शुभकामनाएँ

तिरछी नजरिया के प्रिय पाठंकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ! दीपावली पर भेंट स्वरूप इस छत्तीसगढ़ी गीत का आनंद लें।

ऐसे और भी सुंदर गीत आप यहाँ से पढ़ सकते हैं।

हाय रे कुंदरु करेला,

मोर छैला

अलबेला मोर तीर आजा

मोर तीर आजा राजा

खवाहूं बीरो पान।

हाय रे पड़की परेवना मोर

कोईली मैना मोर तीर आजा

मोर तीर आजा रानी

खवाहूँ बीरो पान।

कोहरा के लोवा नारे म सरगे

तोर बीना हिरदे म भुर्री बरगे।

मोर तीर आजा

कोचई कांदा मही म राधे

नहीं बता मन कोन कइसे बांधे?

मोर तीर आजा

अमारी भाजी रे अमसुरहा लागे,

आते तै डरेऊठी करम फुटहा जागे।

मोर तीर आजा

खाये रे खीरा चाने पंदोली,

मयार्रूंक सुन लेतेंद मया के बोली।

मोर तीर आजा ….

हिन्दी में अनुवाद -

ओ ! मेरे कुंदरु और करेला की तरह

मजेदार अलबेले छैला तुम

मेरे निकट आओ

मैं तुम्हें बीड़ा पान खिलाऊँगी।

पड़ूंगी और कबूतर की तरह सुन्दर

कोयल और मैना की तरह गाने वाली

मेरी रानी

तुम मेरे करीब आ जाओ

मैं तुम्हें अपने हाथों से पान खिलाऊँगा।

कुम्हड़ा की बातीं (छोटा फल)

उसकी बेल में ही खराब हो गई।

और तुम्हारे बिना मेरे हृदय में आग लगी हुई है।

कचालू की सब्जी बनाने के लिये मठा (छाँछ)

की जरुरत पड़ती है

पर तुम्हीं बताओ मैं अपने इस मतवाले मन

को किस प्रकार बाँध कर रखूं।

अमारी की भाजी खट्टी लगती है,

मेरे जीवन में तुम्हारे बिना खटास आ गया है,

यदि तुम मेरे दरवाज़े आ पाओ

तो मेरी फूटी किस्मत जाग जायेगी।

ककड़ी को खाने से पहले उसके अगले (कड़ु़वा)

भाग को काट कर फेंक देते हैं

मेरे प्रिय तुम भी कड़वाहट छोड़ और अपनी प्यार भरी बोली बोलो।

2 Comments

  1. Comment by Sanjeet Tripathi on November 10, 2007 9:56 pm

    बढ़िया, अब्बड़ सुघ्घर लगिस!!

    देवारी के शुभकामना

  2. Comment by मीनाक्षी on November 11, 2007 11:45 pm

    कुंदरु और करेला से :):):) :) सही है.. मुझे तो ऐसे ही स्वभाव वाले मिले है छत्तीसगढ के लोग.. बढिया … आपके ब्लॉग का नाम भी सुघ्घर लगिस ! देवारी के शुभकामना !!!!

Comments RSS TrackBack Identifier URI

Leave a comment