स्मृति क्या है?
स्कूल की टाटपट्टी है
जिसे बिछाने, झटकने और लपेटने की
पारियाँ बंधी होती थीं।
पापा की बुलेट की टंकी है
जिस पर बैठकर मैं
एक्सीलरेटर घुमाता और
सोचता कि गाड़ी चल रही है।
स्कूल के पास का कुँआ है
जिसका पानी मीठा था
और जिसमें मेरी चाक-कलम गिर गयी थी।
राखी है
जिसमें लगे फोम को भिगाकर
हम पट्टी पोंछा करते थे।
गुरूजी की सायकल है
जिसका पैडल जब चैनकवर से घिसता
तो आवाज आती थी पहचानी सी।
पेटी के ढक्कन के पीछे
चिपके हुए स्टीकर हैं
पंजा छाप, कमल छाप
चक्र छाप और हाथी।
आँगन है
जहाँ मम्मी की पुरानी साड़ी बिछाकर
ईंटों से दबाकर हर कोने पर
हम बड़ी-पापड़ सुखाया करते थे।
स्कूल की खपरे वाली छत है
उससे छनकर आने वाली
धूप की रेखा
रेखा में तैरते थे धूलकण।
हिन्दी की पुस्तक है
जुलाई के महीनें में ही
पढ़कर खत्म कर देता मैं
सारी कविताएँ और कहानियाँ।
ईश्वर है
पोलियो हो गया था उसे
ट्रायसाइकिल से आता था स्कूल।
नीले रंग का धब्बा है
खान सर की शर्ट की जेब पर
उनका निब-पेन पोकता था न
इसलिये बन जाता था।
स्कूल में चलने वाला
टीकाकरण अभियान है
“काकर मूड़ में काय हे?
सूजी देवैया आय हे!!”
हम गाते थे जब स्कूल में
डॉक्टर आता था।
खाना छुट्टी है
जब सब खाना खाने घर जाते
और बहुत से वापस नहीं आते
दूसरी पाली के स्कूल में।
टेमा है
दवा की शीशी में
भरा मिट्टी तेल
ढक्कन में छेद कर लगायी बाती
और बनायी चिमनी, यानी टेमा।
पहला और आखिरी सावन-सोमवार है
स्कूल की आधी छुट्टी होती थी।
काँवर है
जिसके दोनों सिरों पर
तेल के पीपे फँसाकर
कुएँ से पानी लाकर
घर की टंकी भरते थे।
‘माता देवाला’ है
नवरात्रि में वहाँ काँटों के झूले पर
वो झूलते थे जिनको
देवी आती थी।
-हितेन्द्र


