इन दिनों शिक्षा व्यवस्था पर बहस छिड़ी हुई है। पूरा देश इस बात पर बहस कर रहा है कि दसवीं की परीक्षा हो या न हो। परंतु शिक्षा का प्रश्न बड़ा ही व्यापक है। विचार का एक विषय यह हो सकता है कि शिक्षा का क्या उद्देश्य है और शिक्षा व्यवस्था का मूल रूप कैसा होना चाहिये? यह मूल रूप से एक दार्शनिक प्रश्न है। इसके अतिरिक्त शिक्षा कैसे प्रदान की जाए, उसका मूल्यांकन कैसे हो और उसकी उपलब्धता और लागत क्या हो? इसे अंग्रेजी में Methodology, Evaluation, Accessibility and Affordability कहा जा सकता है। ये सभी प्रश्न आपस में स्वतंत्र हैं और इन पर पृथक चर्चा की आवश्यकता है। पर इन सबसे ऊपर शिक्षा के दर्शन (philosophy) का प्रश्न है। 
आचार्य रजनीश (ओशो) के विचार शिक्षा के संदर्भ में क्रांतिकारी, और रोमांचकारी हैं। शिक्षा में क्रांति विषय पर उनके विचारों को अंग्रेज़ी भाषा में यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ा जा सकता है।
ओशो की दृष्टि में शिक्षा स्वंत्रता देने वाली और मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करना सिखाने वाली होनी चाहिये। शिक्षा वह है जो मनुष्य को नये की खोज करना सिखाये, उसे संदेह करना सिखाये, ताकि वह सत्य तक स्वयं पहुँचे ना कि किताबों में लिखे हुए को आँख मूँदकर सत्य मान ले। शिक्षा व्यवस्था यदि प्रतियोगिता सिखाये तो वह दो काम करती है, वह अधिक अंकों वाले को श्रेष्ठ और कम अंकों वाले को हेय बताती है, इस आधार पर जो भेद हैं वह आगे भी समाज में कायम रहते हैं, जाति, रंग, पद, धन, प्रसिद्धि, रूप आदि के नाम पर। भेद मनुष्य की पहचान बन जाते हैं, वह स्वयं को मनुष्य नहीं बल्कि अमुक जाति, वर्ग, पेशे, पद, धर्म से पहचानता है, और इसलिये अन्य वर्ग के लोगों से प्रेम नहीं कर पाता। इससे भी बढ़कर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था (ओशो इसे पाँच हज़ार सालों से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था बताते हैं, याने वे वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था को भी निर्दोष नहीं मानते।) मनुष्य को विद्रोह से, प्रश्न करने से हतोत्साहित करती है।
एक रोचक उद्धरण में वे कहते हैं कि समाज और शिक्षा व्यवस्था हरेक मनुष्य को एक जैसा बनाना चाहते हैं। ज़रा सोचिये क्या हो यदि गुलाब को चंपा और चंपा को जास्मीन बनने के लिये कहा जाए? क्या ये संभव भी है? आप खुद ही पढ़ें:
In your whole life have you ever seen one man exactly like any other? In the whole world not even one pebble can be found equal to another. Here everything is unique and unparalleled. As long as we do not respect the uniqueness of every individual, rivalry, competition, murders and violence will remain. Until then, everyone will try to get ahead through dishonesty, and will try to be like someone else. If this happens, what sort of results do we expect?
Will the flowers in a garden become mad? If great teachers go and explain to them that the jasmine flower should be like the champa, or the champa should become a jasmine, which is very beautiful, will that happen? No, because the flowers are not mad like men. A flower is not so foolish as man to get involved in such thoughts. The flower will not listen to such talks of teachers, philosophers, idealists or so-called religious people.
If the flowers listen to such talks, what will happen to the garden where the jasmine tries to become a champa? In that garden flowers will not grow, all the plants will become withered. Why? – because however much the jasmine tries to become a champa, it cannot. It is not its nature. In its effort to become a champa, the jasmine will not even become a jasmine, which it was destined to be.
इस संबंध में अधिक जानने के लिये उचित होगा आप ऊपर दिये गये पते पर क्लिक कर उक्त पुस्तक को डाउनलोड करे और यहाँ टिप्पणियों के माध्यम से हम चर्चा को आगे बढ़ायें।
(भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विषय पर मेरा एक अन्य लेख पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)
(जाते-जाते: तिरछी नजरिया पर लेखों का सिलसिला पुनः प्रारंभ करने का प्रयास है। आशा है इस बार चिट्ठों की आवृत्ति नियमित और अधिक होगी।)
-हितेन्द्र ॥






Good sir ji.
hi sir im mani.i m from bihar but i am completing education from delhi.but one requst to u that u will be try to grow education in bihar.