाईयाँ तक अब बाजार के ‘रेडीमेड” उपायों पर निर्भर हैं। आखिर “कौन झंझट करे”? एक ही नगर में रहने वाले लंगोटिया यारों को भी अब एक दूसरे से मिलने के लिये सप्ताहंत की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मिलना भी होता तो है तो पहले से औपचारिकतापूर्ण विधि से तय समय पर। हमारी सामाजिक जीवंतता और सहज सृजनशीलता को आघात पहुँचा है।
- यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऊपर लिखी सभी समस्याएँ एक चक्र में एक दूसरे से बंधी हुई हैं। एक समस्या दूसरी और दूसरी तीसरी को जन्म देती है। तनाव हो तो प्रियजनों से आपके संबंध बिगड़ेंगे, संबंध बिगड़ेंगे तो तनाव होगा। तनाव होगा तो अनेक शारीरिक रोग होंगे, रोग होंगे तो तनाव होगा। हम यहाँ रोगों के उपचार की प्रक्रिया में होने वाले व्यकि के आर्थिक शोषण के कुचक्र की चर्चा ना ही करें अच्छा होगा।
- अब चूँकि नौकरी से जनित इतनी सारी समस्याएँ तनाव और अवसाद को जन्म देती हैं तो स्वाभाविक है कि हम इनसे बचने के रास्ते ढूंढेंगे। पर तनाव और अवसाद को पहचान पाना कठिन है। और इससे भी कठिन है तनाव के कारण को पहचान पाना। किंतु चूँकि व्यक्ति प्रसन्न नहीं है तो उपाय तो अवश्य किया जाएगा।
- एक उपाय होता है क्षणिक भोगों को बढ़ावा देना। हम सोचते हैं कि सप्ताह के पाँच-छः दिन का ये तनाव स्वाभाविक है, इसलिये सप्ताहंत में जो छुट्टियाँ हैं उनका मैं भरपूर दोहन करूँ। अथवा एक साथ कुछ लंबी छुट्टियाँ ले लूँ। इस प्रकार छुट्टियाँ “एस्केप” करने का या भाग निकलने का हमारा प्रथम उपाय होता है। आजकल “इस पल को जी ले यार” जैसे भाव फिल्मी गीतों में खूब आते हैं। अंग्रेजी में इसे “लिव दिस मोमेंट” या “लिव इट टू द फुलेस्ट” आदि कहकर एक सम्मानजनक आवरण चढ़ाया जाता है। चूँकि अंग्रेजी में कहा जाता है ऐसा, तो हम भरोसा भी कर ही लेते है! छुट्टियों के भरपूर दोहन की भावना से अधिकांश समय तेज़ शोर के संगीत, तीखे और तेज़ मसालों वाले भोजन और मदिरपान में व्यतीत किया जा सकता है। अथवा सारी छुट्टी “नींद का कोटा” पूरा करने और टी.वी. देखने में निकाल दी जाती है। साप्ताहिक छुट्टी के दिन आने वाला अखबार इसे आपका “मी टाईम” कहता है। हम “मी टाईम” के लिये भावुक हैं, अतः चित्रकारी, प्रकृति का सामीप्य, शांति प्रदान करने वाला संगीत, आध्यात्मिक गतिविधियाँ, पुस्तक पढ़ना जैसी किसी भी लालित्यपूर्ण किंतु अधिक एकाग्रता और मानसिक श्रम माँगने वाली गतिविधि में हमारे संलग्न होने की संभावना कम ही होती है। कुल मिलाकर हम हल्के मनोरंजन के अभ्यस्त हो जाते हैं।
- पर कुछ समय बाद हम देखते हैं कि छुट्टियाँ हमारे तनाव को दूर नहीं कर पा रहीं, बल्कि छुट्टियाँ मनाने की नयी शैली, खर्च को ही बढ़ा रही है। खर्च, कमाई, कमाई, नौकरी। नौकरी, तनाव, तनाव, बॉस। बॉस, कम वेतनवृद्धि, अधिक वेतनवृद्धि अधिक आय। तो क्यों न इस नौकरी को ही बदल दिया जाय! हम ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि आखिर यह उपाय हमें सूझ ही गया।
- जैसा कि स्वाभाविक है। नौकरियों का परिवर्तन भी सम्स्याओं को हल नहीं कर पाता। शुरूआती दिनों में यदि तनाव कम भी हो तो धीरे-धीरे पहले जैसी ही स्थिति आ ही जाती है। एक के बाद एक अनेक नौकरियाँ बदलने के बाद अंततः हम देखते हैं कि यह एक दुष्चक्र है। अतः हम सोचने लगते हैं कि इस दुष्चक्र से बाहर कैसे निकला जाय?
- और फिर हम भाग निकलने की योजना बनाते हैं। हमें दिखायी देता है कि हमारे आस-पास अनेक ऐसे लोग हैं जिन्हें हमारे बराबर तनाव नहीं है। कार्यालय के बाहर जो चाय-समोसे की दुकान है, जब उसका मालिक किसी दिन त्यौहार के नाम पर दुकान बंद रखता है, तब उसकी स्वतंत्रता से हमें ईर्ष्या सी होने लगती है। पत्र-पत्रिकओं के मुख्य पृष्ठों पर प्रकाशित होने वाले “उद्यमी” (Entrepreneurs) भी हमारे आदर्श बन जाते हैं। गरीब हो या अमीर, शहरी हो या ग्रामीण, हर वो व्यक्ति जो अपनी मर्जी का मालिक है, हमें आकर्षित करता है। (अपनी ओर से स्पष्ट कर दूँ कि मैंने उद्यमिता की भावना का सदा सम्मान किया है और एक बार ऐसा करने का प्रयास भी किया है। आगे भी करूँगा। यहाँ जो कुछ भी अब तक लिखा गया है वह मनुष्य की भाग निकलने की भावना एवँ आधुनिक नौकरियों तथा जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं के संबंध में है।)
- अब प्रश्न उठता है कि उपाय क्या है? क्या भाग निकलने की भावना उचित है? क्या जो जहाँ है वैसा ही पड़ा रहे और दुःख सहे? यदि यथास्थिति को बनाए रखा जाए तो ऐसे कौन से कदम हैं जिनसे नौकरियों में रहकर भी आधुनिक मनुष्य सुखी एवँ स्वस्थ जीवन जी सके?
- इससे पहले कि हम उपायों की चर्चा करें, थोड़ा और गहरे पानी उतरने की आवश्यकता है। कामकाज के जिस दबाव की ऊपर चर्चा की गयी है, वह दबाव दो मूल कारणों से जन्म लेता है: अ) अधिकाधिक लाभ कमाने की भावना ब) प्रतियोगिता की भावना या दूसरों से आगे निकल जाने की होड़. यह दोनों कारण संस्थानों के संदर्भ में भी सत्य हैं और उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के संदर्भ में भी।
- चूँकि सारा प्रपंच अधिकाधिक लाभ कमाने की भावना से और गलाकाट प्रतियोगिता की भावना से उत्पन्न होता है। अतः समस्याओं का समाधान अवश्य ही इन दो मूल कारणों के चिंतन से उपलब्ध होगा। यदि हम मनुष्य की स्वाभाविक लाभ कमाने की भावना और दूसरों की होड़ या प्रतियोगिता की भावना के गुण दोषों का चिंतन करें और एक व्यवसाय (बिज़नेस) प्रणाली की संकल्पना कर सकें जो इन दो कारकों के संदर्भ में नीरक्षीरविवेक (अच्छे को ग्रहण करना एवँ बुरे को छोड़ देना) से विचार करे तो उपाय मिल सकता है। समस्याएँ सुलझ सकती हैं। ध्यान दें, कि यह कोइ पूंजीवाद बनाम समाजवाद का प्रश्न नहीं है। हमें बस इतना प्रयास करना है कि हम स्वयं को एक विकल्प दें।
यहाँ इस लेख श्रुंखला का प्रथम भाग समाप्त होता है। लेख के दूसरे भाग में लाभ कमाने की भावना और उसके संभावित विकल्प पर विचार किया जाएगा। यहाँ तक जो लिखा है उसके संदर्भ में आपके विचारों का सदैव स्वागत है।
- हितेन्द्र






















