भाग निकलने की भावना: समस्या और उपाय – २

इस लेख का पहला भाग आप यहाँ से पढ़ सकते हैं।

मुझे प्रतिदिन काम पर जाने के लिये बीस कि.मी. की यात्रा शहर के एक छोर से दूसरे छोर पर करनी पड़ती है। रास्ते में अनेक चौराहों पर सिग्नल आते हैं। मेरी ही तरह सैकड़ों मध्यमवर्गीय कामकाजी लोग अपने-अपने वाहनों समेत लाल बत्ती के निशान पर ठहरते हैं। रोज़ ही देखता हूँ कि जैसे ही लाल बत्ती के साथ लगी उल्टी गिनती की घड़ी दस सेकंड दिखाती है, लोग धीरे-धीरे अपने वाहन आगे बढ़ाने लगते हैं। पाँच सेकंड आने तक वे चौराहे के मध्य तक पहुँच जाते हैं। इस बीच दूसरी ओर से आने वाले वाहनों का सिलसिला थमा नहीं होता है। स्थिति कुछ ऐसी बन जाती है दूसरी ओर से आने वाले वाहन समय रहते भी या तो सिग्नल पार नहीं कर पाते, या मेरी ओर से आ रहे वाहनों को बढ़ते देख तेज़ी से पार करते हैं। इससे रोज़ ही दुर्घटना की संभावना बनी रहती है।

एक और उदाहरण। विवाह समारोहों पर होने वाले सामूहिक भोज बीते कुछ वर्षों में भव्य रूप ले चुके हैं। इनमें नियमित भोजन के अतिरिक्त अनेक सुरूकिपूर्ण चाट, पानी-पूरी, बर्फ के गोले आदि के स्टॉल विशेष आकर्षण का केन्द्र होते हैं। इसलिये इन स्टॉलों पर कुछ अधिक ही भीड़ दिखायी देती है। इन स्टॉलों पर कुछ लोग तो पंक्ति में खड़े होकर अपना समय आने की प्रतीक्षा करते हैं, पर अनेक ऐसे होते हैं जो येनकेनप्रकारेण पंक्ति को तोड़ना और पहले से प्रतीक्षा कर रहे लोगों से पहले ही इच्छित वस्तु हासिल कर लेना अपनी शान समझते हैं। इसके लिये वे जो युक्तियाँ अपनाते हैं, वे प्रायः असभ्यता का द्योतक होती हैं। मैंने देखा है ऐसा करने वाले लोगों में शिक्षा या आर्थिक आधार पर कोइ भेद नहीं होता।

सिग्नल पर कुछ सेकंड और इंतज़ार कर लेने से क्या लोगों की विशेष आर्थिक हानि हो जाएगी? जो भारतीय समाज हर जगह विलंब से जाने के लिये जगविख्यात है, वह सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी उतावली क्यों दिखाता है? फिर किसी विवाह समारोह में जाने का तो अर्थ ही है कि आप परिजनों के बीच आनंद के क्षण बिताने आये हैं। फिर वहाँ भी ऐसी अधीरता क्यों?

कल्पना कीजिये कि जो समाज ऐसे सामान्य अवसरों पर असंयत व्यवहार करता है वह नौकरी और व्यापार में क्या करता होगा? सत्य यह है कि हम प्रायः अधिक पाना चाहते हैं, हम प्रायः जल्दी पाना चाहते हैं। इससे भी बड़ा सत्य यह है कि हम दूसरों से अधिक और दूसरों से जल्दी पाना चाहते हैं।

संस्कृत भाषा की एक धातु है ‘लभ्’। इसका अर्थ होता है प्राप्त करना। लभ् से अनेक शब्द बने हैं। जैसे सुलभ, दुर्लभ, लाभ, और लोभ।

लाभ का अर्थ है नफा, फायदा, प्रॉफिट। लोभ का अर्थ है लालच, ग्रीड।

लेख के पहले भाग में हमने जिन समस्याओं की चर्चा की, उनके मूल में अधिकतम लाभ कमाने का लोभ और प्रतियोगिता की भावना को माना। किंतु क्या लाभ का अस्तित्व मात्र दोषपूर्ण है? इस पर विचार करते हैं:

  1. लाभ के अंतर्निहित होने से विक्रेता को श्रम और मूल्यवर्धन (वैल्यू एडिशन) का प्रतिफल मिलता है।
  2. लाभ की भावना से विक्रेता अपने उत्पादों और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिये हरसंभव प्रयास करते हैं। ऐसे प्रयासों ने ही अनेक वैज्ञानिक अविष्कारों को जन्म दिया है।
  3. अधिक लाभ केवल अधिक मूल्य से ही प्राप्त नहीं होता। यह कम लागत से भी प्राप्त होता है। अतः अधिक लाभ कमाने के भावना से पूरी व्यापार प्रणाली में क्षमता में वृद्धि (एफिशिएंसी इंप्रूवमेंट) के अनेक उपाय किये जाते हैं।
  4. प्रतियोगिता की भावना से भी अपने उत्पाद और सेवा को दूसरों से बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है। इन सब प्रयासों से हमारा संसार अधिक सुविधासंपन्न, सुंदर और अनेकानेक विकल्पों से सुसज्जित होता है।

लेकिन लाभ के लोभ और प्रतियोगिता की भावना से कार्य करने में कुछ दोष हैं जिनसे कि वे सम्स्याएँ जन्म लेती हैं जिनका लेख के पहले भाग में उल्लेख किया गया है।

  1. लाभ और लोभ की गणना अंकों में होती है। प्रतियोगिता में कौन आगे है और कौन पीछे, इसका आकलन भी किसी न किसी प्रकार अंकों से ही किया जाता है।
  2. अधिक अंक प्राप्त करने के लोभवश संस्थानों और व्यक्तिओं के लिये अन्य सभी बातें गौण हो जाती हैं। नैतिकता, मानवता, सदाशयता, यह सब भुला दिये जाते हैं और सिर्फ लाभ पर, और दूसरों से आगे बढ़ने पर ध्यान दिया जाता है।
  3. लाभ का लोभ एक सामाजिक दबाव भी है। यदि आप की आय सौ रूपये मासिक है तो आप पर दबाव है कि इसे आगे बढ़ाओ, यदि आपकी आय दस हजार रूपये मासिक है, तब भी आप पर दबाव है कि यह और अधिक होना चाहिये। ठीक उसी तरह जिस तरह परीक्षा में अस्सी प्रतिशत लाने वाले विद्यार्थी को अगली बार नब्बे और उसके अगली बार सौ प्रतिशत लाने के लिये सामाजिक दबाव होता है। यदि आप डिप्टी मैनेजर हैं (जो कि एक सम्मान का ही पद हुआ), तो भी आप स्वयं को मैनेजर से नीचे ही पाते हैं। समाज आपकी नाक में दम किये हुए है कि “आगे बढ़ो”। यदि आपने कार खरीदी है, तो अब बड़ी खरीदो। यदि घर, कार सब कुछ है, तो खास तरह के क्लबों में जाओ। आप तो आप, यदि आपका बच्चा स्कूल में प्रथम आता है, तो आप पर दबाव है कि उसे आई.ए.एस. बनाओ। चाहे जितना आपने हासिल किया हो जीवन में, समाज आपको विश्राम नहीं करने देगा। वह आपको “आगे बढ़ने” के लिये मजबूर करता रहेगा। यह सब इसलिये क्योंकि सफलता एवँ सुख का पैमाना समाज ने अंकों को बना लिया है। और अंकों में वृद्धि की संभावना अनंत है।

कुल मिलाकर जब तक लाभ का लोभ और प्रतियोगिता की भावना है, तब तक हम अपने सहज स्वरूप से जीवन यापन नहीं कर पायेंगे। यह भी संभव है कि जिस अंधी दौड़ का प्रथम भाग में उल्लेख किया गया है, उस अंधी दौड़ में जीते रहना ही हमारा सहज स्वरूप बन जाय।

इससे आगे की चर्चा उनके लिये जो मानते हैं कि उन्हें स्थिति में परिवर्तन चाहिये। सबसे पहले आइये चर्चा करें एक वैकल्पिक अवधारणा की जिसकी विशेषरूप से भारत में जैन धर्म और वैदिक धर्म के योगसूत्रों में चर्चा की गयी है।

यह धारणा है “अपरिग्रह” की। अपरिग्रह का अर्थ होता है आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह का निषेध। जीवन का निर्वाह उतनी ही वस्तुओं और धन से करना जितने की आवश्यकता है। यदि आप उससे अधिक अर्जित करते हैं, तो उसे दान और परोपकार में खर्च करना।

महात्मा गाँधी ने भी उद्योगपतियों से अपरिग्रह की भावना के पालन का आग्रह किया था। वे चाहते थे कि उद्योगपति अपने व्यापार का पालन किसी ट्रस्टी की भाँति करें जो कि अपने आवश्यकताओं से अधिक प्राप्त होने वाले धन को समाज कल्याण में खर्च करे। देश के एक प्रसिद्ध उद्योग घराने “बजाज” के पितृ पुरूष श्री जमनालाल बजाज ऐसे ही सिद्धांतों पर चलने वाले एक गाँधीवादी उद्योगपति थे।

पर आज के संदर्भ में विशेषरूप से नौकरीपेशा लोगों के लिये अपरिग्रह की क्या उपयोगिता है? हम तनाव और अवसाद से मुक्ति पाने के लिये किस प्रकार इसका उपयोग करें? यह लाभ के लोभ का विकल्प किस प्रकार हो सकता है?

जो आधुनिक जीवनशैली के दुष्प्रभावों से बचना चाहते हैं वे इन बातों पर विचार अवश्य करें

  1. अपरिग्रह का अर्थ संन्यासियों के लिये अलग और गृहस्थ के लिये अलग होता है। इसलिये सबसे पहले आप अपने जीवन में उन सारे कर्तव्यों तथा आवश्यकताओं पर विचार करें जिनके लिये आपको अर्थसंग्रह की आवश्यकता है।
  2. इस विचार से आप आवश्यकताओं के संदर्भ में कुछ प्राथमिकताएँ तय कर पायेंगे। उदाहरणार्थ आप संभवतः यह तय करें कि भोजन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। इनका वरीयता क्रम आप स्वयं निश्चित करें।
  3. इनके बाद नंबर आने चाहिये, आपके और आपपर निर्भर लोगों के आत्मविकास का। साथ ही आपके सामाजिक दायित्व और आपकी रूचि के विषय तथा कलाएँ आदि।
  4. जब कभी असमंजस की स्थिति हो तब, सबसे पहले आवश्यकता, फिर सुविधा और अंत में विलासिता का क्रम आने दें।
  5. इन दिनों प्रचार का ऐसा आडंबर हर जगह है धीरे-धीरे विलासिता (लग्ज़री) आवश्यकता का रूप लेती जा रही है। ऐसे आडंबरों से बचें।
  6. अब तक यह बातें किसी धर्मगुरू के प्रवचन जैसी लग रही होंगी। अतः कुछ उदाहरण लेते हैं। यदि आप मोबाईल फोन का उपयोग करते हैं, तो सोच समझ कर फैसला करें कि आपको तकनीकी रूप से कितना उन्नत मोबाईल फोन चाहिये। यदि हर दस दिनों में एक नयी तकनीकी का मोबाईल बाज़ार में आता है, तो इसका यह अर्थ तो नहीं कि आप प्रत्येक दस दिन के अंतराल पर एक नया मोबाईल फोन खरीदें। लगभग यही बात, घर, कार, महँगे कपड़ों, यात्राओं, खर्चीले उत्सवों, उपहारों आदि के लिये भी सत्य है।
  7. सबसे बड़ी भूल होती है दूसरों से होड़ अथवा नकल के लिया किया गया खर्च। यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के जैसा है। किसी और की देखा-सीखी अथवा किसी और से आगे बढ़कर खुद को दिखाने के लिये किया गया खर्च मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
  8. विवेकपूर्ण विचार करें, आपके खर्च कम होंगे। जिससे कि आपकी आवश्यकताएँ कम होंगी। कम आवश्यकताएँ आपको लोभ से मुक्त करेंगी और अपरिग्रह का मार्ग प्रशस्त करेंगी।
  9. आवश्यकताएँ कम होने से आपकी किसी भी अयुक्तिसंगत जीवनशैली से मुक्ति होगी। यह जो “जीवन स्तर” अथवा “लिविंग स्टैन्डर्ड” का मिथक है, इससे आप मुक्त होंगे। यदि आपको लगता है कि खास तरह के खर्चों में कटौती करने पर आपके कुछ मित्र-परिचित आपसे दूरी बना लेंगे, तो ऐसे मित्रों से आज ही मुक्ति ले लेना ही उचित होगा।
  10. एक दबाव मुक्त जीवनशैली अपनाने पर आप किसी भी अनुचित नौकरी या नियोक्ता के दबाव में नहीं आयेंगे। तब आप बाहरी कारकों से आने वाले दबाव, तनाव आदि का सरलता से उपाय भी कर पायेंगे।
  11. ध्यान रहे कि यहाँ मेरा उद्देश्य आपको कम काम करने अथवा अकर्मण्यता के लिये प्रेरित करना नहीं है। काम में प्रगति और मेहनत तथा भौतिक वस्तुओं की गुलामी ये दोनों भिन्न विषय हैं।
  12. दूसरा विषय है प्रतियोगिता की भावना का। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन हर दूसरे व्यक्ति से पृथक होता है। ऐसे में किन्हीं भी दो व्यक्तिओं की तुलना करना व्यर्थ है।
  13. यदि आप समझते हैं प्रतितोगिता की भावना से हम स्वयं को बेहतर बना सकते हैं, तो यही श्रेयस्कर होगा कि आप स्वयं से प्रतियोगिता करें। पर इस प्रतियोगिता के दौरान भी याद रखें कि आपका तनावरहित होना, स्वस्थ होना, समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना, अपने प्रियजनों के प्रति धर्म का पालन करना, किसी भी प्रतियोगिता को जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है।
  14. प्रतियोगिता के नाम पर यदि आप पाते हैं कि आप किसी लंबी रेस का घोड़ा बनकर रह गये हैं, तो एक उपाय है। आप यह धारणा करें कि किसी भी यात्रा का आनंद लेना गंतव्य (मंज़िल, डेस्टिनेशन) पर पहुँचने से अधिक सुखकारी होता है। अतः जीवन में यात्रा का आनंद लीजिये और गंतव्य को भूल जाइये। जब गंतव्य ही नहीं रहेगा तो प्रतियोगिता का प्रश्न ही समाप्त हो जायेगा।
  15. सार संक्षेप में हम कहें तो लोभ के स्थान पर अपरिग्रह, विलास के स्थान पर आवश्यकता को वरीयता, आत्मिक सुख के स्थान पर परोपकार एवँ गंतव्य के स्थान पर यात्रा में आनंद की अनुभूति, ये कुछ उपाय हैं जो कि हमें अनेक समस्याओं से मुक्ति दिला सकते हैं।

ऊपर जिन उपायों की चर्चा की गयी है, वे व्यक्तिगत परिवर्तनों का विषय हैं ना कि संस्थागत। अर्थव्यवस्था में परिवर्तन या किसी बड़े राजनैतिक अथवा सामाजिक परिवर्तन के बगैर यह संभव है कि हम छोटे-छोटे उपायों से अपना जीवन अधिक सुखकर बना सकें।

जहाँ तक भाग निकलने की भावना का प्रशन है। हमें यह सोचना चाहिये कि एक समस्या से पलायन दूसरी समस्या को ही जन्म देगा। साथ ही यह भी कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। अतः जीवन में जहाँ तक हमारा नियंत्रण है, वहाँ तक सारे परिवर्तन हमे स्वयं करने चाहिये।

जीवन को देखने की हमारी स्वतंत्र दृष्टि होनी चाहिये। सफलता अथवा असफलता के मापदंड हमारे अपने बनाये होने चाहिये। हमें याद रखना चाहिये कि जिस धरती पर हमने जन्म लिया है उसे सुंदर बनाने वाली अनेक बाते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त की अपनी सुंदरता है। प्रकृति प्रतिपल प्रतिक्षण अपना अनुपम सौंदर्य बिखेर रही है। मानवीय संबंधों और प्रेम का भी अपना सौंदर्य है। इन सबके साथ ही हमारे अपने सपने हैं, संगीत है, कलाएँ हैं। जीवन की इस यात्रा में सुखानुभूति के लिये कितना कुछ है। कहीं किसी गंतव्य तक पहुँचने की शीघ्रता में हम स्वयं को यात्रा के इस सुख से वंचित तो नहीं कर रहे?

जीवन यात्रा के इस सुख की अनुभूति के बदले यदि आपसे अपेक्षाकृत छोटे भौतिक सुखों जैसे कि नौकरी में तरक्की, आय में थोड़ी अधिक वृद्धि, व्यापार में किसी प्रतियोगी को पछाड़ने का सुख आदि का त्याग करने को कहा जाय तो क्या आप तैयार नहीं होंगे? यदि जीवन एक सौदा ही है, तो तुच्छ भौतिक सुखों के बदले जीवन के अनुपम सुखों का सौदा क्या महँगा है?

मैं यह नहीं मानता कि उपाय केवल इतने ही हैं। और भी उपाय हो सकते हैं जिनकी चर्चा अनवरत् की जा सकती है। साथ ही संभव है कि इन उपायों में दोष हों अथवा इनके पालन में व्यवहारिक कठिनाइयाँ हों। इन दो लेखों में मैंने विकल्पों की चर्चा की है, समाधानों का दावा नहीं किया। आपके सुझावों और आपकी चर्चा में भागीदारी से हम इस प्रयास को बेहतर ही बनाएँगे।

-हितेन्द्र

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2s टिप्पणियाँ

  1. [...] तिरछी नजरिया कहने से क्यों चूकें वो, जो नज़रों ने देखा है! HomeAbout This Blogमेरा परिचयCAN’T SEE HINDI/Hindi Help RSS ← स्मृति क्या है भाग निकलने की भावना: समस्या और उपाय –&nbsp… [...]

  2. hitendra bhai, main aapki swayam se pratiyogita wali baat se poori tarah sehmat hun. main ise “theory of competetion” kehta hun. pratiyogita ek manushya kisi doosre manushya se kar hi nahin sakta, aisa karna moorkhta hai. har manushya ka jeevan alga hota hai, vatavaran, bharan-poshan, samaj, mata pita ke sansakar, vidyalaya aur pratyek shan ke anubhav alag alag hote hain. phir kaise app kisi doosre manushaya se pratiyogita kar sakte hain. prathmiktayen variyata kram alag alag hota hai. pratiyogita swayam se hi karni chahiye. kyonki jab aap swayam se pratiyogita karte hain to ek santulit avam uchit dabav ka anubhav karte hain. poorntah dabav mokt hona udaseenta aur alasya ka prateek bhi ho sakta hai. ab ye kuch samajhne jaisa hai: uchit dabav isliye ki agar aap exam mein asafal hote aaye hain aur swayam se hi pratiyogita karen to aap bas safal hona chahenge na ki top karna. aaj aapke 50% marks aayenge to kal aap thoda behtar karna chahenge ki 50% se upar aa jayen. lekin agar aap topper se pratiyogita karenge to aapko 90% ke liye mehnat karni padegi. aur yahan dhyan dene ki baat yeh hai ki jeevan ke kisi bhi bindu par agar aap apnay ko doosron se mapenge to koi na koi to aapse bada/achha/unche sthan par to hoga hi chahe aap jahan pahunch jayen, kitna hi aage bad jayen. aur kitna bhi neeche gir jayen, asafal ho jayen aapko aapse neeche, aapse bhi asafal aur aapse bhi dukhi log mil jayenge. isliye ye prapanch hi vyarth hai, niradhar hai moorkhta hai. har vyakti apni safalta swayam nirdharit kare, swayam ko pehchane, swayam se pooche ki uska chitt kya chahta hai uttar khud ba khud mil jayega, bas ek bas swayam sach bolne ki himmat, swayam ka samna karne ki chaht honi chahiye. ye mere vichar hain – app inse asehmat ho sakte hain.

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