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प्रसिद्ध् हिन्दी कवितायें

In My Poems (कविताएँ) on September 26, 2006 at 6:19 pm

यह कुछ सुंदर हिन्दी कविताओं का संग्रह है। इनमें मेरे प्रिय कवि गोपालदास नीरज की दो कवितायें भी सम्मिलित हैं।

ऐसी और भी कवितायें “तिरछी नजरिया” पर शीघ्र ही आयेंगी।

कारवाँ गुज़र गया

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से
,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
,
और हम खड़े
खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे!नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
,
पात
-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न
, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए
,
छंद हो दफन गए
,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये
,
और हम झुकेझुके
,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे।क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा

,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा
,
एक दिन मगर यहाँ
,
ऐसी कुछ हवा चली
,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली
,
और हम लुटे-लुटे
,
वक्त से पिटे-पिटे
,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे।हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ
,
हो सका न कुछ मगर
,
शाम बन गई सहर
,
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखरबिखर
,
और हम डरे-डरे
,
नीर नयन में भरे
,
ओढ़कर कफ़न
, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे!माँग भर चली कि एक

, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं
, ठुमक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन
, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा
, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी
,
गाज एक वह गिरी
,
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
,
और हम अजान से
,
दूर के मकान से
,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे।-         गोपालदास नीरज

 ऊँचाई ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते
,
पौधे नहीं उगते
,
न घास ही जमती है।
          जमती है सिर्फ बर्फ,
          जो, कफन की तरह सफेद और,
          मौत की तरह ठंडी होती है।
          खेलती, खिल-खिलाती नदी,
          जिसका रूप धारण कर,
          अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई
,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे
,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे
,
अभिनन्दन की अधिकारी है
,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है
,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं
,
          किन्तु कोई गौरैया,
          वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
          ना कोई थका-मांदा बटोही,
          उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफि नहीं होती

,
सबसे अलग-थलग
,
परिवेश से पृथक
,
अपनों से कटा-बंटा
,
शून्य में अकेला खड़ा होना
,
पहाड़ की महानता नहीं
,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
          जो जितना ऊँचा,
          उतना एकाकी होता है,
          हर भार को स्वयं ढोता है,
          चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
          मन ही मन रोता है।जरूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो
,
जिससे मनुष्य
,
ठूंट सा खड़ा न रहे
,
औरों से घुले-मिले
,
किसी को साथ ले
,
किसी के संग चले।
          भीड़ में खो जाना,
          यादों में डूब जाना,
          स्वयं को भूल जाना,
          अस्तित्व को अर्थ,
          जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं
,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें
,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें
,
          किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
          कि पाँव तले दूब ही न जमे,
          कोई कांटा न चुभे,
          कोई कलि न खिले।न वसंत हो

, न पतझड़,
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़
,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।
          मेरे प्रभु!
          मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
          गैरों को गले न लगा सकूँ,
          इतनी रुखाई कभी मत देना।- अटल बिहारी वाजपेयी  

एक आशीर्वाद

जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।
हँसें
मुस्कुराऐं
गाऐं।
हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलायें।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
- दुष्यन्त कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।हर सड़क पर

, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग
, लेकिन आग जलनी चाहिए।- दुष्यन्त कुमार

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही
, लहरों से टकराती तो है। एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।एक खंडहर के हृदय-सी

, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही
, गाती तो है।एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी

,
पत्थरों से
, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो
, आकाश-सी छाती तो है।- दुष्यन्त कुमार

बरसों के बाद कहीं

बरसों के बाद कभी
हमतुम यदि मिलें कहीं
,
देखें कुछ परिचित से
,
लेकिन पहिचानें ना।याद भी न आये नाम

,
रूप
, रंग, काम, धाम,
सोचें
,
यह सम्मभव है -
पर
, मन में मानें ना। हो न याद, एक बार
आया तूफान
, ज्वार
बंद
, मिटे पृष्ठों को -
पढ़ने की ठाने ना।
बातें जो साथ हुई,
बातों के साथ गयीं
,
आँखें जो मिली रहीं -
उनको भी जानें ना।
-         गिरिजाकुमार माथुर

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में
, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है
, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले
, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा
, आराम करो, आराम करो। आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद
, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में
रामछिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ
, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन
, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है

, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं
, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है
, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं
,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब
सुख की नींदकढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में
, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ
, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है
, कविता सब उमड़ी पड़ती है।मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में
, लेटो, बैठो, आराम करो।- गोपालप्रसाद व्यास

स्वतंत्रता का दीपक

घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ
, यह स्वतंत्रतादिया,
रुक रही न नाव हो
, ज़ोर का बहाव हो,
      आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
      यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है!

यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना
, यह अनंत साधना,
शांति हो
, अशांति हो, युद्ध, संधि क्रांति हो,
      तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं!
      देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है!

तीनचार फूल है, आसपास धूल है
बाँस है
, बबूल है, घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर से
, फूँक दे, झकोर दे,
      कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं!
      यह किसी शहीद का पुण्य प्राणदान है!

झूमझूम बदलियाँ, चूमचूम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रहीं
, हलचलें मचा रहीं!
लड़ रहा स्वदेश हो
, शांति का न लेश हो
      क्षुद्र जीतहार पर, यह दिया बुझे नहीं!
      यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है!- गोपालसिंह नेपाली

ईंधन

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर – कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला
, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थेहँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद – मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

- गुलज़ार  

लो दिन बीता, लो रात गई

लो दिन बीता, लो रात गई,
सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा
,
डूबा
, संध्या आई, छाई,
     सौ संध्या-सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था
,
     दिन में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता
, लो रात गई।धीमे-धीमे तारे निकले

,
धीरे-धीरे नभ में फैले
,
     सौ रजनी-सी वह रजनी थी
क्यों संध्या को यह सोचा था
,
     निशि में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता
, लो रात गई। चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी,
पूरब से फिर सूरज निकला
,
     जैसे होती थी सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था
,
     होगी प्रातः कुछ बात नई।
लो दिन बीता
, लो रात गई,- बच्चन  

रात आधी खींच कर मेरी हथेली

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।
एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग इस संसार में
है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर।
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।
प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अंधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने
पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।
और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ।
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं
?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
-         बच्चन  

प्रयाणगीत

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती -
स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती -
अमर्त्य वीर पुत्र हो
, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं – बढ़े चलो बढ़े चलो।असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी।
सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी।
अराति सैन्य सिंधु में – सुबाड़वाग्नि से जलो

,
प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो बढ़े चलो।
- जयशंकर प्रसाद  

झाँसी की रानी सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में
, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कानपूर के नाना की

, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम
, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह
, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल
, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
,
सैन्य घेरना
, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में
,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में
,
चित्रा ने अर्जुन को पाया
, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

दित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई
,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई
,
रानी विधवा हुई
, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
,
डलहौज़ी ने पैर पसारे
, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी
, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी

राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में
, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर
, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध
, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले
, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
,
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कुटियों में भी विषम वेदना

, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी
,
झाँसी चेती
, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ
, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर
, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत
, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी
, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा
, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली
, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा
, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई,, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार
,
विजयी रानी आगे चल दी
, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था
, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया
, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया
, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा
, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक
, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज
, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी
, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी
,
दिखा गई पथ
, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी
,
होवे चुप इतिहास
, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय
, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी
, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
सुभद्रा कुमारी चौहान 

छिप छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों

कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है नयन सेज पर, सोया हुई आँख का पानी

और टूटना है उसका ज्यों, जागे कच्ची नींद जवानी।

गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों

कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है, खुद ही हल हो गयी सम्स्या

आँसू गर नीलाम हुए तो, समझो पूरी हुई तपस्या।

रूठे दिवस मनाने वालों, फ़टी कमीज़ सिलाने वालों

कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी, शिकन न आयी पर पनघट पर

लाखों बार किश्तियाँ डूबीं, चहल पहल वो ही है तट पर।

तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,

लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन, लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की

तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,खिड़की बंद ना हुई धूल की।

नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों

कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।-गोपलदास नीरज

  1. सभी कवीताऐ अच्छी हैं

  2. धन्यवाद शुऐब व आशीष भाई।
    अभी और भी कविताएँ आना बाकी है।