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Monthly Archives: सितम्बर 2011

स्मृति क्या है

स्मृति क्या है?

 

स्कूल की टाटपट्टी है

जिसे बिछाने, झटकने और लपेटने की

पारियाँ बंधी होती थीं।

 

पापा की बुलेट की टंकी है

जिस पर बैठकर मैं

एक्सीलरेटर घुमाता और

सोचता कि गाड़ी चल रही है।

 

स्कूल के पास का कुँआ है

जिसका पानी मीठा था

और जिसमें मेरी चाक-कलम गिर गयी थी।

 

राखी है

जिसमें लगे फोम को भिगाकर

हम पट्टी पोंछा करते थे।

 

गुरूजी की सायकल है

जिसका पैडल जब चैनकवर से घिसता

तो आवाज आती थी पहचानी सी।

 

पेटी के ढक्कन के पीछे

चिपके हुए स्टीकर हैं

पंजा छाप, कमल छाप

चक्र छाप और हाथी।

 

आँगन है

जहाँ मम्मी की पुरानी साड़ी बिछाकर

ईंटों से दबाकर हर कोने पर

हम बड़ी-पापड़ सुखाया करते थे।

 

स्कूल की खपरे वाली छत है

उससे छनकर आने वाली

धूप की रेखा

रेखा में तैरते थे धूलकण।

 

हिन्दी की पुस्तक है

जुलाई के महीनें में ही

पढ़कर खत्म कर देता मैं

सारी कविताएँ और कहानियाँ।

 

ईश्वर है

पोलियो हो गया था उसे

ट्रायसाइकिल से आता था स्कूल।

 

नीले रंग का धब्बा है

खान सर की शर्ट की जेब पर

उनका निब-पेन पोकता था न

इसलिये बन जाता था।

 

स्कूल में चलने वाला

टीकाकरण अभियान है

“काकर मूड़ में काय हे?

सूजी देवैया आय हे!!”

हम गाते थे जब स्कूल में

डॉक्टर आता था।

 

खाना छुट्टी है

जब सब खाना खाने घर जाते

और बहुत से वापस नहीं आते

दूसरी पाली के स्कूल में।

 

टेमा है

दवा की शीशी में

भरा मिट्टी तेल

ढक्कन में छेद कर लगायी बाती

और बनायी चिमनी, यानी टेमा।

 

 

पहला और आखिरी सावन-सोमवार है

स्कूल की आधी छुट्टी होती थी।

 

काँवर है

जिसके दोनों सिरों पर

तेल के पीपे फँसाकर

कुएँ से पानी लाकर

घर की टंकी भरते थे।

 

‘माता देवाला’ है

नवरात्रि में वहाँ काँटों के झूले पर

वो झूलते थे जिनको

देवी आती थी।

 

 

-हितेन्द्र

 

 

 

 

 


 
20 Comments

Posted by on सितम्बर 27, 2011 in My Poems (कविताएँ)

 

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अनोखी सांप्रदायिकता ‘मौसम’ की

यह लेख कोइ फिल्म समीक्षा नहीं है। केवल यह कहना चाह्ता हूँ कि एक बार फिर बॉलीवुड ने सांप्रदायिकता पर अपनी कमजोर समझ को उजागर किया है। दुर्भाग्य से पंकज कपूर जैसे मंजे हुए कलाकार के निर्देशन में भी। मौसम एक प्रेम कहानी के रूप में प्रस्तुत की गयी है जो ई. सन् 1992 से शुरू होती है और 2002 में समाप्त। आप जानते होंगे कि 1992 में अयोध्या में रामजन्मभूमि पर बना विवादित ढाँचा ढहाया गया था। 1993 में मुंबई में बम विस्फोट हुए, 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ, 2001 में अमेरिका पर इस्लामी आतंकवादियों ने हमले किये और 2002 में गुजरात के दंगे। आप यह भी जानते होंगे कि 1984 में दिल्ली में सिख विरोधी दंगे हुए थे।

क्या इन सारी घटनाओं को लेकर एक ही फिल्म बन सकती है?

क्या इन सभी घटनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित नायक और नायिका की कोइ जोड़ी हो ऐसी कहानी लिखी जा सकती है?

ऐसी ही एक कहानी पर लिखी गयी फिल्म है मौसम। अब ज़रा ध्यान दें कि प्रेम कहानी के अतिरिक्त इन सभी घटनाओं का उल्लेख यह फिल्म किस तरह करती है:

1. कश्मीर में हिंसा। नायिका जो मुसलमान है उसका पिता उसे अपने रिश्तेदारों के पास पंजाब छोड़ना चाहता है क्योंकि टेररिस्ट (जेहादी या मुजाहिद नहीं) की वजह से उनका श्रीनगर में रहना मुश्किल हो गया है। यानी मुसलमानों ने पंडितों को श्रीनगर से भगाया यह तथ्य तो छिपाना मुश्किल है। लेकिन दिखाया गया है कि एक मुसलमान परिवार अधिक पीड़ित है।

2. एक दृश्य में नायिका सपना देख रही है, उसका मुसलमान पिता एक कश्मीरी पंडित मित्र को बचाने के लिये आतंकवादियों को उसका पता नहीं बताता। आतंकवादी उसे गोलियों से भून देते हैं। कश्मीर की हिंसा के इस दृश्य में आतंकवादी दिखायी नहीं देते। उनका धर्म पहचानना मुश्किल है। यानी मुसलमान सांप्रदायिक नहीं हैं। उन्होंने तो पंडितों को बचाने के चक्कर में खुद घाटी छोड़ दी!

3. 6 दिसंबर की अयोध्या की घटना का विडियो दिखाया गया है। जो खबर उस दिन की सुनायी गयी है, उसमें कार सेवकों ने ‘मस्जिद’ गिरा दी ।  ध्यान दीजिये ढाँचा नहीं, मस्जिद। पार्श्व में कारसेवक “जय श्री राम” के नारे लगा रहे हैं। दृश्य पर्याप्त समय तक है ताकि आप जान लें अगर अब तक नहीं जानते थे कि ये हिमाकत करने वाले किस धर्म से हैं!

4. मुंबई में 1993 के बम विस्फोटों में नायिका का मुसलमान ‘फूफा’ मारा जाता है। इन विस्फोटों का कोइ दृश्य नहीं। इसमें मरे हिन्दुओं के बारे में एक इशारा तक नहीं। दुनिया जानती है कि दाउद इब्राहिम ने पाकिस्तान की आई.एस.आई. के साथ मिलकर 1992 का बदला लेने के लिये यह हिन्दू विरोधी विस्फोट कराए थे। लेकिन जहाँ बाबरी ध्वंस को बाकायदा दिखाया गया है, इस घटना का कोइ दृश्य नहीं। यानी इस बार भी कोइ पीड़ित है तो वो है सिर्फ मुसलमान!

5. 1999 का कारगिल युद्ध। किसने किया? कोइ नाम तक नहीं!! पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया गया। क्यों हुई यह लड़ाई बताया तक नहीं गया। तो क्या यहाँ गुनहगारों की पहचान छुपाने की कोशिश की गयी है?

6. 2001 में अमरीका पर आतंकवादी हमले की खबर। कोइ दृश्य नहीं। लेकिन जो खबर दिखायी गयी है उसमें ये कहा गया है कि चूँकि ये हमले ओसामा बिन लादेन और उसके साथियों (उनके धर्म का नाम नहीं लिया गया), ने करवाये हैं तब से पश्चिम में मुसलमानों के प्रति भेदभाव बढ़ गय है। कमाल है, यहाँ भी फिल्म हमलों में मारे गये हजारों लोगों का दर्द भूल जाती है, कोइ पीड़ित है (विक्टिम है) तो वो है सिर्फ मुसलमान!

7. 2002 के गुजरात दंगे। ‘बेस्ट बेकरी’ याद है आपको? जी हाँ खबर है कि अहमदाबाद की इस बेकरी में कुछ मुसलमानों को जिन्दा जलाया गया था। अब लीजिये। नायिका मुसलमान है। अपनी बुआ के साथ वह अहमदाबाद में एक बेकरी चलाती है। फिर कुछ लोग इस मुसलमान नायिका की बेकरी, उसका घर और उसका मोह्ल्ला जला देते हैं। अंदाज लगाइये किस धर्म के होंगे वे लोग? लेकिन नायिका के पूछने पर कि वे कौन थे नायक कहता है – साये थे, कोइ पहचान नहीं थी उनकी!! लेकिन बारीकियाँ क्या कहती हैं? यही कि मुसलामान ही यहाँ भी विक्टिम है। और हिन्दू हत्यारा!

8. दंगो की आग के बीच नायक याद करता है कि 1984 के दंगों में उसकी माँ चल बसी। लेकिन इन दंगों का भी कोइ दृश्य नहीं। 1984 के दंगों की कोइ पहचान या पृष्टभूमि नहीं। यानी सिख विक्टिम हो सकता है, पीड़ित हो सकता है, लेकिन इस दर्द को काँट छँट कर, कम कर के बताया गया है सफाई से।

कुल मिलाकर दंगों का मतलब यह कि ‘कौम’ विशेष ही पीड़ित है। पंकज कपूर की यह फिल्म चले न चले, यदि इस फिल्म से वे सांप्रदायिक सद्भाव का कोइ संदेश देना चाहते थे, तो मेरी नजर में उनका यह प्रयास सच्चा नहीं था। और यदि प्रेम कहानी दिखानी ही थी तो इतनी सारी घटनाओं को घुसाने की आवश्यकता ही क्या थी? यह समझ से परे है।

[फिल्म की समीक्षा लिखने का मेरा उद्देश्य नहीं था। इसलिये कहानी आदि लिखी नहीं यहाँ। फिल्म देखना चाहें तो अवश्य एक बार देख लें। समीक्षा यहाँ से पढ़ें: http://msnyuva.webdunia.com/entertainment/moviereview/1109/23/1110923051_1.htm]

- हितेन्द्र

 

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