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कैटल क्लास के मुसाफ़िर

In Current Issues (सामयिक), इन दिनों...These Days... on September 19, 2009 at 5:45 pm

विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर इन दिनों समस्याग्रस्त हैं। अपने एक बयान में विमानों की इकॉनॉमी क्लास को उन्होंने कैटल क्लास (भेड़-बकरियों की श्रेणी) की संज्ञा दे डाली है। इस पर काँग्रेस पार्टी उनसे ख़फ़ा है। और इकॉनॉमी क्लास के यात्री भी। चूँकि इस चिट्ठाकार को अब तक विमान से यात्रा का अनुभव नहीं है, इसलिये यह बताना मुश्किल है कि क्या सचमुच विमानों की इकॉनॉमी क्लास में यात्री भेड़ बकरियों की तरह सफ़र करते हैं? यह तो आप ही बताएँ। किंतु ‘आम आदमी’ (और आम औरत भी) कहीं-कहीं कैटल क्लास यानी मवेशियों की तरह सफ़र करता है , वह है भारतीय रेल की ट्रेनों का सामान्य दर्जे डिब्बा, और मुंबई सहित अनेक शहरों की लोकल ट्रेनें। सोनिया गाँधी एक किस्म की कैटल क्लास मेंतो सफ़र कर चुकी हैं किंतु शायद ही कभी वे ट्रेनों के साधारण दर्जे में सफ़र कर ‘सादगी’ का प्रदर्शन करें। क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि महाराष्ट्र के काँग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी पार्टी की सादगी की विचारधारा को ध्यान में रखते हुए, मुंबई में लोकल ट्रेनों से यात्रा करेंगे? इन ट्रेनों इंसान की गति मुर्गी के दड़बे से भी गयी-बीती होती है। बैठना या खड़े होना तो दूर पैर रख पाना भी अपने आप में एक संतुष्ट सफ़र की यादगार बन जाता है। मुझे अच्छी तरह याद है जब अंधेरी से दादर जाने वाली मुंबई लोकल में मेरे एक मित्र को उतरने के लिये पैरों का उपयोग नहीं करना पड़ा, भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि वे भीड़ में दबकर लटक गये और भीड़ ने हवा में लटके हुए ही रेल्वे प्लैटफार्म पर ‘लैंड’ करवा दिया। तो मंत्री महोदय की बात पर हम नाहक ही नाराज़ हो रहे हैं। कैटल क्लास तो है, और हम सचमुच भेड़-बकरियों की तरह रोज़ाना सफ़र कर रहे हैं। ऐसे में बुरा मानने की बात ही क्या है?

कवि रहीम ने उचित ही कहा है, “सांई इतना दीजिए,  जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाए”

सादगी का चाहे जितना भी नाटक कर लें, हमारे नेता, कवि रहीम के इस दोहे का मर्म कभी नहीं समझ पाएँगें।

-हितेन्द्र।