तिरछी नजरिया पिछले एक वर्ष से रूकी हुई सी थी। यद्यपि पाठकों का आना नहीं रूका। अब पुनः तिरछी नजरिया एक नये उद्देश्य के साथ सक्रिय होने जा रही है। प्रसंग यह कि मैंने आंग्लभाषा में उद्यमिता यानी EntrePreneurship पर नया चिट्ठा The Entrepreneur प्रारंभ किया है। नयी सदी में भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाना है तो एक प्रमुख आवश्यक्ता यह है कि हमारे यहाँ अधिक से अधिक लोग स्वयं की राह चुनें। नौकरी पर निर्भर न होकर साहस के साथ अपने विचार को, अपनी कल्पनाओं को सच्चा बनाएँ। ऐसा क्यों है कि दुनिया के ज़्यादातर ब्रांड पश्चिमी हैं? मैक्डॉनल्ड्स, जनरल मोटर्स, फोर्ड, जनरल इलेक्ट्रिक, सिटी बैंक, कॆलॉग्स, माइक्रोसॉफ्ट, एप्प्ल, डेल, ये सब भारत में क्यों नहीं हुए? भारत के उत्पाद और भारत के ब्रांड जब दुनिया भर में अपना नाम करेंगे, तो हमारी अर्थव्यवस्था को नयी गति मिलेगी। और हमारे समाज की नौकरी पर निर्भरता की मानसिकता भी दूर होगी। हमारा सकल घरेलू उत्पाद तब और अधिक गति से आगे बढ़ेगा जब हमारे लोग उत्पादन करेंगे ना कि नौकरी। उद्यमिता व्यवसाय से भिन्न है। उद्यमी वह होता है जो पैसे बनाने कि बजाय एक विचार को सफल बनाना चाहता है और एक सफ़ल संस्थान को खड़ा करता है। वह रोज़गार नहीं ढूंढता बल्कि रोज़गार के अवसर निर्मित करता है। ये रास्ता कठिन होता है। और इसमें आने वाली मुश्किलें पीछे की ओर खींचतीं हैं। लेकिन कुछ लोग हैं जो पीछे मुड़कर नहीं देखते, जैसे धीरू भाई अंबानी, सुनील भारती मित्तल, नारायन मूर्ती, या जैसे लक्ष्मी निवास मित्तल। ये ऐसे लोगों की कथाएँ हैं जो प्रेरक हैं और प्रसिद्ध हैं। किंतु उन कथाओं का क्या जो अख़बारों में छपा नहीं करतीं? उन लोगों का क्या जिन्हें ऐसे रास्ते पर जाने के लिये, या ऐसे रास्ते के बीच सहायता की या मार्गदर्शन की जरूरत है? इन्हीं सब उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने मित्र कपिल विधानी के साथ इस नये चिट्ठे “The Entrepreneur” की शुरुआत की है। चिट्ठा अंग्रेजी मैं है, किंतु समस्त चर्चा हिन्दी में तिरछी नजरिया पर अनूदित की जायेगी। खुशी की खबर यह है कि अपने प्रारंभ होने के दो वर्ष और कुछ महीनों के भीतर ही तिरछी नजरिया को तीस हज़ार से अधिक पाठकों का प्यार हासिल हुआ है। एक अच्छी शुरुआत के पहले ये एक अच्छी ख़बर है।
आप सभी इस नये चिट्ठे को पढ़ेंगे ऐसी अपेक्षा है। यूं हिन्दी में तिरछी नजरिया पर सब कुछ उपलब्ध रहेगा।
-हितेन्द्र.








