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Category Archives: Story (कहानी)

पानी के किस्से

इन दिनों हवा में गर्मी है, और प्यास भी ज़्यादा लगा करती है। ऐसे में पानी ज़्यादा पीना पड़ता है। पर गर्मियों में पानी की कमी होती है। इसीलिए पानी के मूल्य का बोध मनुष्य को गर्मियों में ही होता है, तब वह साल भर पानी बचाने का संकल्प लेता है और हर साल वर्षा के मौसम में भूल भी जाता है कि कोइ संकल्प लिया था। ठीक वैसे ही जैसे हर परीक्षा परिणाम के बाद एक औसत दर्जे का विद्यार्थी साल भर पढ़ने का संकल्प लेता है किंतु जुलाई का महीना आते ही भूल जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऊपर जिन दो संकल्पों का उल्लेख हुआ है, दोनों ही संकल्प गर्मी के मौसम में लिये जाते हैं और बारिश के मौसम में भुला दिये जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि पढ़ाई वाला संकल्प जो भूल जाते हैं वे विद्यार्थी औसत दर्जे के होते हैं, औसत से निचले दर्जे के विद्यार्थियों को संकल्प की चिंता नहीं होती और औसत दर्जे से ऊपर के विद्यार्थियों को संकल्प की आवश्यकता नहीं होती। तो क्या पानी बचाने के मामले में भी यही बात सत्य है? क्या हम कह सकते हैं कि दुनिया में ज़्यादातर आबादी ऐसे लोगों की है जो औसत दर्जे के हैं इसीलिये संकल्प लेकर भूल जाते हैं । यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि संकल्प लेकर भूल जाना एक बात है और संकल्प तोड़ देना दूसरी बात। लेकिन इससे पहले कि मनुष्यों में दर्जे की चर्चा करते हुए हम किसी गंभीर समाजशास्त्रीय बहस में पड़ें, मैं आपको बता दूँ कि इस चिट्ठे का उद्देश्य जल संकट पर या संकल्पों के टूटने पर चर्चा करना नहीं है। मुझे तो बस याद आ रहा है कि कैसे पानी पीने के तरीके बदल चले हैं मेरे आसपास के संसार में। 

      हम रायपुर जिले की गरियाबंद तहसील के ग्राम छुरा के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे। हम यानी ग्राम छुरा की सिंचाई विभाग की कॉलोनी में रहने वाले हम-उम्र बच्चे। हमारे माता-पिता शहरी थे जिन्हें नौकरी के चलते गाँव में रहना पड़ रहा था। हम घर के अंदर शहरी और घर से बाहर देहाती थे। हमारी स्कूल सन् 1907 में बनी थी जिसमें मैंने सन् 1987 से 1991 तक पढाई की । हमारे स्कूल में पीने के पानी की कोइ व्यवस्था नहीं थी। स्कूल में पढ़ाई के बीच तीन छुट्टियाँ दी जाती थी। इनमें से एक खाने की छुट्टी थोड़ी लंबी होती थी जिसमें हम सब घर जाकर खाना खाकर वापस आते थे। वहाँ टिफ़िन लेकर जाने का कोइ रिवाज़ नहीं था। तो जब ये छुट्टियाँ होती थीं, तो हम आसपास के घरों में जाकर पानी माँगकर पीते थे। इन घरों की गृहणियाँ बड़े प्रेम से हमें पानी पिलाया करतीं। स्कूल में कोइ दो सौ से तीन सौ लड़के पढ़ते थे। सभी एक ही घर से पाने नहीं पी सकते थे, इसलिये सब अलग अलग घरों में पानी पीते, इनमें वे घर भी शामिल थे जिनके बच्चे हमारे ही स्कूल में पढ़ते थे। हम घरों के आँगन में सीधे घुस जाते और वहाँ काम कर रही महिलाओं से कहते, दाई-ओ पानी दे तो। इस पीने के पानी में और भी किस्से शामिल थे। जैसे मेरे एक दोस्त ने मुझसे एक बार कहा ओ नेहरू घर के पानी झन पिये कर, ओकर डौकी टोनही हे, तोला पानी पिया के टोनहा दिहीयानी तुम नेहरू के घर से पाने मत पिया करो, क्योंकि उसकी पत्नी टोनही है और तुमपर जादू टोना कर सकती है। लेकिन मैं नेहरू के घर से ही पानी पीना चाहता था क्योंकि उसके घर के कुँए का पानी मीठा होता था। इस समस्या का समाधान बताते हुए एक मित्र ने कहा कि जब भी उसके यहाँ पानी पियो, तो पहले थोड़ा सा पानी ज़मीन पर गिरा दो, ऐसा करने से उसका जादू टोना काम नहीं करेगा। बाद में मैंने ध्यान दिया कि अनेक बड़े बुजुर्ग लोग जहाँ भी जाते हैं, पीने से पहले थोड़ा सा पानी गिरा देते हैं।  

पानी पीना तो प्याऊ का  भी बड़ा मज़ेदार होता है। हमें गर्मियों में अक्सर बाज़ार भेजा जाता था। अब चूँकि बाज़ार एक गाँव का था, अतः छोटा था, अतः हम पैदल ही जाते। जाने से पहले ही हम यह फ़ैसला कर लेते थे कि आज कौन से प्याऊ का पानी पीना है। गर्मी के शुरूआती कुछ दिनों तक अलग अलग प्याऊ में भटकने के बाद हम उस एक प्याऊ की पहचान कर लेते जहाँ पानी अच्छा होता था। अच्छा पानी यानी ठंडा- मीठा पानी और प्याऊ में साफ़ सफ़ाई। प्याऊ में प्लास्टिक के अलग अलग रंगों के गिलास होते थे। अपने मनपसंद रंग के गिलास में पाने पीने के लिये हम दूर से ही दौड़ लगा देते। ज़्यादातर प्याऊ ऐसे थे जहाँ पानी पीने के पहले और बाद पीने वाले को ही गिलास पानी से साफ़ करना होता था। कुछ प्याऊ ऐसे भी थे जहाँ पानी पिलाने वाली महिला गिलास साफ़ कर देती और पाने पीने के बाद जूठा गिलास भी स्वयं साफ करती। ऐसे प्याऊ की इस अतिरिक्त सेवा से हम खासे खुश हो जाते थे।  

अब पुनः स्कूल का रूख़ करते हैं। प्राथमिक शाला के बाद हमने माध्यमिक शाला यानी मिडिल स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ पीने के पानी का एक ड्रम था जिसे स्कूल खुलने के वक्त एक दाई पास के हाई स्कूल के हैंडपंप से भरकर रख जाती थी। दाई स्कूल की साफ़सफ़ाई भी करती थी। प्राथमिक शाला में झाड़ू लगाने का काम विद्यार्थी अपनी अपनी कक्षा में बारी बारी से करते थे। मिडिल स्कूल में हमने गुरूजी को सर कहना सीखा। यहीं हमने पहली बार देखा कि हर विषय को अलग अलग सर पढ़ाते हैं, तो हमारा पहली बार पीरियड और डेली टाईम टेबल जैसे शब्दों से परिचय हुआ। वर्ना टाईम टेबल तो सिर्फ परीक्षा के लिये हुआ करता था। मिडिल स्कूल में एक और सुविधा थी जो प्राथमिक स्कूल से बढ़कर थी। यहाँ प्रधानपाठकजी की कुर्सी से लगा एक बटन था जिसे दबाने पर एक विद्युत घंटी बजती थी। यूँ पीरियड बदलने या छुट्टी की सूचना देने के लिये एक घंटा अलग से था। जब कभी पीरियड बदलता तो प्रधानपाठक या उनकी गैरमौजूदगी में कोइ अन्य शिक्षक बटन दबाते और पास ही जो कक्षा छठवीं(अ) का कमरा था वहाँ के विद्यार्थी दौड़ लगाते कि सर क्या काम है? कभी कभी सरजी घंटा इसलिये बजाते कि उन्हें पानी पीना होता था। ऐसे में जो बच्चा कार्यालय तक पहले पहुँचता, उसे सभी शिक्षकों को पानी पिलाने का गौरव प्राप्त होता था। इस काम में सभी को अतीव आनंद प्राप्त होता था। मिडिल स्कूल के पास स्वयं का कोइ हैडपंप नहीं था। आगे चलकर हमारे गाँव के सरपंच जो हमारे ही स्कूल से पढ़े थे, जब विधायक बन गये तो हमारे प्रधानपाठक के अनुरोध पर उन्होंने एक हैंडपंप हमारे स्कूल के पास ही लगवा दिया था। कुछ साल बाद मुझे पता चला कि प्राथमिक शाला के सामने भी एक हैंडपंप लग चुका था। 

मिडिल स्कूल की पढाई के बाद हमारा परिवार शहर आ गया। यहाँ के स्कूल में मैंने देखा कि पीने के पानी का एक अलग ही कमरा था जिसमें अनेक नल एक कतार में लगे हुए थे। ये नल एक बड़े से वाटर फ़िल्टर से जुड़े थे। पानी के कमरे की दीवार पर किसी ने कोयले से लिख रखा था यहाँ ज़ीरो-बी का पानी मुफ़्त मिलता है 

पानी तो मिनरल वाटर की बोतल से भी पिया जाता है। मैंने पहली बार मिनरल वाटर का पानी तब पिया जब हमारे मिडिल स्कूल की स्काउट टीम के साथ मैं कलकत्ता गया था। तब मैंने और मेरे मित्र ने कौतुहलवश एक बोतल खरीदी थी। हमारे साथ गये प्रधानपाठक ने हमें हिदायत दी थी कि हम इसे किसी और को न दें, और रोज़ इसे थोड़ा-थोड़ा पियें क्योंकि इसमें सेहत के लिये लाभकारी खनिज-लवण (मिनरल्स) होते हैं। और हमने उनकी बात मानी। अब तो लोग सफ़र में वज़नी थर्मस नहीं ले जाते और मिनरल वाटर की बोतल पर ही भरोसा करते हैं। मिनरल वाटर अब बोतल के अलावा पाऊच में भी मिला करता है। पानी-पाऊच का विशेष इस्तेमाल मैंने राजनेताओं की रैलियों और संतों के प्रवचनों में देखा जहाँ आई या लायी गयी भीड़ में इसे निःशुल्क वितरित किया जाता है। 

तो ये वो अनेक बाते हैं जो पानी पीने से जुड़ी हैं। पानी पीने का तरीका चाहे जो हो, जो प्यासा है उसके लिये तो पानी अमृत है। तो जो प्यासा है और जिसके लिये पानी अमृत है, उससे यह अपेक्षा अवश्य की जानी चाहिये कि वह पानी बचाने का संकल्प ले। किंतु जो प्यासा है और पानी बचाने का संकल्प लेता है वह इस संकल्प को भूल न जाए इस बात की कितनी संभावनाएँ हैं? खैर यह इस पर भी निर्भर करता है कि संकल्प लेने वाला औसत दर्जे का मनुष्य है या किसी और दर्जे का। तो आपका दर्जा क्या है? और आपका संकल्प क्या है?

 
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Posted by on मई 16, 2007 in Story (कहानी)

 

हितोपदेश की संपूर्ण कथायें

भारत सरकार के सूचना और तकनीकी विभाग के भारतीय भाषाओं के लिये तकनीकी विकास प्रकल्प ने प्रशंसनीय कार्य किया है। इस प्रकल्प के साथ देश के अनेक विश्वविद्यालय जुड़े हैं। इनके जाल स्थल पर हितोपदेश की लगभग सभी कथायें हिन्दी में यूनिकोड पर दी गयी हैं। इस पोस्ट के अंत में सभी कहानियों के श्रेणीबद्ध लिंक दिये गये रहे हैं। इन लिंकों यानी कड़ियों पर जाकर आप सपूर्ण हितोपदेश पढ़ सकते हैं। अथवा यहाँ क्लिक करें। कुल मिलाकर हमारी सरकार इतनी बुरी नहीं, जितना हम उसे समझते हैं! कभी कभार अच्छे काम भी कर जाती है सरकार हमारी।

 

हितोपदेश

हितोपदेश भारतीय जन- मानस तथा परिवेश से प्रभावित उपदेशात्मक कथाएँ हैं। इसकी रचना का श्रेय पंडित नारायण जी को जाता है, जिन्होंने पंचतंत्र तथा अन्य नीति के ग्रंथों की मदद से हितोपदेश नामक इस ग्रंथ का सृजन किया।

नीतिकथाओं में पंचतंत्र का पहला स्थान है। विभिन्न उपलब्ध अनुवादों के आधार पर इसकी रचना तीसरी शताब्दी के आस- पास निर्धारित की जाती है। हितोपदेश की रचना का आधार पंचतंत्र ही है। स्वयं पं. नारायण जी ने स्वीकार किया है–

पंचतंत्रान्तथाडन्यस्माद् ग्रंथादाकृष्य लिख्यते।

हितोपदेश की कथाएँ अत्यंत सरल व सुग्राह्य हैं। विभिन्न पशु- पक्षियों पर आधारित कहानियाँ इसकी खास- विशेषता हैं। रचयिता ने इन पशु- पक्षियों के माध्यम से कथाशिल्प की रचना की है। जिसकी समाप्ति किसी शिक्षापद बात से ही हुई है। पशुओं को नीति की बातें करते हुए दिखाया गया है। सभी कथाएँ एक- दूसरे से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।

 

रचनाकार नारायण पंडित

हितोपदेश के रचयिता नारायण पंडित को नारायण भ के नाम से भी जाना जाता है। पुस्तक के अंतिम पद्यों के आधार पर इसके रचयिता का नाम”"नारायण” ज्ञात होता है। 

नारायणेन प्रचरतु रचितः संग्रहोsयं कथानाम्

इसके आश्रयदाता का नाम धवलचंद्रजी है। धवलचंद्रजी बंगाल के माण्डलिक राजा थे तथा नारायण पंडित राजा धवलचंद्रजी के राजकवि थे। मंगलाचरण तथा समाप्ति श्लोक से नारायण की शिव में विशेष आस्था प्रकट होती है।

रचना काल

कथाओं से प्राप्त साक्ष्यों के विश्लेषण के आधार पर डा. फ्लीट कर मानना है कि इसकी रचना काल ११ वीं शताब्दी के आस- पास होना चाहिये। हितोपदेश का नेपाली हस्तलेख १३७३ ई. का प्राप्त है। वाचस्पति गैरोलाजी ने इसका रचनाकाल १४ वीं शती के आसपास माना है।

हितोपदेश की कथाओं में अर्बुदाचल (आबू) पाटलिपुत्र, उज्जयिनी, मालवा, हस्तिनापुर, कान्यकुब्ज (कन्नौज), वाराणसी, मगधदेश, कलिंगदेश आदि स्थानों का उल्लेख है, जिसमें रचयिता तथा रचना की उद्गमभूमि इन्हीं स्थानों से प्रभावित है।

हितोपदेश की कथाओं को इन चार भागों में विभक्त किया जाता है –

मित्रलाभ

सुहृद्भेद

विग्रह

संधि

मित्रलाभ

  1. सुवर्णकंकणधारी बूढ़ा बाघ और मुसाफिर की कहानी
  2. कबुतर, काक, कछुआ, मृग और चूहे की कहानी
  3. मृग, काक और गीदड़ की कहानी
  4. भैरव नामक शिकारी, मृग, शूकर, साँप और गीदड़ की कहानी
  5. धूर्त गीदड़ और हाथी की कहानी

सुहृद्भेद

  1. एक बनिया, बैल, सिंह और गीदड़ों की कहानी
  2. धोबी, धोबन, गधा और कुत्ते की कहानी
  3. सिंह, चूहा और बिलाव की कहानी
  4. बंदर, घंटा और कराला नामक कुटनी की कहानी
  5. सिंह और बूढ़ शशक की कहानी
  6. कौए का जोड़ा और काले साँप की कहानी

विग्रह

  1. पक्षी और बंदरो की कहानी
  2. बाघंबर ओढ़ा हुआ धोबी का गधा और खेतवाले की कहानी
  3. हाथियों का झुंड और बूढ़े शशक की कहानी
  4. हंस, कौआ और एक मुसाफिर की कहानी
  5. नील से रंगे हुए एक गीदड़ की कहानी
  6. राजकुमार और उसके पुत्र के बलिदान की कहानी
  7. एक क्षत्रिय, नाई और भिखारी की कहानी

संधि

  1. सन्यासी और एक चूहे की कहानी
  2. बूढ़े बगुले, केंकड़े और मछलियों की कहानी
  3. सुन्द, उपसुन्द नामक दो दैत्यों की कहानी
  4. एक ब्राह्मण, बकरा और तीन धुताç की कहानी
  5. माधव ब्राह्मण, उसका बालक, नेवला और साँप की कहानी
 
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Posted by on अक्टूबर 15, 2006 in हितोपदेश

 

बेताल पच्चीसी: पच्चीसवीं कहानी

योगी राजा को और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। बोला, ‘‘हे राजन्! तुमने   यह कठिन काम करके मेरे साथ बड़ा उपकार किया है। तुम सचमुच सारे राजाओं में श्रेष्ठ हो।’’                  इतना कहकर उसने मुर्दे को उसके कंधे से उतार लिया और उसे स्नान कराकर फूलों की मालाओं से सजाकर रख दिया। फिर मंत्र-बल से बेताल का आवाहन करके उसकी पूजा की। पूजा के बाद उसने राजा से कहा, ‘‘हे राजन्! तुम शीश झुकाकर इसे प्रणाम करो।’’            राजा को बेताल की बात याद आ गयी। उसने कहा, ‘‘मैं राजा हूँ, मैंने कभी किसी को सिर नहीं झुकाया। आप पहले सिर झुकाकर बता दीजिए।’’            योगी ने जैसे ही सिर झुकाया, राजा ने तलवार से उसका सिर काट दिया। बेताल बड़ा खुश हुआ। बोला, ‘‘राजन्, यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था। अब तुम बनोगे। मैंने तुम्हें बहुत हैरान किया है। तुम जो चाहो सो माँग लो।’’            राजा ने कहा, ‘‘अगर आप मुझसे खुश हैं तो मेरी प्रार्थना है कि आपने जो चौबीस कहानियाँ सुनायीं, वे, और पच्चीसवीं यह, सारे संसार में प्रसिद्ध हो जायें और लोग इन्हें आदर से पढ़े।’’            बेताल ने कहा, ‘‘ऐसा ही होगा। ये कथाएँ ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से मशहूर होंगी और जो इन्हें पढ़ेंगे, उनके पाप दूर हो जायेंगे।’’            यह कहकर बेताल चला गया। उसके जाने के बाद शिवाजी ने प्रकट होकर कहा, ‘‘राजन्, तुमने अच्छा किया, जो इस दुष्ट साधु को मार डाला। अब तुम जल्दी ही सातों द्वीपों और पाताल-सहित सारी पृथ्वी पर राज्य स्थापित करोगे।’’            इसके बाद शिवाजी अन्तर्धान हो गये। काम पूरे करके राजा श्मशान से नगर में आ गया। कुछ ही दिनों में वह सारी पृथ्वी का राजा बन गया और बहुत समय तक आनन्द से राज्य करते हुए अन्त में भगवान में समा गया।

 
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Posted by on अक्टूबर 12, 2006 in बेताल पच्चीसी

 

बेताल पच्चीसी: चौबीसवीं कहानी

किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था। उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चलकर भीलों की नगरी में पहुँचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयीं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अन्त में वह मारा गया। भील चले गये।                  उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजाव को मरा देखकर बड़ी दु:खी हुईं। वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची। उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का साहूकार अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, ‘‘अगर ये स्त्रियाँ मिल जों तो जायें जिससे चाहा, विवाह कर लेना।’’                  लड़के ने कहा, ‘‘छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी, उससे मैं विवाह कर लूँगा। आप बड़ी से कर लें।’’                  साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था, पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया।                  थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दीं। साहूकार ने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’                  रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे, पुत्री के पैर बड़े। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया, लड़के ने रानी से हुई और इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू। उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं।                  इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्! बताइए, माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?’’                  यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड़ा। उसने बहुत सोचा, पर जवाब न सूझ पड़ा। इसलिए वह चुपचाप चलता रहा।                  बेताल यह देखकर बोला, ‘‘राजन्, कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे धीरज और पराक्रम से खुश हूँ। मैं अब इस मुर्दे से निकला जाता हूँ। तुम इसे योगी के पास ले जाओ। जब वह तुम्हें इस मुर्दे को सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले आप करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर बतावे तो तुम उसका सिर काट लेना। उसका बलिदान करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे। सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।’’                  इतना कहकर बेताल चला गया और राजा मूर्दे को लेकर योगी के पास आया। 

 
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Posted by on अक्टूबर 12, 2006 in बेताल पच्चीसी

 

बेताल पच्चीसवीं: तेईसवीं कहानी

कलिंग देश में शोभावती एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था। जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएँ सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े माँ-बाप बड़े दु:खी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर श्मशान में पहुँचे तो रोने-पीटने की आवाज़ सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब ज़ोर से रोया, फिर खूब हँसा, फिर योग-बल से अपना शरीर छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए।                  वह लड़का वही तपस्या करने लगा।                  इतना कहकर बेताल बोला, ‘‘राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हँसा?’’                  राजा ने कहा, ‘‘इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके माँ-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हँसा इसलिए कि वह नये शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकेगा।’’                  राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर उसे लाया तो रास्ते में बेताल ने कहा, ‘‘हे राजन्, मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि बिना जरा-सा भी हैरान हुए तुम मेरे सवालों का जवाब देते रहे हो और बार-बार आने-जाने की परेशानी उठाते रहे हो। आज मैं तुमसे एक बहुत भारी सवाल करूँगा। सोचकर उत्तर देना।’’                  इसके बाद बेताल ने यह कहानी सुनायी।                                                                 

 
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Posted by on अक्टूबर 12, 2006 in बेताल पच्चीसी

 

बेताल पच्चीसी: बाईसवीं कहानी

 कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता था। उसके नगर में एक ब्राह्मण था, जिसके चार बेटे थे। लड़कों के सयाने होने पर ब्राह्मण मर गया और ब्राह्मणी उसके साथ सती हो गयी। उनके रिश्तेदारों ने उनका धन छीन लिया। वे चारों भाई नाना के यहाँ चले गये। लेकिन कुछ दिन बाद वहाँ भी उनके साथ बुरा व्यवहार होने लगा। तब सबने मिलकर सोचा कि कोई विद्या सीखनी चाहिए। यह सोच करके चारों चार दिशाओं में चल दिये।            कुछ समय बाद वे विद्या सीखकर मिले। एक ने कहा, ‘‘मैंने ऐसी विद्या सीखी है कि मैं मरे हुए प्राणी की हड्डियों पर मांस चढ़ा सकता हूँ।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘मैं उसके खाल और बाल पैदा कर सकता हूँ।’’ तीसरे ने कहा, ‘‘मैं उसके सारे अंग बना सकता हूँ।’’ चौथा बोला, ‘‘मैं उसमें जान डाल सकता हूँ।’’            फिर वे अपनी विद्या की परीक्षा लेने जंगल में गये। वहाँ उन्हें एक मरे शेर की हड्डियाँ मिलीं। उन्होंने उसे बिना पहचाने ही उठा लिया। एक ने माँस डाला, दूसरे ने खाल और बाल पैदा किये, तीसरे ने सारे अंग बनाये और चौथे ने उसमें प्राण डाल दिये। शेर जीवित हो उठा और सबको खा गया।            यह कथा सुनाकर बेताल बोला, ‘‘हे राजा, बताओ कि उन चारों में शेर बनाने का अपराध किसने किया?’’            राजा ने कहा, ‘‘जिसने प्राण डाले उसने, क्योंकि बाकी तीन को यह पता ही नहीं था कि वे शेर बना रहे हैं। इसलिए उनका कोई दोष नहीं है।’’            यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर फिर उसे लाया। रास्ते में बेताल ने एक नयी कहानी

 
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Posted by on अक्टूबर 12, 2006 in बेताल पच्चीसी

 
 
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