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Archive for the ‘इन दिनों...These Days...’ Category

क्या करें जब आपका समय ख़राब हो?

In इन दिनों...These Days... on November 15, 2009 at 8:41 pm

कुछ आप-बीती और कुछ सुनी-सुनाई के आधार कुछ सुझाव लिख रहा हूँ उनके लिये जिन्हें लगता है कि उनके तारे आजकल गर्दिश में चल रहे हैं। जब सितारे आपका साथ ना दें, जब हर काम उल्टा पड़े तो इन बातों का ध्यान रखिये:

  1. अपने वाहन में पेट्रोल/डीजल कभी कम न होने दें, ऐसे हालात में अक्सर गाड़ी का पेट्रोल या डीज़ल ख्त्म हो जाता है, और वो भी पेट्रोल पंप से कॉफ़ी दूर।
  2. वाहन के टायरों में हवा नियमित भरायें, क्योंकि बुरे दिनों में टायर का पंचर होना एक आम बात है। यदि फ़िर भी एक बार आपकी गाड़ी पंचर हो जाए, तो सीधा ट्यूब ही बदलवा दें अन्यथा बार-बार पंचर होने की संभावना दें।
  3. अपने बटुए (वॉलेट) में पैसे कम से कम इतने रखें कि मुसीबत में आप पेट्रोल/डीज़ल भरा सकें या पंचर बनवा सकें और कम से कम अपने किसी मित्र को फ़ोन कर सकें!
  4. अपने मोबाईल फ़ोन का बैलेंस कभी शून्य के आसपास ना होने दें।
  5. कभी भी बिना टिकट यात्रा ना करें।
  6. समय पर रेल्वे स्टेशन या बस स्टॉप पहुँचें।
  7. छोटी से छोटी बीमारी का भी इलाज करवा लें, वरना बीमारी इतनी ज़रूर बढ़ेगी कि आपको डॉक्टर का तगड़ा बिल देना पड़े।
  8. अपने बॉस से पंगा ना लें ।
  9. सीढ़ियों से उतरते वक्त ध्यान रखें, कहीं आपका पैर न फ़िसल जाए।
  10. दुपहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट ज़रूर पहनें
  11. यदि आप विद्यार्थी  हैं तो कभी भी परीक्षा में नकल ना  करें

ये सब मैं आपको डराने के लिये नहीं, सिर्फ़ सावधान करने के लिये लिख रहा हूँ। यूँ तो बुरा वक्त या अच्छा वक्त जैसी कोइ चीज है भी या नहीं ये पक्का नहीं। लेकिन अच्छा है सावधान रहें, और मस्त रहें। उन सभी को शुभकामनाएँ जिन्हें लगता है कि यह पोस्ट उनके लिये उपयोगी है, ईश्वर करे आपका ऐसा समय जल्द ही ख़त्म हो जाए!

-हितेन्द्र

20 years of the breaking of the Berlin Wall

In इन दिनों...These Days... on November 9, 2009 at 8:16 pm

It was 20 years ago when the Berlin wall was broken and east and west Germany reunited. The Foreign Policy magazine has published some good articles on one of the greatest moments of recent world history.
berlin wall

If Berlin wall could be broken why can’t India, Pakistan and Bangladesh reunite one day…

Read the articles:

Who broke the Berlin Wall:

http://www.foreignpolicy.com/articles/2009/11/06/who_brought_down_the_berlin_wall

Today’s Berlin Walls:

http://www.foreignpolicy.com/articles/2009/11/05/todays_berlin_walls

The article lists following as today’s berlin walls:

  1. The Israel/Palestine “Separation Barrier”
  2. The U.S.-Mexico border fence
  3. The Korean Demilitarized Zone
  4. The Wagah Border Crossing (India-Pakistan)
  5. The Great Firewall of China

I am reading…The Ascent of Money…

In इन दिनों...These Days... on October 30, 2009 at 8:24 pm

“The Ascent of Money: A Financial History of the Worldis a book from author Niall Ferguson. I picked it recently. The book records the  journey of money from the ancient times to the current. It starts from the use of Silver or Gold as a symbol of value, it tracks how Banking evolved, how currency was exchanged or how there were some nations that tried to become a moneyless society but failed. It also tells the reader how evolutions in mathematics resulted in the flow of money becoming more and more sophisticated.

ascentofmoneyNiall Ferguson also discusses poverty and riches at great length. He says it is not the lack of money but lack of strong financial systems and institutions that makes individuals and nations poor. Evolution of Banks, equity market, bonds, insurance etc. has been covered in great detail in the book.

The book is three in one, a good read in economics, history and philosophy. I haven’t finished reading it yet and wish I get a good long vacation or travel so that I can finish it fast. I really enjoy travelling because I get to read then.

 

Read more about Niall Ferguson here http://www.niallferguson.com/site/FERG/Templates/Home.aspx?pageid=1

More: the book was adapted into a television series on Channel 4.

-Hitendra

2 State’s के बहाने…लव या अरेंज्ड?

In इन दिनों...These Days... on October 29, 2009 at 12:01 am

बीते दिनों मैं मुंबई की यात्रा पर गया था, जब पास में कुछ खाली समय पाया तो मैं अपनी सबसे प्यारी जगह मरीन ड्राइव पर गया और वहाँ आराम से बैठकर भारत के अंग्रेजी उपन्यासकार चेतन भगत का नवीनतम उपन्यास “2 States, the story of my marriage”  पढ़ा। चेतन के अनुसार यह उपन्यास उनके निजी जीवन से प्रेरित है, किन्तु इसमें थोड़ी हकीकत और थोड़ा फ़साना है। पढ़ने की दृष्टि से देखें तो मुझे तो यह उपन्यास उनके पिछले सभी उपन्यासों से बेहतर लगा।

ज़रा कहानी पर नज़र डालिये। कृश दिल्ली में रहने वाला एक पंजाबी युवक और अनन्या, चेन्नई की रहने वाली एक तमिल युवती, दोनों ही आईआईएम अहमदाबाद के विद्यार्थी हैं। जैसा कि स्वाभाविक है दोनों में प्रेम होता है और अंततः दोनों शादी करने का फ़ैसला करते हैं, लेकिन अनन्या चाहती हैं कि ये शादी सभी की खुशी और रज़ामंदी से हो। और सबको खुश करने और विशेषतः राज़ी करने की जद्दोजहत की कहाने है यह उपन्यास। भारत के युवाओं के लिये कहानी और कहानी का विषय नया नहीं है। लेकिन चेतन ने अपनी चिर-परिचित व्यंग्यात्मक शैली में भारत की एक गंभीर समस्या पर प्रश्न किया है। और यह समस्या है लव मैरिज बनाम अरेंज्ड मैरिज की समस्या यानी प्रेम विवाह विरूद्ध पारंपरिक अरेंज्ड मैरिज (इसका कोइ हिन्दी प्रचलित शब्द मुझे आजतक नहीं मालूम)।

2states

हम उपन्यास के बहाने कहानी की चर्चा छोड़कर सीधे मुद्दे की बात करते हैं। आख़िर क्या सही है? और कितनी गंभीर है यह सम्स्या? इस बात पर यूँ तो अंतहीन चर्चाएँ होती रहती हैं किन्तु प्रश्न सर्वदा प्रासंगिक है। इस मुद्दे में दो बाते हैं, पहली जाति की समस्या और दूसरी माता-पिता की पसंद से शादी करने या न करने की। इस चर्चा में हम जाति के प्रश्न पर ध्यान केंद्रित करेंगे। हमारे देश में जाति एक गंभीर समस्या है। जाति की व्यवस्था ने, जो पूरी तरह सामाजिक व्यवस्था है और जिसका धर्म से कोइ लेना देना नहीं है, देश को जितना नुकसान पहुँचाया है उतना किसी और बात ने नहीं। पर हमारे यहाँ जाति का प्रश्न पश्चिम के गोरे-काले या यहूदी-ईसाई के प्रश्न की तरह नस्लवादी नहीं है। कुछ बातों पर ध्यान दीजिये:

1. एक ही जाति में अनेक गोत्र के लोग होते हैं। इन गोत्रों में भी अनेक मतभेद हैं, कौन ऊँचा कौन नीचा?

2. एक ही क्षेत्र के समान जाति के लोग भी स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ समझते हैं, उदाहरण के लिये उत्तर प्रदेश में ही कान्यकुब्ज और सर्यूपारिण दो प्रकार के ब्राह्मण होते हैं। रीति-रिवाज नस्ल आदि में कोइ भेद नहीं, फ़िर भी इनमें स्वयं को श्रेष्ठतर कहने की होड़ है।

3. एक ही जाति के लोग क्षेत्र बदलने पर आपस में विबाह नहीं करते, जैसे कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण दक्षिण भारत और यहाँ तक कि कुछ ही दूर में बिहार के मैथिल ब्राह्मणों से संबंध नहीं रखते।

4. भाषा बदलने पर भी भारत में वर्ण व्यव्स्था समान रहती है, किन्तु जाति व्यव्स्था वर्ण व्यवस्था से भी अधिक जटिल है। इसलिये एक ही वर्ण के लोग भाषा बदलने पर आपस में विवाह नहीं करते।

5. मैंने अपनी दादी से सुना है कि किस प्रकार हमारी अपनी जाति में ही कुछ गाँवों के लोगों को ऊँचा और कुछ गाँवों के लोगों को नीचा कहा जाता है।

कुल मिलाकर जाति व्यवस्था इतना विकृत रूप ले चुकी है कि उसका कोइ तार्किक आधार नज़र आता नहीं। जातियों के बनने का चाहे जो कारण रहा हो, इंसान को इंसान से सिर्फ जन्म के आधार पर जो अलग करे, ऐसी व्यवस्था की जितनी निंदा की जाए कम है।

आइये देखते हैं जाति के भीतर ही शादी के पैरोकार क्या तर्क देते हैं, और आधुनिक भारत में ये तर्क कितने मज़बूत हैं

तर्क: एक ही जाति के लोगों के आचार-व्यवहार और संस्कृति एक जैसी होती है, जिससे विवाह के बाद जीवन में अच्छा तालमेल बना रहता है।

उत्तर: अव्वल तो यह कि खुशहाल शादी-शुदा ज़िंदगी के लिये एक जैसा खान-पान या पहनावा या भाषा की नहीं बल्कि आपसे समझ, समझदारी, मेलजोल और एक दूसरे के लिये त्याग करने के लिये तैयार रहने की भावना की ज़रूरत होती है।

तर्क: जरूरत पड़ने पर जाति के लोग जीवन में काम आते हैं। और लव मैरिज करने वालों का मुसीबत के वक्त कोइ साथ नहीं देता।

उत्तर: क्या सचमुच! आज के आधुनिक जीवन में आपका वास्ता ज़्यादातर भिन्न-भिन्न जातियों के लोगों से होता है। ऐसे में कौन मुसीबत में काम आएगा और कौन नहीं यह लोगों कि भलमनसाहत और उनसे आपकी घनिष्ठ्ता पर निर्भर करता है न कि उनके उनकी और आपकी जाति के साम्य पर। और वैसे भी क्या यह तर्क एक प्रकार कि धमकी नहीं है कि अगर हमारी बात नहीं मानी तो हम तुम्हारा बुरे वक्त में साथ नहीं देंगे! धमकी देनेवाले समाज से रिश्ता बनाना किस प्रकार से उचित है?

तर्क: अलग-अलग जाति में विवाह करने वालों की संतान कमज़ोर या रूग्ण (बीमार) होती है।

उत्तर: छतीसगढ़ की कुछ जातियों में एक बीमारी पाई जाती है सिकलसेल एनीमिया। यह रक्त के दोष से संबंधित बीमारी एक ही जाति के लोगों में ही क्यों ज़्यादा पायी जाती है? शायद इस तर्क का विपरीत ही सत्य है।

तर्क: अगर जातियाँ जरूरी नहीं हैं तो भगवान ने जातियाँ बनायी ही क्यों?

उत्तर: जी नहीं। भगवान अगर है भी तो उसने जातियाँ नहीं बनायी। क्योंकि यह पूरी धरा भगवान का ही सृजन है, और उसे जाति उचित प्रतीत होती तो वह सारे विश्व के मनुष्यों के लिये जाति बनाता, केवल हम भारतियों के लिये नहीं। और वैसे भी हमने भगवान की बनायी इस सुंदर धरती पर बहुत कुछ नष्ट कर दिया है। अब क्यों न जाति की बारी हो!

तर्क: (यह तर्क मैंने कई लोगों से कई बार सुना है) वाह! यदि आपकी बात मानें तो कोइ भी किसी से भी शादी कर सकता है? फ़िर तो गधे की शादी घोड़े से और शेर की हाथी से हो सकती है। आखिर ऐसी दुनिया की शक्ल ही क्या रह जाएगी जहाँ कोइ नियम-कायदा न हो?

उत्तर: अब इसका क्या जवाब दें! यूँ यह उल्लेखनीय है कि अंतर्जातीय विवाह कोइ नयी बात नहीं। महाभारत काल में महाराज शांतनु ने सामान्य कुल की गंगा से विवाह किया। धृतराष्ट्र ने गांधार (अब अफ़गानिस्तान) की एक कन्या से विवाह किया। अर्जुन ने एक राक्षसी से भी विवाह किया था। अपनी जाति से दूर विवाह करना कोइ नयी बात नहीं दिखाये देती।

आखिर ये विवाह संबंधी नियम आये कहाँ से?

इसका बेहतर उत्तर तो इतिहासकार ही दे पायेंगे। लेकिन कुछ कॉमन सेंस की बाते हैं। मनुष्य ने कबीले छोड़कर गाँवों में रहना शुरू किया तो एक ही गाँव की कन्याओं से दुराचार रोकने के लिये कहा गया कि एक ही गाँव की लड़्कियाँ बहने होती हैं। ये प्रथा आज भी भारत में मानी जाती है। लेकिन यदि संबंध फिर भी होते तो कितनी  दूर ? आखिर तब मनुष्य एक सीमा से ज़्यादा यात्रा भी तो नहीं कर सकता था। साथ ही कर्म आधारित जातियाँ होने के कारण एक ही जैसे पेशे के परिवार में संबंध करना स्वाभाविक भी था। आखिर उसी पेशे में पारंगत  कामगार लड़की आपके घर में जुड़ जाती।

शादियों में आन-बान-शान और दिखावेबाजी का आगमन

पुराने ज़माने में मनुष्यों के सामने संवर्धन (अपनी संख्या बढ़ाना) एक बड़ी चुनौती थी। जिस कबीले, गाँव, जाति या समूह की संख्या ज़्यादा होती वह युद्धों, जानवरों और कुदरती हमलों से खुद के रक्षा बेहतर ढंग से कर सकता था। संख्या बल के लिये स्त्रियाँ चाहिये। ऐसे में स्त्रियों को उपयोगी वस्तु के रूप में देखा जाने लगा और उनका हरण एक आम बात हो गयी। अन्य जाति, क्षेत्र या समूह के लोग जब हमला करते तो सामान और जानवरों के साथ स्त्रियों को भी लूट ले जाते थे। धीरे-धीरे दो बातों ने जन्म लिया, एक, अपने घर की स्त्री की रक्षा सम्मान का प्रतीक और सबसे महती ज़िम्मेदारी बना, और दो, किसी अन्य कुल की कन्या को अपने परिवार में लाना वीरता और मर्दानगी का प्रतीक हो गया। राजस्थान में शादी के वक्त तोरण मारने की एक प्रथा है जिसमें दूल्हा शादी के लिये जब कन्या के द्वार मे प्रवेश करता है तो वह अपनी तलवार से वह द्वार पर लगे तोरण (ध्वज) को काट देता है, जो एक प्रकार से उस घर को युद्ध में जीत लेने का प्रतीक है। हम हमेशा देखते हैं कि भारतीय विवाहों में परंपरावश लड़कीवालों को अपेक्षाकृत विनम्र व्य्वहार करना होता है जबकि लड़केवालों के सौ ख़ून भी माफ़ होते हैं। शादियों के वक्त निकाले जाने वाली भव्य बारात भी दरअसल किसी विजय यात्रा जैसी ही लगती है जिसमें लाव-लश्कर के साथ, हथियारों और गाजे-बाजे को शामिल किया जाता है।

ऐतिहासिक कारण चाहे जो रहे हों, आधुनिक समय में लड़कियों को कमतर कर आँकना अमानवीय है. इसलिये, विवाह से जुड़ा शान-शौकत का प्रश्न भी विद्रूप है।

पारिवारिक सहमति का प्रश्न

कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे असहमत नहीं हुआ जा सकता:

1. माँ-बाप हमेशा संतान का भला चाहते हैं।

2. हर माता-पिता का अपनी संतान के विवाह को लेकर एक सपना होता है।

3. माता-पिता अपनी संतान के सुख के लिये अपना सर्वस्व त्याग देते हैं

4. विवाह दो व्यक्तियों में होता है किन्तु रिश्ते दो परिवारों में बनते हैं।

कुछ तर्क प्रेम -विवाह के पक्ष में हैं

1. यह कहना मुश्किल है कि जो आपका भला चाहते हैं, वो आपका भला समझते भी हैं।

2. यह सोचना गलत है कि जो अपनी मर्जी से विवाह करते हैं वो परिवात के प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं।

3. समाज को चाहिये कि वह न केवल दो व्यक्तियों के आपसी सहमति से विवाह में दखलअंदाज़ी न करे बल्कि  उन्हें सहयोग भी करे।

4. अपनी इच्छा से विवाह करना मनुष्य का नैतिक, प्राकृतिक और वैधानिक अधिकार है।

5. एक भिन्न जाति के सद्स्य के आपके परिवार में शामिल होने से विविधताएँ बढ़ती हैं, समस्याएँ नहीं।

6. मनुष्य ने समाज का निर्माण अपनी सुरक्षा और सुविधा के लिये किया, समाज ने मनुष्य को नहीं  बनाया। लेकिन अस्तित्व के खत्म होने के डर से जाति आधारित समाज या कोइ भी समाज हर नयी व्यवस्था का विरोध करता है। समाज सबको अपने रंग में देखना चाहता है, ताकि उसे असुविधा न हो, भले ही समाज को बनाये रखने के लिये मनुष्य के प्राकृतिक और मौलिक अधिकारों का हनन होता हो।

7. ज़रा सोचिये यदि जाति आधारित विवाह न होते तो क्या छुआ-छूत की प्रथा होती? क्या जाति के आधार पर चुनाव में वोट डाले जाते? क्या जाति रहित भारतीय समाज अधिक परिपक्व और खुशहाल समाज न होता?

8. यदि विभिन्न भाषा-भाषियों, राज्यों और जातियों लोग आपस में विवाह कर पायें आने वाले पीढ़ी में भारतीयता की भावना अधिक मज़बूत न होगी?

शायद मैंने उन्हीं प्रश्नों को दोहराया है जो पहले भी इस तरह की चर्चाओं में होते हैं, लेकिन ये प्रश्न वाजिब हैं और हमें इन्हें तब तक उठाते रहना होगा जब तक हम सफ़ेद को सफ़ेद और काले को काला न कह लें। पुरानी गलतियों से सीख लेकर भारतियों ने अनेक वर्जनाओं को तोड़ा है, सती प्रथा, बाल-विवाह लगभग बंद हो चुके हैं। समुद्र न लांघने की कसमें खाने वाले हिन्दु अब समुद्र पार के देशों में अपनी प्रतिभा के बल पर समृद्धि और सम्मान पा रहे हैं। कम से कम शहरों में अब हमें छुआ-छूत दिखायी नहीं देती। हमें और आगे जाने की जरूरत है, हमें हर उस चीज़ को सुधारने की ज़रूरत है जिसे हम गलत समझते हैं।

उपन्यास पर वापस आते हैं। चेतन का यह चौथा उपन्यास है और निश्चय ही एक बॉलीवुड फिल्म इस पर बनाये जाने ली संभावना है। कहानी का अंत सुखद है या दुखद यह तो आपको पढ़ने के बाद ही पता चलेगा लेकिन यदि इस उबाऊ पोस्ट के विपरीत आप एक मनोरंजन से भरा उपन्यास पढ़ना चाहते हैं तो “2 States, the story of my marriage”  अवश्य पढ़ें।

-हितेन्द्र

कैटल क्लास के मुसाफ़िर

In Current Issues (सामयिक), इन दिनों...These Days... on September 19, 2009 at 5:45 pm

विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर इन दिनों समस्याग्रस्त हैं। अपने एक बयान में विमानों की इकॉनॉमी क्लास को उन्होंने कैटल क्लास (भेड़-बकरियों की श्रेणी) की संज्ञा दे डाली है। इस पर काँग्रेस पार्टी उनसे ख़फ़ा है। और इकॉनॉमी क्लास के यात्री भी। चूँकि इस चिट्ठाकार को अब तक विमान से यात्रा का अनुभव नहीं है, इसलिये यह बताना मुश्किल है कि क्या सचमुच विमानों की इकॉनॉमी क्लास में यात्री भेड़ बकरियों की तरह सफ़र करते हैं? यह तो आप ही बताएँ। किंतु ‘आम आदमी’ (और आम औरत भी) कहीं-कहीं कैटल क्लास यानी मवेशियों की तरह सफ़र करता है , वह है भारतीय रेल की ट्रेनों का सामान्य दर्जे डिब्बा, और मुंबई सहित अनेक शहरों की लोकल ट्रेनें। सोनिया गाँधी एक किस्म की कैटल क्लास मेंतो सफ़र कर चुकी हैं किंतु शायद ही कभी वे ट्रेनों के साधारण दर्जे में सफ़र कर ‘सादगी’ का प्रदर्शन करें। क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि महाराष्ट्र के काँग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी पार्टी की सादगी की विचारधारा को ध्यान में रखते हुए, मुंबई में लोकल ट्रेनों से यात्रा करेंगे? इन ट्रेनों इंसान की गति मुर्गी के दड़बे से भी गयी-बीती होती है। बैठना या खड़े होना तो दूर पैर रख पाना भी अपने आप में एक संतुष्ट सफ़र की यादगार बन जाता है। मुझे अच्छी तरह याद है जब अंधेरी से दादर जाने वाली मुंबई लोकल में मेरे एक मित्र को उतरने के लिये पैरों का उपयोग नहीं करना पड़ा, भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि वे भीड़ में दबकर लटक गये और भीड़ ने हवा में लटके हुए ही रेल्वे प्लैटफार्म पर ‘लैंड’ करवा दिया। तो मंत्री महोदय की बात पर हम नाहक ही नाराज़ हो रहे हैं। कैटल क्लास तो है, और हम सचमुच भेड़-बकरियों की तरह रोज़ाना सफ़र कर रहे हैं। ऐसे में बुरा मानने की बात ही क्या है?

कवि रहीम ने उचित ही कहा है, “सांई इतना दीजिए,  जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाए”

सादगी का चाहे जितना भी नाटक कर लें, हमारे नेता, कवि रहीम के इस दोहे का मर्म कभी नहीं समझ पाएँगें।

-हितेन्द्र।

जगदलपुर यात्रा

In इन दिनों...These Days... on July 17, 2009 at 8:02 pm

कुछ दिन पहले से मैं रायपुर से जगदलपुर (बस्तर जिले का मुख्यालय, और पूर्व बस्तर प्रांत की राजधानी) गया। बारिश के कारण रास्ता बड़ा ही मोहक था। हरियाली और बारिश का माहौल था। केसकाल घाटी का सौंदर्य बारिश में अप्रतिम अप्रतिम होता है। चक्करदार रास्तों से जब ग़ाड़ियाँ  केसकाल की ओर पहाड़ पर चढ़ाई करती हैं तो नीचे और चारों ओर फ़ैला प्राक़्रुतिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। बस्तर मध्य-भारत का सबसे सुंदर अंचल है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज यह पूरा अंचल नक्सलवाद से पीड़ित है। पता नहीं क्यों कश्मीर या बस्तर जैसे सुंदर प्रांत अतिवादियों का शिकार होते हैं? ख़ैर, जगदलपुर रायपुर से 300 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा शहर है। रायपुर से धमतरी फ़िर कांकेर, केसकाल, कोंडागाँव और बस्तर(एक छोटा सा क़स्बा जिसके नाम पर प्राचीन बस्तर राज्य का नाम था) होकर जगदलपुर पहुँचने में करीब 5-6 घंटे लगते हैं।

( बस्तर के बारे में अधिक जानकारी यहाँ से मिल सकती है। बस्तर में पर्यटन के लिये बहुत सारे विकल्प हैं जिनकी जानकारी यहाँ से मिल सकती है। )

जगदलपुर में मैंने वहाँ के पूर्व राजपरिवार का महल देखा। इस महल में आज भी राजपरिवार के सदस्य निवास करते हैं। अपने ऐतिहासिक महत्व के बावज़ूद यह महल उपेक्षित दशा में है। रख-रखाव के अभाव में इस महल का वास्तविक सौंदर्य सामने नहीं आ पाता। महल की और यात्रा की कुछ तसवीरें यहाँ चस्पा कर रहा हूँ। महल के अंदर स्थित राजा का राजसिंहासन देख कर अच्छा लगा। बस्तर राजपरिवार की एक गाड़ी पर बस्तर राज्य का राजचिह्न भी देखा। बस्तर के प्रसिद्द और जनप्रिय राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की तस्वीर भी देखी। जगदलपुर में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान अनेक आदिवासियों सहित राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को 1966 में पुलिस ने 25 मार्च 1966 को गोलियों से मार दिया था।

उद्यमिता पर नया चिट्ठा “The Entrepreneur” और तीस हज़ार पाठक

In Current Issues (सामयिक), Information, इन दिनों...These Days... on October 5, 2008 at 8:56 pm

तिरछी नजरिया पिछले एक वर्ष से रूकी हुई सी थी। यद्यपि पाठकों का आना नहीं रूका। अब पुनः तिरछी नजरिया एक नये उद्देश्य के साथ सक्रिय होने जा रही है। प्रसंग यह कि मैंने आंग्लभाषा में उद्यमिता यानी  EntrePreneurship पर नया चिट्ठा  The Entrepreneur प्रारंभ किया है। नयी सदी में भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाना है तो एक प्रमुख आवश्यक्ता यह है कि हमारे यहाँ अधिक से अधिक लोग स्वयं की राह चुनें। नौकरी पर निर्भर न होकर साहस के साथ अपने विचार को, अपनी कल्पनाओं को सच्चा बनाएँ। ऐसा क्यों है कि दुनिया के ज़्यादातर ब्रांड पश्चिमी हैं? मैक्डॉनल्ड्स, जनरल मोटर्स, फोर्ड, जनरल इलेक्ट्रिक, सिटी बैंक, कॆलॉग्स, माइक्रोसॉफ्ट, एप्प्ल, डेल, ये सब भारत में क्यों नहीं हुए? भारत के उत्पाद और भारत के ब्रांड जब दुनिया भर में अपना नाम करेंगे, तो हमारी अर्थव्यवस्था को नयी गति मिलेगी। और हमारे समाज की नौकरी पर निर्भरता की मानसिकता भी दूर होगी। हमारा सकल घरेलू उत्पाद तब और अधिक गति से आगे बढ़ेगा जब हमारे लोग उत्पादन करेंगे ना कि नौकरी। उद्यमिता व्यवसाय से भिन्न है। उद्यमी वह होता है जो पैसे बनाने कि बजाय एक विचार को सफल बनाना चाहता है और एक सफ़ल संस्थान को खड़ा करता है। वह रोज़गार नहीं ढूंढता बल्कि रोज़गार के अवसर निर्मित करता है। ये रास्ता कठिन होता है। और इसमें आने वाली मुश्किलें पीछे की ओर खींचतीं हैं। लेकिन कुछ लोग हैं जो पीछे मुड़कर नहीं देखते, जैसे धीरू भाई अंबानी, सुनील भारती मित्तल, नारायन मूर्ती, या जैसे लक्ष्मी निवास मित्तल। ये ऐसे लोगों की कथाएँ हैं जो प्रेरक हैं और प्रसिद्ध हैं। किंतु उन कथाओं का क्या जो अख़बारों में छपा नहीं करतीं? उन लोगों का क्या जिन्हें ऐसे रास्ते पर जाने के लिये, या ऐसे रास्ते के बीच सहायता की या मार्गदर्शन की जरूरत है? इन्हीं सब उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने मित्र कपिल विधानी के साथ इस नये चिट्ठे “The Entrepreneur” की शुरुआत की है। चिट्ठा अंग्रेजी मैं है, किंतु समस्त चर्चा हिन्दी में तिरछी नजरिया पर अनूदित की जायेगी। खुशी की खबर यह है कि अपने प्रारंभ होने के दो वर्ष और कुछ महीनों के भीतर ही तिरछी नजरिया को तीस हज़ार से अधिक पाठकों का प्यार हासिल हुआ है। एक अच्छी शुरुआत के पहले ये एक अच्छी ख़बर है। 

आप सभी इस नये चिट्ठे को पढ़ेंगे ऐसी अपेक्षा है। यूं हिन्दी में तिरछी नजरिया पर सब कुछ उपलब्ध रहेगा। 

-हितेन्द्र.

शुभकामनाएँ

In इन दिनों...These Days... on November 10, 2007 at 5:13 pm

तिरछी नजरिया के प्रिय पाठंकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ! दीपावली पर भेंट स्वरूप इस छत्तीसगढ़ी गीत का आनंद लें।

ऐसे और भी सुंदर गीत आप यहाँ से पढ़ सकते हैं।

हाय रे कुंदरु करेला,

मोर छैला

अलबेला मोर तीर आजा

मोर तीर आजा राजा

खवाहूं बीरो पान।

हाय रे पड़की परेवना मोर

कोईली मैना मोर तीर आजा

मोर तीर आजा रानी

खवाहूँ बीरो पान।

कोहरा के लोवा नारे म सरगे

तोर बीना हिरदे म भुर्री बरगे।

मोर तीर आजा

कोचई कांदा मही म राधे

नहीं बता मन कोन कइसे बांधे?

मोर तीर आजा

अमारी भाजी रे अमसुरहा लागे,

आते तै डरेऊठी करम फुटहा जागे।

मोर तीर आजा

खाये रे खीरा चाने पंदोली,

मयार्रूंक सुन लेतेंद मया के बोली।

मोर तीर आजा ….

हिन्दी में अनुवाद –

ओ ! मेरे कुंदरु और करेला की तरह

मजेदार अलबेले छैला तुम

मेरे निकट आओ

मैं तुम्हें बीड़ा पान खिलाऊँगी।

पड़ूंगी और कबूतर की तरह सुन्दर

कोयल और मैना की तरह गाने वाली

मेरी रानी

तुम मेरे करीब आ जाओ

मैं तुम्हें अपने हाथों से पान खिलाऊँगा।

कुम्हड़ा की बातीं (छोटा फल)

उसकी बेल में ही खराब हो गई।

और तुम्हारे बिना मेरे हृदय में आग लगी हुई है।

कचालू की सब्जी बनाने के लिये मठा (छाँछ)

की जरुरत पड़ती है

पर तुम्हीं बताओ मैं अपने इस मतवाले मन

को किस प्रकार बाँध कर रखूं।

अमारी की भाजी खट्टी लगती है,

मेरे जीवन में तुम्हारे बिना खटास आ गया है,

यदि तुम मेरे दरवाज़े आ पाओ

तो मेरी फूटी किस्मत जाग जायेगी।

ककड़ी को खाने से पहले उसके अगले (कड़ु़वा)

भाग को काट कर फेंक देते हैं

मेरे प्रिय तुम भी कड़वाहट छोड़ और अपनी प्यार भरी बोली बोलो।

नक्सल्वाद और बस्तर India’s War in the Woods

In Information, इन दिनों...These Days... on November 7, 2006 at 8:24 pm

नक्सल्वाद और बस्तर India’s War in the Woods

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या गंभीर है। आम आदिवासी सरकार और नक्सलियों की लड़ाई में पिस रहा है। हज़ारों आदिवासी ऐसे हैं जो विभिन्न शरणार्थी शिविरों में किसी तरह जीवन काट रहे हैं। गाँव के गाँव उजड़ चुके हैं। और एक प्रकार का गृह युद्ध सा चल पड़ा है। क्योंकि सरकार और नेता प्रतिपक्ष श्री महेन्द्र कर्मा द्वारा समर्थित आंदोलन(?) सलवा जुड़ुम अर्थात शांतिपूर्ण मार्च के तहत आदिवासी युवकों के एसपीओ यानी विशेष पुलिस अधिकारी बना दिया गया है। इन एसपीओ, जिनमें अनेक तो किशोरवय हैं, के हाथ में बंदूक गुटीय हिंसा और अराजकता को बढ़ावा दे रही है। बस्तर के जंगलों में नक्सलियों से लड़ाई के लिये पहले ही अनेक केंद्रीय बल तैनात हैं। इनके अलावा सलवा जुड़ुम के सिपाही भी हैं। यह सब मिलकर बस्तर में एक अंतहीन प्रतीत होते हिंसक संघर्ष को जन्म दे चुके हैं। प्रस्तुत वीडियो कहानी का कुछ हिस्सा उजागर करता है। चूँकि यह यू ट्यूब पर दिखायी दिया तो इसे प्रकाशित करना उचित समझा। यद्यपि इस विषय में छत्तीसगढ़ में काफ़ी बहस हो रही है, शांति का कोइ रास्ता निकलता दिखायी नहीं देता।

डिजिटल सांस्कृतिक संपदा पुस्तकालय

In Information, इन दिनों...These Days... on October 16, 2006 at 6:05 pm

हिन्दी प्रेमियों विशेषकर वे जो इंटरनेट पर हिन्दी की उपस्थिति के लिये चिंतित रहते हैं, के लिये यह अच्छा समाचार है। भारत सरकार के टीडीआईएल यानी भारतीय भाषाओं के तकनीकी विकास प्रकल्प के क़ॉइलनेट कार्यक्रम के अंतर्गत हिन्दी और लोकभाषाओं के प्राचीन और आधुनिक साहित्य को इंटरनेट पर उपलब्ध कराया गया है। देश के विभिन्न राज्यों के चुनींदा विश्वविद्यालयों के सहयोग से यह कार्य किया गया है। इस प्रकल्प के पीछे जो भी हैं वे साधुवाद के पात्र हैं।

संपूर्ण पुस्तकालय के लिये यहाँ क्लिक करें।

इस पोस्ट में पुस्तकालय की संपूर्ण विषय सूची दी जा रही है। ताकि यदि इतना पढ़ने पर भी आप नये लिंक पर न जा रहे हों तो शायद विषय सूची देखकर ही आप को लालच हो। पर ध्यान रहे विषय सामग्री इतने काम की है कि शायद ही आप सब कुछ अपने कंप्यूटर में सुरक्षित करने से चूकें। हाँ वर्तनी की त्रुटियाँ हैं पर कार्य की महानता और सार्थकता अधिक महत्वपूर्ण है।   

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काशी की विभूतियाँ राम कथा की विदेश-यात्रा

कवि एवं लेखक·         महाकवि विद्यापति ठाकुर ·         कबीर ·         अमीर ख़ुसरो दहलवी ·         मलिक मुहम्मद जायसी ·         रसखान ·         अब्दुर्रहीम खान खाना ·         तुलसीदास ·         सूरदास ·         मीराबाई ·         केशवदास ·         चन्द्रवरदाइ प्रेमचन्ददक्खिनी हिन्दीलेख, डिजिटल चित्र, श्रृव्य, चलचित्र पुस्तकें:

  उत्तरांचल:·         झारखण्ड:

·झारखण्ड प्रदेश और ग्रामीण प्रशासन

 छत्तीसगढ़

·         छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के बीच सामान्य जन का मसीहा “कबीर

·         छत्तीसगढ़ – एक आधुनिक नाम

बिहारबिहार एक सांस्कृतिक परिचय

मगध

मिथिला- वैभव

o        युगान्तर

o        अक्षर-अक्षर अमृत

o        महाकवि विद्यापति ठाकुर

o        कल्याणी कोश

मध्य प्रदेश 

राजस्थानी लोककथा: बुआजी की आँखें (भागीरथ कानोडिया)

In इन दिनों...These Days... on October 5, 2006 at 10:58 am

प्रद्युम्नसिंह नाम का एक राजा था। उसके पास एक हंस था। राजा उसे मोती चुगाया करता और बहुत लाड़-प्यार से उसका पालन किया करता। वह हंस नित्य प्रति सायंकाल राजा के महल से उड़कर कभी किसी दिशा में और कभी किसी दिशा में थोड़ा चक्कर काट आया करता।            एक दिन वह हंस उड़ता हुआ नीवनजी की छत पर जा बैठा। उकी पुत्रवधु गर्भवती थी। उसने सुन रखा था कि गर्भावस्था में यदि किसी स्त्री को हंस का मांस खाने को मिल जाय तो उसकी होने वाली संतान अत्यंत मेधावी, तेजस्वी और भाग्यशाली होती है। अनायास ही छत पर हंस आया देखकर उसके मुंह में पानी भर आया। उसने हंस को पकड़ लिया ओर रसोईघर में ले जाकर उसे पकाकर खा गई। इस बात का पता न उसने अपनी सास को  लगने दिया, न ससुर को और न पति को ही, क्योंकि उसे भय था कि अगर राजा को इस बात का सुराग लग गया तो बड़ा अनिष्ट हो जायगा।            उधर जब रात होने पर हंस राजमहल में नहीं पहुंचा तो राजा-रानी को बहुत चिंता हुई। उनका मन आकुल-व्याकुल होगया। चारों ओर उसकी खोज में आदमी दौड़ाये गए। लेकिन हंस कहीं हो तब मिले न! राजा ने अड़ोस-पड़ोस के शहरों-कस्बों में भी सूचना कराई कि अगर कोई हंस का पता लगा सके तो राज्य की ओर से उसे बहुत बड़ा पुरस्कार दिया जायगा।            दस-बीस दिन निकल गये। कुछ भी पता नहीं लग सका। चूंकि वह हंस राजा ओर रानी को बहुत प्रिय था, अत: वे उदास रहने लगे। एक दिन एक कुटटनी राजा के पास आई और बोली कि वह हंस का पता लगा सकती है, लेकिन उसे थोड़ा-सा समय चाहिए।            राजा ने कहा, “मेरे राज्य के पंडित-जयोतिषी, हाकिम-हुक्काम और मेरे इतने सारे गुप्तचरों में कोई भी पता नहीं लगा सका, तुम कैसे पता लगा सकोगी?”            कुटटनी ने कहा, “मुझे अपनी योग्यता पर विश्वास है। अगर अन्नदाता का हुक्म हो तो एक बार आकश के तारे भी तोड़कर ले आऊं। आप मुझे थोड़ा-सा समय दीजिए और आवश्यक धन दे दीजिय। उसे वापस ला सकूं या नहीं, लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाती हूं कि उसका अता-पता आवश्य ले आऊंगी।”            राजा ने स्वीकार कर लिया और कुटअनी अपने उद्देश्य की सिद्वि के लिए चल पड़ी।            सबसे पहले कुटटुनी ने यह पता लगाया कि शहर के धनिक घरों में कौन-कौन स्त्री गर्भवती हैं। उसे पता था कि गर्भावस्था में किसी स्त्री को यदि हंस का मांस मिल जाय तो वह बिना खाये नहीं रहेगी। साथ ही यह भी जनती थी कि साधारण घर की कोई स्त्री राजा का हंस पकड़ने का साहस नहीं कर सकती।            खोजते-खोजते उसे पता लगा कि दीवान की पुत्रवधू गर्भवती है। अत: उसके मन में संदेह हो गया कि हो सकता है, राजा का हंस उड़ते-उड़ते किसी दिन इनके घर की छत पर आ गया हो और गर्भावस्था में होने के कारण लोभवश यह स्त्री उसे खा गई हो।            कुटटनी ने सोचा, किसी भी स्त्री के साथ निकटस्थ मैत्री करने के लिए उसके पीहर के हालचाल जानना आवश्यक है। इसलिए कुटटनी उसके पीहर के गांव पहुंची। वहां जाकर उसने पहरवाले सारे लोगों के नाम-धाम तथा उनके घर में बीती हुई खास-खास पुरानी घटनाओं की जानकारी ली। उसे पता लगा कि दीवानजी की पुत्रवधू की बूआ छोटी उम्र में ही किसी साधु के साथ चली गई थी और आज तक लौटकर नहीं आई है। उसने सोचा, अब दीवानजी के घर जाकर उनकी पुत्रवधू की बुआ बनकर भेद लेने का अच्छा अस्त्र अपने हाथ आ गया।            वह दीवनजी के घर गई। उनकी पुत्रवधू के साथ बहुत स्नेह-ममत्व की बात करने लगी और बोली; “बेटी, मैं तेरी बुआ हूं। हम दोनों आज पहली बार मिली हैं। तुम जानती ही हो कि मैं तो बहुत पहले घर छोड़कर एक साधु के साथ चली गई थी। हल ही में घर लौटकर आयी और भाई से मिली तो उसने बताया कि तुम यहां ब्याही गई हो और तुम्हारे ससुर राज्य के दीवान हैं। यह जानकर मन में तुमसे मिलने की बहुत उत्कंठा हुई तो यहां चली आई। तुम्हें देखकर मेरे मन में बहुत ही हर्ष हुआ। भगवान तुम्हें सुखी रखें और तुम्हारी कोख से एक कांतिवान तेजस्वी पुत्र पैदा हो। मैं परसों वापस जा रही हूं और तुम्हारे लड़का होने के बाद भाई-भाभी को साथ लेकर बच्चे को देखने और उसका लाड़-चाव करने यहां आऊंगी।”            दीवान की पुत्रवधू ने अपने भोलपन के कारण उसकी बातों का विश्वास करलिया और बोली, “बुआजी, आप आई हैं तो दस-बीस दिन तो यहां रहिए। जाने की इतनी जल्दी भी क्या पड़ी है!”            बुआ बनी हुई कुटअनी को और क्या चाहिए था ! उसने वहां रहना स्वीकार कर लिया। थोड़े ही दिनों में बुआ-भतीजी खूब हिल-मिल गईं। एक दिन बातों-ही बातों में बुआजी ने कहा, “बेटी, गर्भावस्था में किसी स्त्री को अगर हंस का मांस खाने को मिल जाय तो बहुत अच्छा परिणाम निकलता है। उसके प्रभाव से होनेवाली संतानबहुत ही तेजस्वी और कांतिवान होती है; किंतु हंस तो मानसरोवर छोड़कर और कहीं होते नहीं, इसलिए यह काम पार पड़े तो कैसे पड़े !”            यह सुनकर उसने अपने हंस खाने की बात बुआजी को सहजभाव से बता दी। सुनकर बुआ ने कहा, “बेटी, यह अचरज की बात है कि तुम्हारे यहां राजा के पास हंस था ! तुमने जो कुछ किया, वह बहुत अच्छा किया; किन्तु तुम्हें किसी के सामने इस घटना का जिक्र नहीं करना चाहिए। मेरे सामने भी नहीं करना था। लेकिन खैर, मुझसे कही हुई बात तो कहीं जाने वाली नहीं है, इसलिए जिक्र कर दिया तो भी कोई बात नहीं!˝            कुछ दिन और बती गये, तब कुटटनी ने कहा, “बेटी, अगर भगवान के सामने तुम हंस खाने की बात स्वीकार कर लो तो हंस की हत्या का पाप तो सिर से उतर ही जायगा, सुपरिणाम भी द्विगुणित होगा। मंदिर के पुजारी से कहकर मैं ऐसी व्सवस्था कर दूंगी कि जिस वक्त वहां तुम सारी घटना बताकर अपराध स्वीकार करो, उस वक्त पुजारी भी वहां नहीं रहे तथा और भी कोई न रहे, हम दो ही रहेंगी।˝            उसने ऐसा करना स्वीकार कर लिया।            कुटटनी लुक-छिपकर राजा के पास पहुंची और बोली, “आपसे वायदा किया था, उसके अनुसार हंस का अता-पता लगा लाई हूं।˝ ऐसा कहकर उसने सारी घटना राजा को बताई।            राजा ने कहा, “इसका प्रमाण क्या है?˝            वह बोली, “फलां दिन आप मंदिन में आ जायं और हंस खाने वाली स्त्री की स्वीकारोक्ति स्वयं अपने कानों सुन लें।˝            राजा ने ऐसा करने की ‘हां’ भर ली।            नियत दिनसमय से कुछ पहले पूर्व-योजना के अनुसार कुटटनी ने राजा को एक जरा ऊंचे स्थान पर रखे हुए एक बड़े-से ढोल में छिपा दिया और बुआ-भतीजी मंदिर पहुंचीं।            मंदिर का पट खुला था। पुजारी या और दूसरा कोई भी व्यक्ति वहां नहीं था। अब बुआजी ने शुरू किया, “हां, तो बेटी क्या बात हुई थी उस दिन?˝            दीवानकी पुत्रवधू ने घटना आरम्भ की। वह थोड़ी-सी घटना ही कह पाई थी कि कुटटनी ने सोचा, राजा ध्यानपूर्वक सुन तो रहा है न, इसलिए वह ढोल की तरफ इशारा करके बोली, “ढोल रे ढोल, सुन रे बहू का बोल।˝            उसका इतना कहना था कि भतीजी का माथा ठनका। उसे वहम हो गया कि हो न हो, दाल में कुछ काला है। मालूम होता है, मैं तो ठगी गई हूं। वह चुप हो गई।            बुआ बोली; “हां तो बेटी, आगे क्या हुआ ?˝            इस पर भतीजी बोली, “उसके बाद तो बुआजी मेरी आंख खुल गयी, सपना टूट गया।”            ज्योंही भतीजी की आंख खुली, त्योंही बुआजी की आंखें भी खुली-की-खुली रह गईं। उसके पांव तो भतीजी से भी भारी हो गये और उसके लिए उठकर खड़े होना भी मुश्किल हो गया।

शंखनाद- मुंशी प्रेमचंद

In Story (कहानी), इन दिनों...These Days... on September 27, 2006 at 6:03 pm

भानु चौधरी अपने गॉँव के मुखिया थे। गॉँव में उनका बड़ा मान था। दारोगा जी उन्हें टाटा बिना जमीन पर न बैठने देते। मुखिया साहब को ऐसी धाक बँधी हुई थी कि उनकी मर्जी बिना गॉँव में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था। कोई घटना, चाहे, वह सास-बहु का विवाद हो, चाहे मेड़ या खेत का झगड़ा, चौधरी साहब के शासनाधिकारी को पूर्णरुप से सचते करने के लिए काफी थी, वह तुरन्त घटना स्थल पर पहुँचते, तहकीकात होने लगती गवाह और सबूत के सिवा किसी अभियोग को सफलता सहित चलाने में जिन बातों की जरुरत होती है, उन सब पर विचार होता और चौधरी जी के दरबार से फैसला हो जाता। किसी को अदालत जाने की जरुरत न पड़ी। हॉँ, इस कष्ट के लिए चौधरीसाहब कुछ फीस जरुर लेते थे। यदि किसी अवसर पर फीस मिलने में असुविधा के कारण उन्हें धीरज से काम लेना पड़ता तो गॉँव में आफत मच जाती थी; क्योंकि उनके धीरज और दरोगा जी के क्रोध में कोई घनिष्ठ सम्बन्ध था। सारांश यह है कि चौधरी से उनके दोस्त-दुश्मन सभी चौकन्ने रहते थे।

चौधरी माहश्य के तीन सुयोग्य पुत्र थे। बड़े लड़के बितान एक सुशिक्षित मनुष्य थे। डाकिये के रजिस्टर पर दस्तखत कर लेते थे।  बड़े अनुभवी, बड़े नीति कुशल। मिर्जई की जगह कमीज पहनते, कभी-कभी सिगरेट भी पीते, जिससे उनका गौरव बढ़ता था। यद्यपि उनके ये दुर्व्यसन बूढ़े चौधरी को नापसंद थे, पर बेचारे विवश थे; क्योंकि अदालत और कानून के मामले बितान के हाथों में थे। वह कानून का पुतला था। कानून की दफाएँ उसकी जबान पर रखी रहती थीं। गवाह गढ़ने में वह पूरा उस्ताद था। मँझले लड़के शान चौधरी कृषि-विभाग के अधिकारी  थे। बुद्धि के मंद; लेकिन शरीर से बड़े परिश्रमी। जहॉँ घास न जमती हो, वहॉँ केसर जमा दें। तीसरे लड़के का नाम गुमान था। वह बड़ा रसिक, साथ ही उद्दंड भी था। मुहर्रम में ढोल इतने जोरों से बजाता कि कान के पर्दे फट जाते। मछली फँसाने का बड़ा शौकीन था बड़ा रँगील जवान था। खँजड़ी बजा-बजाकर जब वह मीठे स्वर से ख्याल गाता, तो रंग जम जाता। उसे दंगल का ऐसा शौक था कि कोसों तक धावा मारता; पर घरवाले कुछ ऐसे शुष्क थे कि उसके इन व्यसनों से तलिक भी सहानुभूति न रखते थे। पिता और भाइयों ने तो उसे ऊसर खेत समझ रखा था। घुड़की-धमकी, शिक्षा और उपदेश, स्नेह और विनय, किसी का उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। हॉँ, भावजें अभी तक उसकी ओर से निराश न हुई थी। वे अभी तक उसे कड़वी दवाइयॉँ पिलाये जाती थी; पर आलस्य वह राज रोग है जिसका रोग कभी नहीं सँभलता। ऐसा कोई बिराल ही दिन जाता होगा कि बॉँक गुमान को भावजों के कटुवाक्य न सुनने पड़ते हों। ये बिषैले शर कभी-कभी उसे कठोर ह्रदय में चुभ जाते; किन्तु यह घाव रात भर से अधिक न रहता। भोर होते ही थकना के साथ ही यह पीड़ा भी शांत हा जाती। तड़का हुआ, उसने हाथ-मुँह धोया, बंशी उठायी और तालाब की ओर चल खड़ा हुआ। भावजें फूलों की वर्षा किया करती; बूढ़े चौधरी पैतरे बदलते रहते और भाई लोग तीखी निगाह से देखा करते, पर अपनी धुन का पूरा बॉँका गुमान उन लोगों के बीच से इस तरह अकड़ता चला जाता, जैसे कोई मस्त हाथी कुत्तों के बीच से निकल जाता है। उसे सुमार्ग पर लाने के लिए क्या-क्या उपाय नही किये गये। बाप समझाता-बेटा ऐसी राह चलो जिसमें तुम्हें भी पैसें मिलें और गृहस्थी का भी निर्वाह हो। भाइयों के भरोसे कब तक रहोगे? मैं पका आम हूँ-आज टपक पड़ा या कल। फिर तुम्हारा निबाह कैसे होगा ? भाई बात भी न पूछेगे; भावजों का रंग देख रहे हो। तुम्हारे भी लड़के बाले है, उनका भार कैसे सँभालोगे ? खेती में जी न लगे,  कास्टि-बिली में भरती करा दूँ ? बाँका गुमनान खड़ा-खड़ा यह सब सुनता, लेकिन पत्थर का देवता था, कभी न पसीजता ! इन माहश्य के अत्याचार का दंड उसकी स्त्री बेचारी को भोगना पड़ता था। मेहनत के घर के जितने काम होते, वे उसी के सिर थोपे जाते। उपले पाथती, कुंए से पानी लाती, आटा पीसती  और तिस पर भी जेठानानियॉँ सीधे मुँह बात न करती, वाक्य बाणों से छेदा करतीं। एक बार जब वह पति से कई दिन रुठी रही, तो बॉँके गुमान कुछ नर्म हुए। बाप से जाकर बोले-मुझे कोई दूकान खोलवा दीजिए। चौधरी ने परमात्मा को धन्यवाद दिया। फूले न समाये। कई सौ रुपये लगाकर कपड़े की दूकान खुलवा दी। गुमान के भाग जगे। तनजेब के चुन्नटदार कुरते बनवाये, मलमल का साफा धानी रंग में रँगवाया। सौदा बिके या न बिके, उसे लाभ ही होना था! दूकान खुली हुई है, दस-पाँच गाढ़े मित्र जमे हुए हैं, चरस की दम और खयाल की तानें उड़ रही हैं

चल झपट री, जमुना-तट री, खड़ो, नटखट री।

इस तरह तीन महीने चैन से कटे। बॉँके गुमान ने खूब दिल खोल कर अरमान निकाले, यहॉँ तक कि सारी लागत लाभ हो गयी। टाट के टुकड़े के सिवा और कुछ न बचा। बूढ़े चौधरी कुऍं में गिरने चले, भावजों ने घोर आन्दोलन मचायाअरे राम ! हमारे बच्चे और हम चीथड़ों को तरसें, गाढ़े का एक कुरता भी नसीब न हो, और इतनी बड़ी दूकान इस निखट्टू का कफ़न बन गई। अब कौन मुँह दिखायेगा? कौन मुँह लेकर घर में पैर रखेगा? किंतु बॉँके गुमान के तेवर जरा भी मैले न हुए। वही मुँह लिए वह फिर घर आया और फिर वही पुरानी चाल चलने लगा। कानूनदां बिताने उनके ये ठाट-बाट देकर जल जाता। मैं सारे दिन पसीना बहाऊँ, मुझे नैनसुख का कुरता भी न मिले, यह अपाहिज सारे दिन चारपाई तोड़े और यों बन-ठन कर निकाले? एसे वस्त्र तो शायद मुझे अपने ब्याह में भी न मिले होंगे। मीठे शान के ह्रदय में भी कुछ ऐसे ही विचार उठते थे। अंत में यह जलन सही न गयी, और अग्नि भड़की; तो एक दिन कानूनदाँ बितान की पत्नी गुमनाम के सारे कपड़े उठा लायी और उन पर मिट्टी का तेल उँड़ेल कर आग लगा दी। ज्वाला उठी, सारे कपड़े देखत-देखते जल कर राख हो गए। गुमान रोते थे। दोनों भाई खड़े तमाशा देखते थे। बूढ़े चौधरी ने यह दृश्य देखा, और सिर पीट लिया। यह द्वेषाग्नि हैं। घर को जलाकर तक बुझेगी।

यह ज्वाला तो थोड़ी देर में शांत हो गयी, परन्तु ह्रदय की आग ज्यों की त्यों दहकती रही। अंत में एक दिन बूढ़े चौधरी ने घर के सब मेम्बरों को एकत्र किया और गूढ़ विषय पर विचार करने लगे कि बेड़ा कैसे पार हो। बितान से बोले- बेटा, तुमने आज देखा कि बात की बात में सैकड़ों रुपयों पर पानी फिर गया। अब इस तरह निर्वाह होना असम्भव है। तुम समझदार हो, मुकदमे-मामले करते हो, कोई ऐसी राह निकालो कि घर डूबने से बचे। मैं तो चाहता था कि जब तक चोला रहे, सबको समेटे रहूँ, मगर भगवान् के मन में कुछ और ही है। बितान की नीतिकुशलता अपनी चतुर सहागामिनी के सामने लुप्त हो जाती थी। वह अभी उसका उत्तर सोच ही रहे थे कि श्रीमती जी बोल उठींदादा जी! अब समुझाने-बुझाने से काम नहीं चलेगा, सहते-सहते हमारा कलेजा पक गया। बेटे की जितनी पीर बाप को होगी, भाइयों को उतनी क्या, उसकी आधी भी नहीं हो सकती। मैं तो साफ कहती हूँगुमान को तुम्हारी कमाई में हक है, उन्हें कंचन के कौर खिलाओ और चॉँदी के हिंडाले में झुलाओ। हममें न इतना बूता है, न इतना कलेजा। हम अपनी झोपड़ी अलग बना लेगें। हॉँ, जो कुछ हमारा हो, वह हमको मिलना चाहिए। बॉँट-बखरा कर दीजिए। बला से चार आदमी हँसेगे, अब कहॉँ तक दुनिया की लाज ढोवें? नीतिज्ञ बितान पर इस प्रबल वक्तृता का जो असर हुआ, वह उनके विकासित और पुमुदित चेहरे से झलक रहा था। उनमें स्वयं इतना साहस न था कि इस प्रस्ताव का इतनी स्पष्टता से व्यक्त कर सकते। नीतिज्ञ महाशय गंभीरता से बोलेजायदाद मुश्तरका, मन्कूला या गैरमन्कूला, आप के हीन-हायात तकसीम की जा सकती है, इसकी नजीरें मौजूद है। जमींदार को साकितुलमिल्कियत करने का कोई इस्तहक़ाक़ नहीं है। अब मंदबुद्धि शान की बारी आयी, पर बेचारा किसान, बैलों के पीछे ऑंखें बंद करके चलने वाला, ऐसे गूढ़ विषय पर कैसे मुँह खोलता। दुविधा में पड़ा हुआ था। तब उसकी सत्यवक्ता धर्मपत्नी ने अपनी जेठानी का अनुसरण कर यह कठिन कार्य सम्पन्न किया। बोलीबड़ी बहन ने जो कुछ कहा, उसके सिवा और दूसरा उपाय नहीं। कोई तो कलेजा तोड़-तोड़ कर कमाये मगर पैसे-पैसे को तरसे, तन ढॉँकने को वस्त्र तक न मिले, और कोई सुख की नींद सोये, हाथ बढ़ा-बढ़ा के खाय! ऐसी अंधेरे नगरी में अब हमारा निबाह न होगा। शान चौधरी ने भी इस प्रस्ताव का मुक्तकंठ से अनुमोदन किया। अब बूढ़े चौधरी गुमान से बोलेक्यों बेटा, तुम्हें भी यह मंजूर है ? अभी कुछ नहीं बिगड़ा। यह आग अब भी बुझ सकती है। काम सबको प्यारा है, चाम किसी को नहीं। बोलो, क्या कहते हो ? कुछ काम-धंधा करोगे या अभी ऑंखें नहीं खुलीं ?गुमान में धैर्य की कमी न थी। बातों को इस कान से सुन कर उस कान से उड़ा देना उसका नित्य-कर्म था। किंतु भाइयों की इस जन-मुरीदी पर उसे क्रोध आ गया। बोलाभाइयों की जो इच्छा है, वही मेरे मन में भी लगी हुई है। मैं भी इस जंजाल से भागना चाहता हूँ। मुझसे न मंजूरी हुई, न होगी। जिसके भाग्य में चक्की पीसना बदा हो, वह पीसे! मेरे भाग्य में चैन करना लिखा है, मैं क्यों अपना सिर ओखली में दूँ ? मैं तो किसी से काम करने को नहीं कहता। आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए है। अपनी-अपनी फिक्र कीजिए। मुझे आध सेर आटे की कमी नही है। इस तरह की सभाऍं कितनी ही बार हो चुकी थीं, परन्तु इस देश की सामाजिक और राजनीतिक सभाओं की तरह इसमें भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता था। दो-तीन दिन गुमान ने घर पर खाना नहीं खाया। जतन सिंह ठाकुर शौकीन आदमी थे, उन्हीं की चौपाल में पड़ा रहता। अंत में बूढ़े चौधरी गये और मना के लाये। अब फिर वह पुरानी गाड़ी अड़ती, मचलती, हिलती चलने लगी।

 

पांडे घर के चूहों की तरह, चौधरी के धर में बच्चें भी सयाने थे। उनके लिए घोड़े मिट्टी के घोड़े और नावें कागज की नावें थीं। फलों के विषय में उनका ज्ञान असीम था, गूलर और जंगली बेर के सिवा कोई ऐसा फल न था जिसे बीमारियों का घर न समझते हों, लेकिन गुरदीन के खोंचे में ऐसा प्रबल आकर्षण था कि उसकी ललकार सुनते ही उनका सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता साधारण बच्चों की तरह यदि सोते भी हो; तो चौंक पड़ते थे। गुरदीन उस था। गॉँव में साप्ताहिक फेरे लगाता था। उसके शुभागमन की प्रतीक्षा और आकांक्षा में कितने ही बालकों को बिना किंडरागार्टन की रंगीन गोलियों के ही, संख्याऍं और दिनों के नाम याद हो गए थे। गुरदीन बूढ़ा-सा, मैला-कुचैला आदमी था; किन्तु आस-पास में उसका नाम उपद्रवी लड़कों के लिए हनुमान-मंत्र से कम न था। उसकी आवाज सुनते ही उसके खोंचे पर लड़कों का ऐसा धावा होता कि मक्खियों की असंख्य सेना को भी रण-स्थल से भागना पड़ता था। और जहॉँ बच्चों के लिए मिठाइयॉँ थीं, वहॉँ गुरदीन के पास माताओं के लिए इससे भी ज्यादा मीठी बातें थी। मॉँ कितना ही मना करती रहे, बार-बार पैसा न रहने का बहाना करे पर गुरदीन चटपट मिठाईयों का दोनों बच्चों के हाथ में रख ही देता और स्नहे-पूर्ण भाव से कहता—बहू जी, पैसों की कोई चिन्ता न करो, फिर मिलते रहेंगे, कहीं भागे थोड़े ही जाते हैं। नारायण ने तुमको बच्चे दिए हैं, तो मुझे भी उनकी न्योछावर मिल जाती है, उन्हीं की बदौलत मेरे बाल-बच्चे भी जीते हैं। अभी क्या, ईश्वर इनका मौर तो दिखावे, फिर देखना कैसा ठनगन करता हूँ।   गुरदीन का यह व्यवहारा चाहे वाणिज्य-नियमों के प्रतिकूल ही क्यों न हो, चाहे, नौ नगद सही, तेरह उधार नही वाली कहावत अनुभव-सिद्ध ही क्यों न हो, किन्तु मिष्टाभाषी गुरदीन को कभी अपने इस व्यवहार पर पछताने या उसमें संशोन करने की जरुरत नहीं हुई। मंगल का शुभ दिन था। बच्चे बड़े बेचैनी से अपने दरवाजे पर खड़े गुरदीन की राह देख रहे थे। कई उत्साही लड़के पेड़ पर चढ़ गए और कोई-कोई अनुराग से विवश होकर गॉँव के बाहर निकल गए थे। सूर्य भगवान् अपना सुनहला गाल लिए पूरब से पश्चिम जा पहुँचे थे, इतने में ही गुरदीन आता हुआ दिखाई दिया। लड़कों ने दौड़कर उसका दामन पकड़ा और आपस में खींचातानी होने लगी। कोई कहता था मेरे घर चलो; कोई अपने घर का न्योता देता था। सबसे पहले भानु चौधरी का मकान पड़ा। गुरदीन अपना खोंचा उतार दिया। मिठाइयों की लूट शुरु हो गयी। बालको और स्त्रियों का ठट्ट लग गया। हर्ष और विषाद, संतोष और लोभ, ईर्ष्या ओर क्षोभ, द्वेष और जलन की नाट्यशाला सज गयी। कनूनदॉँ बितान की पत्नी अपने तीनों लड़कों को लिए हुए निकली। शान की पत्नी भी अपने दोनों लड़कों के साथ उपस्थित हुई। गुरदीन ने मीठी बातें करनी शुरु की। पैसे झोली में रखे, धेले की मिठाई दी और धेले का आशीर्वाद। लड़के दोनो लिए उछलते-कूदते घर में दाखिल हुए। अगर सारे गॉँव में कोई ऐसा बालक था जिसने गुरदीन की उदारता से लाभ उठाया हो, तो वह बॉँके गुमान का लड़का धान था।यह कठिन था कि बालक धान अपने भाइयों-बहनों को हँस-हँस और उलल-उछल कर मिठाइयॉँ खाते देख कर सब्र कर जाय! उस पर तुर्रा यह कि वे उसे मिठाइयॉँ दिख-दिख कर ललचाते और चिढ़ाते थे।  बेचारा धान चीखता और अपनी मात का ऑंचल पकड़-पकड़ कर दरवाजे की तरफ खींचता था; पर वह अबला क्या करे। उसका ह्रदय बच्चे के लिए ऐंठ-ऐंठ कर रह जाता था। उसके पास एक पैसा भ्री नहीं था। अपने दुर्भाग्य पर, जेठानियों की निष्ठुरता पर और सबसे ज्यादा अपने पति के निखट्टूपन पर कुढ़-कुढ़ कर रह जाती थी। अपना आदमी ऐसा निकम्मा न होता, तो क्यों दूसरों का मुँह देखना पड़ता, क्यों दूसरों के धक्के खाने पड़ते ? उठा लिया और प्यार से दिलासा देने लगीबेटा, रोओ मत, अबकी गुरदीन आवेगा तो तुम्हें बहुत-सी मिठाई ले दूँगी, मैं इससे अच्छी मिठाई बाजार से मँगवा दूँगी, तुम कितनी मिठाई खाओग! यह कहते कहते उसकी ऑंखें भर अयी। आह! यह मनहूस मंगल आज ही फिर आवेगा; और फिर ये ही बहाने करने पड़ेगे! हाय, अपना प्यारा बच्चा धेले की मिठाई को तरसे और घर में किसी का पत्थर-सा कलेजा न पसीजे! वह बेचारी तो इन चिंताओं में डूबी हुई थी ओर धान किसी तरह चुप ही न होता था। जब कुछ वश न चला, तो मॉँ की गोद से जमीन पर उतर कर लोठने लगा और रो-रो कर दुनिया सिर पर उठा ली। मॉँ ने बहुत बहलाया, फुसलाया, यहॉँ तक कि उसे बच्चे के इस हठ पर क्रोध भी आ गया। मानव ह्रदय के रहस्य कभी समझ में नहीं आते। कहॉँ तो बच्चे को प्यार से चिपटाती थी, ऐसी झल्लायी की उसे दो-तीन थप्पड़ जोर से लगाये और घुड़कर कर बोलीचुप रह आभगे! तेरा ही मुँह मिठाई खाने का है ? अपने दिन को नहीं रोता, मिठाई खाने चला है।बाँका गुमान अपनी कोठरी के द्वार पर बैठा हुआ यह कौतुक बड़े ध्यान से देख रहा था। वह इस बच्चे को बहुत चाहता था। इस वक्त के थप्पड़ उसके ह्रदय में तेज भाले के समान लगे और चुभ गया। शायद उसका अभिप्राय भी यही था। धुनिया रुई को धुनने के लिए तॉँत पर चोट लगाता है। जिस तरह पत्थर और पानी में आग छिपी रहती है, उसी तरह मनुष्य के ह्रदय में भी, चाहे वह कैसा ही क्रूर और कठोर क्यों न हो, उत्कृष्ट और कोमल भाव छिपे रहते हैं। गुमान की ऑंखें भर आयी। ऑंसू की बूँदें बहुधा हमारे ह्रदय की मुलिनता को उज्जवल कर देती हैं। गुमान सचेत हो गया। उसने जा कर बच्चे का गोद में उठा लिया और अपनी पत्नी से करुणोत्पादक स्वर में बोलाबच्चे पर इतना क्रोध क्यों करती हो ? तुम्हारा दोषी मैं हूँ, मुझको जो दंड चाहो, दो। परमात्मा ने चाहा तो कल से लोग इस घर में मेरा और मेरे बाल-बच्चों का भी आदर करेंगे। तुमने आज मुझे सदा के लिए इस तरह जगा दिया, मानों मेरे कानों में शंखनाद कर मुझे कर्म-पथ में प्रवेश का उपदेश दिया हो।

 

बड़े घर की बेटी- मुंशी प्रेमचंद

In Story (कहानी), इन दिनों...These Days... on September 27, 2006 at 5:52 pm

बड़े घर की बेटी

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गॉँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गॉँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ शेष न रहा था; पर दूध शायद बहुत देती थी; क्योंकि एक न एक आदमी हॉँड़ी लिए उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान आय एक हजार रुपये वार्षिक से अधिक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी.ए. की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा,चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सबेरे पी जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी। इन नेत्रप्रिय गुणों को उन्होंने बी०ए०–इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर कर दिया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था। इसी से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वेदिक औषधियों पर उनका अधिक विश्वास था। शाम-सबेरे उनके कमरे से प्राय: खरल की सुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनायी दिया करती थी। लाहौर और कलकत्ते के वैद्यों से बड़ी लिखा-पढ़ी रहती थी।      श्रीकंठ इस अँगरेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी अँगरेजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे; बल्कि वह बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। इसी से गॉँव में उनका बड़ा सम्मान था। दशहरे के दिनों में वह बड़े उत्साह से रामलीला होते और स्वयं किसी न किसी पात्र का पार्ट लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे। प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगान उनकी धार्मिकता का प्रधान अंग था। सम्मिलित कुटुम्ब के तो वह एक-मात्र उपासक थे। आज-कल स्त्रियों को कुटुम्ब को कुटुम्ब में मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गॉँव की ललनाऍं उनकी निंदक थीं ! कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न करती थीं !  स्वयं उनकी पत्नी को ही इस विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि घृणा थी; बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके, तो आये-दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलग पकायी जाय।      आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेट और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यहॉँ विद्यमान थे। नाम था भूपसिंह। बड़े उदार-चित्त और  प्रतिभाशाली पुरुष थे; पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी न था। सात लड़कियॉँ हुईं और दैवयोग से सब की सब जीवित रहीं। पहली उमंग में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोलकर किये; पर पंद्रह-बीस हजार रुपयों का कर्ज सिर पर हो गया, तो ऑंखें खुलीं, हाथ समेट लिया। आनंदी चौथी लड़की थी। वह अपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर संतान को कदाचित् उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसका विवाह कहॉँ करें? न तो यही चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न यही स्वीकार था कि उसे अपने को भाग्यहीन समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ उनके पास किसी चंदे का रुपया मॉँगने आये। शायद नागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम से श्रीकंठसिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया।      आनंदी अपने नये घर में आयी, तो यहॉँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहां नाम-मात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का तो कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी स्लीपर साथ लायी थी; पर यहॉँ बाग कहॉँ। मकान में खिड़कियॉँ तक न थीं, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थी का मकान था; किन्तु आनंदी ने थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानों उसने विलास के सामान कभी देखे ही न थे। 

एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला–जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है। आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी। हांड़ी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक न था। बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाने। उसने सब घी मांस में डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी न था, बोला-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?      आनंदी ने कहा–घी सब मॉँस में पड़ गया। लालबिहारी जोर से बोला–अभी परसों घी आया है। इतना जल्द उठ गया?      आनंदी ने उत्तर दिया–आज तो कुल पाव–भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस में डाल दिया।      जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक कर बोला–मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो !      स्त्री गालियॉँ सह लेती हैं, मार भी सह लेती हैं; पर मैके की निंदा उनसे नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली–हाथी मरा भी, तो नौ लाख का। वहॉँ इतना घी नित्य नाई-कहार खा जाते हैं।      लालबिहारी जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और बोला–जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।      आनंद को भी क्रोध आ गया। मुँह लाल हो गया, बोली–वह होते तो आज इसका मजा चखाते।      अब अपढ़, उजड्ड ठाकुर से न रहा गया। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटी थी। जब जी चाहता, उस पर हाथ साफ कर लिया करता था। खड़ाऊँ उठाकर आनंदी की ओर जोर से फेंकी, और बोला–जिसके गुमान पर भूली हुई हो, उसे भी देखूँगा और तुम्हें भी।      आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सिर बच गया; पर अँगली में बड़ी चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भॉँति कॉँपती हुई अपने कमरे में आ कर खड़ी हो गयी। स्त्री का बल और साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। आनंदी खून का घूँट पी कर रह गयी।

 

श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे। वृहस्पति को यह घटना हुई थी। दो दिन तक आनंदी कोप-भवन में रही। न कुछ खाया न पिया, उनकी बाट देखती रही। अंत में शनिवार को वह नियमानुकूल संध्या समय घर आये और बाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार तथा कुछ नये मुकदमों आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता रहा। गॉँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे ! किसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठी। एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा–भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुँह सँभाल कर बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायगा।      बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर साक्षी दी–हॉँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मूँह लगें।      लालबिहारी–वह बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं है। श्रीकंठ ने चिंतित स्वर से पूछा–आखिर बात क्या हुई?      लालबिहारी ने कहा–कुछ भी नहीं; यों ही आप ही आप उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोगों को कुछ समझती ही नहीं।      श्रीकंठ खा-पीकर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा–चित्त तो प्रसन्न है।      श्रीकंठ बोले–बहुत प्रसन्न है; पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा है?      आनंदी की त्योरियों पर बल पड़ गये, झुँझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी। बोली–जिसने तुमसे यह आग लगायी है, उसे पाऊँ, मुँह झुलस दूँ।      श्रीकंठ–इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कहो।      आनंदी–क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है ! नहीं तो गँवार छोकरा, जिसको चपरासगिरी करने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर यों न अकड़ता।श्रीकंठ–सब हाल साफ-साफ कहा, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं।            आनंदी–परसों तुम्हारे लाड़ले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हॉँडी में पाव-भर से अधिक न था। वह सब मैंने मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा–दल में घी क्यों नहीं है? बस, इसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा–मुझसे न रहा गया। मैंने कहा कि वहॉँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते हैं, और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊँ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाय। उसी से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है या झूठ।      श्रीकंठ की ऑंखें लाल हो गयीं। बोले–यहॉँ तक हो गया, इस छोकरे का यह साहस !    आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी; क्योंकि ऑंसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान् और शांति पुरुष थे। उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था; स्त्रियों के ऑंसू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं। रात भर करवटें बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रात:काल अपने बाप के पास जाकर बोले–दादा, अब इस घर में मेरा निबाह न होगा।      इस तरह की विद्रोह-पूर्ण बातें कहने पर श्रीकंठ ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को आड़े हाथों लिया था; परन्तु दुर्भाग्य, आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने मुँह से कहनी पड़ी ! दूसरों को उपदेश देना भी कितना सहज  है!      बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले–क्यों?      श्रीकंठ–इसलिए कि मुझे भी अपनी मान–प्रतिष्ठा का कुछ विचार है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर–सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा घर पर रहता नहीं। यहॉँ मेरे पीछे स्त्रियों पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तक चिन्ता नहीं। कोई एक की दो कह ले, वहॉँ तक मैं सह सकता हूँ किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम न मारुँ। बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे सके। श्रीकंठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया। केवल इतना ही बोला–बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियॉं इस तरह घर का नाश कर देती है। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।श्रीकंठ–इतना मैं जानता हूँ, आपके आशीर्वाद से ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझाने से, इसी गॉँव में कई घर सँभल गये, पर जिस स्त्री की मान-प्रतिष्ठा का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता हूँ, उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत् व्यवहार मुझे असह्य है। आप सच मानिए, मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड नहीं होता।अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बातें और न सुन सके। बोले–लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब कभी भूल–चूक हो, उसके कान पकड़ो लेकिन.श्रीकंठलालबिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता।बेनीमाधव सिंह–स्त्री के पीछे?श्रीकंठजी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।दोनों कुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसी बीच में गॉँव के और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने वहॉँ आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने की तैयार हैं, तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर वाणियॉँ सुनने के लिए उनकी आत्माऍं तिलमिलाने लगीं। गॉँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थेश्रीकंठ अपने बाप से दबता है, इसीलिए वह दब्बू है। उसने विद्या पढ़ी, इसलिए वह किताबों का कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकी मूर्खता है। इन महानुभावों की शुभकामनाऍं आज पूरी होती दिखायी दीं। कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखाने आ कर बैठ गया। बेनीमाधव सिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को ताड़ गये। उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछ ही क्यों न हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा। तुरंत कोमल शब्दों में बोले–बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तम्हारा जो जी चाहे करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथकंडों की उसे क्या खबर? बाप ने जिस मतलब से बात पलटी थी, वह उसकी समझ में न आया। बोलालालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।      बेनीमाधवबेटा, बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो कुछ भूल हुई, उसे तुम बड़े होकर क्षमा करो।      श्रीकंठउसकी इस दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वही घर में रहेगा, या मैं ही। आपको यदि वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना भार आप सॅंभाल लूँगा। यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहॉँ चाहे चला जाय। बस यह मेरा अंतिम निश्चय है।      लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत आदर करता था। उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाय, हुक्का पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह इतना मान न करता था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह इलाहाबाद से आते, तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्यौढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जा कर उसे गले लगा लिया था, पॉँच रुपये के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हृदय-विदारक बात सुनकर लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह फूट-फूट कर रोने लगा। इसमें संदेह नहीं कि अपने किये पर पछता रहा था। भाई के आने से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सम्मुख कैसे जाऊँगा, उनसे कैसे बोलूँगा, मेरी ऑंखें उनके सामने कैसे उठेगी। उसने समझा था कि भैया मुझे बुलाकर समझा देंगे। इस आशा के विपरीत आज उसने उन्हें निर्दयता की मूर्ति बने हुए पाया। वह मूर्ख था। परंतु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ उसे अकेले में बुलाकर दो-चार बातें कह देते; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित् उसे इतना दु:ख न होता; पर भाई का यह कहना कि अब मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया ! वह रोता हुआ घर आया। कोठारी में जा कर कपड़े पहने, ऑंखें पोंछी, जिसमें कोई यह न समझे कि रोता था। तब आनंदी के द्वार पर आकर बोलाभाभी, भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते; इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा ! मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।       यह कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।                        जिस समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ था, उसी समय श्रीकंठ सिंह भी ऑंखें लाल किये बाहर से आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से ऑंखें फेर लीं, और कतरा कर निकल गये। मानों उसकी परछाही से दूर भागते हों।आनंदी ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी वह स्वभाव से ही दयावती थी। उसे इसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इतनी बढ़ जायगी। वह मन में अपने पति पर झुँझला रही थी कि यह इतने गरम क्यों होते हैं। उस पर यह भय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझसे इलाहाबाद चलने को कहें, तो कैसे क्या करुँगी। इस बीच में जब उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूँ, मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, क्षमा करना, तो उसका रहा-सहा क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।      श्रीकंठ को देखकर आनंदी ने कहालाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।      श्रीकंठ–तो मैं क्या करूँ?      आनंदीभीतर बुला लो। मेरी जीभ में आग लगे ! मैंने कहॉँ से यह झगड़ा उठाया।      श्रीकंठ–मैं न बुलाऊँगा।      आनंदी–पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।      श्रीकंठ न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर कहा–भाभी, भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते; इसलिए मैं भी अपना मुँह उन्हें न दिखाऊँगा।      लालबिहारी इतना कह कर लौट पड़ा, और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदी कमरे से निकली और उसका हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और ऑंखों में ऑंसू भरे बोला–मुझे जाने दो।

      आनंदी कहॉँ जाते हो?

लालबिहारी–जहॉँ कोई मेरा मुँह न देखे।      आनंदीमैं न जाने दूँगी?      लालबिहारीमैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।      आनंदीतुम्हें मेरी सौगंध अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।      लालबिहारीजब तक मुझे यह न मालूम हो जाय कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।      आनंदीमैं ईश्वर को साक्षी दे कर कहती हूँ कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।      अब श्रीकंठ का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया। दोनों भाई खूब फूट-फूट कर रोये। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहाभैया, अब कभी मत कहना कि तुम्हारा मुँह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।      श्रीकंठ ने कॉँपते हुए स्वर में कहा–लल्लू ! इन बातों को बिल्कुल भूल जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा अवसर न आवेगा।      बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गये। बोल उठेबड़े घर की बेटियॉँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।      गॉँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा—‘बड़े घर की बेटियॉँ ऐसी ही होती हैं।

 

दुर्गा का मंदिर- मुंशी प्रेमचंद

In Story (कहानी), इन दिनों...These Days... on September 27, 2006 at 5:44 pm

दुर्गा का मन्दिर

बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नु रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली।       ब्रजनाथ ने क्रुद्घ हो कर भामा से कहातुम इन दुष्टों को यहॉँ से हटाती हो कि नहीं? नहीं तो मैं एक-एक की खबर लेता हूँ।       भामा चूल्हें में आग जला रही थी, बोलीअरे तो अब क्या संध्या को भी पढ़तेही रहोगे? जरा दम तो ले लो।      ब्रज०–उठा तो न जाएगा; बैठी-बैठी वहीं से कानून बघारोगी ! अभी एक-आध को पटक दूंगा, तो वहीं से गरजती हुई आओगी कि हाय-हाय ! बच्चे को मार डाला !       भामातो मैं कुछ बैठी या सोयी तो नहीं हूँ। जरा एक घड़ी तुम्हीं लड़को को बहलाओगे, तो क्या होगा ! कुछ मैंने ही तो उनकी नौकरी नहीं लिखायी!      ब्रजनाथ से कोई जवाब न देते बन पड़ा। क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग न पा कर और भी प्रबल हो जाता है। यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों के ज्ञाता थे; पर उनके पालन में इस समय कुशल न दिखायी दी। मुद्दई और मुद्दालेह, दोनों को एक ही लाठी हॉँका, और दोनों को रोते-चि

सावन का महीना था। आज कई दिन के बाद बादल हटे थे। हरे-भरे वृक्ष सुनहरी चादर ओढ़े खड़े थे। मृदु समीर सावन का राग गाता था, और बगुले डालियों पर बैठे हिंडोले झूल रहे थे। ब्रजनाथ एक बेंच पर आ बैठे और किताब खोली। लेकिन इस ग्रंथ को अपेक्षा प्रकृति-ग्रंथ का अवलोकन अधिक चित्ताकर्षक था। कभी आसमान को पढ़ते थे, कभी पत्तियों को, कभी छविमयी हरियाली को और कभी सामने मैदान में खेलते हुए लड़कों को।

      एकाएक उन्हें सामने घास पर कागज की एक पुड़िया दिखायी दी। माया ने जिज्ञासा कीआड़ में चलो, देखें इसमें क्या है।

      बुद्धि ने कहातुमसे मतलब? पड़ी रहने दो।

लेकिन जिज्ञासा-रुपी माया की जीत हुई। ब्रजनाथ ने उठ कर पुड़िया उठा ली। कदाचित् किसी के पैसे पुड़िया में लिपटे गिर पड़े हैं। खोल कर देखा; सावरेन थे। गिना, पुरे आठ निकले। कुतूहल की सीमा न रही।       ब्रजनाथ की छाती धड़कने लगी। आठों सावरेन हाथ में लिये सोचने लगे, इन्हें क्या करुँ? अगर यहीं रख दूँ, तो न जाने किसकी नजर पड़े; न मालूम कौन उठा ले जाय ! नहीं यहॉँ रखना उचित नहीं। चलूँ थाने में इत्तला कर दूँ और ये सावरेन थानेदार को सौंप दूँ। जिसके होंगे वह आप ले जायगा या अगर उसको न भी मिलें, तो मुझ पर कोई दोष न रहेगा, मैं तो अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाऊँगा।       माया ने परदे की आड़ से मंत्र मारना शुरु किया। वह थाने नहीं गये, सोचाचलूं भामा से एक दिल्लगी करुँ। भोजन तैयार होगा। कल इतमीनान से थाने जाऊँगा।      भामा ने सावरेन देखे, तो हृदय मे एक गुदगुदी-सी हुई। पूछा किसकी है?ब्रज०–मेरी।भामाचलो, कहीं हो न !ब्रज०पड़ी मिली है।भामाझूठ बात। ऐसे ही भाग्य के बली हो, तो सच बताओ कहॉँ मिली? किसकी है?ब्रज०सच कहता हूँ, पड़ी मिली है। भामामेरी कसम?ब्रज०तुम्हारी कसम।भामा गिन्नयों को पति के हाथ से छीनने की चेष्टा करने लगी। ब्रजनाथ के कहाक्यों छीनती हो?भामालाओ, मैं अपने पास रख लूँ।ब्रज०रहने दो, मैं इसकी इत्तला करने थाने जाता हूँ।भामा का मुख मलिन हो गया। बोलीपड़े हुए धन की क्या इत्तला?ब्रज०हॉँ, और क्या, इन आठ गिन्नियों के लिए ईमान बिगाडूँगा? भामाअच्छा तो सवेरे चले जाना। इस समय जाओगे, तो आने में देर होगी।      ब्रजनाथ ने भी सोचा, यही अच्छा। थानेवाले रात को तो कोई कारवाई करेंगे नहीं। जब अशर्फियों को पड़ा रहना है, तब जेसे थाना वैसे मेरा घर।

      गिन्नियॉँ संदूक में रख दीं। खा-पी कर लेटे, तो भामा ने हँस कर कहाआया धन क्यों छोड़ते हो? लाओ, मैं अपने लिए एक गुलूबंद बनवा लूँ, बहुत दिनों से जी तरस रहा है।

माया ने इस समय हास्य का रुप धारण किया। ब्रजनाथ ने तिरस्कार करके कहागुलूबंद की लालसा में गले में फॉँसी लगाना चाहती हो क्या? ल्लाते छोड़ कानून का ग्रंथ बगल में दबा कालेज-पार्क की राह ली।

 

प्रात:काल ब्रजनाथ थाने के लिए तैयार हूए। कानून का एक लेक्चर छूट जायेगा, कोई हरज नहीं। वह इलाहाबाद के हाईकोर्ट में अनुवादक थे। नौकरी में उन्नति की आशा न देख कर साल भर से वकालत की तैयारी में मग्न थे; लेकिन अभी कपड़े पहन ही रहे थे कि उनके एक मित्र मुंशी गोरेवाला आ कर बैठ गये, ओर अपनी पारिवारिक दुश्चिंताओं की विस्मृति की रामकहानी सुना कर अत्यंत विनीत भाव से बोलेभाई साहब, इस समय मैं इन झंझटों मे ऐसा फँस गया हूँ कि बुद्धि कुछ काम नहीं करती। तुम बड़े आदमी हो। इस समय कुछ सहायता करो। ज्यादा नहीं तीस रुपये दे दो। किसी न किसी तरह काम चला लूँगा, आज तीस तारीख है। कल शाम को तुम्हें रुपये मिल जायँगे।      ब्रजनाथ बड़े आदमी तो न थे; किन्तु बड़प्पन की हवा बॉँध रखी थी। यह मिथ्याभिमान उनके स्वभाव की एक दुर्बलता थी। केवल अपने वैभव का प्रभाव डालने के लिए ही वह बहुधा मित्रों की छोटी-मोटी आवश्यकताओं पर अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को निछावर कर दिया करत थे, लेकिन भामा को इस विषय में उनसे सहानुभूति न थी, इसलिए जब ब्रजनाथ पर इस प्रकार का संकट आ पड़ता था, तब थोड़ी देर के लिए उनकी पारिवारिक शांति अवश्य नष्ट हो जाती थी। उनमें इनकार करने या टालने की हिम्मत न थी।      वह सकुचाते हुए भामा के पास गये और बोलेतुम्हारे पास तीस रुपये तो न होंगे? मुंशी गोरेलाल मॉँग रहे है।भामा ने रुखाई से रहामेरे पास तो रुपये नहीं।ब्रज०होंगे तो जरुर, बहाना करती हो। भामाअच्छा, बहाना ही सही।ब्रज०तो मैं उनसे क्या कह दूँ !भामाकह दो घर में रुपये नहीं हैं, तुमसे न कहते बने, तो मैं पर्दे की आड़ से कह दूँ।ब्रज०–कहने को तो मैं कह दूँ, लेकिन उन्हें विश्वास न आयेगा। समझेंगे, बहाना कर रहे हैं।भामा–समझेंगे; तो समझा करें। ब्रज०मुझसे ऐसी बमुरौवती नहीं हो सकती। रात-दिन का साथ ठहरा, कैसे इनकार करुँ?भामाअच्छा, तो जो मन में आवे, सो करो। मैं एक बार कह चुकी, मेरे पास रुपये नहीं।ब्रजनाथ मन में बहुत खिन्न हुए। उन्हें विश्वास था कि भामा के पास रुपये है; लेकिन केवल मुझे लज्जित करने के लिए इनकार कर रही है। दुराग्रह ने संकल्प को दृढ़ कर दिया। संदूक से दो गिन्नियॉँ निकालीं और गोरेलाल को दे कर बोलेभाई, कल शाम को कचहरी से आते ही रुपये दे जाना। ये एक आदमी की अमानत हैं, मैं इसी समय देने जा रहा था      –यदि कल रुपये न पहुँचे तो मुझे बहुत लज्जित होना पड़ेगा; कहीं मुँह दिखाने योग्य न रहूँगा।

गोरेलाल ने मन में कहाअमानत स्त्री के सिवा और किसकी होगी, और गिन्नियॉँ जेब मे रख कर घर की राह ली।

आज पहली तारीख की संध्या है। ब्रजनाथ दरवाजे पर बैठे गोरेलाल का इंतजार कर रहे है। पॉँच बज गये, गोरेलाल अभी तक नहीं आये। ब्रजनाथ की ऑंखे रास्ते की तरफ लगी हुई थीं। हाथ में एक पत्र था; लेकिन पढ़ने में जी नहीं लगता था। हर तीसरे मिनट रास्ते की ओर देखने लगते थे; लेकिन सोचते थेआज वेतन मिलने का दिन है। इसी कारण आने में देर हो रही है। आते ही होंगे। छ: बजे, गोरे लाल का पता नहीं। कचहरी के कर्मचारी एक-एक करके चले आ रहे थे। ब्रजनाथ को कोई बार धोखा हुआ। वह आ रहे हैं। जरुर वही हैं। वैसी ही अचनक है। वैसे ही टोपी है। चाल भी वही है। हॉँ, वही हैं। इसी तरफ आ रहे हैं। अपने हृदय से एक बोझा-सा उतरता मालूम हुआ; लेकिन निकट आने पर ज्ञात हुआ कि कोई और है। आशा की कल्पित मूर्ति दुराशा में बदल गयी।       ब्रजनाथ का चित्त खिन्न होने लगा। वह एक बार कुरसी से उठे। बरामदे की चौखट पर खडे हो, सड़क पर दोनों तरफ निगाह दौड़ायी। कहीं पता नहीं। दो-तीन बार दूर से आते हुए इक्कों को देख कर गोरेलाल का भ्रम हुआ। आकांक्षा की प्रबलता !       सात बजे; चिराग जल गये। सड़क पर अँधेरा छाने लगा। ब्रजनाथ सड़क पर उद्विग्न भाव से टहलने लगे। इरादा हुआ, गोरेलाल के घर चलूँ, उधर कदम बढाये; लेकिन हृदय कॉँप रहा था कि कहीं वह रास्ते में आते हुए न मिल जायँ, तो समझें कि थोड़े-से रुपयों के लिए इतने व्याकुल हो गये। थोड़ी ही दूर गये कि किसी को आते देखा। भ्रम हुआ, गोरेलाल है, मुड़े और सीधे बरामदे में आकर दम लिया, लेकिन फिर वही धोखा ! फिर वही भ्रांति ! तब सोचले लगे कि इतनी देर क्यों हो रही हैं? क्या अभी तक वह कचहरी से न आये होंगे ! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। उनके दफ्तर-वाले मुद्दत हुई, निकल गये। बस दो बातें हो सकती हैं, या तो उन्होंने कल आने का निश्चय कर लिया, समझे होंगे, रात को कौन जाय, या जान-बूझ कर बैठे होंगे, देना न चाहते होंगे, उस समय उनको गरज थी, इस समय मुझे गरज है। मैं ही किसी को क्यों न भेज दूँ? लेकिन किसे भेजूँ? मुन्नू जा सकता है। सड़क ही पर मकान है। यह सोच कर कमरे में गये, लैप जलाया और पत्र लिखने बैठे, मगर ऑंखें द्वार ही की ओर लगी हुई थी। अकस्मात् किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। परन्तु पत्र को एक किताब  के नीचे दबा लिया और बरामद में चले आये। देखा, पड़ोस का एक कुँजड़ा तार पढ़ाने आया है। उससे बोलेभाई, इस समय फुरसत नहीं हैं; थोड़ी देर में आना। उसने कहा–बाबू जी, घर भर के आदमी घबराये हैं, जरा एक निगाह देख लीजिए। निदान ब्रजनाथ ने झुँझला कर उसके हाथ से तार ले लिया, और सरसरी नजर से देख कर बोलेकलकत्ते से आया है। माल नहीं पहुँचा। कुँजड़े ने डरते-डरते कहाबाबू जी, इतना और देख लीजिए किसने भेजा है। इस पर ब्रजनाथ ने तार फेंक दिया और बोले–मुझे इस वक्त फुरसत नहीं है।      आठ बज गये। ब्रजनाथ को निराशा होने लगीमुन्नू इतनी रात बीते नहीं जा सकता। मन में निश्चय किया, आज ही जाना चाहिए, बला से बुरा मानेंगे। इसकी कहॉँ तक चिंता करुँ स्पष्ट कह दूँगा मेरे रुपये दे दो। भलमानसी भलेमानसों से निभाई जा सकती है। ऐसे धूर्तो के साथ भलमनसी का व्यवहार करना मूर्खता हैं अचकन पहनी; घर में जाकर माया से कहाजरा एक काम से बाहर जाता हूँ, किवाड़े बन्द कर लो।       चलने को तो चले; लेकिन पग-पग पर रुकते जाते थे। गोरेलाल का घर दूर से दिखाई दिया; लैंप जल रहा था। ठिठक गये और सोचने लगे चल कर क्या कहूँगा? कहीं उन्होंने जाते-जाते रपए निकाल कर दे दिये, और देर के लिए क्षमा मॉँगी तो मुझे बड़ी झेंप होगी। वह मुझे क्षुद्र, ओछा, धैर्यहीन समझेंगे। नहीं, रुपयों की आतचीत करूँ? कहूंगाभाई घर में बड़ी देर से पेट दर्द कर रहा है। तुम्हारे पास पुराना तेज सिरका तो नहीं है मगर नहीं, यह बहाना कुछ भद्दा-सा प्रतीत होता है। साफ कलई खुल जायगी। ऊंह ! इस झंझट की जरुरत ही क्या है। वह मुझे देखकर आप ही समझ जायेंगे। इस विषय में बातचीत की कुछ नौबत ही न आवेगी। ब्रजनाथ इसी उधेड़बुन में आगे बढ़ते चले जाते थे जैसे नदी में लहरें चाहे किसी ओर चलें, धारा अपना मार्ग नहीं छोड़ती।      गोरेलाल का घर आ गया। द्वार बंद था। ब्रजनाथ को उन्हें पुकारने का साहस न हुआ, समझे खाना खा रहे होंगे। दरवाजे के सामने से निकले, और धीरे-धीरे टहलते हुए एक मील तक चले गए। नौ बजने की आवाज कान में आयी। गोरेलाल भोजन कर चुके होंगे, यह सोचकर लौट पड़े; लेकिन द्वार पर पहुंचे तो, अंधेरा था। वह आशा-रूपी दीपक बुझ गया था। एक मिनट तक दुविधा में खड़े रहे। क्या करूँ। अभी बहुत सबेरा है। इतनी जल्दी थोड़े ही सो गए होंगे? दबे पॉँव बरामदे पर चढ़े। द्वार पर कान लगा कर सुना, चारों ओर ताक रहे थे कि कहीं कोई देख न ले। कुछ बातचीत की भनक कान में पड़ी। ध्यान से सुना। स्त्री कह रही थी-रुपये तो सब उठ रए, ब्रजनाथ को कहॉँ से दोगे? गोरेलाल ने उत्तर दिया-ऐसी कौन सी उतावली है, फिर दे देंगे। और दरख्वास्त दे दी है, कल मंजूर हो ही जायगी। तीन महीने के बाद लौटेंगे तब देखा जायगा।      ब्रजनाथ को ऐसा जान पड़ा मानों मुँह पर किसी न तमाचा मार दिया।      क्रोध और नैराश्य से भरे हुए बरामदे में उतर आए। घर चले तो सीधे कदम न पड़ते थे, जैसे कोई दिन-भर का थका-मॉंदा पथिक हो।

 

ब्रजनाथ रात-भर करवटें बदलते रहे। कभी गोरेलाल की धुर्तता पर क्रोध आता था, कभी अपनी सरलता पर; मालूम नहीं; किस गरीब के रुपये हैं। उस पर क्या बीती होगी ! लेकिन अब क्रोध या खेद रो क्या लाभ? सोचने लगे–रुपये कहॉँ से आवेंगे? भाभा पहले ही इनकार कर चुकी है, वेतन में इतनी गुंजाइश नहीं। दस-पॉँच रुपये की बात होती तो कतर ब्योंत करता। तो क्या करू? किसी से उधार लूँ। मगर मुझे कौन देगा। आज तक किसी से मॉँगने का संयोग नहीं पड़ा, और अपना कोई ऐसा मित्र है भी नहीं। जो लोग हैं, मुझी को सताया करते हैं, मुझे क्या देंगे। हॉँ, यदि कुछ दिन कानून छोड़कर अनुवाद करने में परिश्रम करूँ, तो रुपये मिल सकते हैं। कम-से-कम एक मास का कठिन परिश्रम है। सस्ते अनुवादकों के मारे दर भी तो गिर गयी है ! हा निर्दयी ! तूने बड़ी दगा की। न जाने किस जन्म का बैर चुकाया है। कहीं का न रखा !      दूसरे दिन ब्रजनाथ को रुपयों की धुन सवार हुई। सबेरे कानून के लेक्चर में सम्मिलित होते, संध्या को कचहरी से तजवीजों का पुलिंदा घर लाते और आधी रात बैठे अनुवाद किया करते। सिर उठाने की मुहलत न मिलती ! कभी एक-दो भी बज जाते। जब मस्तिष्क बिलकुल शिथिल हो जाता तब विवश होकर चारपाई पर पड़े रहते।      लेकिन इतने परिश्रम का अभ्यास न होने के कारण कभी-कभी सिर में दर्द होने लगता। कभी पाचन-क्रिया में विध्न पड़ जाता, कभी ज्वर चढ़ आता। तिस पर भी वह मशीन की तरह काम में लगे रहते। भाभा कभी-कभी झुँझला कर कहती–अजी, लेट भी रहो; बड़े धर्मात्मा बने हो। तुम्हारे जैसे दस-पॉँच आदमी और होते, तो संसार का काम ही बन्द हो जाता। ब्रजनाथ इस बाधाकारी व्यंग का उत्तर न देते, दिन निकलते ही फिर वही चरखा ले बैठते।      यहॉँ तक कि तीन सप्ताह बीत गये और पचीस रुपये हाथ आ गए। ब्रजनाथ सोचते थे–दो तीन दिन में बेड़ा पार है; लेकिन इक्कीसवें दिन उन्हें प्रचंड ज्वर चढ़ आया और तीन दिन तक न उतरा। छुट्टी लेनी पड़ी, शय्यासेवी बन गए। भादों का महीना था। भाभा ने समझा, पित्त का, प्रकोप है; लेकिन जब एक सप्ताह तक डाक्टर की औषधि सेवन करने पर भी ज्वर न उतरा तब घबरायी। ब्रजनाथ प्राय: ज्वर में बक-झक भी करने लगते। भाभा सुनकर डर के मारे कमरे में से भाग जाती। बच्चों को पकड़ कर दूसरे कमरे में बन्द कर देती। अब उसे शंका होने लगती थी कि कहीं यह कष्ट उन्हीं रुपयों के कारण तो नहीं भोगना पड़ रहा है ! कौन जाने, रुपयेवाले ने कुछ कर धर दिया हो ! जरूर यही बात है, नहीं तो औषधि से लाभ क्यों नहीं होता?      संकट पड़ने पर हम धर्म-भीरु हो जाते हैं, औषधियों से निराश होकर देवताओं की शरण लेते हैं। भाभा ने भी देवताओं की शरण ली। वह जन्माष्टमी, शिवरात्रि का कठिन व्रत शुरू किया।      आठ दिन पूरे हो गए। अंतिम दिन आया। प्रभात का समय था। भाभा ने ब्रजनाथ को दवा पिलाई और दोनों बालकों को लेकर दुर्गा जी की पूजा करने के लिए चली। उसका हृदय आराध्य देवी के प्रति श्रद्धा से परिपूर्ण था। मन्दिर के ऑंगन में पहुँची। उपासक आसनों पर बैठे हुए दुर्गापाठ कर रहे थे। धूप और अगर की सुगंध उड़ रही थी। उसने मन्दिर में प्रवेश किया। सामने दुर्गा की विशाल प्रतिमा शोभायमान थी। उसके मुखारविंद पर एक विलक्षण दीप्त झलक रही थी। बड़े-बड़े उज्जल नेत्रों से प्रभा की किरणें छिटक रही थीं। पवित्रता का एक समॉँ-सा छाया हुआ था। भाभा इस दीप्तवर्ण मूर्ति के सम्मुख साधी ऑंखों से ताक न सकी। उसके अन्त:करण में एक निर्मल, विशुद्ध भाव-पूर्ण भय का उदय हो आया। उसने ऑंखें बन्द कर लीं। घुटनों के बल बैठ गयी, और हाथ जोड़ कर करुण स्वर से बोलीमाता, मुझ पर दया करो।      उसे ऐसा ज्ञात हुआ, मानों देवी मुस्कराई। उसे उन दिव्य नेत्रों से एक ज्योति-सी निकल कर अपने हृदय में आती हुई मालूम हुई। उसके कानों में देवी के मुँह से निकले ये शब्द सुनाई दिएपराया धन लौटा दे, तेरा भला होगा।      भाभा उठ बैठी। उसकी ऑंखों में निर्मल भक्ति का आभास झलक रहा था। मुखमंडल से पवित्र प्रेम बरसा पड़ता था। देवी ने कदाचित् उसे अपनी प्रभा के रंग में डूबा दिया था।      इतने में दूसरी एक स्त्री आई। उसके उज्जल केश बिखरे और मुरझाए हुए चेहरे के दोनों ओर लटक रहे थे। शरीर पर केवल एक श्वेत साड़ी थी। हाथ में चूड़ियों के सिवा और कोई आभूषण न था। शोक और नैराश्य की साक्षात् मूर्ति मालूम होती थी। उसने भी देवी के सामने सिर झुकाया और दोनों हाथों से ऑंचल फैला कर बोलीदेवी, जिसने मेरा धन लिया हो, उसका सर्वनाश करो।      जैसे सितार मिजराब की चोट खा कर थरथरा उठता है, उसी प्रकार भाभा का हृदय अनिष्ट के भय से थरथरा उठा। ये शब्द तीव्र शर के समान उसके कलेजे में चुभ गए। उसने देवी की ओर कातर नेत्रों से देखा। उनका ज्योतिर्मय स्वरूप भयंकर था, नेत्रों से भीषण ज्वाला निकल रही थी। भाभा के अन्त:करण में सर्वथा आकाश से, मंदिर के सामने वाले वृक्षों से; मंदिर के स्तंभों से, सिंहासन के ऊपर जलते हुए दीपक से और देवी के विकराल मुँह से ये शब्द निकलकर गूँजने लगे–पराया धन लौटा दे, नहीं तो तेरा सर्वनाश हो जायगा।      भाभा खड़ी हो गई और उस वृद्धा से बोली-क्यों माता, तुम्हारा धन किसी ने ले लिया है?      वृद्धा ने इस प्रकार उसकी ओर देखा, मानों डूबते को तिनके का सहारा मिला। बोलीहॉं बेटी !      भाभा–कितने दिन हुए ?      वृद्धा–कोई डेढ़ महीना।      भामा–कितने रुपये थे?      वृद्धा–पूरे एक सौ बीस।      भामा–कैसे खोए?      वृद्धा–क्या जाने कहीं गिर गए। मेरे स्वामी पलटन में नौकर थे। आज कई बरस हुए, वह परलोक सिधारे। अब मुझे सरकार से आठ रुपए साल पेन्शन मिलती है। अक्की दो साल की पेन्शन एक साथ ही मिली थी। खजाने से रुपए लेकर आ रही थी। मालूम नहीं, कब और कहॉँ गिर पड़े। आठ गिन्नियॉँ थीं।      भामा–अगर वे तुम्हें मिल जायँ तो क्या दोगी।      वृद्धा–अधिक नहीं, उसमें से पचास रुपए दे दूँगी।      भामा रुपये क्या होंगे, कोई उससे अच्छी चीज दो।      वृद्धा–बेटी और क्या दूँ जब तक जीऊँगी, तुम्हारा यश गाऊँगी।       भामा–नहीं, इसकी मुझे आवश्यकता नहीं !      वृद्धा–बेटी, इसके सिवा मेरे पास क्या है?      भामा–मुझे आर्शीवाद दो। मेरे पति बीमार हैं, वह अच्छे हो जायँ।      वृद्धा–क्या उन्हीं को रुपये मिले हैं?      भामा–हॉँ, वह उसी दिन से तुम्हें खोज रहे हैं।       वृद्धा घुटनों के बल बैठ गई, और ऑंचल फैला कर कम्पित स्वर से बोली–देवी ! इनका कल्याण करो।भामा ने फिर देवी की ओर सशंक दृष्टि से देखा। उनके दिव्य रूप पर प्रेम का प्रकाश था। ऑंखों में दया की आनंददायिनी झलक थी। उस समय भामा के अंत:करण में कहीं स्वर्गलोक से यह ध्वनि सुनाई दी–जा तेरा कल्याण होगा।      संध्या का समय है। भामा ब्रजनाथ के साथ इक्के पर बैठी तुलसी के घर, उसकी थाती लौटाने जा रही है। ब्रजनाथ के बड़े परिश्रम की कमायी जो डाक्टर की भेंट हो चुकी है, लेकिन भामा ने एक पड़ोसी के हाथ अपने कानों के झुमके बेचकर रुपये जुटाए हैं। जिस समय झुमके बनकर आये थे, भामा बहुत प्रसन्न हुई थी। आज उन्हें बेचकर वह उससे भी अधिक प्रसन्न है।      जब ब्रजनाथ ने आठों गिन्नियॉँ उसे दिखाई थीं, उसके हृदय में एक गुदगुदी-सी हुई थी; लेकिन यह हर्ष मुख पर आने का साहस न कर सका था। आज उन गिन्नियों को हाथ से जाते समय उसका हार्दिक आनन्द ऑंखों में चमक रहा है, ओठों पर नाच रहा है, कपोलों को रंग रहा है, और अंगों पर किलोल कर रहा है; वह इंद्रियों का आनंद  था, यह आत्मा का आनंद है; वह आनंद लज्जा के भीतर छिपा हुआ था, यह आनंद गर्व से बाहर निकला पड़ता है।      तुलसी का आशीर्वाद सफल हुआ। आज पूरे तीन सप्ताह के बाद ब्रजनाथ तकिए के सहारे बैठे थे। वह बार-बार भामा को प्रेम-पूर्ण नेत्रों से देखते थे। वह आज उन्हें देवी मालूम होती थी। अब तक उन्होंने उसके बाह्य सौंदर्य की शोभ देखी थी, आज वह उसका आत्मिक सौंदर्य देख रहे हैं।      तुलसी का घर एक गली में  था। इक्का सड़क पर जाकर ठहर गया। ब्रजनाथ इक्के पर से उतरे, और अपनी छड़ी टेकते हुए भामा के हाथों के सहारे तुलसी के घर पहुँचे। तुलसी ने रुपए लिए और दोनों हाथ फैला कर आशीर्वाद दिया–दुर्गा जी तुम्हारा कल्याण करें।      तुलसी का वर्णहीन मुख वैसे ही खिल गया, जैसे वर्षा के पीछे वृक्षों की पत्तियॉँ खिल जाती हैं। सिमटा हुआ अंग फैल गया, गालों की झुर्रियॉँ मिटती दीख पड़ीं। ऐसा मालूम  होता थ, मानो उसका कायाकलूप हो गया।      वहॉँ से आकर ब्रजनाथ अपवने द्वार पर बैठे हुए थे कि गोरेलाल आ कर बैठ गए। ब्रजनाथ ने मुँह फेर लिया।      गोरेलाल बोले–भाई साहब ! कैसी तबियत है?      ब्रजनाथ–बहुत अच्छी तरह हूँ।गोरेलाल–मुझे क्षमा कीजिएगा। मुझे इसका बहुत खेद है कि आपके रुपये देने में इतना विलम्ब हुआ। पहली तारीख ही को घर से एक आवश्यक पत्र आ गया, और मैं किसी तरह तीन महीने की छुट्टी लेकर घर भागा। वहॉँ की विपत्ति-कथा कहूँ, तो समाप्त न हो; लेकिन आपकी बीमारी की शोक-समाचार सुन कर आज भागा चला आ रहा हूँ। ये लीजिये, रुपये हाजिर हैं। इस विलम्ब के लिए अत्यंत लज्जित हूँ।      ब्रजनाथ का क्रोध शांत हो गया। विनय में कितनी शक्ति है ! बोले-जी हॉँ, बीमार तो था; लेकिन अब अच्छा हो गया हूँ, आपको मेरे कारण व्यर्थ कष्ट उठाना पड़ा। यदि इस समय आपको असुविधा हो, तो रुपये फिर दे दीजिएगा। मैं अब उऋण हो गया हूँ। कोई जल्दी नहीं है।      गोरेलाल विदा हो गये, तो ब्रजनाथ रुपये लिये हुए भीतर आये और भामा से बोले–ये लो अपने रुपये; गोरेलाल दे गये।      भामा ने कहा–ये मरे रुपये नहीं तुलसी के हैं; एक बार पराया धन लेकर सीख गयी।      ब्रज०–लेकिन तुलसी के पूरे रुपये तो दे दिये गये !      भामा–दे दिये तो क्या हुआ? ये उसके आशीर्वाद की न्योछावर है।      ब्रज०-कान के झुमके कहॉँ से आवेंगे?      भामा–झुमके न रहेंगे, न सही; सदा के लिए कान तो हो गये।

 

वो एक सुबह थी नयी सुबह

In My Poems (कविताएँ), इन दिनों...These Days... on September 12, 2006 at 5:01 pm

वो एक सुबह थी नयी सुबह

जब आलस भीतर का टूटा

एक दाग़ था वो छूटा

जब बरसों की आदत छोड़्कर

निकल पड़ा मैं

तड़के सुबह पाँच बजे सैर पर

दौड़ लगायी मील भर

और चटकायीं कुछ हड्डियाँ

यानी कुछ व्यायाम किया

आज के दिन

ये वचन दिया स्वयं को

कि आलस्य से कोसों दूर

ताज़गी से भरपूर

मेरे भी साहसी जीव होने का

यह जो प्रमाण है

सुबह सैर पर जाने के

इस दो दिन पुराने उपक्रम को

इस बार

कम से कम

मैं एक महीना जारी रखूँगा॥

हाँ, एक बात और,

अब भूख़ भी ज़्यादा लगा करती है!

(मुझे प्रातः भ्रमण पर जाने हेतु प्रेरित एवँ विवश करने वाले मित्र नितेश बंछोर का मैं हृदय से आभारी हूँ)

Lage Raho Vidhu Vinod Chopra Bhai

In इन दिनों...These Days... on September 7, 2006 at 3:14 pm

Raghupati Raghav Raja RamPatit Pavan Sita RamIshwar Allah Tero NaamSabko Sanmati De Bhagwan

Yes! Now I can see Gandhiji around while typing these lines minutes after watching the movie “Lage Raho Munna Bhai” (LRMB). But before you proceed my advice is watch the movie first. Second, for your information, this post is not a review of the movie but just a flattery.

 

LRMB is said to be a sequel of Munna Bhai MBBS. But it is not a sequel. This movie is a true tribute to Gandhian thoughts and way of living. If one tries to say a movie is good because it spreads messages of Gandhiji, then no words to oppose it. But LRMB is one step ahead because this movie takes Indian cinema one step ahead. LRMB is not a story of an innocent gangster befooling a beloved, it is not a story of few people winning a battle of their rights through non violence and satyagrah, LRMB is a success story of how one can preach Gandhian thoughts to a generation which holds him responsible for many problems of the country today. A generation especially of those who see to Israel or the
USA models of solutions to our problems. A generation which lives in a world where violence and hatred are inherent parts of the environment. In this kind of a world where Gandhi is said to be irrelevant, LRMB is a movie that shows the way. And See how it makes it possible.

One.      Through the language. For instance, it uses “Gandhigiri” for Gandhism. Munna Bhai teaches and practices “Gandhigiri” in the movie and thus solves many problems and ultimately wins the heart of the actress. It sends the message in a “feel good” lexicon. “Chemical Locha” for chemical imbalances in mind is another example of how it tries to connect to the audiences.

Two.      The kind of problems it deals with. Gandhi solved serious political and social problems through his weapons of truth and non violence. But in this movie Gandhism helps a girl to get married to her lover. It makes a bad son good son by teaching him earn money responsibly by working hard and saving more. This solves problems of neighbors and the problems of corruption in government offices. The problems we face everyday can be solved though non violence and truth it shows. Here, the movie does not show how Gandhi defeated the British or how he successfully launched some social reforms in our society. It only shows how his weapons can be used to make our lives better.

 

Few more thing about the movie, I liked acting of Arshad Warsi more that that of Munna Bhai or Vidya Balan. Vidya Balan, it seems has become favorite of Vidhu Vinod Chopra.

 

A nice movie and a must watch.

 

Hitendra

शॉपिंग मॉल

In इन दिनों...These Days... on July 12, 2006 at 3:23 pm

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक चलती थी लाठी को टेक
उसके पास बहुत था माल

जाना था उसको शॉपिंग मॉल

जब बुढिया पहुँची शॉपिंग मॉल

भीड़ से था बुरा हाल

संडे का था बड़ा फ़ुटफ़ाल

मोलभाव करते करते, उमर बुढिया की बीती थी।

पर मॉल में सौदेबाजी की, अजब अनोखी रीति थी॥

मोलभाव ना होता था, क्या महँगा क्या सस्ता।

लेना हो तो ले लो भैया, वर्ना नापो रस्ता॥

तो मॉल ने एक पूरी सभ्यता को खत्म करने का बीड़ा उठाया है। “नगद बड़े शौक से, उधार अगले चौक से” ये कहकर भी प्यार से सामान देने वाला हमारे पड़ोस का दुकानदार कहाँ जाएगा? यूँ खत्म तो नहीं होगा वो। पर संपन्न घरों के बच्चे इस पूरी सांस्कृतिक विरासत से अछूते रह जाएँगे। मुझे दुकानदारों से ज़्यादा उनकी फ़िक्र है। सारी जेबें टटोल कर किसी तरह पैसे चुकाने और क़्रेडिट कार्ड फ़िराकर (स्वैप कर) सामान खरीद लेने में बहुत अंतर है। मॉल को पूरा हक है कि वो बढ़े और सुहुलियत बढ़ाये। पर ये सांस्कृतिक ह्रास की कीमत पर ना हो। अन्यथा जो पैसे से अमीर हैं वो संस्कृति से खासे ग़रीब हो जायेंगे।

मॉल तुम आगे बढ़ो, पर हमें पीछे ना धकेलो।
 
 
 

हिंदी मे कैसे लिखें?

In इन दिनों...These Days... on March 25, 2006 at 8:09 am

मुझे यह जानकारी निरंतर से मिली ।
आपको बारहा नाम का साफ़्ट्वेयर डाउनलोड करना होगा ।

मुफ़्त है भैया!

बारहा तक पहुँचने के लिये यहाँ क्लिक करें।
अधिक जानकारी के लिये यहाँ क्लिक करें

बारहा सचमुच जादू है ।

मजा आ गया !

In इन दिनों...These Days... on March 24, 2006 at 11:06 pm

हिंदी मे लिखने का मजा ही कुछ और है ।
मदद चाहिये तो मुझे लिखें
थोड़ी बहुत कर सकता हूँ ।

हे हे हे
मजा आ गया!!!

मेरा पन्ना हिन्दि मे`

In इन दिनों...These Days... on March 24, 2006 at 10:40 pm

पहली बार हिन्दि मे लिख रहा हूँ भाई
हाथ काँप रहे हैं।

बारहा को धन्यवाद

चटपटा रायपुर ! Delicious Raipur

In इन दिनों...These Days... on March 12, 2006 at 4:37 pm

A glutton’s paradise, Raipur is open for those who have little money in the pocket. This city has many places where sumptuous snacks are available at affordable prices. If you happen to be a Raipurian and do not know these places, shame on you! ( These embarrsed Raipurians should actualy thank this blog! )

See what not has this city has to offer:

 

 

 

Budget Breakfast:

 

 

Poha

 

When at central India, the first breakfast which comes to your mind is Poha. All homes probably consume Poha every morning as there breakfast. It is easy to cook. Raipur has two Poha shops, One at the old us standand other at the Phool Chowk.

Old Bus Stand: Sahu Jalebi Bhandar is the historical place for hot Jalebis and all time Poha. This man started with a small shop there some thirty years ago, then there was situated the Bus stand of Raipur, now the bus stand and its comuters have moved to a new place called Pandri, but for for the lovers of Poha-Jalebi, the destination hasn’t changed. Open from 7 in the morning to 9 in the evening. Phool Chowk: A man opens his Poha shop in the morning. his Poha is spicy and these days attracts more people than the Sahu jalebi Bhandar. Morning 7 to 9, you see many cars and bikes parked there. Even those who go for for a morning walk, prefer for a breakfast here.

 

Sambhar Bada:

 

At Sadar Bazar: An old man opens his temporary shop on the raod there, morning and evening. His crucnhy bada is so tasty that it beats any great south Indian cook’s easily. People literaly queue for there turn of Sambhar bada. Sometimes the stock finishes, then seems he as a kitchen neary so within minutes again the stock is full. But people do not wait, they pass the time with the Idli available. Although his Idli is not that great.

 

Dosa:

I have two places for you; one is Deep-Rupa Restaurant near City Kotwali. This is also good for Idli and Sambhar Bada. The otrher place is Satti Bazar, near Hansa Book Depot Satti Bazar is the ook market of the city.

 

Bubbly Bhel-Puri:

 

Simple. All school gates! The best, though, is at St. Paul’s School.

 

 

Gup-Chup (Pani-Puri ):

 

Phool Chowk again. In the evening at the Mathura Wasi Chat Bhandar.