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भाग निकलने की भावना: समस्या और उपाय – १

अपने-अपने जीवन में हम सभी कुछ ना कुछ प्राप्त करना चाहते हैं। हम सफल होना चाहते हैं, सुखी होना चाहते हैं, प्रसिद्ध होना चाहते हैं, आदि इत्यादि। इन सबके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि हममें से कुछ लोग ‘संतोष” पर विश्वास करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो कि अब तक यह फैसला नहीं कर पाये हैं कि वे क्या चाहते हैं। कुछ भी नहीं चाहने वाले वैरागी जीवों की तो यहाँ चर्चा भी नहीं की जा रही।

 

हम चाहे केवल संतोष के साथ जीना चाहें या जीवन में बहुत ही “आगे बढ़ना” चाहें, हमारे सपने चाहे छोटे हों या बड़े, प्रायः यह देखने में आता है कि हम सभी को जीवन में एक अंतहीन दौड़ का घोड़ा बनना पड़ता है। और यह दौड़ चाहे-अनचाहे हममें तनाव, अवसाद, अस्वस्थता, और भौतिक तथा वैयक्तिक विकृतियों को जन्म देती है। सीधे शब्दों में कहें तो हमारे भीतर की मनुष्यता को समाप्तप्राय ही कर देती है।

 

इन अवसाद (डिप्रेशन) और तनाव (स्ट्रेस) के क्षणों से प्रभावित होकर कभी-कभी हमारा ‘स्व” अर्थात हमारा मूल स्वरूप हमसे ही विद्रोह कर बैठता है। इस द्वन्द्व के प्रभाव में आकर हम अन्धी भौतिक दौड़ से बचने के उपाय सोचने लगते हैं। हम इन सम्स्याओं से दूर भागना चाहते हैं, जिसे अंग्रेजी में “एस्केप” करना कहा जाता है। यदि आप किसी नगर या महानगर में निवास करते हों तो आपने अनेक बार सुना होगा अथवा स्वयं कहा होगा कि “जी तो करता है इस शहर को छोड़कर आराम से किसी गाँव में जाकर रहूं। वहाँ कोइ छोटा-मोटा काम ही कर लूंगा, कम से कम इस तनाव से मुक्ति तो मिलेगी!” यदि आप नौकरी करते हैं या ऐसे लोगों से मिलते जुलते हैं तो आपने अवश्य सुना-कहा होगा कि “यार, चलो कोइ स्वयं का बिज़नेस (व्यापार) शुरू करते हैं, इस रोज़-रोज़ की झंझट से छुटकारा तो मिलेगा! और अच्छे-खासे पैसे भी कमा लेंगे। इस नौकरी में रखा ही क्या है?” इसका ठीक उल्टा भी सत्य है। छोटे शहरों के लोग महानगरों के सपने देखते हैं और गाँवों के लोग शहरों के। महानगरों के कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विदेशों मे बस जाने को भी सुखी जीवन का एक उपाय समझते हैं। मैंने अनेक व्यापारियों को भी यह कहते सुना है कि “भाई हमारे व्यापार से तो तुम्हारी नौकरी ही भली, कम से कम तुम्हें मालूम तो है कि अगले महीने न्यूनतम इतने पैसे तो तुम कमा ही लोगे।”

 

ये और बात है कि ऐसा कहने वाले अधिकांश लोग न तो शहर छोड़कर गाँव में जाते हैं, और ना अपनी नौकरी छोड़कर कोइ व्यापार ही प्रारंभ करते हैं। पर यहाँ मैं उनके संकल्प की दृढ़ता पर विचार नहीं कर रहा। साथ ही स्पष्ट कर दूँ कि आपके शुभचिंतक ने स्वयं भी ऐसे अनेक संकल्पों को धारण किया है और कभी पूरा नहीं किया।

तो फिर मैं इस लेख में कहना क्या चाहता हूँ?

 

मेरा मानना है कि न तो कभी यह संभव है कि पूरा संसार गाँवों में जाकर रहे और ना ही यह संभव है कि सभी नौकरीपेशा अपनी नौकरियाँ छोड़कर स्वयं का व्यसाय करने लगें। हमें यही सुनिश्चित करना होगा कि जो जहाँ भी रहता है, और इच्छापूर्वक जिस व्यवसाय को भी करता है वह वहीं सुख या संतोष या सफलता या यह सब प्राप्त कर सके।

 

समस्या यह है कि हम अपनी वर्तमान स्थिति से अप्रसन्न हैं और इससे भागना चाहते हैं, “एस्केप” करना चाह्ते हैं। इस भाग जाने की भावना के पीछे कुछ तात्कालिक एवँ भावावेशजनित कारण दिखायी देते हैं जैसे नौकरी में मालिक या उच्चाधिकारी (बॉस) की घुड़कियाँ। पराये शहर का अकेलापन और सामाजिकता का अभाव। छोटी-मोटी असफलताएँ। कुछ कारण वस्तुतः गंभीर एवँ दुःसाध्य हैं। समस्या के मूल में जाने के लिये इन कारणों और उनके प्रभावों पर विचार करते हैं। इनमें भी हम पहले नौकरीपेशा और शहरी लोगों से जुड़ी समस्याओं पर विचार करेंगे। यहाँ सरकारी नौकरियों से जुड़ी परिस्थितियों पर विचार नहीं किया गया है।

  1. नौकरी देने वाले छोटे-बड़े सभी संस्थान अपने कर्मचारियों का शोषण करते हैं। ये संस्थान प्रायः “अधिकतम लाभ कमाने की भावना” से संचालित होते हैं। यहाँ अधिकतम शब्द पर जोर दिया जाय।
  2. किसी भी मनुष्य की सुचारू रूप से कार्य कर सकने की शारीरिक एवँ मानसिक क्षमताओं या सीमाओं को ये संस्थान जाने-अनजाने अनदेखा करते हैं।
  3. कर्मचारियों को उनके कार्य में हर अगली तिमाही या अगले वित्तीय वर्ष में पिछले हर वर्ष से अधिक लक्ष्य दिया जाता है। ज़ोर “अधिक से अधिक” पर होता है। यह लक्ष्य सीधे बिक्री अर्थात सेल्स से ना भी जुड़ा हो पर अंततः संस्थानों की अधिक कमाई की लालसा से ही संचालित होता है।
  4. कर्मचारियों की वार्षिक वेतन वृद्धि अधिकांशत: गिने-चुने हाथों में और आमतौर पर एक अपारदर्शी एवँ अस्पष्ट प्रक्रिया के तहत होती है। यद्यपि संस्थान अपनी ऐसी प्रक्रियाओं को पारदर्शी और वैज्ञानिक बताने का खूब पाखंड करते हैं।
  5. चूँकि नौकरी का मूल प्राप्य वेतन है, कर्मचारियों में स्वतः ही एक तरह का “दबाव” कार्य करने लगता है। यह स्वतः सक्रिय दबाव सुनिश्चित करता है कि येन-केन-प्रकारेण कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को प्रसन्न करें और अगले वर्ष “अधिक से अधिक” वेतनवृद्धि प्राप्त करें।
  6. इस दबाव के चलते आने वाली समस्याओं के कुछ लक्षण होते हैं। कार्यालयीन समय के समाप्त हो जाने पर भी देर रात तक लोगों का अपने दफ्तरों में टिके रहना। या तो वाकई काम का बोझ अधिक होता है अथवा यह दिखाने की प्रतिस्पर्धा कि हम कितनी मेहनत करते हैं। दूसरा लक्षण है चाटुकारिता। अपने वरिष्ठ की हाँ में हाँ मिलाना, अपने समकक्ष की बुराई, स्वयं के छोटे-से-छोटे कार्य के लिये श्रेय की याचना इत्यादि। ऐसे चाटुकारों से उनमें भी असंतोष एवँ तनाव व्याप्त हो जाता है जो या तो किसी प्रकार चाटुकारिता में बाज़ी नहीं मार पाते या केवल अपने काम की ईमानदारी पर ही भरोसा करते हैं। दबाव का तीसरा लक्षण है संस्थान के द्वारा दिये गये लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये कर्मचारियों द्वारा अनुचित, अनैतिक एवँ संभवतः अवैधानिक साधनों का उपयोग। इन सब अनैतिक कार्यों को करने या न करने वाले जब निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाते तो यह भी एक नये दबाव को जन्म देता है कि वे अब अपनी नौकरियाँ कैसे बचाएँ? इतना सब कर लेने पर भी और निर्धारित लक्ष्य पूरा कर लेने पर भी यदि ऐच्छिक वेतनवृद्धि एवँ प्रशंसा आदि न मिले तब?
  7. स्वाभाविक है कि कार्य में अनुचित दबाव, नैतिक पतन और कार्य की अधिकता से मानसिक एवँ शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी सम्स्याएँ जन्म लेती हैं। इनमें सर्वप्रमुख हैं तनाव और जीवनशैली से जुड़े अन्य रोग जैसे कि मधुमेह, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, मोटापा, अपच, अम्लरोग इत्यादि। जो अधिक देर तक खड़े रहकर या घंटों एक ही जगह बैठकर काम करते हैं, उन्हें हड्डी से संबंधित रोग जैसे कि मेरूदंड(स्पाईनल कॉर्ड) से संबंधित बीमारियाँ, कमर और कंधों में दर्द की शिकायत होने लगती है।
  8. शारीरिक नुकसानों के अतिरिक्त सामाजिक समस्याएँ भी आ घेरती हैं। अपने प्रियजनों, परिवार, मित्रों एवँ पड़ोसी तथा रिश्तेदारों को समय न दे पाना। सामाजिक आयोजनों में न जा पाना। परिवार के प्रति आवश्यक दायित्वों को भी समयाभाव के कारण पूरा न कर पाना। पति-पत्नी एवँ पालकों तथा संतानों के रिश्तों में खटास। खटास को प्रेम के स्थान पर पैसों से दूर करने का प्रयास। इससे भी अधिक भयावह स्थिति है काम के दबाव, और कॅरियर (आजीविका?) के लिये विवाह में देर और फिर संतान्नोत्पत्ति जैसी नितांत प्राक्रुतिक घटना को भी या तो टालना या इससे बचने का प्रयास।
  9. व्यक्ति तो व्यक्ति, पूरे समाज ने भी इस आधुनिक जीवन की अनिवार्य व्यस्तता की भारी कीमत चुकाई है। चूँकि समय की कमी है, इसीलिये, पाँच-दस दिनों विवाह-उत्सव केवल एक-दो दिनों में सिमट गये हैं। अनेक उत्सवों जैसे कि वसंतोत्सव को तो मनाना ही बंद कर दिया गया। दीपावली जैसे अति महत्वपूर्ण त्यौहारों पर भी सजावट से लेकर मिठाईयाँ तक अब बाजार के ‘रेडीमेड” उपायों पर निर्भर हैं। आखिर “कौन झंझट करे”? एक ही नगर में रहने वाले लंगोटिया यारों को भी अब एक दूसरे से मिलने के लिये सप्ताहंत की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मिलना भी होता तो है तो पहले से औपचारिकतापूर्ण विधि से तय समय पर। हमारी सामाजिक जीवंतता और सहज सृजनशीलता को आघात पहुँचा है।
  10. यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऊपर लिखी सभी समस्याएँ एक चक्र में एक दूसरे से बंधी हुई हैं। एक समस्या दूसरी और दूसरी तीसरी को जन्म देती है। तनाव हो तो प्रियजनों से आपके संबंध बिगड़ेंगे, संबंध बिगड़ेंगे तो तनाव होगा। तनाव होगा तो अनेक शारीरिक रोग होंगे, रोग होंगे तो तनाव होगा। हम यहाँ रोगों के उपचार की प्रक्रिया में होने वाले व्यकि के आर्थिक शोषण के कुचक्र की चर्चा ना ही करें अच्छा होगा।
  11. अब चूँकि नौकरी से जनित इतनी सारी समस्याएँ तनाव और अवसाद को जन्म देती हैं तो स्वाभाविक है कि हम इनसे बचने के रास्ते ढूंढेंगे। पर तनाव और अवसाद को पहचान पाना कठिन है। और इससे भी कठिन है तनाव के कारण को पहचान पाना। किंतु चूँकि व्यक्ति प्रसन्न नहीं है तो उपाय तो अवश्य किया जाएगा।
  12. एक उपाय होता है क्षणिक भोगों को बढ़ावा देना। हम सोचते हैं कि सप्ताह के पाँच-छः दिन का ये तनाव स्वाभाविक है, इसलिये सप्ताहंत में जो छुट्टियाँ हैं उनका मैं भरपूर दोहन करूँ। अथवा एक साथ कुछ लंबी छुट्टियाँ ले लूँ। इस प्रकार छुट्टियाँ “एस्केप” करने का या भाग निकलने का हमारा प्रथम उपाय होता है। आजकल “इस पल को जी ले यार” जैसे भाव फिल्मी गीतों में खूब आते हैं। अंग्रेजी में इसे “लिव दिस मोमेंट” या “लिव इट टू द फुलेस्ट” आदि कहकर एक सम्मानजनक आवरण चढ़ाया जाता है। चूँकि अंग्रेजी में कहा जाता है ऐसा, तो हम भरोसा भी कर ही लेते है!  छुट्टियों के भरपूर दोहन की भावना से अधिकांश समय तेज़ शोर के संगीत, तीखे और तेज़ मसालों वाले भोजन और मदिरपान में व्यतीत किया जा सकता है। अथवा सारी छुट्टी “नींद का कोटा” पूरा करने और टी.वी. देखने में निकाल दी जाती है। साप्ताहिक छुट्टी के दिन आने वाला अखबार इसे आपका “मी टाईम” कहता है। हम “मी टाईम” के लिये भावुक हैं, अतः चित्रकारी, प्रकृति का सामीप्य, शांति प्रदान करने वाला संगीत, आध्यात्मिक गतिविधियाँ, पुस्तक पढ़ना जैसी किसी भी लालित्यपूर्ण किंतु अधिक एकाग्रता और मानसिक श्रम माँगने वाली गतिविधि में हमारे संलग्न होने की संभावना कम ही होती है।  कुल मिलाकर हम हल्के मनोरंजन के अभ्यस्त हो जाते हैं।
  13. पर कुछ समय बाद हम देखते हैं कि छुट्टियाँ हमारे तनाव को दूर नहीं कर पा रहीं, बल्कि छुट्टियाँ मनाने की नयी शैली, खर्च को ही बढ़ा रही है। खर्च, कमाई, कमाई, नौकरी। नौकरी, तनाव, तनाव, बॉस। बॉस, कम वेतनवृद्धि, अधिक वेतनवृद्धि अधिक आय। तो क्यों न इस नौकरी को ही बदल दिया जाय! हम ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि आखिर यह उपाय हमें सूझ ही गया।
  14. जैसा कि स्वाभाविक है। नौकरियों का परिवर्तन भी सम्स्याओं को हल नहीं कर पाता। शुरूआती दिनों में यदि तनाव कम भी हो तो धीरे-धीरे पहले जैसी ही स्थिति आ ही जाती है। एक के बाद एक अनेक नौकरियाँ बदलने के बाद अंततः हम देखते हैं कि यह एक दुष्चक्र है। अतः हम सोचने लगते हैं कि इस दुष्चक्र से बाहर कैसे निकला जाय?
  15. और फिर हम भाग निकलने की योजना बनाते हैं। हमें दिखायी देता है कि हमारे आस-पास अनेक ऐसे लोग हैं जिन्हें हमारे बराबर तनाव नहीं है। कार्यालय के बाहर जो चाय-समोसे की दुकान है, जब उसका मालिक किसी दिन त्यौहार के नाम पर दुकान बंद रखता है, तब उसकी स्वतंत्रता से हमें ईर्ष्या सी होने लगती है। पत्र-पत्रिकओं के मुख्य पृष्ठों पर प्रकाशित होने वाले “उद्यमी” (Entrepreneurs) भी हमारे आदर्श बन जाते हैं। गरीब हो या अमीर, शहरी हो या ग्रामीण, हर वो व्यक्ति जो अपनी मर्जी का मालिक है, हमें आकर्षित करता है। (अपनी ओर से स्पष्ट कर दूँ कि मैंने उद्यमिता की भावना का सदा सम्मान किया है और एक बार ऐसा करने का प्रयास भी किया है। आगे भी करूँगा। यहाँ जो कुछ भी अब तक लिखा गया है वह मनुष्य की भाग निकलने की भावना एवँ आधुनिक नौकरियों तथा जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं के संबंध में है।)
  16. अब प्रश्न उठता है कि उपाय क्या है? क्या भाग निकलने की भावना उचित है? क्या जो जहाँ है वैसा ही पड़ा रहे और दुःख सहे? यदि यथास्थिति को बनाए रखा जाए तो ऐसे कौन से कदम हैं जिनसे नौकरियों में रहकर भी आधुनिक मनुष्य सुखी एवँ स्वस्थ जीवन जी सके?
  17. इससे पहले कि हम उपायों की चर्चा करें, थोड़ा और गहरे पानी उतरने की आवश्यकता है। कामकाज के जिस दबाव की ऊपर चर्चा की गयी है, वह दबाव दो मूल कारणों से जन्म लेता है: अ) अधिकाधिक लाभ कमाने की भावना ब) प्रतियोगिता की भावना या दूसरों से आगे निकल जाने की होड़. यह दोनों कारण संस्थानों के संदर्भ में भी सत्य हैं और उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के संदर्भ में भी।
  18. चूँकि सारा प्रपंच अधिकाधिक लाभ कमाने की भावना से और गलाकाट प्रतियोगिता की भावना से उत्पन्न होता है। अतः समस्याओं का समाधान अवश्य ही इन दो मूल कारणों के चिंतन से उपलब्ध होगा। यदि हम मनुष्य की स्वाभाविक लाभ कमाने की भावना और दूसरों की होड़ या प्रतियोगिता की भावना के गुण दोषों का चिंतन करें और एक व्यवसाय (बिज़नेस) प्रणाली की संकल्पना कर सकें जो इन दो कारकों के संदर्भ में नीरक्षीरविवेक (अच्छे को ग्रहण करना एवँ बुरे को छोड़ देना) से विचार करे तो उपाय मिल सकता है। समस्याएँ सुलझ सकती हैं। ध्यान दें, कि यह कोइ पूंजीवाद बनाम समाजवाद का प्रश्न नहीं है। हमें बस इतना प्रयास करना है कि हम स्वयं को एक विकल्प दें।

 

यहाँ इस लेख श्रुंखला का प्रथम भाग समाप्त होता है। लेख के दूसरे भाग में लाभ कमाने की भावना और उसके संभावित विकल्प पर विचार किया जाएगा। यहाँ तक जो लिखा है उसके संदर्भ में आपके विचारों का सदैव स्वागत है।

 

- हितेन्द्र

 
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Posted by on मई 22, 2012 in Philosophy (दर्शन)

 

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स्मृति क्या है

स्मृति क्या है?

 

स्कूल की टाटपट्टी है

जिसे बिछाने, झटकने और लपेटने की

पारियाँ बंधी होती थीं।

 

पापा की बुलेट की टंकी है

जिस पर बैठकर मैं

एक्सीलरेटर घुमाता और

सोचता कि गाड़ी चल रही है।

 

स्कूल के पास का कुँआ है

जिसका पानी मीठा था

और जिसमें मेरी चाक-कलम गिर गयी थी।

 

राखी है

जिसमें लगे फोम को भिगाकर

हम पट्टी पोंछा करते थे।

 

गुरूजी की सायकल है

जिसका पैडल जब चैनकवर से घिसता

तो आवाज आती थी पहचानी सी।

 

पेटी के ढक्कन के पीछे

चिपके हुए स्टीकर हैं

पंजा छाप, कमल छाप

चक्र छाप और हाथी।

 

आँगन है

जहाँ मम्मी की पुरानी साड़ी बिछाकर

ईंटों से दबाकर हर कोने पर

हम बड़ी-पापड़ सुखाया करते थे।

 

स्कूल की खपरे वाली छत है

उससे छनकर आने वाली

धूप की रेखा

रेखा में तैरते थे धूलकण।

 

हिन्दी की पुस्तक है

जुलाई के महीनें में ही

पढ़कर खत्म कर देता मैं

सारी कविताएँ और कहानियाँ।

 

ईश्वर है

पोलियो हो गया था उसे

ट्रायसाइकिल से आता था स्कूल।

 

नीले रंग का धब्बा है

खान सर की शर्ट की जेब पर

उनका निब-पेन पोकता था न

इसलिये बन जाता था।

 

स्कूल में चलने वाला

टीकाकरण अभियान है

“काकर मूड़ में काय हे?

सूजी देवैया आय हे!!”

हम गाते थे जब स्कूल में

डॉक्टर आता था।

 

खाना छुट्टी है

जब सब खाना खाने घर जाते

और बहुत से वापस नहीं आते

दूसरी पाली के स्कूल में।

 

टेमा है

दवा की शीशी में

भरा मिट्टी तेल

ढक्कन में छेद कर लगायी बाती

और बनायी चिमनी, यानी टेमा।

 

 

पहला और आखिरी सावन-सोमवार है

स्कूल की आधी छुट्टी होती थी।

 

काँवर है

जिसके दोनों सिरों पर

तेल के पीपे फँसाकर

कुएँ से पानी लाकर

घर की टंकी भरते थे।

 

‘माता देवाला’ है

नवरात्रि में वहाँ काँटों के झूले पर

वो झूलते थे जिनको

देवी आती थी।

 

 

-हितेन्द्र

 

 

 

 

 


 
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Posted by on सितम्बर 27, 2011 in My Poems (कविताएँ)

 

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अनोखी सांप्रदायिकता ‘मौसम’ की

यह लेख कोइ फिल्म समीक्षा नहीं है। केवल यह कहना चाह्ता हूँ कि एक बार फिर बॉलीवुड ने सांप्रदायिकता पर अपनी कमजोर समझ को उजागर किया है। दुर्भाग्य से पंकज कपूर जैसे मंजे हुए कलाकार के निर्देशन में भी। मौसम एक प्रेम कहानी के रूप में प्रस्तुत की गयी है जो ई. सन् 1992 से शुरू होती है और 2002 में समाप्त। आप जानते होंगे कि 1992 में अयोध्या में रामजन्मभूमि पर बना विवादित ढाँचा ढहाया गया था। 1993 में मुंबई में बम विस्फोट हुए, 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ, 2001 में अमेरिका पर इस्लामी आतंकवादियों ने हमले किये और 2002 में गुजरात के दंगे। आप यह भी जानते होंगे कि 1984 में दिल्ली में सिख विरोधी दंगे हुए थे।

क्या इन सारी घटनाओं को लेकर एक ही फिल्म बन सकती है?

क्या इन सभी घटनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित नायक और नायिका की कोइ जोड़ी हो ऐसी कहानी लिखी जा सकती है?

ऐसी ही एक कहानी पर लिखी गयी फिल्म है मौसम। अब ज़रा ध्यान दें कि प्रेम कहानी के अतिरिक्त इन सभी घटनाओं का उल्लेख यह फिल्म किस तरह करती है:

1. कश्मीर में हिंसा। नायिका जो मुसलमान है उसका पिता उसे अपने रिश्तेदारों के पास पंजाब छोड़ना चाहता है क्योंकि टेररिस्ट (जेहादी या मुजाहिद नहीं) की वजह से उनका श्रीनगर में रहना मुश्किल हो गया है। यानी मुसलमानों ने पंडितों को श्रीनगर से भगाया यह तथ्य तो छिपाना मुश्किल है। लेकिन दिखाया गया है कि एक मुसलमान परिवार अधिक पीड़ित है।

2. एक दृश्य में नायिका सपना देख रही है, उसका मुसलमान पिता एक कश्मीरी पंडित मित्र को बचाने के लिये आतंकवादियों को उसका पता नहीं बताता। आतंकवादी उसे गोलियों से भून देते हैं। कश्मीर की हिंसा के इस दृश्य में आतंकवादी दिखायी नहीं देते। उनका धर्म पहचानना मुश्किल है। यानी मुसलमान सांप्रदायिक नहीं हैं। उन्होंने तो पंडितों को बचाने के चक्कर में खुद घाटी छोड़ दी!

3. 6 दिसंबर की अयोध्या की घटना का विडियो दिखाया गया है। जो खबर उस दिन की सुनायी गयी है, उसमें कार सेवकों ने ‘मस्जिद’ गिरा दी ।  ध्यान दीजिये ढाँचा नहीं, मस्जिद। पार्श्व में कारसेवक “जय श्री राम” के नारे लगा रहे हैं। दृश्य पर्याप्त समय तक है ताकि आप जान लें अगर अब तक नहीं जानते थे कि ये हिमाकत करने वाले किस धर्म से हैं!

4. मुंबई में 1993 के बम विस्फोटों में नायिका का मुसलमान ‘फूफा’ मारा जाता है। इन विस्फोटों का कोइ दृश्य नहीं। इसमें मरे हिन्दुओं के बारे में एक इशारा तक नहीं। दुनिया जानती है कि दाउद इब्राहिम ने पाकिस्तान की आई.एस.आई. के साथ मिलकर 1992 का बदला लेने के लिये यह हिन्दू विरोधी विस्फोट कराए थे। लेकिन जहाँ बाबरी ध्वंस को बाकायदा दिखाया गया है, इस घटना का कोइ दृश्य नहीं। यानी इस बार भी कोइ पीड़ित है तो वो है सिर्फ मुसलमान!

5. 1999 का कारगिल युद्ध। किसने किया? कोइ नाम तक नहीं!! पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया गया। क्यों हुई यह लड़ाई बताया तक नहीं गया। तो क्या यहाँ गुनहगारों की पहचान छुपाने की कोशिश की गयी है?

6. 2001 में अमरीका पर आतंकवादी हमले की खबर। कोइ दृश्य नहीं। लेकिन जो खबर दिखायी गयी है उसमें ये कहा गया है कि चूँकि ये हमले ओसामा बिन लादेन और उसके साथियों (उनके धर्म का नाम नहीं लिया गया), ने करवाये हैं तब से पश्चिम में मुसलमानों के प्रति भेदभाव बढ़ गय है। कमाल है, यहाँ भी फिल्म हमलों में मारे गये हजारों लोगों का दर्द भूल जाती है, कोइ पीड़ित है (विक्टिम है) तो वो है सिर्फ मुसलमान!

7. 2002 के गुजरात दंगे। ‘बेस्ट बेकरी’ याद है आपको? जी हाँ खबर है कि अहमदाबाद की इस बेकरी में कुछ मुसलमानों को जिन्दा जलाया गया था। अब लीजिये। नायिका मुसलमान है। अपनी बुआ के साथ वह अहमदाबाद में एक बेकरी चलाती है। फिर कुछ लोग इस मुसलमान नायिका की बेकरी, उसका घर और उसका मोह्ल्ला जला देते हैं। अंदाज लगाइये किस धर्म के होंगे वे लोग? लेकिन नायिका के पूछने पर कि वे कौन थे नायक कहता है – साये थे, कोइ पहचान नहीं थी उनकी!! लेकिन बारीकियाँ क्या कहती हैं? यही कि मुसलामान ही यहाँ भी विक्टिम है। और हिन्दू हत्यारा!

8. दंगो की आग के बीच नायक याद करता है कि 1984 के दंगों में उसकी माँ चल बसी। लेकिन इन दंगों का भी कोइ दृश्य नहीं। 1984 के दंगों की कोइ पहचान या पृष्टभूमि नहीं। यानी सिख विक्टिम हो सकता है, पीड़ित हो सकता है, लेकिन इस दर्द को काँट छँट कर, कम कर के बताया गया है सफाई से।

कुल मिलाकर दंगों का मतलब यह कि ‘कौम’ विशेष ही पीड़ित है। पंकज कपूर की यह फिल्म चले न चले, यदि इस फिल्म से वे सांप्रदायिक सद्भाव का कोइ संदेश देना चाहते थे, तो मेरी नजर में उनका यह प्रयास सच्चा नहीं था। और यदि प्रेम कहानी दिखानी ही थी तो इतनी सारी घटनाओं को घुसाने की आवश्यकता ही क्या थी? यह समझ से परे है।

[फिल्म की समीक्षा लिखने का मेरा उद्देश्य नहीं था। इसलिये कहानी आदि लिखी नहीं यहाँ। फिल्म देखना चाहें तो अवश्य एक बार देख लें। समीक्षा यहाँ से पढ़ें: http://msnyuva.webdunia.com/entertainment/moviereview/1109/23/1110923051_1.htm]

- हितेन्द्र

 

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दुनिया गोल है

 दुनिया गोल है

एक रोज़ जब लेटा था

हर रोज़ की तरह बगीचे में

हवा का झोंका उड़ा लाया मेरे पास

पास ही के पेड़ के एक फ़ूल को

फ़ूल को मैंने देखा था, पहले भी

उस बगीचे में सबसे सुंदर था जो

पर नहीं मालूम था पहले कि सुगंध भी है उसमें

सुगंध जिससे पता चलता है

कि फ़ूल सुंदर तो होते ही हैं,

आत्मा भी होती है उनमें

आत्मा, जो सुगंध है

इससे पहले कि छू लेता उसे

हवा फ़िर उड़ा ले गयी फ़ूल को

कुछ दूर मुझसे

कुछ दूर, बस कुछ ही दूर

मालूम नहीं ये हवा कि शरारत थी

या फ़ूल की इच्छा

पर हो चुका था वक्त और जाना ज़रूरी था

बगीचे से दूर

मैं बगीचे से बाहर हूँ

और मेरी निगाहें हैं

आगे की ओर जाने वाली सड़क पर

सड़क पर मेरे कदम तेज़ हैं

और वो डगमगा भी नहीं रहे

ना ही मैं मुड़कर देख रहा हूँ

क्योंकि पीछे मुड़कर देखने से

आगे चलना मुश्किल होता है

मेरा रास्ता पूर्व की ओर जाता है

और हवा उड़ा ले गयी है फ़ूल को

पश्चिम की ओर

मालूम नहीं ये कितना सच है

पर किताबों में लिखा है

कि दुनिया गोल है

 

[यह कविता 4 दिसंबर 2006, को नागपुर में लिखी गयी थी। किताबें सही साबित हुईं, और मैंने जान लिया कि दुनिया गोल है। आगे आप समझ ही गये होंगे।]

[सोनू के लिये]

-हितेन्द्र

 
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Posted by on अगस्त 31, 2011 in My Poems (कविताएँ)

 

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बाबा के समर्थन से अण्णा बने प्रधानमंत्री!

25 जून 2012, नयी दिल्ली। गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता किसन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे भारत के नये प्रधानमंत्री मनोनीत किये गये हैं। बीते महीने देश में हुए ऐतिहासिक मध्यावधि चुनावों के परिणाम आज घोषित कर दिये गये। गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे के नेतृत्व में बनी जनलोकपाल पार्टी देश में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सामने आई है। जनलोकपाल पार्टी को प्रख्यात योग गुरू बाबा रामदेव के नेतृत्व में बनी भारत-स्वाभिमान पार्टी ने समर्थन देने की घोषणा पहले ही कर दी थी। भारत स्वाभिमान के समर्थन से जनलोकपाल पार्टी के लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कल श्री हजारे को प्रधानमंत्री मनोनीत कर दिया। श्री हजारे आज दिल्ली के रामलीला मैदान में शपथ लेंगे। बाबा रामदेव की पार्टी के संसदीय दल के नेता श्री सुब्रह्मण्यम स्वामी उप-प्रधानमंत्री होंगे।

लोकसभा के 545 में से 543 सीटों पर बीते महीन हुए चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। जनलोकपाल पार्टी को 230 सीटें मिली हैं। वहीं 200 सीटों के साथ बाबा रामदेव की भारत स्वाभिमान पार्टी दूसरे स्थान पर रही। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए. को 30-30 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। शेष 53 सीटों पर निर्दलीय और क्षेत्रीय दलों को विजय मिली है।

नये प्रधानमंत्री की घोषणाएँ:

प्रधानमंत्री मनोनीत होते ही श्री हजारे ने घोषणा की है कि जनलोकपाल कानून लागू करवाने के बाद उनकी पहली प्राथमिकता देश में शराबबंदी की होगी। देश में जो भी व्यक्ति शराब का सेवन करते पाया जाएगा उसे पेड़ से बांधकर पीटा जाएगा। यदि शराब बंद होगी तो ही देश का विकास होगा ऐसा उनका कहना था। बाबा रामदेव द्वारा दिये गये समर्थन पर आभार व्यक्त करते हुए अण्णा ने कहा कि दोनों दलों का एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी बनाया जाएगा और यदि बाबा चाहें तो रोज सुबह उठकर जो भी नागरिक योग-प्राणायाम न करे उसे भी पेड़ से बांधकर पीटने की सजा दी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि ऐसी सज़ा का सफल प्रयोग अण्णा अपने गाँव रालेगण सिद्धि में कर चुके हैं। श्री हजारे द्वारा की गयी अन्य महत्वपूर्ण घोषणाएँ इस प्रकार हैं:

1. शिक्षा व्यवस्था में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता। उन्होंने कहा कि “यह बड़े ही दुर्भाग्य का विषय है कि गांधी जी के देश मे बच्चों को सत्याग्रह की शिक्षा नहीं दी जाती। अब से स्कूलों में ही बच्चों को लंबे समय तक बिना बीमार हुए अनशन कैसे करें इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। अण्णा के सहयोगी अरविंद केजरिवाल को मानव-संसाधन मंत्री बनाया जाएगा। इस अवसर पर उपस्थित श्री केजरिवाल ने कहा कि सभी विश्वाविद्यालयों में कुलपति उन्हें ही नियुक्त किया जाएगा जिन्होंने मैगसेसे या नोबल पुरस्कारों में से कम से कम एक पुरस्कार जीता हो।

2. एक नयी सूचना क्रांति का आहवाहन। प्रत्येक भारतीय को इंटरनेट निःशुल्क प्रदान किया जाएगा। इसके बदले उन्हें फेसबुक और ट्विटर पर हमेशा ऑनलाईन रहना अनिवार्य होगा।

 

3. नये कानूनों का निर्माण। कपिल सिब्बल को चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव हराने वाले प्रशांत भूषण विधि मंत्री नियुक्त किये जाएंगे। अण्णा ने कहा कि श्री भूषण के पिता श्री शांति भूषण की अध्यक्षता में एक ड्राफ़्ट कमिटी बनायी जाएगी जो भारत के सभी कानूनों की समीक्षा कर नये कानूनों को लिखने का काम करेगी। जैसा भी यह कमिटी कहेगी अक्षरशः वैसा ही कानून संसद में बिना बहस के पारित करा लिया जाएगा।

4. कानून व्यवस्था में सुधार। काँग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी को अमेठी के चुनाव में हराने वाली डॉ. किरण बेदी को गृह मंत्री बनाया जाएगा। किरण बेदी का कहना था कि वे देश की सारी जेलों को तिहाड़ जेल की तरह सुधार गृह में परिवर्तित कर देंगी। ऐसा करने पर सभी अपराधी आप ही सुधर जाएँगे और अपराधों में कमी आएगी। देश की अदालतों में चल रहे मुकदमों को कम करने के लिये स्टार प्लस चैनल पर आने वाला किरण बेदी का कार्यक्रम “आप की कचहहरी” अब दूरदर्शन पर रोज़ 4 घंटे आएगा। स्वयं किरण बेदी इसमें जज बनकर मुकदमों का निपटारा कर देंगी। इससे अदालतों को काम के बोझ से काफी मुक्ति मिलेगी।

 

5. अल्पसंख्यकों का विकास होगा। अल्पसंख्यकों के विकास पर विशेष ध्यान देने की घोषणा करते हुए मनोनीत प्रधानमंत्री श्री अण्णा हजारे ने अल्पसंख्यकों के विकास हेतु गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा बनाये गये मॉडल की प्रशंसा की। हालाँकि अरविंद केजरिवाल के द्वारा टोकने पर बाद में अण्णा ने कहा कि उनकी बात को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुतु किया गया है। उन्होंने कहा कि स्वामी अग्निवेश को अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया जाएगा। वही अल्पसंख्यकों के विकास की योजना बनाएँगे।

6. सिंचाई हेतु नये बाँध बनेंगे। मेधा पाटकर को नया सिंचाई मंत्री बनाने की घोषणा करते हुए अण्णा ने कहा कि सुश्री पाटकर अब देश के हर गली-मोहल्ले में छोटे बाँधों का निर्माण करेंगी। इसके बाद भाखड़ा-नांगल समेत देश के सभी बड़े बाँधों को तोड़ दिया जाएगा।

बाबा रामदेव की प्रतिक्रिया:

भारत स्वाभिमान पार्टी के संस्थापक बाबा रामदेव का कहना था कि उन्होंने अण्णा हजारे को दो प्रमुख शर्तों पर समर्थन दिया है। पहली शर्त यह कि विदेशों में जमा देश का काला धन वापस लाया जाएगा। और दूसरी शर्त यह कि केंद्रीय मंत्रिमंडल सहित सरकार के सभी अधिकारी कर्मचारी प्रातः सार्वजनिक उद्यानों में आम जनता के साथ योगासन करेंगे। उन्होंने पेप्सी-कोला बंद करने और समलैंगिकता पर प्रतिबंध लगाने के लिये कानून लाने की भी माँग की है। सूत्रों का कहना है कि बाबा के प्रिय शिष्य आचार्य बालकृष्ण को स्वास्थ्य मंत्री बनाया जा सकता है। यह भी चर्चा है कि बाबा वेदप्रताप वैदिक को विदेश मंत्री और स्वदेशी अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिये श्री के. एन. गोविन्दाचार्य को वित्त मत्री बनाने की भी बात अण्णा से मनवा चुके हैं।

 

सुब्रह्मण्यम स्वामी का बयान:

श्री स्वामी का कहना था कि उपप्रधानमंत्री बनते ही वे गाँधी परिवार की असलियत का पता लगाने के लिये एक आयोग का गठन करेंगे। 2 जी घोटाले जैसे घोटाले और ना हों इसके लिये देश के साधु-संतों से मार्गदर्शन लेकर वे नयी योजना बनाएँगे। आपने अमएरिका के हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय अपने देश में भी शुरू करने की बात कही। आपने यह भी कहा कि जून 2011 में रामलीला मैदान में जिनपर लाठी चार्ज हुआ था उन्हें स्वत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाएगा।

काँग्रेस की प्रतिक्रिया:

काँग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने एन.डी.ए. की केवल तीस सीटें आने पर कहा कि इससे साबित होता है कि देश की जनता ने भाजपा को नकार दिया है। यह पूछे जाने पर कि उनके गठबंधन की भी इतनी ही सीटें आयी हैं और वे चुनाव हार गये हैं, श्री तिवारी ने कहा कि यह सब राष्ट्रीय स्वयं संघ और अमेरिका की खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. का षढयंत्र है।

इधर काँग्रेस सूत्रों ने बताया कि इटली में अपने एक बीमार रिश्तेदार का हाल जानने के लिये श्रीमती सोनिया गांधी पुत्र राहुल गांधी, बेटी प्रियंका और दामाद रॉबर्ट के साथ फिलहाल रोम गयी हैं।

दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया:

काँग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह का चुनाव परिणामों पर कहना था कि आर.एस.एस. की साजिश का शिकार हो चुका चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव कराने में विफल रहा है। उनका कहना था कि पूरे देश में सलवा-जुड़ूम के कार्यकर्ताओं की दहशत की वजह से जनता ने काँग्रेस को वोट नहीं दिया। सलवा जुड़ूम को भी संघ की साजिश बताते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने से पहले नक्सली नेता आजाद ने उन्हें खुद फ़ोन करके बताया था कि नक्सलियों को मारने के लिये संघ के स्वयंसेवकों को एस.पी.ओ. बनाय जा रहा है और उन्हें बंदूकें दी जा रही हैं। इन्हीं एस.पी.ओ. की बंदूक के दम पर अण्णा और बाबा की पार्टियाँ चुनाव में जीत गयी हैं। हालाँकि श्री सिंह ने कहा कि आजाद के फोन कॉल की डिटेल्स अब बी.एस.एन.एल के पास उपलब्ध नहीं है। अतः वे अपनी बात को सिद्ध नहीं कर सकते।

 

गडकरी की फिर फिसली ज़ुबान:

भाजपा अध्यक्ष श्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर विवादासपद बयान दिया। चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि “काँग्रेस पार्टी बिल्ली की औलाद है”। हालाँकि बाद में श्री गडकरी ने अपने बयान पर माफी भी माँग ली। चुनाव हारने के मुद्दे पर पूछे जाने पर उनका कहना था कि वे पहले नागपुर जाएँगे। घर पर कुछ समय विश्राम करने के बाद वे संघ मुख्यालय जाएँगे। वहाँ जैसा बताया जाएगा, वैसा बयान मीडिया को उपलब्ध करा दिया जाएगा।

 

 

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हिन्दी की ‘शुद्धता’ पर फेसबुक में चर्चा

हिन्दी भाषा की क्लिष्टता अथवा शुद्धता के विषय पर फेसबुक पर एक मित्र का आलेख पढ़ा। पहले भी उनके आलेख पढ़ता आया हूँ और निःसंदेह वे अत्यंत ज्ञानी, राष्ट्रवादी और हिन्दी भाषा के बहुत ही अच्छे जानकार हैं। उनके प्रति पूर्ण आदर है। नाम आदि का उल्लेख न करते हुए यह बता दूँ कि उनका कहना था कि हिन्दी जितनी अधिक संस्क़्रुतनिष्ठ होगी उतना ही अच्छा।

फेसबुक पर आप इस चर्चा को यहाँ से पढ़ सकते हैं: (कृपया लिंक कॉपी कर ब्राउज़र में पेस्ट करें)

http://www.facebook.com/notes/anand-g-sharma/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%81-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81-/10150648443925603?notif_t=note_reply

एक खास तरह की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के प्रयोग के पक्ष में मित्र का कथन है:

“हिन्दी मेरी मातृभाषा है – मैं माता को सुन्दर – शालीन एवं मूल्यवान वस्त्राभूषणों से अलंकृत करने का यथाशक्ति प्रयास कर रहा हूँ – और इसमें निहित स्वार्थ यह है कि इस से मेरी भी लेखनी का परिमार्जन हो रहा है l

 मेरा विचार है कि निरंतर शुद्ध – उच्च – शालीन – सुसंस्कृत भाषा के संपर्क में रहने से – शनैः शनैः – जड़मति भी सु-जान हो जाता है – इस प्रयास करने में मष्तिष्क को किंचित कष्ट भी हो तो सहन कर लेना अपेक्षित हैl

 साधारण में रूचि रखने से उत्कर्ष का मार्ग स्वतः अथवा अनायास ही अवरुद्ध हो जाता है - यह चिंतन का विषय है l

 अब आप समस्त हिन्दी भाषियों एवं हिन्दी प्रेमियों को चयन करना है कि मातृभाषा हिन्दी को सुशोभित करना है अथवा परित्यक्ता की तरह दीन हीन अवस्था में रखना है l” 

आप श्री का यह भी कहना था:

“मेरा मानना है कि हिन्दी भाषा समुचित रूप से समृद्ध भाषा है |

 अब जो समृद्ध है – जिसके पास वस्त्राभूषणों का बाहुल्य है – वह सादगी दिखने के लिए सप्ताह में एक दो दिन सादे वस्त्र धारण करे तो उसे स्वयं को एवं दूसरों को भी अच्छा लगता है – परन्तु वस्त्राभूषणों की प्रचुरता होने के उपरांत यदि वह व्यक्ति सदैव नितांत सादे वस्त्रों में विचरण करे तो वह अपनी संपदा का दुरूपयोग कर रहा है |

 इसी प्रकार यदि हिन्दी भाषा में भी शालीन सुसंकृत अलंकारिक शब्दों का प्रयोग नहीं होगा तो शनैः शनैः लोग हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा को सड़कछाप भिन्डीबजारी बोली में रूपांतरित कर देंगे – और हिन्दी सिनेमा यह नीचकर्म बहुत पहले से आरंभ कर चुका है |”

अनेक लोगों ने चर्चा में हिस्सा लिया और अपने-अपने मत रखे। इस विषय पर मैंने जो विचार रखे उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

“[...], हिन्दी शुद्ध रूप से लिखी जाए यहाँ तक ठीक है। किंतु आप एक विशेष प्रकार की हिन्दी को ‘उच्च’ क्यों कह रहे हैं। क्या अन्य प्रकार ‘नीच’ हैं? आप और हम जिस हिन्दी में बात करते हैं वह कितनी पुरानी है? आज से 200-300 वर्ष पहले क्या यह भाषा इसी स्वरूप में थी? हिन्दी की माताएँ वे भाषाएँ हैं जिन्हें ‘बोली’ कहकर ‘नीच’ करार दिया गया है। ये लोकभाषाएँ जिनकी मातृभाषाएँ हैं क्या वे निम्न स्तरीय भाषा का उपयोग करते हैं? महाशय, डायनासोर की भाँति यदि भाषाओं को विलुप्ति से बचाना है तो उन्हें बहती नदी के समान स्वच्छ जल बनाईये ना कि तालाब का सड़ा हुआ पानी। भाषाएँ देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलती हैं। इनमें राजनैतिक और ऐतिहासिक कारणों से भी परिवर्तन आते हैं। भारतेन्दु हरिशचंद्र जी जिस हिन्दी में लिखा करते थे उसमें आप नहीं लिखते हैं। तो किसकी हिन्दी ‘उच्च स्तरीय’ एवँ महँगे ‘वस्त्र आभूषणों से सुसज्जित” मानी जाए? हिन्दी की माता संस्कृत नहीं है। संस्कृत उसकी परनानी हो सकती है। प्राचीन भारत के विभिन्न जनपदों में बोली जाने वाली भाषाएँ ही उसकी माताएँ हैं। प्रभो, धनवान भाषा वह नहीं जो अधिक ‘शास्त्रीय’ है, अपितु वह है जो अनेक क्षेत्रों-संस्कृतियों की भाषाओं से आने वाले शब्दों को स्वयं में समाहित करने की क्षमता रखती है। हिन्दी में एक से अधिक भाषाओं के शब्दों का प्रयोग कर पाना भाषायी अशुद्धता नहीं अपितु एकाधिक भाषाओं का मेल कर पाने की कला है। उदाहरण के लिये मुंबईया भाषा ‘निम्न स्तरीय’ या ‘दरिद्र’ भाषा नहीं है। वह मराठी, हिन्दी, और कुछ हद तक अन्य भाषाओं का सम्मिलन है। मुंबईया भाषा ने मुंबई के विभिन्न भाषा-भाषियों को निकट लाने का पुनीत कार्य किया है। हिन्दी को ‘शास्त्रीय’ बनाए रखने के आपके प्रयास प्रशंसनीय हैं। लेकिन यही हिन्दी मानक, उच्च, आदि है ऐसा मानना कठिन है।

यदि प्रश्न शुद्धता का ही है, तो विवाद को हजारों वर्षों पूर्व ले जाइये। और हजारों वर्ष पूर्व बोली जाने वाली संस्कृत में बातें कीजिये। 100-200 साल पुरानी हिन्दी में नहीं। आज घर-घर में तुलसी ज्ञानेश्वर और तिरूवल्लूर पढ़े जाते हैं ना कि वाल्मीकि और वेद-व्यास। भाषा माध्यम है, धर्म नहीं। वर्ग विशेष ने जिस भाषा की पढ़ायी से अन्यों को वंचित रखा आज वह भाषा विलुप्तप्राय है। जिन भाषाओं के कभी स्कूल नहीं खुले वे आज भी बोली जाती हैं।

आप मुझे किसी भी वेद, षड-दर्शनों के ग्रंथों,एवँ सभी भाष्यॉ, और स्मृतियों में से कहीं भी ‘हिन्दी’ अथवा ‘हिन्दू’ शब्द का उल्लेख हो तो कृपया बताइये। जिस भाषा के लिये हम इतनी बहस कर रहे हैं उसका यह नाम भी बाहरी भाषाओं के प्रभाव से ही पड़ा है। तो शुद्धता की शुरूआत क्यों ना नाम बदलकर की जाए?”

मेरा मानना यही है कि भाषा के प्रति हमें उदारवादी होना चाहिये, भाषा के प्रति पेम सर्वथा उचित है किंतु एक सीमित शब्दावली (भले ही वह कितनी ही समृद्ध हो) के ही प्रयोग का हठ उचित नहीं है।

-हितेन्द्र

 

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