एकाग्रता एक मिथक है।

ज़माना भी बड़ा जालिम है क़सम से। कहता है भैया एकाग्र रहो, उसी में सार है। बच्चों को एकाग्रता के तरीक़े सिखाये जाते हैं। कुछ बड़े भी आजमा लेते हैं गुरुजी-वुरुजी के प्रवचन में या क़िताबों में पढ़ के। अच्छा है।

पर क्या एकाग्रता एक अपराध नहीं है?

एक दृष्टिहीन कितनी चीज़ें देख सकता है? और एक एकाग्र? और वो कितनी चीज़ें देख सकता है जो देख तो सकता है पर एकाग्र नहीं है?

तो ये फ़र्क है। ज़माने को चाहिये ऐसे भी कुछ लोग जो ज़माने को जानते हों। एकाग्रता चरम पर जब हो तो वो दृष्टिहीनता के निकट होती है। और फ़िर धर्मांधता भी एकाग्रता का एक विस्तार ही तो है।

तो एकाग्र जो होता है वो होता है दृष्टिहीन से बस एक सीढ़ी ऊपर।

इसलिये एकाग्रता एक मिथक है।

3 Comments

  1. Comment by शैलेश भारतवासी on April 4, 2006 2:49 pm

    मित्र हितेन्द्र!
    आपका यह लेख मुझे ओशो (रजनीश) की याद दिला गया,
    अपनी बात रखने के लिये वो आपकी भाँति तर्क देते थे।
    खैर मेरी नज़र में एकाग्रता मन की वह अवस्था जिस समय आप किसी बात पर या विषय पर पूरा का
    पूरा ध्यान दे पाते हैं।

  2. Comment by नारद मुनि।Naradmuni on April 5, 2006 2:18 pm

    नारायण! नारायण!
    भक्त हितेन्द्र तुम्हे ब्लॉग शुरु करने की बहुत बहुत बधाई।लगातार लिखते रहो, आगे बढते रहो, यही नारद का आशीर्वाद है।

  3. Comment by Raviratlami on April 6, 2006 4:00 pm

    चिट्ठाकारों के दल में आपका स्वागत् है.

    इस काली पृष्ठभूमि को जरा उजला रंग दें तो पढ़ने वालों को सुभीता होगा.

    ब्लॉग शुभकामनाएँ

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